बुधवार, 7 अगस्त 2013

अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन

अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन
सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है. सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन
सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है. सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है.
आज भले ही प्रशासन कुछ भी बहाने बना ले परन्तु यह  भी तय है की लोगों की जानों की कीमत सिर्फ बहानेबाजी नहीं होसकती है. हम क्यों भूल जाते है की जिस तरह यह हादसा हुआ उस तरह के कई हादसे इस शहर में हो चुके है. और तब ही नों इंट्री की बात को हवा मिलती है. कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है और प्रशासन भी अपने काम में उसी तरह लग जाता है. जैसे  की कोई बुरा सपना देखा हो. आज जरूरत है की नियमों  पर पुनः समीक्षा हो और यह तय किये जा सके की ऐसे हादसों के लिए पुलिश के आलावा और कौन से कारक है जो सतना के प्रशासन के थू थू करने के लिए जनता को मजबूर करते है. प्रशासन हमें सुरक्षित रखने के लिए पुलिस देती है. पुलिस अमले की जवाबदारी है की जनता के रक्षा करे. प्रशासन ने नियम बनाया की सुबह से रात तक भारी वाहन प्रवेश न करे तो भी प्रवेश होते वाहनों के लिए जिम्मेवार कौन है. क्या पुलिस प्रशासन इतना निकम्मा हो गया की उसके घर के खर्चो के लिए भारी वाहनों के द्वारा दी जाने वाली बकसीस से दिन गुजर रहे है. क्या सरकार को और वेतनमान बढाने की आवश्यकता है ताकि पुलिस वाले इस तरह के नीचतापूर्ण कार्य बंद करने की महान कृपा करे. और नो इंट्री का सख्ती से पालन हो. यह भी सच है की पिछले कुछ महीनों से पुलिश अपहरण कांडो में इतना व्यस्त हो गयी के उसे इस मामले में सोचने का कोई अवसर ही नहीं मिला. प्रशासन को मुख्यमंत्री के स्वागत और सुरक्षा व्यवस्था की चिंता अधिक थी. आम जनता तो सिर्फ इनके लिए कीड़े मकोडो की तरह ही शायद है. दो दिन पहले हुए इस हादसे ने प्रशासन के गाल में जिस तरह का तमाचा लगाया है वह प्रशासन मुख्यमंत्री जी की यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था के दौरान भी नहीं भूलेगा. मन में यह ख्याल क्यों आ रहा था उस दिन की अपने सतना के अमन चैन को भंग करने के लिए कही यह एक राजनैतिक साजिस तो नहीं थी. परन्तु. ज्यादा हताहत दोनों धर्मों के लोग हुए और सबसे ज्यादा फुटपाथ के वो लोग जिनकी न कोई जात थी और न कोई पात. वो तो सिर्फ गरीब थे. एक तरफ गम इस बात का है की प्रशासन की नपुंसकता का एक और नमूना इस रमजान के पाकीज मौके में देखने को मिला .ऐसा लगने लगा है इस शहर में किसी के साथ कुछ भी हो सकता है  परन्तु प्रशासन शिखंडी के तरह मौन बना रहेगा भविष्य में भी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा न किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा न किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. कलेक्टर का देर से पहुँचना और फिर विधायक का आप खोना कहीं न कहीं एक घातक परिणाम की आशंका पैदा कर रहा था. यह दर्द विदारक घटना कई प्रश्न समाज और प्रशासन के सामने खड़े करते है. की क्या इसी तरह से सड़क सुरक्षा व्यवस्था रहेगी. क्या. इसी तरह सड़क आम जन के खून से लाल होती रहेगी. क्या इसी तरह प्रशासन सोता रहेगा. क्या जिलाधीश इसीतरह बहाने बनाते रहेगे. क्या पुलिस से बेहतर जिम्मेवारी जनता निभाती रहेगी.
अब जागने की जरूरत है. शासन और पुलिस दोनों को क्योंकि सिर्फ नियमों को तार तार करने की जिम्मेवारी और आम जन को मौत की शूली में चढाने की जिम्मेवारी बस उनकी नहीं है. बल्कि इन सब से ज्यादा जरूरत है आम नागरिक के मन से अपने प्रति एक सम्मान पैदा करने के लिए अच्छे कर्म  करने की. सिर्फ मंत्रियों और आला कमान के अधिकारियो से पीठ ठोकवा कर जनता का सेवक जनता के लिए लाभकारी और फलदायी नहीं होगा बल्कि जनता के बीच जाकर उसकी सुरक्षा का जिम्मा उठाना ही प्रशासन और पुलिस का प्रथम और अंतिम रास्ता होना चाहिए. यह एक मौका है नो इंट्री के नियमो को सख्त करने और जवानों को मुस्तैद करने का. नहीं तो यह पब्लिक सब जानती है की कहाँ से उसे अपने कदम उठाने होते है और फिर उसके लिए वो किसी से भी इजाजत नहीं लेती है भले ही धरा १४४ क्यों न लगी हो.कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है.
आज भले ही प्रशासन कुछ भी बहाने बना ले परन्तु यह  भी तय है की लोगों की जानों की कीमत सिर्फ बहानेबाजी नहीं होसकती है. हम क्यों भूल जाते है की जिस तरह यह हादसा हुआ उस तरह के कई हादसे इस शहर में हो चुके है. और तब ही नों इंट्री की बात को हवा मिलती है. कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है और प्रशासन भी अपने काम में उसी तरह लग जाता है. जैसे  की कोई बुरा सपना देखा हो. आज जरूरत है की नियमों  पर पुनः समीक्षा हो और यह तय किये जा सके की ऐसे हादसों के लिए पुलिश के आलावा और कौन से कारक है जो सतना के प्रशासन के थू थू करने के लिए जनता को मजबूर करते है. प्रशासन हमें सुरक्षित रखने के लिए पुलिस देती है. पुलिस अमले की जवाबदारी है की जनता के रक्षा करे. प्रशासन ने नियम बनाया की सुबह से रात तक भारी वाहन प्रवेश न करे तो भी प्रवेश होते वाहनों के लिए जिम्मेवार कौन है. क्या पुलिस प्रशासन इतना निकम्मा हो गया की उसके घर के खर्चो के लिए भारी वाहनों के द्वारा दी जाने वाली बकसीस से दिन गुजर रहे है. क्या सरकार को और वेतनमान बढाने की आवश्यकता है ताकि पुलिस वाले इस तरह के नीचतापूर्ण कार्य बंद करने की महान कृपा करे. और नो इंट्री का सख्ती से पालन हो. यह भी सच है की पिछले कुछ महीनों से पुलिश अपहरण कांडो में इतना व्यस्त हो गयी के उसे इस मामले में सोचने का कोई अवसर ही नहीं मिला. प्रशासन को मुख्यमंत्री के स्वागत और सुरक्षा व्यवस्था की चिंता अधिक थी. आम जनता तो सिर्फ इनके लिए कीड़े मकोडो की तरह ही शायद है. दो दिन पहले हुए इस हादसे ने प्रशासन के गाल में जिस तरह का तमाचा लगाया है वह प्रशासन मुख्यमंत्री जी की यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था के दौरान भी नहीं भूलेगा. मन में यह ख्याल क्यों आ रहा था उस दिन की अपने सतना के अमन चैन को भंग करने के लिए कही यह एक राजनैतिक साजिस तो नहीं थी. परन्तु. ज्यादा हताहत दोनों धर्मों के लोग हुए और सबसे ज्यादा फुटपाथ के वो लोग जिनकी न कोई जात थी और न कोई पात. वो तो सिर्फ गरीब थे. एक तरफ गम इस बात का है की प्रशासन की नपुंसकता का एक और नमूना इस रमजान के पाकीज मौके में देखने को मिला .ऐसा लगने लगा है इस शहर में किसी के साथ कुछ भी हो सकता है  परन्तु प्रशासन शिखंडी के तरह मौन बना रहेगा भविष्य में भी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा न किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा न किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. कलेक्टर का देर से पहुँचना और फिर विधायक का आप खोना कहीं न कहीं एक घातक परिणाम की आशंका पैदा कर रहा था. यह दर्द विदारक घटना कई प्रश्न समाज और प्रशासन के सामने खड़े करते है. की क्या इसी तरह से सड़क सुरक्षा व्यवस्था रहेगी. क्या. इसी तरह सड़क आम जन के खून से लाल होती रहेगी. क्या इसी तरह प्रशासन सोता रहेगा. क्या जिलाधीश इसीतरह बहाने बनाते रहेगे. क्या पुलिस से बेहतर जिम्मेवारी जनता निभाती रहेगी.

अब जागने की जरूरत है. शासन और पुलिस दोनों को क्योंकि सिर्फ नियमों को तार तार करने की जिम्मेवारी और आम जन को मौत की शूली में चढाने की जिम्मेवारी बस उनकी नहीं है. बल्कि इन सब से ज्यादा जरूरत है आम नागरिक के मन से अपने प्रति एक सम्मान पैदा करने के लिए अच्छे कर्म  करने की. सिर्फ मंत्रियों और आला कमान के अधिकारियो से पीठ ठोकवा कर जनता का सेवक जनता के लिए लाभकारी और फलदायी नहीं होगा बल्कि जनता के बीच जाकर उसकी सुरक्षा का जिम्मा उठाना ही प्रशासन और पुलिस का प्रथम और अंतिम रास्ता होना चाहिए. यह एक मौका है नो इंट्री के नियमो को सख्त करने और जवानों को मुस्तैद करने का. नहीं तो यह पब्लिक सब जानती है की कहाँ से उसे अपने कदम उठाने होते है और फिर उसके लिए वो किसी से भी इजाजत नहीं लेती है भले ही धरा १४४ क्यों न लगी हो.

सोमवार, 5 अगस्त 2013

डीठ लगी आजादी के समीकरण

डीठ लगी आजादी के समीकरण
आज हम स्वतंत्रता की ६५वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहे है और यह भी जानते है कि आज के समय में कितना जरूरी हो गया है ,समझना कि आजादी के मायने क्या है. जिस तरह के संघर्ष के चलते अंग्रेज भारत छॊड कर गये और भारत को उस समय क्या खोकर यह कीमती आजादी मिली यह हमे हर समय याद रखना होगा. आज  ६० वर्ष के ऊपर होगया है भारत अपने विकसित होने की राह सुनिश्चित कर रहाहै. वैज्ञानिकता, व्यावसायिकता, वैश्वीकरण के नये आयाम गढ रहाहै. आज के समय समाज, राज्य, राष्ट्र और अन्य विदेशी मुद्दे ऐसे है कि आज के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान में पानी फिरता नजर आ रहा है.ऐसा महसूस होता है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज अपने राजनेताओं के गुलाम हो गये है भारत के हर राज्य अपनी जनसंख्या बढाने में लगे हुये है. पहले जहाँ भारत की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन समुचित थे यहाँ के विकास के लिये आज के समय में भारत को हर क्षेत्र में आयात ज्यादा और निर्यात कम करना पड रहा है,भारत ने जितना विकास किया और विकास दर बढाई है उतना ही भारत की मुद्रा स्फीति की दर में गिरावट हुई है. आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने के लिये जगदोजहद करने में लगा हुया है. और दूसरी तरफ आतंकवाद, और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे भी कहीं ना कहीं भारत को घुन के समान खत्म करने में लगे हुये है. ऐसा लगता है कि गाडी की लाल बत्तियाँ वही है सिर्फ सवारियाँ बदल गयी है. आज जो भी राज्य और केंद्र की कुर्सी में बैठ रहाहै वह सब अपने राजनैतिक समीकरण बनाने में लगे हुये है.आज के समय में भारत का संविधान भी सुरक्षित नहीं है.इसके साथ साथ भी खिलवाड करने , बलात्कार करने से राजनेता बाज नहीं आरहे है,आज के समय में भाषा गत मुद्दे, क्षेत्र के मुद्दे,जाति धर्म के मुद्दे इस तरह छाये हुये है कि उसके सामने देश को प्रगति और विकास के विचार विमर्श करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है. राष्ट्रीय पार्टी के नाम पर यूपीए, और एनडीए गठबंधन अपनी सरकार बनाने में लगे हुये है. आज सिफ भारत को भौतिक रूप से आजादी मिल गयी है परन्तु सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक, आजादी के सामने भारत आज भी पाश्चात सभ्यता के पीछे घिघिया रहा है.
  आज के समय सिर्फ राजनैतिक समीकरण बनाने के किसी के पास कुछ भी नहीं सूझता है. चाहे वह छात्र नेता हो या राजनैतिक मठाधीश सभी अपने अपने समीकरण से कुर्सी की राजनीति के दलदल में अपने को डुबोने मे लगे हुये है. राजनैतिक स्थिति यह है भितरघात से बचने की कोशिश में खुद भी भितरघाती बन जाते है. आजादी के बाद आज के समय मे एक सर्वहारा वर्ग से पूँछे की बाबा तुम्हे आजादी के पहले और बाद में क्या अंतर दिखाई पडता है तो चाहे किसान हो, मजदूर हो, बुजुर्ग हो, या कामगार हो वह सब यही कहेंगें कि पहले साहूकारों से, बिचौलियों से कर्जा लेकर अपना जीवनयापन करते थे आज सरकार घर आकर जबरन कर्जा दे जाती है. और फिर मार  मारकर वसूल करती है. आज पाश्चात सभ्यता का प्रभाव है कि दो पीढियाँ एक साथ टेलीविजन का मजा नही ले सकती है. कब शीला की जवानी. टिकू जिया, जलेबी बाई जैसे गाने बडे बुजुर्गों को अपने साथ बैठे नाती पोतों से अलग उठ कर जाने के लिये विवश कर देंगें यह वो भी नहीं जानते है.आज के समय में सब कारक उठे है परन्तु आज के समय  में सिर्फ चारित्रिक अवमूल्यन इस तरह हुआ है कि ऐसा लगता है हर रिश्ते बेमानी से है. सगा बाप अपनी बेटी के साथ बिस्तर में शारीरिक संबंध बनाता है और समाज उसे सिर आँखो में बिठाता है.आज के समय मे आरक्षण की आग इस तरह फैली हुई है कि आज के समय में आरक्षित जातियाँ ही इसका दुरुपयोग करने में लगी हुयी है. और सवर्णों को आरक्षण की आवश्यता आन पडी है.आज के समय बौद्धिक आजादी के नाम पर लोग अन्य जातियों धर्मों को गाली देने में अपनी शान समझते है. आज के समय में रुपया डालर और अन्य देशो की मुद्राओं की तुलना में लगातार गिरता ही जा रहा है.आज के समय में मँहगायी सुरसा की तरह अपना मुह फैला रही है और गरीबी को निगलने में आतुर है. आज लोकतंत्र में तंत्रलोक मिलता नजर आरहा है. और पब्लिक प्रापर्टी को लोग अपने घर की जागीर समझ कर अतिक्रमण करने में उतारू होगये है. आज के समय सिनेमा और खेल दोनो सेंसर और डोपिंग टेस्ट की कगार में खडे हुये है. पूरा देश अपनी आजादी के गुमान और गुरूर में इतना मादक होगया है कि उसे ना अपने अतीत के संघर्ष की फिक्र है और ना इस बात का भान है कि भविष्य में भी कोई उसे फिर किसी तरीके से अपना उपनिवेश बना सकता और वो कुछ भी नहीं कर सकता है. आज के समय में भारत के पडोसी ही दुश्मन बने हुये है,. और तब पर भी भारत उनसे भाई चारे की बाँह फैलाये गले लगाने के लिये आतुर नजर आता है. इतने वर्ष होने के बाद भारत आज भी वैचारिक रूप से गुलाम है. बस गुलाम बनाने वाले अपना नकाब बदल लेते है. आज के समय में नपुंसक केंद्र की सत्ता अपने घरेलू लडायी में ही उलझी नजर आती है. आज के समय में लाल किले में तिरंगा फहरा लेने , परेड की सलामी लेलेने से, और संसद मे बैठ कर जूतम पैजार करने भर से सच्ची श्रृद्धाँजलि होगी तो यह सरासर गलत है. आज के समय में जरूरत है कि बेरोजगारी को कम करके आने वाली पीढी को आतंकवादी, अराजक, और डकैत बनने से रोका जाये, पलायन करने से रोका जाये. और यह प्रयास किया जाये कि नजर लग चुकी आजादी का अपने प्रयासों के सार्वभौमिक बनाया जाए नहीं तो. आज के जनप्रतिनिधि... प्रति जन निधि संचय करने में अपने आप के साथ साथ देश को भी विदेशियों के हाँथों बेंचते रहेंगें और आम जनता देश की आजादी के जश्न मनाती रहेगी.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना.

रविवार, 4 अगस्त 2013

क्षेत्र के विकास में राजनैतिक बट्टा.

क्षेत्र के विकास में राजनैतिक बट्टा.
केंद्र की राजनीति में फिर से एक नया मोड आगया है. जिसके तहत नये राज्यों की माँग जोर पकडती जा रही है. और इसके चलते लोकसभा के चुनाव भी प्रभावित होने के आसार नजर आने लगे है, तेलंगाना की घोषणा के बाद जिस तरह का माहौल आंघ्राप्रदेश में बना हुआ है वह एक राजनैतिक नौटंकी के अलावा और कुछ भी नही है. और यह भी तय है कि मंत्रियों का इस्तीफा इसका एक भाग है हम सब जानते है कि देश के विकास में नये राज्यों के विकास का मह्त्वपूर्ण योगदान रहाहै.
भारत जैसे गणतंत्र और लोकतांत्रिक लघुमहाद्वीप में जितने अधिक नये राज्य या प्रदेश बनेंगे उतना ही अधिक देश का विकास तय है. और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. हाँ यह भी तय है कि यदि केंद्र सरकार मजबूती से राज्य सरकारों में अपना सामन्जस्य बना कर रखे तो देश दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा क्योंकी एक समान भाषा ,बोली, और संस्कृति वाले लोग अपने समान व्यवस्था के चलते जीवन यापन करेंगे और उस क्षेत्र का समुचित विकास भी करेंगें क्योंके उनके पास समुचित सत्ता का अधिकार और अर्थ मौजूद होगी. आज भी केंद्र सरकार के पास राज्यों के द्वारा अनुमोदित बहुत से ऐसे प्रस्ताव है जिसमे नये राज्यों को बनाने का प्रस्ताव रखा गया है और वह है कि इस प्रस्तावों पे इसलिये गौर नहीं कर पा रही है क्योंकी कहीं ना कहीं उसके स्वार्थ की चपातियाँ यहा नहीं सेंकी जा रही है. और उसे इस  वक्त भारतीय जनता पार्टी की छीछालेदर करने से फुरसत कहाँ है.
आज के समय में देश में लगभग ३० राज्यों को बनाने की माँग तेज हो गयी है और इस माँग का उठना इसलिये जायज है क्योंकी इस जरिये ही सही उस क्षेत्र का विकास और तेजी से होगा . इस बारे में संबंधित राज्य सरकारों ने पहले से केंद्र के पास अनुमोदन भेज दिया है और और इस इंतजार में है कि कब कैबिनेट इस पर अपनी मोहर लगा देगा. जिसके चलते काफी लंबे समय चल रहे आंदोलनों और संघर्ष को देर से ही सही विराम तो मिलेगा. परन्तु परिणाम सिर्फ सिफर आ रहा है. तेलंगाना के बनने से ही माहोल इतना गरमा गया है अब केंद्र की हिम्म्त ही नहीं है कि वह और राज्यों की माँग को अपने ठंडे बस्ते से निकाल कर पब्लिक के सामने नया परिणाम रखे. आज के समय में तेलंगाना ,विदर्भ, गोरखालैड, कार्बी. बोडोलैड, कामतापुर,मिथिलांचल, बुंदेलखंड, बघेलखंड , सौराष्ट्र, विंध्यप्रदेश, सीमांघ्र, ब्रजप्रदेश, सहित ३० राज्यों की कहानी आज क्या होने वाली है यह कोई नहीं जानता है,. हमारे देश का संविधान भी कहता है कि यदि क्षेत्र का विकास नये राज्य बनाने से होता है तो राज्य , जिले ,कस्बे, और नयी तहसीले बनाने में कोई हर्ज नहीं है. यदि इन राज्यों के बनाने में मुद्रा और मानव संसाधन खर्च होता है तो इन जगहों में उपस्थित प्राकृतिक संपदा और जन शक्ति से नये विकास के पथ भी खुलते है. और इससे भारत के विकासशील देश से विकसित देश के रास्ते और साफ होंगे.जो लोग यह कहते है कि इस तरह के विकास से क्षेत्रवाद पनपता है और व्यक्तियों राजनीति, धर्म, जाति, क्षेत्र , भाषा के नाम में बाँटने की एक साजिस है , तब मुझे उनसे एक ही प्रश्न करने का मन करता है कि आज ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहाँ पर राजनीति नहीं है. और यदि विकास के लिये बंटवारा होता है अच्छा है.मैने अभी देखा है कि छत्तीसगढ बना, झारखण्ड बना, उत्तरांचल बना. कहाँ पर विकास नहीं हुआअ. है यह तो तय है कि यदि क्षेत्र का निर्माण हो रहा है और वहाँ का कोई नेतृत्व नया प्रदेश बनाने में लगा हुआ  है तो वहाँ का विकास तय है कि होगा. पर यह बात भी तय है कि नया राज्य बनाने और उसकी राजधानी बनाने के साथ केंद्र सरकार को नयी जिम्मेवारियों को ढोने  के लिये कंधों को मजबूत करना पडॆगा. और इस मामले में शायद हमारे देश के केंद्र में बैठी सरकार की स्थिति अभी उतनी परिष्कृत नहीं है इसी लिये वो क्षेत्रवाद को मुद्दा बनाकर नये राज्यों को गठन करने मे आना कानी करने में लगी हुयी है. हो सकता है कि मेरा नजरिया आप सभी से अलग हो. परन्तु मेरा मानना है कि नये राज्यों के गढन में संभावनायें भी है और आशंकाये भी संभावनायें इस लिये है कि प्रगति और विकास का नया रास्ता खुलेगा और उस क्षेत्र के लोग ज्यादा तीव्रता से विकास करेंगे और देश का विकास होगा, आशंकायें इसलिये है कि वोट बैंक में  यह देखा जायेगा की केंद्रीय पार्टियों में किसका पक्ष ज्यादा मजबूत हो रहा है , भाजपा का या काग्रेस का. क्योकीं केंद्र की पार्टी का यदि वोट बैंक कमजोर हो जायेगा तो नये राज्य कभी ना बनेंगें. चाहे कोई जितना भी सर पटक कर मर जाये. इसलिये मुझे लगता है कि देश की आज की स्थिति को देख कर लगता हैकि आज जिस तरह भ्रष्टाचार, बढ रहा है और चरित्र का पतन हो रहाहै . उसके लिये देश को जरूरत है कि नये आयाम खोजे जाये ताकि विकास के नये कदम बढाने में मदद मिले. और इस हेतु नये राज्यों का गढन बहुत आवश्यक है. क्योंकि इसके बिना पिछ्डे क्षेत्रों के अविकसित लोगो को आँगे बढने का मौका मिलना तय है नहीं तो ये राजनीतिज्ञ अपने वोट और स्वार्थ के चलते नये राज्यों की फाइले ठंडे बस्ते में ही डाले रह जायेगें.

शनिवार, 27 जुलाई 2013

बेरहम भूख और गरीबी ,कब से नेताओं के करीबी...



बेरहम भूख और गरीबी, कब से नेताओं के करीबी,...

पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि इस समय सत्ता पक्ष के नेता नपाडी गरीबी और भूख का अच्छा खासा तमाशा बनाये हुये है.जिसको देखो वो ही इस पर ढेर सारे कमेंट करके अपने को मीडिया के सामने ग्लोबलाइज करना चाहता है.खाना ,रोटी-सब्जी, दाल-चावल, इन सब का हिसाब रखने की कोशिश में लगे हुये है. और अपने बयानो के जरिये जनता का ध्यान खींचने की कोशिश करने में लगे हुये है. ऐसा लगता है कि जैसे बंदर के हाँथों मे अदरक लग गयी है और वह उसके स्वाद पाने के लिये बौराया फिर रहा है. इस खाने की कीमत का हिसाब लगाने वाले ये जनप्रतिनिधि आज तक अपने घर में खर्च होने वाले सामान्य खर्चों का हिसाब नहीं लगा पाये है. और आज इस देश का दुर्भागय की वह सब आज भूख, भूखे, गरीब गरीबी. भोजन और खिलाने वालों का हिसाब लगाने लगे है.राजनीति के धतूरे से बावरे हुये ये सब चुनाव २०१४ की जगदोजहद में अपने बयानों से वोट इकट्ठा करने की जिस तरकीब को जनता में आजमाने में लगे हुये है. पर वो भूल जाते है कि आज के समय की पब्लिक सब जानती है कि इस वक्त सरकार भी सिरफिरी हो गई है और जो जैसा चाहता है वैसा बयान देकर मीडिया में छाना चाहता है. ताकि जब चुनाव लडे तो उसको उस प्रोपेगेंडा का लाभ मिल सके और अपनी पार्टी का शुभचिंतक बन सके.यह पूरा देश इस वक्त इसी तरह की आग से जल रहा है. यहाँ दलाली, कलाली, मवाली, से लेकर धरम और कुकर्म की मंडी बनती जा रही है. राजनीति के अखाडे है. औरतों का क्रय विक्रय करने वाले अब बयानबाजी पे उतारू हो गये है. गिरोहबाजी का यह हाल है कि इस वक्त चुनाव की स्थिति का कुप्रभाव दिखने लगा है ..इसी वजह से राज बब्बर जैसे नेता अब होटल और ढाबे के सस्ते खाने की चिंता करने लगे है और भी अन्य नेता साथ साथ अपना हाथ इस बहती गंगा में धोते जा रहे है. खान १२,५,३,२, या एक रुपये में मिले तो भी इन सभी को क्या फर्क पडता है ये तो १२ लाख से १२ करोड के मूत्रालय में मूत्र विसर्जन करते है. और बात करते है गरीबों के ससते खाने की शायद वो नहीं जानते है कि
"भूख जब जवान होती है, जिंदगी एक इंतिहान होती है, एक कदम भी कोई चल नहीं पाता, पैरो में जब थकान होती है," जिन्हे आज तक रुपयों के दम पर नीलाम की गई हर फरमाईसो को पूरा किया गया हो वह क्या जानेगा कि खाना २ रुपये में कहाँ मिलता है. यदि एक पता पूछा जाये तो इन नेताओं के मुँह में दही जम जायेगा. तब किसी के मुँह से कोई शब्द नहीं निकल सकता है.
    एक बात और मैने देखा है कि इस तरह की बयान बाजी के चलते हमारे प्रधानमंत्री जी, सोनिया जी और अन्य काँग्रेस की पैरवी करने वाले लोग किस बिल में घुस जाते है समझ में नहीं आते है. राहुल गाँधी की तो बोलती बंद हो जाती है और सरकार की अस्मिता में बट्टा लगाने वाले सरे राह लूट ले जाते है,आज भी आम आदमी के कुछ आम सवाल जो जबाव नहीं दे पाये उन्हे इस बात जिक्र करने का तो कोई हक नहीं है. ये सवाल आपसे सोचता हूँ कि साझा कर लेता हूँ. २५० रु का गैस सिलेन्डर ९५० रु का क्यो दिया जा रहा है. १४रु किलो की चीनी ५० रु किलो में क्यों दी जा रही है.३५ रु लीटर का पेट्रोल ७५ रु लीटर में क्यों मिल रहा है. २५ रु किलो की दाल ९० रु. किलो में क्यों मिल रही है. और तो और १५ रु किलो का टमाटर ८० रुम, किलो में क्यों मिल रहा है. राज बब्बर साहब शायद इन सवालो के जवाब देने में किनारा कर सकते है क्योकी उनकी सरकार ही इस सब प्रश्नों की जिम्मेवारी ले सकती है.यदि मुम्बई की बात करते है तो उन्हे यह भी पता होना चाहिये कि मुम्बई के कई बडे अस्पतालों के पास कुछ ऐसे धर्मशालाये है जहाँ मरीजों और उनके साथियों को मुफ्त में भोजन कराया जाता है. और हम गुरुद्वारे के लंगरों को क्यों भूल जाते है जिसमें हर रोज अनगिनत आने वाले भक्त जनों को मुफ्त में भोजन कराया जाता है. आज के समय में इतने रुपये में मरने के लिये जहर तक नसीब नहीं होता है परन्तु खाये अघाये लोगो की यह प्रवृति होती है कि वह अंगुली करने में लगे रहते है . ना किसी को चैन से रहने देते है. और ना खुद चैन से रहते है. आज के समय में यह सच है कि भारत दिनों दिन गरीब होता जारहा है. विकास दर की तीव्रता और जनसंख्या दर में तीव्रता दोनो एक साथ चल रही है. और कोई चाह कर भी इसे नहीं रोक सकता है. परन्तु जिस जनता ने इन नेताओं को संसद पहुँचाया है वह शायद भूल गये है कि सिविल लाइन और संसद के अंदर के रेट और बाहर के रेट में बहुत अंतर होता है. योजना आयोग जिस ३४ रुपये की इतनी पैरवी करता चला आ रहा है वह भी प्रायोगिक आँकडो से बहुत दूर है और आज के समय पर देश के बाह्य और आँतरिक खतरों के मुद्दे तैयार हो रहे है उनपर चर्चा और बयान आना चाहिये परन्तु उन पर कोई एक भी मुद्दा नहीं सामने आता है. सिर्फ गरीब गरीबी और भूख का मुद्दा ही उछालने की जो नंगी प्रवृति है वह् कहीं ना कहीं देश को तबाह और बर्बाद करने की पहल करने में सहायक होती शाबित हो रही है. रही बात भूख की तो सिर्फ इतना ही कहता चाह्ता हूँ कि फुटपाठ मे पडे बेबस गरीब से पूँछो तो जवाब यही आता है कि
बेरहम भूख मौत से बडी होती है.
सुबह मिटाओ शाम खडी होती है.

और कालिका त्रिपाठी जी की ये पक्तियाँ याद आती है. कि
"सियासत में इलाही और कितने सीन देखेंगे
हरे बस्तर में बिछती खून की कालीन देखेंगे
बडी संजीदगी से रहनुमाई बेरहम होगी
बडी शर्मिंदगी से मुल्क की तौहीन देखेंगे."


- अनिल अयान, सतना.

मौत की डील बनी मिड डे मील.......



कब तक सहे
मौत की डील बनी मिड डे मील.......
अनिल अयान,

उडीसा , गोवा और बिहार के स्कूलों  में घटी एम.डी.एम. की कहानी खत्म कर के रख दी है. मिड डे मील यानी मध्यान भोजन योजना का क्रियान्वयन जिस उद्देश्य को लेकर किया गया था. वह किनारे चलागया है. मिड डे मील का हाल बिहार के स्कूलों में होना और फिर गोवा और उडीसा के स्कूलों में इसकी पुनरावृत्ति यह पुष्टि करती है की हमारी सरकार बच्चों को किसी फिल्म का पात्र बना कर रख दी है. रियल स्टोरी की बजाय रील स्टोरी की बात ज्यादा इसमें जान पडती है. जिस समय यह बयान सामने आया कि खाना खाने के तेल से नहीं बल्कि वाहन चलाने वाले तेल से बनाया गया था. तब मुझे लगा जैसे कि मिड डे मील कोई लाभकारी योजना नहीं बल्कि बच्चों की जिंदगी को शील करती मौत की डील है. मौत की वह डील जो सरकार और समाज के वो स्वसहायता समूह  चला रहे है जिनके बच्चे खुद भी उसी स्कूल में पढाई कर रहे है. अब हम यह कह सकते है कि स्वार्थ की भूँख इतनी ज्यादा बढ गई है कि आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों को और उनकी मासूमियत को मौत के घाट उतार कर खून से सना खाना उन्ही नन्ही सी जान को परोसा जा रहाहै और नेता और संबंधित अधिकारी गण सरकार की इस योजना को धता बताकर अपने धतकरम में बहुत ज्यादा खुश हो रहे है. यह शुक्र है कि इस बार यह सब सतना के स्कूलों में नहीं घटा वरना हर बार इस योजना को टटोलने में पता चलता है कि यह योजना में छेद करने वाले और इसकी सतह को छन्नी बनाने वाले इसी के अंदर छिपे हुये है. जैसे कि घुन गेंहूँ के अंदर छिप कर उसे खत्म कर देता है. मै कभी कभी यह सोचता हूँ कि जिन लोगो को यह काम सौपा जाता है वह इस तरह के काम को अंजाम तक पहुँचाने में कोई परहेज क्यों नहीं करते है. क्या इनको यह नहीं लगता है कि उन नन्हे मुन्हे बच्चों के माता पिता के दिल में क्या गुजरेंगी. और खुदा ना खासता यदि खुद के घर में इसी तरह हो जाये तो इन सबका क्या हाल होगा.

          सरकार की ये योजना बच्चों को स्कूल तक ले जाने की और उन्हें पौष्टिक भोजन मुहैया  कराने की थी परन्तु यह दूसरा ही अंजाम सरकार को दिखा रही है. यह योजना किसी तरह की खामी नहीं रखती है परन्तु इसके क्रियान्वयन और मानीटरिंग की कहानी बिगडी ही रहती है. जब सही ढंग से इस योजना के हर स्तर को निगरानी में रखा जायेगा तो यह तो तय है कि इस तरह का भ्रष्टाचार कम होगा और घोडे में लगाम भी लगेगी.इस तरह के अपराधियों को सजायें मौत की सजा ही तय होना चाहिये. परन्तउ भारत की न्यायपालिका इतनी लचर है कि इस तरह के अपराध उनकी नाक के नीचे भी हो जाये तो भी वो अपना निर्णय सुनाने में सदी गुजार देती है. कई लोग तो इस तरह की घटनाओं में अफसोस जाहिर करके रफा दफा कर देते है.यदि यही घटना किसी बडे स्कूल में या किसी बडे कालेज के कैंटीन में हो जाये तो सरकार समाज और समाज सेवी संगढन स्कूल की नींव तक खोद डालेंगें.परन्तु इस मामले में तो कोई भी कुछ नहीं प्रतिक्रिया या और कुछ बयान बाजी नहीं कर रहा है. क्योकीं सब जानते है कि चुनाव के मौसम में रिस्क लेना खतरे से खाली नहीं है. और कोई भी तालाब में रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं लेना चाहते है. आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों के लिये कोई संगढन आँगे नहीं आना चाहता है. ना कोई जन प्रतिनिधि जुबान खोलना चाहता है. देश के प्रधान मंत्री जी तो अपने अगले चुनाओं के वोटो की गणित को बनाने में लगे हुये है. और अन्य जन प्रतिनिधि चूहों की तरह अपने बिलों के अंदर छिप गये है. जैसे सभी चूडियाँ पहन ली हों यह सच है की इस तरह की योजना सिर्फ बच्चों का पढाई में व्यवधान पैदा करने के अलावा और कुछ काम नहीं करती है. पूरे खेतों का कचडा और स्तरहीन अनाज गरीबों में बाँटने और एम.डी.एम. में खर्च करने के लिये ही आता है. सरकार की चाहे आँगनवाडी योजना हो या यह योजना इसके अनाज को जब कोई खरीद कर अपने दुधारू पशुओं के भोजन में मिलाकर दूध की पैदावार बढाता नजर आता है तो बहुत दुखः होता है और शर्म भी आती है क्योंकी जिस अनाज को पशुओं के भोजन के लिये प्रभारी से ब्लैक में खरीदा जाता हो और उसे स्वेत क्राँति की दर को बढाने का काम किया जा रहा हो उस तरह के भोजन को आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों की मौत का सामान तैयार करना कहाँ तक उचित है. इससे बेहतर कि उन्हे सल्फास की गोलियाँ ही देकर खत्म कर सरकार अपनी योजना पूरी कर ले.इस तरह की गतिविधि केन्द्र्सरकार और संबंधित राज्य सरकार को जनता के प्रश्नों का शिकार बना देती है. मुझे लगता है इस तरह की मील से बेहतरहै की सरकार बच्चों को कच्चा खाना अच्छे स्तर का मुहैया कराये. स्कालरशिप दे. अनुदान दे, रोजगार का मौका दे. परन्तु इस तरह की मौत की डील को बंद कर. समाज , शिक्षक और बच्चों का अमूल्य समय जीवन और क्षमता तो ना नष्ट करे. अन्यथा सरकार के इस तरह के कार्य नेकी कर और दरिया मे डाल वाली परिस्थित ही पैदा करने में कारगर होगी. और इसके अलावा और कोई फायदे मंद परिणाम देने में हिजडे की तरह ही शाबित हो पायेगी. सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि वो स्वार्थके चक्कर में अपने आगामी वोटरों को जाने अंजाने मौत के घाट ही उतारने में तुली हुयी है.

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र


किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र
३० जुलाई को मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म दिवस है. सोचता हूँ कि प्रेम चंद्र में क्या था जो हर वर्ग अपना माई बाप मान कर उनके नाम से ऐश करना चाहता है. चाहे प्रगतिशील हों, चाहे वाम पंथी हों, चाहे भारतीय संस्कृति के पोषक संस्थायें हो. और चाहे कायस्थ समाज हो सब प्रेमचंद्र के नाम की सोने की मोहर को लिये भँजाने की कोशिश में लगे होते है. सभी का यह मानना है कि प्रेमचंद्र जैसा युग दृष्टा उपन्यास कार और कहानी कार शायद ही भविष्य में भारत की धरती में भविष्य में पैदा होगा. लेकिन भारत में लोगों की फितरत रही है कि जब भी कोई फर्श में होता है उसकी कोई पूँछ परख नहीं होती है और जब कोई अर्श में होता है तो सब उसे ही अपना माई बाप मान लेता है. यही सब करते चले आये है.
    प्रेमचंद्र जिन्हे कहानी और उपन्यास का चितेरा जादूगर कहा जाता है.उनकी हर कहानी आज भी कुछ न कुछ बयान करती नजर आती है. वो जैसे उस समय भविष्यवाणी करके चले गये थे कि उनके पात्र वर्तमान परिस्थितियों के फ्रेंम मे उसी तरह फिट होंगे जैसे की वो उस वक्त हुआ करते थे. हर पात्र आज भी काल जयी बना हुआ है और भविष्य में भी बना रहेगा. प्रेमचंद्र की कहानी और उपन्यास की फेहरिस्त की बात करें तो शायद आज वह उपयुक्त समय न होगा क्योंकी आज यह बात करना जरूरी है कि जिस व्यक्ति का काम उसके नाम को इतना आँगे बढाया है कि उसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया हो. उसके लिये इस तरह की गुटबाजी कहाँ तक उचित है. और कहाँ तक यह बात सही है कि प्रेमचंद्र को लेकर इस तरह के विवाद पैदा करे. प्रेमचंद्र ऐसे कहानी और उपन्यासकार है जिनकी सोजे वतन जैसी कृति स्वतंत्रतापूर्व जला दी गई थी.और उसके बाद से ही उन्होने यह प्रेमचंद्र लबादा ओढ कर अपना लेखनकार्य शुरू किया जो अनवरत चलता रहा. लोग कहते है कि प्रेम चंद्र  कब तक चलेंगें और इस सदी तक लोग प्रेमचंद्र के नाम को जानेगें. उन सब का जवाब यही है कि प्रेम चंद्र वो नाम है जो हिन्दी साहित्य के समापन के साथ ही खत्म होगा. उसके पहले ना वो खत्म हो सकता है और ना कोई खत्म कर सकता है. देश में ही नहीं वरन विदेश में भी जहाँ पर हिन्दीप्रेमी है वो प्रेमचंद्र के दीवाने है. प्रेमचंद्र को भारत देश ही नहीं वरन पूरा विश्व अध्यन कर रहा है. प्रेम चंद्र का कथासम्राज्य इतना विस्तृत है कि कोई पाठक जितना चाहे उतना पढे,उसे गढे और एहसास करे कि प्रेमचंद्र किस कलमकार का नाम है.
   आज प्रगतिशील लेखक संघ,दलित लेखक संघ,हिन्दी साहित्य परिषद,हिन्दी साहित्य सम्मेलन, और कायस्थ समाज जैसे संगठन प्रेमचंद्र के नाम की रोटियाँ सेकने की कोशिश में लगे हुये है. सब प्रेमचंद्र को अपना गाडफादर मान कर उसके नाम की असर्फियाँ भुनाने मे लगे हुये है.प्रगतिशील लेखक संघ ने तो यह सोच रखा  है कि प्रेमचंद्र उसी के नाम पेटेंट है और इसका नाम कोई भी उपयोग नहीं कर सकता है क्योंकि प्रगतिशील लेखकों का मानना है कि प्रेमचंद्र ही वह कथाकार है जिसने हर सर्वहारा वर्ग की पीडा का वर्णन किया है. जो प्रगतिशीलता का सबूत है. इसी तरह दलित लेखक संघ का मानना है कि प्रेमचंद्र उनके माई बाप है जिन्होने दलितो की पीडा अपनी कहानियों में लिखा है,. मै भी मानता हूँ कि उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का दर्शन, दलितों की पीडा, और सर्वहारा वर्ग की मार्मिक दास्तान लिखी है और उनकी किसानों के लिये लिखी गयी कथायें अद्वितीय है. पर क्या इसका मतलब यह है कि हम उनके नाम को अपने बाप की बपौती बनाकर नाम का दुरुपयोग करें.क्या यह काफी नहीं है आज भी सरकार ने प्रेमचंद्र सृजनपीठ का गठन करके प्रेमचंद्र का नाम अमर कर दिया है और उस पर कहानियों के लिये काम भी किया जा रहा है.शोध का काम हर जगह किया जा रहा है. मै इतना जानता हूँ कि प्रेमचंद्र को पढना हमारी मजबूरी है यदि हम एक अच्छे पाठक है क्योंकि आज जो लिखा जा रहा है वह अकालजयी है ज्यादा समय तक याद नहीं रहता है. और यदि आज भारत में हिन्दी साहित्य के अंतरगत कहानी और उपन्यास में किसी को पढना है जो आज से कई दशक पहले भी कालजयी था और आज भी कालजयी है ,आने वाले कई दशकों में भी कालजई रहेगा तो हमारी विवशता है प्रेमचंद्र को पढना ही पडेगा.क्योंकी हमारे पास कोई आप्शन ही नहीं है. प्रेमचंद्र की कहानियाँ एक दर्द को बयान करती है जो एक किसान का है, सर्वहारा वर्ग का है, दलित का है, और उस सभी व्यक्ति का है जो दबा और कुचला है अत्याचार से ग्रसित है. यदि इस बिन्दु को लेकर सब अपने अपने तरफ प्रेमचंद्र को खींचना शुरू कर देंगे तो यह दिन दूर नहीं होगा जब प्रेमचंद्र के विचारो को खून के आँशू बहाना पडेगा. और साहित्यकारों को इतना भी वख्त ना मिलेगा कि वह मुंशी प्रेमचंद्र की मैयत मे जाकर आँशू बहा सकें. शायद यही नियति का विधान है. आज के समय मे चाहिये कि बिना उन्हे अपने घर की बपौती माने उनके कार्यों पे चर्चा होनी चाहिये. उनके कार्यों पे शोध होना चाहिये और ऐसे कार्य होने चाहिये कि जिस पर सभी को गर्व हो जिसको आगामी पीढी अनुगमन कर सके और यह जान सके कि भारत का साहित्यिक इतिहास कैसा था. यदि हम इसी तरह गृह युद्ध मचाते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जब प्रेमचंद्र की विचारधारा इन विभिन्न पंथियों के घर में टंगे मृग खाल की तरह हो जायेगी और पाठक बेचारा विवश होगा साहित्य मे मचे यह कुरुक्षेत्र का साक्षी बनने के लिये.
अनिल अयान,सतना

मंगलवार, 25 जून 2013

बारिश से धुलता नगर निगम का मेकप

बारिश से धुलता नगर निगम का मेकप
बरसात आते ही हमारे आसपास जब बाढ के बाद जल भराव की स्थिति निर्मित होने लगे तो ऐसा लगता हैकि दौंगरा के गिरने के पहले ही सब कुछ लबालब हो गया है. लबालब सडक,घर-घाट,पार्क,मैदान और सबसे बडी बात नालियाँ भी लबालब.क्या किया जासकता है सब नगर निगम की मेहरबानी है. नालियों का पानी जब सडक से बहने लगे  और सडक भी नाली की तरह दिखने लगे तब ऐसा लगता है कि ये भी सावन मनाने लगी है. और इनको भी बारिस का सुरूर छाने लगा है.बेचारी नौतपा से तपी नालियाँ अपने ऊपर पानी के बहाव बर्दास्त नहीं कर पाती है. और इस तरह बारिस बता देती है कि नगरनिगम के सफाई कर्मचारियों ने कितनी सफाई से इन्हे साफ किया है. और कैसे कैसे धतकरम किये है. और उनके कार्यों की औकात कितने समय तक है.ब्लैक आउट में बिजली विभाग का भी यही रोना रहता है.पहले तो जनता इस लिये झेलती थी कि मेंटीनेंस की वजह से कटौती झेलनी पडती थी. और अब तो वह इस लिये परेशान है कि लोवोल्टेज की वजह से या हाई वोल्टेज की वजह से सारे बिजली के सामान फूँक जाते है.एक सामान्य सा कलाम स्वच्छ सतना अपना सपना वह इन सब के चलते अधूरा सा लगता है. यही वजह है कि सतना राज मार्ग और राष्ट्रीय मार्ग के आस पास और कुछ वार्डों को छोड कर सामान्य रूप से स्थिति दयनीय है.बारिस के समय में कालोनियों के अंदर घुसते ही बरसात का टाँडव अपने आप दिखाई देने लगता है. जैसे बरसात नहीं कोई सुनामी आकर अपना काम करके लौट गई है. नगरनिगम का वार्षिक बजट जितना है उसमें से एक तिहाई भाग वार्ड के विकास में खर्च होना चाहिये. कई जगहों पर बहुत ही काबिले तारीफ काम हुआ है. अच्छी नालियाँ भी बनाई गयी थी. परन्तु आज भी वहाँ गंदगी का अंबार लगा हुआ है. यह सच है कि काम तो इफरात किये गये परन्तु रखरखाव के नाम पर शून्य कदम तय किया गया,यह वही कदम है जो सिर्फ़ सोचा जाता है. और उसके लिये नियुक्तियाँ की जाती है.वेतनमान भी बनता है और एक समय के बाद उनसे वह काम नहीं कराया जाता है.सफाई कर्मचारी सिर्फ सफाई करना , झाडू लगाना और कचडे को फेंकना जानते है.नालियों की दुर्गति तो उन्हे दिखाई ही नहीं पडती है.
   नालियाँ और बारिस में उनकी स्थिति देख कर नगर निगम के सफाई अभियानों और कामों के ढोल की पोल खुल जाती है.सीवेज सिस्टम की ऐसी की तैसी हो जाती है दो तीन दिन तक तो सडकें अपना वास्तविक रूप भूल जाती है.इतना ही नहीं जनता नगर निगम से और भी आशायें है.शहर में पार्क की कमी, दर्शनीय स्थलों की मरम्म्त और नवीनी करण और वार्डों का मूलचूल विकास कहीं ना कहीं जनता को रोजमर्रा की ख्वाहिशों से दूर करता नजर आता है. नगर निगम के तत्वावधान में प्रशासनिक स्तर पर बहुत से काम हुये है. जो विकास कार्यों की गाथा का गुणगान रेल्वेस्टेशन,चौराहों और मार्गों में करते है. परन्तु सिविललाइन ,पुलिस कालोनी,बाजार ,कबाडी टोला और भरहुत नगर, अन्य ऐसे मोहल्ले जिनका कोई माई बाप नहीं है और यदि माई बाप है वह  सुसुप्तावस्था में अपने घर के पलंग तोडते है. उनकी दुर्गति और विकास में बाधक बन रहे रोडों को भी हटाना जरूरी है.
 एक ज्वलंत उदाहरण  मुख्तयारगंज स्थित व्यंकटेश मंदिर की स्थिति जो मेरी नजर में एक दशक से अधिक पूरा कर चुका है परन्तु इसकी स्थिति अपने अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही है.और मुहुर्त की बाट जोह रहा है.यह तो एक उदाहरण है सूची में और भी बहुत से नाम अभी शेष है.जब से सतना में नगर निगम की स्थापना हुई तब से बहुत से काम हुये,लेकिन जितने भी काम हुये वो सिर्फ सरकार को दिखाने के लिये और अपना वोट बैंक बनाने के लिये किये गये.नगरनिगम के कर्मचारी सिर्फ अतिक्रमण हटाने और किसी काम का प्रारंभ करने के लिए ही तेज तर्रार होते है जहाँ एक बार काम शुरू हो गया उसके वाद यह बंद भी हो जाये. या किस गति से चलेगा इसकी कोई खोज खबर नहीं ली जाती है.कुछ साल पहले सफाई अभियान के तहत बडे बडे कन्टेनर कचडा इकट्ठा करने के लिये उपलब्ध कराये गये थे. और यह भी कहा गया था कि समय समय पर सप्ताह में एक बार इस कचडे को नगर निगम खुद उठवा कर साफ सफाई बनाये रखेगा.परन्तु हुआ क्या वो कन्टेनर ही गल गये मुर्चा लग गया उनमे टाउन हाल के पीछे परन्तु वह कार्य द्रुत गति से हुआ ही नहीं. यही सब के चलते बारिश की हल्की सी बौछार नगर निगम के कामों को धो देती है और वह बेचारा हाँथ में हाँथ धरे देखने को विवश होता है.यह सच है कि प्रशासन अकेले ही सफाई स्वच्छता नहीं फैला सकता है समाज का भी भरपूर सहयोग चाहिये परन्तु आम इंशान जब नगर निगम के आफिस में जाता है तो वह सिकायत करने से सिर्फ इस लिये डरता है कि कहीं उसे ही इस दलदल में ना फँसा दे और उसे जेव ढीली करने पड जाये. हमारे आसपास होने वाली गंदगी को हम रोक सकते है और रोकते भी है परन्तु घरों में पानी भरने और उसे निकालने के लिये भी लोग एडी चोंटी का जोर लगायें यह कहाँ तक सही होगा. हाथ से हाथ मिलाकर ही हम इस सतना को स्वच्छ सतना बना सकते है. अन्यथा इसी तरह बारिस नगर निगम की करतूतों को में पानी फेरती रहेगी.

सोमवार, 17 जून 2013

व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र


व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र
२००४-०५,२००८-०९ और आज २०१३-१४ वो राजनैतिक महाक्रमण काल रहे है जब देश को आडवानीवाद का दंश झेलना पडा है और आज भी यह प्रभाव भारतीय जनता पार्टी को बैकफुट में लाने के लिये काफी है. चाहे वो अटल जी के अटल इरादों के साथ खडे आडवानी हो,चाहे वो जिन्ना की तारीफ करने वाले आडवानी हो,चाहे पिछले चुनाव की हार के जिम्मेवार प्रतिनिधि आडवानी हो, और आज के नरेन्द्र मोदी के शत्रु समान व्यवहार करने वाले आडवानी हो, उन्होने हर मुकाम मे भाजपा को अपने घर की मुर्गी समझा है जब चाहा तब इस्तीफा थमा दिया जैसे इस्तीफा कोई भीख हो, पिछले दो बार यही रवैया अपनाये हुये आड्वानी जी यही सोच रहे थे कि इस बार भी भाजपा के आला कमान के लोग आर एस एस के साथ उनके पीछे भागेगे और उनसे मिन्नते करेंगे कि चलिये आपके बिना हमारा और राजनीति का भला नहीं होने वाला है. मुझे यह समझ मे नहीं आता है कि गोवा के निर्णयों के बाद जब मोदी के नाम पर मोहर लगा दीगई तो फिर भी ये अपनी पदलोलुपता का गुणा भाग लगाकर क्या हासिल करना चाहते है. एक बार तो इन्होने अपनी औकात पार्टी को दिखा दी कि इनके कंधे मे यदि चुनाव की बंदूख से सत्ता का सपना देखना है तो वह पिछली बार की तरह खाली हाथ ही  मलना रह जायेगा. जहाँ तक मुझे पूरा घटना चक्र समझ मे आता है तो आडवानी कुछ गिने चुने मामलों को छोडकर संघीय विचार धारा का समर्थन कहीं किये हों. और इसी का पर्याय रहा जिसके अंतर्गत संघ के प्रस्तावित नरेन्द्र मोदी के विरोध मे खूँटा गाड दिया और पूरी भाजपा को एक तेज तूफान में डाल दिया.और चुपचाप शतरंज के खेल की अगली बाजी का इंतजार करने लगे.
  इस घटना चक्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई नेता अपने आप को पार्टी का माईबाप समझने का भ्रम पालने लगे तो उसके साथ पार्टी को और उसके सिद्धांतो के परिपेक्ष में क्या कदम उठाना चाहिये.९० वर्ष पूरे कर रहे संधीय विचारधारा को धता बताने वाले आडवानी जी को यह आभास होगया कि १९९० के बाद भाजपा सिर्फ उन्हे एक बोझ की तरह ढो रही थी. वरना कब का बाहर का रासता दिखा दी होती.आडवानी जी यह याद रख सकते है कि उन्होने भाजपा को बनाया है और भाजपा को उन्हे प्रधानमंत्री बनाना ही चाहिये.परन्तु उनका कर्तव्य है कि वो यह भी तो जाने कि उनको भाजपाई किसने बनाया है.संघ ने यह पुष्टि कर दिया कि उसने आडवानी के राजनैतिक कैरियर को पैदा किया है  और संस्था से बढ कर कार्यकर्ता का कद नहीं है परन्तु आडवानी जी इस मन के फेर में है कि उन्होने भाजपा को अपने खून पसीने से पैदा किया है पाला पोसा है और यह  भाजपा के ऊपर उनका उधार है जिसे भाजपा को उन्हे पीएम बना कर शूद सहित चुकाना ही होगा जो किसी मायने में सच नही है.व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र जो इस समय लडा जा रहा है वह किस परिणाम तक भाजपा को ले जायेगा यह तो नही पता परन्तु यह तक है कि मोदी जी के इरादे जरूर फौलाद से ज्यादा मजबूत हो जायेंगें. क्योंकी उन्होने गुजरात चुनाव जीतने के बाद ही कहा था कि यदि लोग उन पर पत्थर उछालते है तो वह उन पत्थरों से मंजिलों को पाने की सीढी बना लेगे. यहाँ तो मामला और ज्यादा गंभीर है.
   यह मामला तो ठीक उसी तरह लगने लगा है जिस तरह कम्युनिस्ट १९६४ में बंट गये और आजाद भारत में कांग्रेस के बीच टकराव के कसीदे सुनायी पडे थी. यह भी सच है की आडवानी के तरफ की भावनात्मक सोच को लेकर भाजपा दूरगामी निर्णय नहीं ले पाती क्योंकी डूबने सूरज के साथ चलने वालों को शाम और रात का सामना तो करना ही पडेगा. संघीय विचारधारा जैसे अनुशासित विचारों के साथ के बावजूद यदि आडवानी जी सिर्फ तीन दायित्वधारी पदों से इस्तीफा दिया और अन्य उसी तरह बरकरार रखे थे. तो यह भी तय था कि उन्हे आज भी यह यकीन था कि शायद भाजपा अपना सिर झुका रह उनके वर्चस्व को कुबूल कर लेगी.वो भी क्या करे मानवोचित दुर्गुण से प्रेरित है. और अपना परिणाम भुगत रहें है. लेकिन यह भी तय है की खुशी में लिपटे इस दुख का इलाज जरूरी है इसके पहले की यह नासूर बनकर पूरे शरीर का सत्यानाश कर दे.किसी मुद्दे में जब आडवानी जी ने अपने आप को भीष्म कहा तो मुझे पूछने का मन हुआ कि वो भाजपा को किस सेना की संज्ञा देने के इच्छुक है कौरवों या पाण्डवों की सेना. भाजपा को चाहिये कि वो इस शतरंज के दाव की तरह अपनी चाल में चाणक्य नीति लाये और अवसरवादी आडवानी जी को भी रथ का हिस्सा बना कर इस चुनावी महासमर को विजयी करे परन्तु अर्जुन अर्थात पार्थ की भाँति संघ रूपी केशव को अपना विजय रथ जरूर सौंप दे और आस्वस्त हो जाये क्योंकी अभी वो भ्रम द्वंद के छल छद्म में भ्रमित सी महसूस होती है.
अनिल अयान,सतना.

सोमवार, 10 जून 2013

जिया ने क्या संदेश दिया



जिया ने क्या संदेश दिया
फिल्मों मे कैरियर की महत्वाकांक्षा का एक नामी गिरामी नाम है जिया खान एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री जिसने वालीवुड की सरहद में जाकर जाना कि वास्तविकता में यह किस जन्नत का नाम है. निःशब्द, हाउसफुल, और गजनी जैसी फिल्मों मे अदाकारा की भूमिका मे दिखी जिया खान ने लगभग सबके जिया को मन से जिया.जिन्दगी की जंग को इस तरह हार जाना उसके लिये बहुत कठिन था परन्तु आज वख्त है यह सोचने का कि जिया खान ने अपने जाने के बाद अपनी श्रेणी की अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की तरह युवा चहेतों को साथ ही साथ पूरे समाज के युवाओं और अन्य पीढी को क्या संदेश दिया है. क्या उसने नयी शोहरत का रास्ता अपनाया. या आत्मग्लानि ,अकेलेपन, हार ने मजबूर कर दिया कि अपनी जिंदगी को मौत के सामने आत्मसमर्पित कर दे. क्या सब भूल जाने वाली बात है? या इस बात की इंतजार करने वाली बात है कि हमारे घर की जिया का हम इसी तरह के परिणाम की उम्मीद के साथ बुलंदी मे पहुँचाने की चाह रखें. पिछले पंद्रह दिनों से लगभग यह बात मीडिया में छायी हुई है कि बालीवुड का वास्तविक चेहरा क्या है. हम सब जानते है कि जिया खान का नाम उन नेत्रियों मे सुमार होचुका है जिन्होने वख्त के पहले अपनी मौत को गले लगा लिया और पूरा देश, बालीवुड और समाज सिर्फ उनके नाम पर श्रृद्धांजलि और सहानुभूति ही अदा कर सका.
  हमारे देश का सबसे बडा मनोरंजन का बाजार है मुम्बई , एक ऐसी चकाचौंध जिसके सामने सारा ज्ञान और सारा दर्शन दर्शन लेने के लिये कतार में खरा नजर आता है. और आज के समय मे युवाओं की लम्बी फेहरिस्त में ९० प्रतिशत युवा आज इसी चकाचौंध की दुनिया के सितारे बनने के लिये संघर्ष करने पहुच जाते है इस जन्नत  में.स्कूल और कालेज के युवा उत्सव गवाही देते है कि जितने प्रतिभागी कार्यक्रमों भाग लेकर  निर्णायक मंडल के आशीर्वाद के पात्र बनते है उन सब को अपने अंदर एक अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य वो सारे किरदार सपने मे दिखने लगते है जो इस चकाचौंध मे उन्हे पब्लिक फिगर बनाने में मददगार होते है. परन्तु जनाब वास्तविकता कुछ और ही होती है . हर साल मध्यम शहरी और कस्वाई क्षेत्र से जाने वाले युवाओं का प्रतिशत ८० प्रतिशत है जिसमें ३० प्रतिशत भाग तो मुम्बई की गलियों में गुम जाते है. ४० प्रतिशत भाग संघर्ष मे समाप्त हो जाते है. २० प्रतिशत युवाओं को अवसर की सर्तें विकलाँग बना देती है. और बचे कुचे युवाओं का अधिकतर समूह घर वापसी के डर से पलायन कर जाते है कहीं जाकर १०० मे से ३ से ५ युवा अपने को हर परिस्थिति में समर्पित करके चमक के सितारों तक का सफर प्रारंभ करते है. इस बालीवुड मे करोडो में १० कहीं जाकर पब्लिक फिगर बन पाते है. और उनका जमीर जानता है कि इस शोहरत और बुलंदी को पाने के लिये उन्होने मुम्बई मे क्या खोया और क्या पाया है. कितने दिन कितनी राते उनकी ,उनकी मर्जी के बगैर बेंच दीगई है अनजान हाँथों में.मुम्बई वह महासागर है जहाँ बडी मछली अपनी शोहरत को बढाने के लिये छोटी मछलियों का उपयोग और उपभोग करती है जिसकी कोई भी समय सीमा नहीं है  क्योंकी यदि आप इस श्रेणी में नही आना चाहते तो जिस दरवाजे से आप अपने सपने लेकर गये है वही दरवाजे आपकी बिदायी करने के लिये आपके अंतिम साथी जरूर साबित होते है.
   जिया खान की मौत ने यह बात समझाई है कि इस महासागर में दोस्त कोई नहीं है सब खरीदार भी है और दुकानदार भी है. यह समय बताता है कि आपको खरीदार कब बनना है और दुकानदार कब बनना है. बालीवुड वन वे रास्ता है जिसमें एक समय मे सिर्फ प्रवेश कर सकते है या निकल सकते है प्रवेश करते समय आप कुछ भी ना हों पर निकलते समय सिर्फ और सिर्फ आप पराजित ही होंगे. अवसरवाद का वह घना चक्रव्यूह है जिसमे समाजिक सारे रिस्ते असमाजिक नजर आते है. अवसाद , अकेलापन, छलावा, खरीदफरोक,तनहाई,शोहरत ये सब वो झूठे फसाने है जो किसी और के बारे में सुनने मे हमें बहुत मधुर महसूस होते है. परन्तु एक बार हम उस जगह में अपने को रख कर सोचते है  तो रूह को पता चलता है कि इस महासागर में मनोरंजन के लिये अदाकारा और अदाकार को जिस्म और रूह के हर भेद को खुले आम मनोरंजन के इस बाजार में मन-बेमन,प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष,रूप से भूखे जानवरों के सामने रखना ही पडता है नहीं तो आप भी जिया खान की श्रेणी मे खडे कर दिये जायेंगें या फिर मजबूर कर दिये जायेंगे.अब सवाल यह उठता है कि हम सब कितने सहभागी है इस सब में और हम सब का क्या रोल हो सकता है इस महासागर में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिये.आज के हम जैसे उपभोकताओं की उपभोगवादी सोच ने वालीवुड को मजबूर कर दिया है हर इवेंट को हमारी कसौटी मे खरे उतरे और खरे उतरने की होड में हर फिल्म, हर अदाकारा, हर प्रोग्राम, हर सिने पत्रिका,वेबसाइट, सब ने बाजारूपन अख्तियार कर लिया है. क्योकी बाजार में बाजारवाद का पहला उसूल है कि अपने को शीर्ष मे रखने के लिये बाजारू हो जाओ. कुल मिला कर यदि दर्शक और श्रोता अपना नजरिया बदल ले तो उस पर केंद्रित बाजार भी अपने आप समय के साथ बदल जायेगा. पर यह भी सच है कि यह भारत है और इस जगह मे इस सोच हो लागू करना कुत्ते की पूँछ को सीधी करने जैसा दुरूह कर्म ही है. पर उम्मीद ना छोडना ही विजेता की फितरत है.

फिल्मों मे कैरियर की महत्वाकांक्षा का एक नामी गिरामी नाम है जिया खान एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री जिसने वालीवुड की सरहद में जाकर जाना कि वास्तविकता में यह किस जन्नत का नाम है. निःशब्द, हाउसफुल, और गजनी जैसी फिल्मों मे अदाकारा की भूमिका मे दिखी जिया खान ने लगभग सबके जिया को मन से जिया.जिन्दगी की जंग को इस तरह हार जाना उसके लिये बहुत कठिन था परन्तु आज वख्त है यह सोचने का कि जिया खान ने अपने जाने के बाद अपनी श्रेणी की अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की तरह युवा चहेतों को साथ ही साथ पूरे समाज के युवाओं और अन्य पीढी को क्या संदेश दिया है. क्या उसने नयी शोहरत का रास्ता अपनाया. या आत्मग्लानि ,अकेलेपन, हार ने मजबूर कर दिया कि अपनी जिंदगी को मौत के सामने आत्मसमर्पित कर दे. क्या सब भूल जाने वाली बात है? या इस बात की इंतजार करने वाली बात है कि हमारे घर की जिया का हम इसी तरह के परिणाम की उम्मीद के साथ बुलंदी मे पहुँचाने की चाह रखें. पिछले पंद्रह दिनों से लगभग यह बात मीडिया में छायी हुई है कि बालीवुड का वास्तविक चेहरा क्या है. हम सब जानते है कि जिया खान का नाम उन नेत्रियों मे सुमार होचुका है जिन्होने वख्त के पहले अपनी मौत को गले लगा लिया और पूरा देश, बालीवुड और समाज सिर्फ उनके नाम पर श्रृद्धांजलि और सहानुभूति ही अदा कर सका.
  हमारे देश का सबसे बडा मनोरंजन का बाजार है मुम्बई , एक ऐसी चकाचौंध जिसके सामने सारा ज्ञान और सारा दर्शन दर्शन लेने के लिये कतार में खरा नजर आता है. और आज के समय मे युवाओं की लम्बी फेहरिस्त में ९० प्रतिशत युवा आज इसी चकाचौंध की दुनिया के सितारे बनने के लिये संघर्ष करने पहुच जाते है इस जन्नत  में.स्कूल और कालेज के युवा उत्सव गवाही देते है कि जितने प्रतिभागी कार्यक्रमों भाग लेकर  निर्णायक मंडल के आशीर्वाद के पात्र बनते है उन सब को अपने अंदर एक अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य वो सारे किरदार सपने मे दिखने लगते है जो इस चकाचौंध मे उन्हे पब्लिक फिगर बनाने में मददगार होते है. परन्तु जनाब वास्तविकता कुछ और ही होती है . हर साल मध्यम शहरी और कस्वाई क्षेत्र से जाने वाले युवाओं का प्रतिशत ८० प्रतिशत है जिसमें ३० प्रतिशत भाग तो मुम्बई की गलियों में गुम जाते है. ४० प्रतिशत भाग संघर्ष मे समाप्त हो जाते है. २० प्रतिशत युवाओं को अवसर की सर्तें विकलाँग बना देती है. और बचे कुचे युवाओं का अधिकतर समूह घर वापसी के डर से पलायन कर जाते है कहीं जाकर १०० मे से ३ से ५ युवा अपने को हर परिस्थिति में समर्पित करके चमक के सितारों तक का सफर प्रारंभ करते है. इस बालीवुड मे करोडो में १० कहीं जाकर पब्लिक फिगर बन पाते है. और उनका जमीर जानता है कि इस शोहरत और बुलंदी को पाने के लिये उन्होने मुम्बई मे क्या खोया और क्या पाया है. कितने दिन कितनी राते उनकी ,उनकी मर्जी के बगैर बेंच दीगई है अनजान हाँथों में.मुम्बई वह महासागर है जहाँ बडी मछली अपनी शोहरत को बढाने के लिये छोटी मछलियों का उपयोग और उपभोग करती है जिसकी कोई भी समय सीमा नहीं है  क्योंकी यदि आप इस श्रेणी में नही आना चाहते तो जिस दरवाजे से आप अपने सपने लेकर गये है वही दरवाजे आपकी बिदायी करने के लिये आपके अंतिम साथी जरूर साबित होते है.
   जिया खान की मौत ने यह बात समझाई है कि इस महासागर में दोस्त कोई नहीं है सब खरीदार भी है और दुकानदार भी है. यह समय बताता है कि आपको खरीदार कब बनना है और दुकानदार कब बनना है. बालीवुड वन वे रास्ता है जिसमें एक समय मे सिर्फ प्रवेश कर सकते है या निकल सकते है प्रवेश करते समय आप कुछ भी ना हों पर निकलते समय सिर्फ और सिर्फ आप पराजित ही होंगे. अवसरवाद का वह घना चक्रव्यूह है जिसमे समाजिक सारे रिस्ते असमाजिक नजर आते है. अवसाद , अकेलापन, छलावा, खरीदफरोक,तनहाई,शोहरत ये सब वो झूठे फसाने है जो किसी और के बारे में सुनने मे हमें बहुत मधुर महसूस होते है. परन्तु एक बार हम उस जगह में अपने को रख कर सोचते है  तो रूह को पता चलता है कि इस महासागर में मनोरंजन के लिये अदाकारा और अदाकार को जिस्म और रूह के हर भेद को खुले आम मनोरंजन के इस बाजार में मन-बेमन,प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष,रूप से भूखे जानवरों के सामने रखना ही पडता है नहीं तो आप भी जिया खान की श्रेणी मे खडे कर दिये जायेंगें या फिर मजबूर कर दिये जायेंगे.अब सवाल यह उठता है कि हम सब कितने सहभागी है इस सब में और हम सब का क्या रोल हो सकता है इस महासागर में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिये.आज के हम जैसे उपभोकताओं की उपभोगवादी सोच ने वालीवुड को मजबूर कर दिया है हर इवेंट को हमारी कसौटी मे खरे उतरे और खरे उतरने की होड में हर फिल्म, हर अदाकारा, हर प्रोग्राम, हर सिने पत्रिका,वेबसाइट, सब ने बाजारूपन अख्तियार कर लिया है. क्योकी बाजार में बाजारवाद का पहला उसूल है कि अपने को शीर्ष मे रखने के लिये बाजारू हो जाओ. कुल मिला कर यदि दर्शक और श्रोता अपना नजरिया बदल ले तो उस पर केंद्रित बाजार भी अपने आप समय के साथ बदल जायेगा. पर यह भी सच है कि यह भारत है और इस जगह मे इस सोच हो लागू करना कुत्ते की पूँछ को सीधी करने जैसा दुरूह कर्म ही है. पर उम्मीद ना छोडना ही विजेता की फितरत है.

नक्सलवाद यदि आबाद तो देश बरबाद


नक्सलवाद यदि आबाद तो देश बरबाद
पिछले पंद्रह दिन से एक नया मुद्दा छत्तीसगढ में बहुत गरमाया हुआ है नक्सलवाद और माओवाद का कुप्रभाव और उसमे पिसते भारतीय जन.आम लोग हो या फिर खास किसी को नहीं छोडते है ये नक्सली जैसे इनकी विशेष दुश्मनी होती है हम सब से. चीन के माओ की जुवान को समेटे ये लोग हमे हमारा अधिकार सिर्फ बंदूख की नोंक से ही मिल सकता है.भारत का सत्यानाश करने में तुले हुये ये लोग कहीं ना कहीं भारत में आंतरिक आतंकवाद फैला रहे है.भारत वैसे भी अपने बाह्य मामलों में काफी परेशान रहा है. और परेशान होता चला आरहा है तो फिर यह नया मुद्दा कहीं ना कहीं देश की आंतरिक शांति व्यव्स्था को बिगाडने का नया खेल खेलते नजर आता है.कभी कभी लगता है कि नक्सल और माओवाद में मुख्य धारा का अंतर क्या है. क्यों ये शासन के विरोध में डंडा गाडे रहते है. क्यों ये मार काट में ज्यादा यकीन करते है. क्या इन्हे शांति प्रिय नहीं है. ऐसे बहुत से सवाल है जो कहीं ना कहीं हम सब के सामने खडे यक्ष प्रश्न की भाँति अटूट से नजर आते है.
   माओ के फालोवर जब भारत में आये तो उन्होने उन स्थानों को अपना निशाना बनाया जहाँ बेगारी और गरीबी अधिक थी. जहाँ शासन की ओर से कोई कारगर प्रयास नहीं किया गया.इतिहास गवाह रहा है कि दार्जिंलिंग और पश्चिम बंगाल के ऐसे बहुत से घटना चक्र है जो इस प्रकार घातक आँदोलनों को हवा देते रहे और देश की आंतरिक सुरक्षा को ठेंगा दिखाते रहे. जब यह झारखंड और फिर उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में पहुंचे तो वहाँ की सरकार को अपने दांतों तले अंगुली दबाना पड गया. फिर ये लोग दक्षिणी राज्यों और मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के उन आदिवासी इलाकों को अपना गढ बनाने की कोशिश में कामयाब हुये जिन जगहों पर सबका ध्यान लगभग ना के बराबर था........ युवाओं के हुनर को खरीद कर अपने अनुसार अन्याय के खिलाफ ये एक साथ मोर्चा खोलने की आदत बना चुके ये गिरोह कदम दर कदम अपने हौसलों को बढाते रहे.आंध्रा प्रदेश की यह स्थिति है जिसमे गनपंथी,आर.श्रीनिवासन,गणेश उइके और कट्टकम सुदर्शन जैसे ऐसे महानुभाव है जो पूरे आँध्रा मे अपना वर्चस्व स्थापित करने की सोच को लिये आगे बढ रहे है.इस हमले के बाद भारते में अलगाववादियों की स्थिति हावी होने जैसी हो गई है. ऐसा लगता है जैसे असुरक्षा का माहौल आज अपने पर पसारे आगे बढ कर देश को निगलने के लिये आतुर हो रहा है.१९६० के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष देश की एकता और अखण्डता को नष्ट करने में लगा हुआ है.पढे लिखे ये नौजवानो की बदहवास फौज अपने पहले चरण में इतनी तेज गति से विद्रोह मचायी है कि पूरा देश अपने कर्मों में पश्चाताप इसलिये कर रहा है कि पहले इस मुद्दे पे कारगर कदम क्यों नहीं उठाये गये. जो काँग्रेस आज शासन और प्रशासन की दुहायी देरही है वह खुद ही विपक्ष में बैठे कभी माओ और नक्सलवादियों के खिलाफ बनाये जारहे कानून के सामने खूँटा गाडे खडी हुई थी. यह मै स्वीकार करता हूँ कि नक्सली हमले की वजह से भारत के कई राज्य अपना विकास नहीं कर पा रहे है.ना हि विकास की बातें सोच रहे है. उनका पूरा ध्यान इस समस्या को दूर करने के लिये लगा हुआ है. परन्तु दूसरा पहलू देखे तो यही राजनेता जब नक्सली हमलों मे सिर्फ शोक व्यक्त करके रह जाते है. या फिर बयानबाजी करके अपने आप को पापुलर करने के लिये मीडिया में धुरंधर बनकर चर्चाओं  में भाग लेते है तब इनका जमीर कहाँ सो जाता है. तब इनके लोग अपने परिवार और देशवासियों के परिवार की चिंता करके चुप हो जाते है. कोई कारगर कदम उठाने से परहेज क्यों कर जाते है. आज जब राजनैतिक प्रभुसत्ता पर आक्रमण हुआ तो काँग्रेस ऐसे चिल्लारही है या बौखला रही है जैसे कि किसी ने उसके घर में आग लगा दी है.गोरिल्ला आक्रमण का जवाब शायद किसी सरकार के पास नहीं है.
   इस तरह की घटनाओं में यह होना चाहिये कि ऐसे देश व्यापी मुद्दों में पूरे देश की राजनीति और राजनीतिज्ञों को एक साथ खडे होकर कारगर कदम उठाने चाहिये. जिन लोगो को यह भ्रम है कि सेना इस का सबसे सार्थक उपाय है तो इस बात में मुझे लगता है कि हम सिविलियन क्षेत्र में सेना को पूरा प्रशासन नहीं सौप सकते है. क्योंकी सेना को जिस तरह से ला और आर्डर सुधारने का काम सौपा जाता है वहाँ सिर्फ ओपन फायरिंग के अलावा कोई रास्ता नहीं है और इस काम के लिये यदि ऐसा किया जाता है तो यह मान लेना चाहिये कि जितने नक्सली मारे नहीं जायेंगे उससे कहीं ज्यादा बेगुनाह अपने बेगुनाह परिवार को इस मुठभेड में मरता देखने के बाद बंदूखें उठा लेंगें और इस तरह समस्या और बढ जायेगी. क्योंकी सेना की मुठभेड में गोलियाँ यह नही देखेंगी की नक्सली कौन है या आम जन कौन है. सरकारों को चाहिये की यदि इस आंतरिक घुसबैठ से निजात पाना है तो उसे सवसे पहले  हर जगह पर विकास कार्य बराबर करना होगा. चाहे वो विकसित जगह हो या आदिवासी जगह, चाहे वह फारवर्ड हो या बैकवर्ड इलाका. क्योंकी नक्सली वहीं अपना रहने का स्थान चुनते है जहाँ गरीबी और विकासहीनता अधिक है. अन्यथा भविष्य में सरकार से ज्यादा हुनर मंद युवा नक्सलियों के पास है जो साठ्योत्तर पार कर चुकी सरकार के हर हौसले को पस्त करने का दम रखती है.नक्सलियों के फालोवर सिर्फ युवाओं की उस उर्जा को इस्तेमाल करते है जिसे हम बेरोजगारी का जामा ओढा कर कचडे के डिब्बे में डाल देते है. सरकार को चाहिये हि अपनी सुरक्षा व्यवस्था को सुदृण करने के साथ साथ पारदर्षी विकास करें इसतरह के बाह्य और आंतरिक मामलों में एक जुट होकर खाली जगह को भरें वरना नक्सली तो बैठे ही है सरकार की अनियमितताओं और खाली जगहों को भरकर अपनी नयी सत्ता स्थापित करने के लिये.और यह भी तय है कि हम और हमारे सरकार उनके सामने घुटने टेकने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते है.यह छत्तीसगढ में हुआ नक्सली हमला चींख चींख कर कह रहा है.

सोमवार, 27 मई 2013

भारतीय लोकतंत्र बनाम बौद्ध गणतंत्र


भारतीय लोकतंत्र बनाम बौद्ध गणतंत्र
दो दिन पहले बुद्ध जयन्ती का आयोजन शहर मे धूमधाम से हुआ. मुद्दा था वही एक विरोधात्मक विचार बिंदु क्या बुद्ध के विचारों से भारत का लोकतंत्र चल सकता है. विषय कुछ अटपटा सा जरूर है परन्तु कुछ कहने का मन हो रहा है बौद्ध दर्शन और बुद्ध की गणतंत्र की परिकल्पना बनाम भारतीय लोकतंत्र व्यवस्था कहाँ से कोई जोड तोड ढूँढ कर लाया जाये यह यक्ष प्रश्न खडा मिला. तथागत बुद्ध जिसने पूरी राज सत्ता को त्याग कर ज्ञान प्राप्ति के लिये ब्रह्मचर्य का पालन करने हुये प्रवासी हो गये और अंतत जब ज्ञान प्राप्त कर लिया तब उन्होने नही विचारधारा का प्रतिपादन किया जिसे पंचशील का नाम दिया गया. जो शायद बौद्ध गणतंत्र की नींव मानी जा सकती है. बुद्धम शरणं गच्छामि, संघम शरणं गचछामि, धम्मं शरणं गच्छामि की परिकल्पना को मानने वाल बौद्ध धर्म आज भारत में किस स्थिति में है वो हमारी नजरों के सामने देखने को मिलता है.यह सच है कि बौद्ध धर्म मैत्री, शांति,प्रेम, और भाईचारे का संदेश देता है. परन्तु क्या देश वर्तमान स्थिति में यह संदेश लेकर हम किस समय तक इस विश्व की धरोहर में कायम रह पायेंगे.
  यह धर्म बुद्ध के संदेशो मे पिरोया गया था. आज के विश्व में सबसे अधिक इसी धर्म के लोग निवास करते है. इसी धर्म के अनुयाई है हर जगह बौद्ध शिलालेख हमें देखने और सुनने को मिल जायेगें. अधिक्तर देश बौद्ध धर्म, फिर ईसाइयत, और तत्पश्चात मुस्लिम धर्म के अनुयायी मिलेंगे. भारत मे यह स्थिति पूर्णतः विपरीत है. बौद्ध धर्म में जिस गणतंत्र का जिक्र मिलता है वह उस समय के लिये सही था. वहाँ पर वोट देने का अधिकार सदस्यों को ही हुआ करता था. और उत्तराधिकारी की नियुक्ति परिवार से ही की जाती थी. भारत की स्थिति कुछ या ये कहें की बहुत कुछ अलग है. हमारी सबसे बडी विडम्बना है कि हम हर प्रश्न की खोज हर महापुरुष की बातों में खोजने में उतारू हो जाते है ,बिना ये समझे कि वो किस समय यहाँ जन्म लिया था. उस समय इस देश की परिस्थितियाँ क्या थी. और उसने किन हालातों के चलते अपने अनुयायी बनाये. और फिर हमारा आँकलन शुरू हो जाता है. उसने कैसे यह बात कह दी है. क्या आज के समय में वह समसामायिक है. ये सारे फिजूल के भ्रम हमारे दिलो दिमाग में फितूर उतपन्न कर देता है. और फिर है उस महापुरुष को अपनी आलोचना का शिकार बना लेते है. बुद्ध के अनुयाई ही उनके विचारों को नहीं अपना पाये तो हमारे देश की क्या गिनती है. हमने सिर्फ अपने समय के अनुसार अपने आराध्य बदल दिये है. और आज के समय में तो सिर्फ राजतंत्र ही सबसे बडा तंत्र है. गणतंत्र तो कब का गायब हो चुका है.
  भारत की स्थिति कुछ ऐसी है कि भारत में सिर्फ वोट तंत्र चलता है वोट के लिये हमने दलाईलामा को अपने देश में शरण दिया. ताकि  उस समय में सत्ता में बैठी सरकार को लाभ हो जाये. हमने सिर्फ देश मे उन लोगो को बिठा दिया जिन्होने आज तक देश को सिर्फ बेंचने का काम किया है. चाहे वो प्रत्यक्ष रूप में हो या अप्रत्यक्ष रूप में इस सब के चलते क्या देश के हालात ऐसे  है कि बुद्ध के मैत्री , भाईचारा और प्रेम का संदेश ध्वज लेकर हम अपने शत्रुओं का सामना कर सकते है. नहीं आज के समय में यदि हमें विकास पथ पर लेचलना है तो हमे अपना नियम अपना कानून प्रायोगिक तौर पर बनाना होगा. बौद्ध दर्शन और बौद्ध गणतंत्र की परिकल्पना आज के समय में बेमानी सी लगती है. इतिहास गवाह रहा है कि बुद्ध के अनुयाई बुद्ध के विरोध में चले गये. जितने भी देश इस विचारधारा को मानते है वो आज भी मन ही मन अपने विकास की गति अवरोधक इसी को मानते है. चीन और जापान के बच्चे से जब यह पूँछा जाता है कि देश और बुद्ध में तुम किसे चुनोगे तो वह देश की बात करता है.और बुद्ध को किनारे कर देता है. हिन्दू धर्म में भी बुद्ध को लेकर बहुत से मिथक कथायें ग्रंथों मे उद्धरित है. बुद्ध के सिद्धाँत उस समय में प्रासंगिक हो सकते थे परन्तु आज के समय में वह भारत के परिपेक्षय मे उदासीन से दिखायी देते है.आज के समय में भारत को आवश्यकता है तटस्थ नेतृत्व की जिसके दम पर वह सही और गलत का फैसला देश हित मे कर सके. आज हमारे देश में लोकतंत्र तो कब का खत्म हो चुका है. परन्तु हम कहने से यह डरते है कि कहीं हम बवाल में ना फंस जायें सोचने वाली बात है कि आज एक घर में लोक तंत्र नहीं स्थापित कर सक्ते है तो देश में कैसे संभव हो सकता है. आज देश की जनता को सिर्फ और सिर्फ वोट देने का अधिकार है उसके बाद उसकी हालत चाय में पडी मक्खी की भाँति हो जाती है अगले चुनाव तक. बुद्ध को विष्णु का नवम अवतार माना जाता रहा है उस दृष्टि से वो हमारे आदरणीय और सम्माननीय पूज्य है परन्तु यह जरूरी नहीं ही हर पूज्य महापुरुष के विचारधारा को लेकर देश का प्रशासन चलाया जाये. यदि आज के समय मे देश उनके तरीके से चलता है तो देश अगली बार बहुत ही जल्द बौद्ध देशो का गुलाम हो जायेगा......
अनिल अयान, सतना,

मंगलवार, 21 मई 2013

अंतर्मन के द्वंद को मार्मिकता के समुन्दर मे डुबाती कहानियाँ;धूप और छाँव


अंतर्मन के द्वंद को मार्मिकता के समुन्दर मे डुबाती कहानियाँ

जिंदगी एक सधन वन ही तो है जिसमे धूप और छाँव हमसे लुका छिपी का खेल खेलते रहते है जैसे कि जिंदगी में दुख और सुख आते और अपने  मेहमानी करके चले जाते है. जी हाँ यह किसी कहाने की शुरुआत नहीं वरन एक कहानी संग्रह धूप छाँव के संदर्भ में मेरे मन की आवाज है.इस कहानी संग्रह को सतना की सुप्रसिद्ध समाज सेविका और साहित्य में अटूट रुचि रखने वाली श्री मती बेला मीतल ने लिखा है.यूँ तो उन्हे कोई भी कथाकार के रूप में नहीं जानता है.परन्तु यह भी मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस कहाने संग्रह को पढने के बाद हर पाठक उन्हे हमेशा एक अच्छा कथाकार मन से स्वीकार कर लेगा.धूप छाँव काल्पनिक कहानियों का संग्रह नही बल्कि  जीवन की टीस,कसक, अंतर्दंद, मर्म, और अंतर्मन के कुरुक्षेत्र को बेबाकी से बयान करने वाले पात्रों की अशेश दास्तान है. लेखिका ने अपने प्राक्कथन में खुद लिखा है कि" जीवन एक विशाल जटिल और गहन अरण्य है.वहां उसके सुंदर और असुंदर रूप दोनो विद्यमान होते है. हमारी जिंदगी मे समाजिक पक्ष जितना प्रभावी होता है भावनात्मक पक्ष उतना ही मार्मिक होता है , उतना ही याद गार होता है, और इस हद तक जीवन को प्रभावित करता है कि कोई अपने आप कलम उठा कर भाव और यादों को किसी भी विधा में कागज में उतार सकता है. और ताउमर के लिये उन्हे अमर कर सकता है.
 प्रस्तुत कहाने संग्रह सिर्फ चौदह कहानियों का संग्रह है. जिसमे हर कहानी  अपने नये आयाम छूती नजर आती है.विदाई, स्वीकृति,और पापा चले गये, एक मुट्ठी धूप, वादा, दोस्ती,धोखा, इंतजार,थैक्यू माँ, ऐसी कहानियाँ है जो पाठक एक ही बैठक में पढताहै. मानव संस्कृति सभ्यता की दुहायी देने वालों के समक्ष भावो को जीने वाले भावनात्मक रिस्ते बनाने वाले  पात्रों का प्रत्युत्तर देती ये कहानियाँ पाठक को यह संदेश देती है. कि दकियानूसी विचारधारा के चलते भावनात्मक रिस्तों के साथ बलात्कार करने वाले मठाधीश अपने  को भले विजयी मानकर आत्ममुग्ध होते रहें परन्तु वह जीवन अकी सबसे बडी हार को गले लगाकर उसका दंश उमर भर झेलते रहते है. इन कहानियों में लेखिका ने बताया कि हम उम्रभर भ्रम और द्वेश के चलते सच्चे प्रेम के रिश्तों को अपना नहीं पाते और जब हमें इस बात का पश्चाताप होता है तब तक समय बहुत आगे निकल चुका होता है.हमारे पास उस वक्त सिर्फ अफसोस  ही बचता है.
  संग्रह की अन्य कहानियाँ भी समाज में चलते रिस्तों के साथ खिलवाड और मजाक की पेशगी है.ये कहानियाँ भले ही प्रथम कहानी संग्रह हो परन्तु यह भी सच है कि इसमेम ऐसा ;लगता है कि लेखिका ने जीवन के हर छोटे बडे अनुभवों को , जिसने उन्हे अंतरमन में जाकर हृदय के दरवाजों मे दस्तक दी है, कहानी के रूप में उकेर दिया है. और साथ ही कागज मे भावों को साकार रूप दे दिया. अधिक्तर कहानियाँ चरित्र, भाव और घटनाप्रधान कहानियाँ है. इनके गढन ने ऐसा कही भी नहीं लगता कि कोई पात्र अनायास ही कथा में आकर विचलन उत्त्पन्न कर रहा है. कहानी के मापदण्ड मे हर तरह से खरी उतर रही ये कहानियाँ लेखिका को नये आयाम तक , उचाइयों तक ले जाती है. संग्रह की ८०% कहानियाँ जीवन के धूप छाँव के पलों को मास्टर पीस बना दिया है एक समाज सेविका से एक लेखिका बनने के इस सफर मे ये कहानियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आती है. इन कहानियों को पढने के समय पर ऐसा लगता है कि जैसे मेरे जीवन के उपन्यास के पन्नों से कुछ पल इन कहानियों ने चुरा लिये गये हो. जैसे यह हमारी जिंदगी बयां की जा रही है ऐसा तो हम भी कहना चाह रहे थे.समाज के क्रूरतम व्यवहार के खिलाफ मोर्चा खोलती ये कहानियाँ वह जवाव देती है जिसके सामने सारे सवालात धरासायी नजर आता है. कभी कभी तो मन को यह आभास होता है कि जैसे लेखिका ने अपने  जीवन के भोगे हुये यथार्थ और दंश को हू बहू बयाँ कर दिया है. अंततः मै  लेखिका को एक मार्मिक , गहराई ली हुई , अंतरमन के द्वंद को बया करती कहानियों का कहानी संग्रह पाठकों से समक्ष प्रश्तुत किया है वह काबिले तारीफ है और शुभकामनायें ताकि वो आने वाले वक्त में इसी तरह के मोती पिरोती रहे और हमे नये संग्रह पढने को मिले और अंत में
    हर लफ्ज जिसके जब तह ए दिल मे उतर जाते हों,
    उसके दिल की हर तह कई यादों का कब्रिस्तान होगी.
अनिल अयान,युवा कथाकार
सतना

रविवार, 19 मई 2013

बाल मजदूर ,होते बचपन से दूर.


बाल मजदूर ,होते बचपन से दूर.
आज के समय मे घर  द्वार हो या बाहर , समाज का हर तबका कहीं ना कहीं कभी ना कभी बाल मजदूरी के कुष्ठ से ग्रसित है. यही कारण है कि आज के समय मे बचपन अपने माँ की गोद से निकलता नहीं है कि वह मजदूरी में झोँक दिया जाता है. यह स्थिति मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय व्यवस्था मे अधिक देखने को मिलती है.जब परिवार संख्या बढती चली जाती है तो घर चलाने के लिये बाल मजदूरी ही एक सहारा इन बच्चों के लिये नजर आती है. कहते है कि मजवूरी का नाम महात्मा गाँधी है. लोग भी कम दाम में इनका खून चूसने के लिये बेबाकी से बेरोक टोक इनका उपयोग और उपभोग करते है. यही सब समाज के लिये दंश बना हुआ है,
आज के समय में बाल दिवस हो या कोई समारोह नेता और जन प्रतिनिधि सब अपने तरीके से यह राग अलापते मंच से नजर आते है कि मासूम बच्चे ही हमारे देश का भविष्य है और उनके कंधों में हमारे देश की व्यवस्था है. परन्तु हमारे देश का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के दोनो भाग प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक यह बात समय समय पर स्टिंग आपरेशन , ब्रेकिंग न्यूज, कवर स्टोरीज के रूप जनता के सामने रखते चले आये है कि आज भी भारत मे गरीब बच्चो का ७० प्रतिशत भाग बाल मजदूर के रूप में अपना बचपन स्वाहा कर रहा है. उसकी वजह कहीं ना कहीं माता पिता के द्वारा परिवार में वृद्धि. माता पिता का देहावसान हो जाना, गरीबी, और भी अन्य समाजिक कारण है जिसके चलते बच्चे बच्चियाँ सबसे पहले बडे बडे बंगलों में काम करने से शुरुआत करते है और फिर धीरे धीरे बाल मजदूरी के लिये खुद को पलायन वादी बना लेते है. कोई साइकिल ,और गैरेज मे काम करता है,कोई होटल में,कोई फैक्ट्री के अपना बचपन आग और कोयले में झोक देता है. देश में लगभग १० वर्ष से १७ वर्ष के वो बच्चे जो अनाथ है और जिनकी देख रेख करने वाल व्यक्ति कोई नहीं है वो इस तरह के अत्याचार और लगातार शोषण के चलते अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते है और इनका अंतिम संस्कार तक करने वाला भी कोई नहीं होता है. बडे बडे शहरों में मानव अंगो की तस्करी, स्मगलिंग, और अन्य बाल अपराध भी इन्ही बच्चों के ३० से ४० प्रतिशत भाग के बरगलाये या लालच में आये बाल मजदूर करते है.जो बाद में समाज से बहिष्कृत कर दिये जाते है. इस सब घटना चक्र मे देखे तो कहीं ना कहीं एक बात तो सामने आती है कि आज के समय मे देश को जरूरत है कि इन बच्चों का क्या इस दुनिया में आना ही कसूर है, या भारत में पैदा होना दूसरा बडा कुसूर, इनके  माता पिता तो इन्हे समाज के दलदल में फेंक कर चले जाते है.. और हम सब समाज ठेकेदार, सफेद पोश इनके बचपन को दफन करके  इनको मजदूर बना देता है. आज यदि हर व्यक्ति इनको मजदूर से मजबूर बनाने की बजाय सही दिशा में इनके जीवन को मोड सके तो सबसे बडा दायित्व इस देश के नाम पर पूरा माना जायेगा हाँ इस सोच को राजनीत में कम्युनिस्ट कहा जाता है तो कहने दीजिये. कब तक हम लोग क्या कहेगे इस बात का डर मन में बिढाये रहेंगे,

मंगलवार, 14 मई 2013

चाइना को आईना दिखाना जरूरी


चाइना को आईना दिखाना जरूरी.
बचपन में एक कहानी पढी थी. जिसमे चूहों की फौज के बीच यह बहस जारी थी कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा. और अंततः घंटी बाँध दी जाती है. ऐसे ही हालात इस वक्त देश के अंदर जारी है. पडोसी मुल्क चाइना अपने दंभ के चलते भारत के अंदर घुसबैठ कर रहा है और भारत यह सोच रहा है कि चाइना को आईना कैसे दिखाया जाये. ऐसा लग रहा है कि यक्ष प्रश्न भारत के सामने खडा हुआ है शांति स्थापित करने के लिये और भारत अभी भी समप्रभुता और एकता अखण्डता के लिये दिन रात मनन कर रहा है और चिंतन कर रहा है कि किया क्या जाये अपनी अस्मिता को बचाने के लिये और स्वाभिमान की रक्षा के लिये. इतिहास साक्षी है की भारत और चाइना बहुत अच्छे मुल्क है. जो हमेशा अपने रिस्तो का उपयोग और उपभोग बहुत अच्छे तरीके से करते रहे है. जब भी स्वार्थ की बात आयी है भारत मे चाइना ने अपना विस्तार करने की पहल की है. भारत में आज भी बहुत कुछ व्यवसाय भारत से मिलता है. भारत के घर घर में चाइना मेड सामान उपयोग हो रहा है जिसपे ना कोई विश्वास है और ना कोई भरोसा.
जब बाजारवाद मे चाइना का कोई भरोसा नहीं करता तो फिर हमारे प्रधानमंत्री जी और उनका मंत्रीमंडल कैसे विश्वास कर सकता है क्या वो इस देश में नही रहे क्या वो इस देश के साथ हुए चाइना के व्यवहार को भूल गये है. क्या वो दलाईलामा के भारत शरणागत होने की स्थिति में चाइना के व्यवहार और प्रतिकार को पूर्णतः बिसरा दिया है. खैर जो भी हो यह तो सरकार ही जानती है. पर यह तो तय है भारत अभी भी चाइना के समक्ष बौना है. चाइना का दल बल सेना सत्ता और समस्त अवयव संसाधन भारत की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी , मारक और तेज है. उनके यहाँ की सत्ता से सेना सब देश के लिये , हित के लिये अपनी जान को कुर्बान कर देते है. और भारत में सिर्फ बात की जाती है. यही कारण है की आज भी भारत की सीमा में चाइना ने अपने बल पर २५ कि,मी तक कब्जा कर लिया तो भी रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री जी सेना को पीछे हटने की सिफारिश कर रहे है. धिक्कार है कि राजा खुद कह रहा है कि आओ और हमारे घर की इज्जत को सरे आम बिना विरोध किये लुट जाने का साक्षी बनो. दुश्मन चाहे जितना भी शक्ति शाली क्यों ना हो हमें पोरस की तरह लडना चाहियें , और अंतत एक राजा की तरह सिकंदर के सामने ताल ठोक कर कहना चाहिये कि ऐसा व्यवहार करो जैसे कि एक राजा दूसरे राज से करता है. एक विजेता दूसरे पराजित से नहीं. भारत में इस वक्त आंतरिक मामले इतना ज्यादा तूल पकडे हुये है कि उसे बाहरी और पडोसी दुश्मनो पर नजर रखने की फुरसत ही नहीं है. मै तो कहता हूँ कि काश भारत में लोकतंत्र की जगह यदि पूँजीवाद होता तो कहानी इस देश की कुछ और होती. तब भारत की रक्षा के लिये सेना को पीछे नहीं हटना पडता. ना ही प्रधान मंत्री जी को यह सोचना पडता की चाइना के साथ कैसा व्यवहार किया जाये. वहाँ पर तो एक ही नियम चलता की जो हमे सम्मान दे उसे सम्मान दो नही तो मौत का दान दो.
 चाइना ही नहीं बल्कि अन्य दुश्मन पडोसी मुल्क  को सीमा का संज्ञान होना चाहिये , अच्छी दीवारे अच्छे पडोसी तैयार करती है. यदि इस लोकोक्ति का असर पडोसी मुल्को पर नहीं है तो भारत को चाहिये कि बिना सोचे बिसूरे ईट का जवाब पत्थर से दे. ताकि दंभ से लोलुप हो चुके अन्य देश को भी पता चले की भारत कमजोर हो सकता है लोकतंत्रीय होसकता है पर वैस्याओं की भाँति कलाई में चूडियाँ और हाथ पैरों में मेंहदी नही सजा रखी है कि आप उसके साथ रास लीला रचाओ और वह विरोध भी ना कर सके क्योंकि आपके साथ उसके व्यावसायिक संबंध है. आज भारत को चाहिये कि रक्षा मामलों को सर्वोपरि मानकर काम करे. क्योंकि देश में सिर्फ व्यापार और व्यवसाय ही बस नहीं होता. लोगों की रक्षा और अपनी विरासत की हिफाजत भी महत्वपूर्ण होती है.
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सोमवार, 6 मई 2013

सबर की जीत नहीं ,हमारे सब्र की हार


सबर की जीत नहीं ,हमारे सब्र की हार
राजा जब शासन करने मे असमर्थ हो जाये तो उसकी विद्वता है कि वो राज गद्दी छोड कर अपनी जगह पर किसी और योग्य और समझदार शासक को बैठा दे.चाणक्य ने सही नसीहत दी थी चंद्रगुप्त को. आज यही कुछ हाल इस देश के शासन व्यवस्था का हो चुका है. और परिणाम यह है कि हम सब इस गल्ती का सिकार होते चले जारहे है. केन्द्र की सत्ता नपुंसक और नाकारा होती चली जा रही है. जो हाल कसाब और अफजल गुरु का भारत ने किया . उससे कहीं ज्यादा बदतर हाल पाक ने सबरजीत नाम के भारतीय का किया. फिर उदारवादिता का धतकरम हमे चूना लगा गया और हम सब स्वागत में खडे रहे. वाह रे सत्ता और सत्ता के मठाधीशों. इस तरह से देश के संग बलात्कार करने का अधिकार जिस तरह से जनता ने दिया है उसे तुम भरपूर उपयोग कर रहे हो. भारत तो हमेशा से ही अपने पडोसी मुल्को के प्रति ज्यादा ही मित्रवत रहा है.
   कितने सबरजीत और हमारा पडोसी मुल्क हलाल करता रहेगा. कितना सामन्जस्य हम ही बिठाते रहेंगे. कब तक वह पीठ मे छूरा घोंपता रहेगा. कब तक हम अपना हाथ मित्रता के लिये बढाते रहेंगें. यह सवाल आज हर भारतवासी मनमोहन सिंह जी से पूँछ रहा है. आखिरकार सबरजीत अपनी जीवन की जंग लडते लडते सबर खो दिया. और साथ ही संदेश दे गया कि. भारत में आम और खास की खाई कितनी गहरी है. कोई कुछ  नहीं कर सकता है. सब लाचार है. यदि गाहे बगाहे सबरजीत की जगह पर देश के किसी नेता , मंत्री, और बडे आलाअधिकारी का रिस्तेदार गया होता तो भारत हर शर्त मानने के लिये गुटनों के बल तैयार खडी होती. मै इतना जानता हूँ. कि देश भावनाओं में बहकर नहीं चलाया जाता बल्कि विवेक से चलाया जाता है. एक उदाहरण इटली के दो गुनहगारो और कातिल सेना के सिपाहियों की रिहाई के लिये पूरे देश के प्रशासन को उसके सामने झुकना पडा. पर भारत एक आम और बेकसूर नागरिक के लिये पाक को नहीं झुका सका. क्या समझ है. सबरजीत के मरणोपरांत तो ऐसे बयान आरहे थे. जैसे कि राजनीति अब बयानों की शक्ल में बाहर आरही हो. राजनीति की रोटियाँ सेकी जारही थी. और गृह प्रशासन ने तो जेलों की सुरक्षा भी बढा दिया. तीज त्योहारों को भूल कर शासन को जैसे इस बात की आशंका होने लगी कि कहीं धर्म का बलवा ना मच जाये. तीज त्योहारों मे जब हिन्दू और मुस्लमान एक साथ गले लगते है. तो इस तरह का घटिया काम कैसे कर सकते है.
  पाक को तो तब भी शर्म नहीं आयी. वो अपने कैदियों की माँग भी करने लगा है. क्या जज्बा पाया है भारत से.पर गलत तरीके से इसका उपयोग करने लगा है वह.आखिरकार खून का असर दिखायेगा ही.सबरजीत की मौत पाक का जवाब था . भारत के सत्ता के मठाधीशो को बताने के लिये. और एक संकेत है कि प्रशासन मे पारदर्शिता लाने के लिये. वरना अभी तो सबरजीत का परिवार खून के आँसू बहा रहा है. कहीं ये आह भारत के अन्य परिवारों को ना लग जाये. आज वक्त है चेतने का, और प्रधानमंत्री जी के तेज तर्रार रवैये का,वरना यह देश आपको कभी माफ नहीं करेगा.अब आपकी चुप्पी खलने लगी है. आपका मौन व्रत टूटने की आशा,अब आमंत्रण नहीं युद्ध की उम्मीद को और ज्यादा मजबूत करता है. क्योंकी इस शक्स की मौत भारत की उदारवादिता के सम्मान का बलात्कार और विश्वास नामक द्रोपदी का चीर हरण है. इस लिये अब आवश्यकता  है कि कडे कदम और प्रभावी दो टूक जवाब देने की. ना कि एक नव व्याहता स्त्री के कोमल अंगो की भाँति दुश्मन देश के गालों को सहलाकर रति क्रिया करने की.
          

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

कैन्डिल मार्च या सैन्डिल मार्च


  कैन्डिल मार्च या सैन्डिल मार्च
दामनी के बाद तो देश मे हैवानियत जैसे अपने मुँह को और बडा करने मे लगी हुयी है और इन्सानियत तो जैसे दुम दबाकर भारत के किसी कोने मे विश्राम करने लगी है. बलात्कार करना जैसे आज के समय में वीरता का काम बनता जा रहा है कोई भी किसी भी वक्त यह कृत्य करके अपने को गौरवान्वित और पुरुषार्थ की जीत का जश्न मनाता नजर आता है. कभी कभी तो यह लगता है कि संस्कार और विरासत तो कहीं खो सी गयी है.सभ्यता तो बिल्कुल अंतिम साँसें गिन रही है,. सिर्फ बची कुची जो इज्जत इन्सानियत के पास शेष है वो भी लोग बलात्कृत करके इन्शानों से छीनने में लगे हुये है. दिल्ली जैसे महानगरों में तो लडकी कोई खेलने वाली गुडिया बनकर रह गयी है. जिसमे कोई उमर की आवश्यकता नहीं है जो चाहे खरीदे , छीने खेले और कचडॆ में फेक दे. नियम और कानून की धज्जियाँ उडाते ये इन्सानो के भेष में छिपे दरिंदे वास्तविक रूप से अपनी मानसिक विकृति का शिकार मासूम  लडकियो को बनाते है, इनके लिये लडकियाँ किसी की माँ ,बहन ,बेटी,और परिवार का और भी कोई रिस्ता नहीं सिर्फ भोगने वाली मादा मानते है. जिसका उपयोग और उपभोग करके सिर्फ भोगवादी भूख और प्यास मिटाने का प्रबंध किया जा सके. जानवरों से भी बदतर इनका यह कृत्य यह शाबित कर देता है कि मानसिक सोच की पगडंडियाँ कितनी संकरी हो चुकी है. की अब उनकी चौडी होनी की संभावना बहुत कम है.
       जिस प्रकार दक्षिण अफ़्रीका की राजधानी केपटाउन है उसी तरह भारत की राजधानी दिल्ली अब रेपटाउन बनती जा रही है. और दिल्ली सरकार पुलिस और प्रशासन सब अपने घर की बेटियों यह सांस्कृतिक कार्यक्रम होने का जैसे इन्तजार करते बैठे हुये है. दिल्ली क्या भारत का ऐसा कोई कोना नहीं है जहाँ यह कष्टकारी घटना ना घटती हो. मुझे तो लगता है कि प्रशासन पुलिस और सरकार क्या कर सकती है जब हम में ही चारित्रिक कमजोरी है और नैतिक पतन है. आज के समय देश वाकयै विकासशीलता का पालन कर रहा है. नैतिक विकास बहुत कम और अनैतिक विकास बहुत तेजी से हुआ है.आज के समय में पोर्नोग्राफी जहाँ युवाओं के मोबाइल्स की शान बने हुये है. जहाँ देश मे सन्नी लियोन और अन्य आइटम हीरोइन्स अपने जिस्म का प्रदर्शन करने मे गौरवान्वित महसूस करने लगी हो,. वहाँ पर रेप कैसे रुक सकते है. सामान्यतः मनोविज्ञान का मनोविज्ञान भी चकित है कि भारत के लोगो को क्या हो गया है. एक केस समाप्त होता नहीं है कि दूसरा अंजाम तक पहुँच जाता है. सरकार की सिरदर्दी भी कम नहीं हो पाती है.सबसे बडी बात कि इस तरह की घटनाओं में लोग कैंडिल मार्च करके शांति प्रदर्शन करने में जुट जाते है. थोडा बहुत शोक मनाते है और फिर अपने काम लग जाते है. जैसे कुछ हुआ हि नहीं है. सब सामान्य रूप से चलने लगता है. और सब लोग दुहायी देते है कि सरकार कुछ कर नहीं कर रही है. .अरे रेप करे आपके समाज का और आप हाथ मे हाथ धरे बैठे रहे ... फिर सरकार ,पुलिस और प्रशासन को दोष देते रहे. हम सब जानते है कि कानून हमारा इतना लचीला और सुस्त है कि अपराधियों को सजा देने में कई साल लग जाते है. न्याय तो कोर्ट के दरवाजे के सामने कुम्भकर्ण की नींद लेता नजर आता है. फरियादी और फरियादी का परिवार  अपने फरियादी होने पर दिन रात सोचते सोचते मर जाता है पर न्याय नहीं मिल पाता है. यही सब चलते रेप करने वाले दरिंदे खुले आम घूमते है एक के बाद एक अनगिनत रेप करते है पर हमारा कानून उदारवादी रवैये के चलते सिर झुका लेता है. देश की महिलाये , और अन्य जागरुक लोग दिन रात धरना प्रदर्शन करके सरकार से न्याय की गोहार लगाते है. सरकार पुलिस बल का प्रयोग करके लाठी चार्ज करती है.
      आज के समय पर जरूरत है की अपने मसले खुद निपटाओ. कब तक.....आखिरकार कब तक इस तरह महिलाये जिसे देवियों का स्थान दिया जाता है उन्हे लाठियाँ खाना पडेगा. वो खुद चाहें तो इस मसले को. बलात्कारियों को और अपने अपराधियों को ऐसी सजा दें की सब लोग देखे . क्या जरूरत है कोर्ट में जाकर अपना समय और रुपया बरबाद करने की. कैंडिल मार्च की जगह यदि इन बलात्कारियों के साथ सैंडिल मार्च किया जाये तो  हमारे देश की महिलाये और बेटियाँ इतनी है कि बलात्कारी सैंडिल खाते खाते बेमौत मर जायेगा.  क्योकीं दिल्ली में बैठी शीला दीक्षित जी तो कुछ करने से रहीं और सरकार सिर्फ बयानबाजी से बाज नहीं आती है. तो महिलाओं को यह काम अपने हाथों से करना होगा. इसके लिये देश की महिलाओं को एक जुट होकर सहयोग करके बलात्कारियों को सजा देना होगा, वरना अभी तो देश की राजधानी रेप टाउन बनी है आने वाले समय में पूरे राज्यों के हर शहर रेपटाउन बन जायेंगें.

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

संविधान का बदलते विधान में बाबा साहबह


संविधान का बदलते विधान में बाबा साहब
पिछले ही सप्ताह अम्बेडकर जयन्ती का आयोजन किया गया. कई जगह पर अनगिनत आयोजन किये गये. ऐसा लगा कि आज ही देश की बहुत सी पार्टियाँ, संगठन और सामाजिक संस्थायें अपने अपने तरीके से आयोजन किये और समाचार पत्रो की सुर्खियाँ बने. हमारे देश की परम्परा हो गयी है कि किसी भी महापुरुष की जयन्ती हो या किसी भी बडे साहित्यकार का जन्मदिवस , वह भी टोलों और गुटो के हवाले हो गयी है. बापू किसी राजनैतिक संगढन की विरासत बन गये. कोई जयप्रकाश के नाम पर ऐश कर रहे है. कोई लोहिया को अपने घर की बपौती समझ कर उसके नाम पर देश को अपने अगुलियों में नचाने की कवायद कर रहे है. और यही हाल अपने संविधान का विधान लिख्नने वाले बाबा साहेब का.कभी पढा था की बाबा साहेब दबे कुचले और आम सर्वहारा वर्ग के साथ थे. उन्होने समाजिक परिवर्तन के लिये सर्वहारा वर्ग के लिये लडते रहे.समाजिक वर्ग संरचना के विरोध में आम जन की आवाज बनते रहे. और आजाद भारत के संविधान की रचना करने का कार्य अपनी समिति के साथ मिल कर किया और. संविधान के जनक बन गये. पूरा देश आज उनके लिये कृतज्ञ है.
आजादी के बाद जैसे जैसे देश तरक्की करता गया,उसमे और भी बदलाव द्रुत गति से होते गये. देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी राजनेताओं के हवाले होती चली गयी.संविधान का विधान लिख्नने वाले बाबा साहेब की मेहनत को लोग भूलते चले गये और अपने स्वार्थ और राजनैतिक रोटियों को सेकने के लिये संविधान की सिगडी मे परिवर्तबन होता रहा और हर एक वर्ष ही अम्बेडकर जयन्ती मे सभी दलों के राज नेता यह कह्ते नजर आये कि आज भी भारत बाबा साहेब के संविधान मे अपना विकास कर रहा है. मेरे यह नही समझ मे आता है कि आज बाबा साहेब का संविधान रह कहां गया. इतने बार संसोधन होने के बाद तो बाबा साहेब की रूह भी सोचती होगी कि कहाँ से मैने भारत को चलाने के लिये संविधान बनाने के लिये दिन रात एक कर दिया और आज भारतवासी उसी के नाम की धज्जियाँ उडाने में लगे हुये है. आज देश मे हर दल का कदवार नेता और मंत्री दावे के साथ यह कहते नजर आते है कि हम बाबा साहेब का इतना आदर और सम्मान करते है कि आज भी उन्ही के बनाये संविधान मे चल रहे है. पर अफसोस की बात की बाबा साहेब की आत्मा को तो उसी दिन ही ठेस पहुँच गई थी जिस दिन संविधान में संसोधन होना शुरू हो गया था. आज जिस बात का राग अलापा जा रहा है वह पूरी तरह से बेबुनियाद है. बाबा साहब का संविधान आम सर्वहारा वर्ग के लिये और अमी्री गरीबी की खाई पाटने वाला था. और परिणाम भी जल्द भारत को देने वाला था. परन्तु जो भी सत्ता मे गया वह संविधान मे संसोधन मे उतारू हो गया. और अब दावा करना उनके राष्ट्र प्रेम को गालियाँ देने की तरह ही है.
  सबसे बडी बात बाबा साहब की १२३ वी जयन्ती मनाने वाला भारतवर्ष और उसके राज नेता जिस तरह की ईमानदारी बाबा साहेब के जीवित रहने के दौरान दिखा रहे थे मरने के बाद उनके अनुयायी उनके विरोध मे हो गये. अपने अपने गुट बना लिये और समय के साथ पाले बदल लिये. जहाँ पर बाबा साहेब के चरण पखारने वाले लोग,उनकी पूजा करने वाले लोग, उनके गुणगान करने से नहीं थकते थे. वो समय बदल जाने के साथ साथ अब उन्ही के नाम पर ऐश और कैश करते नजर आते है. आज बाबा साहब को निश्वार्थ भाव से याद करने वाला व्यक्ति कम मिलेगा और उनकी वसीहत के नाम पर अपनी जागीर बनाने वाले लोग गिनती से भी बढ कर है. बैर हाल वाकया कुछ भी हो परन्तु बाबा साहब के कार्यों को यूँ हवा में उडाने की प्रवृति छोड कर प्रचार प्रसार करने की आवश्यकता है. और संविधान के विधान को सम्हालने की आवश्यकता और भी ज्यादा है.

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

अतिथि विद्वान,पडे उतान....


अतिथि विद्वान,पडे उतान....
स्कूल शिक्षा मे जो हाल संविदा शिक्षकों का सरकार ने कर रखा है वही हाल महाविद्यालयीन शिक्षा मे अतिथि विद्वानों का उच्च शिक्षा मे उच्च शिक्षा विभाग ने कर रखा है. बस जहाँ अंतर सिर्फ इतना है कि संविदा शिक्षको के वेतन मान का अन्य परमानेंट शिक्षकों की तुलना मे अनुपात ५००० और २५००० का है और अतिथि विद्वानो के विषय मे यह अनुपात ८०००-१०००० और ५००००-८०००० का अंतर है. कुल मिलाकर देखा जाये तो इनकी जीवन चर्या को गर्त में मिलाने का काम सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने बखूबी किया है. ये तथाकथित रूप से विद्वान का पद तो पाजाते है पर वेतन मान और अपनी विद्वता का पारितोषित पाने के लिये खून के आँसू बहाने पडते है. साल के दस महीने इनके जलवे  महाविद्यालय मे होते है और फिर काम निकल जाने के बाद इनको दूध मे पडी मक्खी की तरह निकाल कर फेक दिया जाता है. तब इनकी सेवा, शिक्षा , ज्ञान और अनुभव की बारा की ढेर हो जाती है. और सिर्फ यही कहा जाता है की यह नियुक्ति तो जनभागीदारी समिति के तहत सिर्फ पीरियड के तहत हुई थी. हम सब नियम कानून से बंधे हुये है.अतिथि विद्वान योग्यता में प्राध्यापकों की तुलना में कहीं भी कम नहीं होते है. वो नेट, पी.एच.डी. एम.फिल, सभी उच्च योग्यताओं से परिपूर्ण होते है. और ज्ञान में तो कभी कभी ६० वर्ष पूर्ण करने वाले प्राध्यापको से एक कदम आंगे ही होते है. क्योकी के वो अध्ययन में किसी से कम नहीं और अपने को समय समय में अपडेट करते रहते है. पर प्राध्यापक तो इन सबसे परहेज इस लिये है कि ना उनके पास इतना समय है और ना ही उनको जरूरत जब सरकार उन्हे ५००००-८०००० रुपये दे रही है तो पढना भी सिर्फ समय की बरबादी नजर आती है और कालेज के विद्यार्थी तो पढने आते कहाँ है. वो तो डिग्री लेने और राजनीति करने शासकीय महाविद्यालय में आते है.
          सरकार जहाँ एक तरफ प्राध्यापकों की नियुक्ति करने में असमर्थ है या ये कहे कि इतनी भी अब औकात नहीं रह गई की वो सहायक प्राध्यापक की सीधी भर्ती करके सभी महाविद्यालयों मे नियुक्ति करे ताकी यह स्थिति आये ही नहीं, सरकार के पास बैकलाग पदों की नियुक्ति करने का समय ,बजट और योजनायें है पर सामान्य भरती की कोई योजना नहीं है यह कहाँ का न्याय है. और दूसरी तरफ हर जगह महाविद्यालय लगातार कुकुरमुत्तों की तरह खुलते चले जारहे है. तो फिर छात्रो के पठन पाठन के हित के लिये अतिथि विद्वानों की नियुक्ति एक सामान्य प्राध्यापक की तरह क्यों नहीं की जाती है. कई जगह तो ऐसी है जिसमें प्राचार्य को छोड कर सारा स्टाफ अतिथि विद्वानों का है. पूरे सत्र मेहनत करने में ये कभी पीछे नहीं रहते है. वेतन मान में इनकों पीछे क्यों छोड दिया जाता है, सरकार इनके साथ इस तरह का सौतेला व्यवहार करती है जैसे सरकारी प्राध्यापक सरकार की जायज औलाद हो और ये नाजायज. इनका पूरा कार्य एक प्राध्यापक की तुलना में कहीं भी कम नहीं आँका जा सकता है, बल्कि कई मायनों में कामचोरी और पढने पढाने की चोरी के मामले में प्राध्यापक इन अतिथि विद्वानों से कई कदम आंगे होते है.
  कभी कभी तो ऐसा नहीं लगता है कि शासन की नजरों में जैसे ना इनका परिवार है. ना इन्हे. कोई जरूरत होती है. ये बिल्कुल फकीर है......आखिर क्या हो रहा है इस उच्च शिक्षा विभाग को क्यों इतना भेदभाव है. काम मे समान और वेतनमान में अलग अलग. आज जरूरत है कि उच्च शिक्षा विभाग  या तो लोक सेवा आयोग के तहत या तो परमानेंट नियुक्ति करे, या फिर इन अतिथि विद्वानों की योग्यता और अनुभव के आधार पर इनकी नियुक्ति के प्राध्यापक के रूप में करे तभी इनका भविष्य कुछ हद तक उज्ज्वल होगा. अन्यथा, आज तो ये पूरी तरह से उतान पडे हुये है. ना कोई माई बाप है ना कोई योजना इनका भविष्य बना रही है. और ना महाविद्यालय का कोई सहयोग.साल भर मे ९ महीने काम करने के बाद बाकी ३ महीने इनके कैसे परिवार चलते होंगे. कैसे इनका गुजारा होता होगा. और इनके परिवार का विकास कैसे होगा यह सोच कर चिंता होने लगती है. पर हमारा प्रशासन की कान में जूं तक नहीं रेगती, उसे इनके काम से सरोकार होता है परन्तु इनके जीवन इनके परिवार और इनके भविष्य से कोई सरोकार क्यों नहीं होता. यदि यही चलता रहा तो तय है कि आने वाले वक्त मे अतिथि विद्वान प्राइवेट विद्यालय और महा विद्यालय मे पढा लेगा पर सरकारी अतिथि विद्वान बनना नहीं पसंद करेगा, क्योंकि यदि मेजबान बेशर्म हो जाये तो अतिथि ना बनने में ही बडप्पन होगा.
अनिल अयान सतना.

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

मरीज हलाल डाक्टर खुशहाल


मरीज हलाल डाक्टर खुशहाल
बीमारियाँ बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारी जिंदगी मे आती है. और कब तक इनका ठिकाना रहेगा यह तो बीमार होने वाला व्यक्ति भी नहीं जानता है.बीमारी ,बीमार और अस्पताल का संबंध बिल्कुल लंगोटिये यार की तरह रहा है. जब भी बीमारी हमारी जिंदगी में आती है तो मजबूरी मे हमें अस्पताल रूपी यमलोक जाना ही पडता है. और यह स्थिति से सभी रूबरू होते है.आम आदमी को उस वक्त अपने आम तबके के होने का आभास हो जाता है जब वो गल्ती से सरकारी अस्पताल पहुँच जाये. जहाँ बीमारी चार दिन मे सही होने वाली होगी वहाँ चार सप्ताह में भी सही नहीं होती है. सरकारी अस्पताल यानी आपकी स्थिति एक जानवर से भी बदतर होती है यहाँ के लोग है भगवान और आप इंसान. इसके बीच का गैप इतना ज्यादा होता है कि आप चाह कर भी यहाँ के स्टाफ से मानवीयता की उम्मीद नहीं कर सकते है.
          सरकारी अस्पताल का हाल यूँ होता है कि मरीज डाक्टर की दवा खाकर ही मरते है. और डाक्टर बहुत ही सफाई से यह कह देता है कि भगवान के आँगे भला किसी की कैसे चल सकती है. सब कहने की बाते है. सरकारी अस्पताल का रवैया देख कर तो यह लगता है कि इस तरह की इमारते हमारे समाज मे सिर्फ मरीज से रुपया चूसने के लिये ही बनायी जाती है जिसमे एक वार्ड ब्वाय से लेकर एक अधिकारी तक सिर्फ मरीज और उसके परिवार वालों की चरसी उकेलने से बाज नहीं आते है. सिलसिला तब शुरु होता है जब उसे ओपीडी में घंटो खडे होकर सिर्फ दिखाने के लिये पर्ची कटवाने का इंतजार करना पडता है. फिर डाँक्टर साहब का इंतजार , उनके पास इतना समय कहाँ कि वो आम जन की बान को सुन सकें वो तो नर्सिंग होम्स और प्राइवेट प्रैक्टिस मे काफी व्यस्त रहते है. अब मरीज चाहे तो डाक्टर के घर जाकर या क्लीनिक जाकर अपना इलाज कराये वरना इलाज करवाने के लिये सूरज के डूबने तक का इंतजार करे,,,, मरीज और उसके परिवार वाले इस तरह की स्थिति देख कर झोलाछाप डाक्टर्स का सहारा लेने के लिये मजबूर है क्योंकि ना उनके पास उतना पैसा है और ना वक्त की डाक्टर साहब के नखडों को बरदास्त कर पाये. सरकारी अस्पताल की एक और खासियत होती है यहाँ पर कोई काम मुफ्त में नहीं होता है. हाँ मुफ्त रूप का जामा पहना दिया जाता है. मानवीयता तो यहाँ पर शर्म से पानी पानी नजर आती है. यहा पर भर्ती होने वाले मरीज तब ही यहाँ से जाते है जब वो जान जाते है कि अब मरने की स्थिति आगई है या फिर मरीज अब इन डाक्टर्स के बस का नहीं है.
यहाँ पर किसी मरीज को तभी सूचना दी जाती है जब वो पूरी तरह से टूट चुका होता है और दवाएँ मर्ज को सही कर पाने  मे असमर्थ हो जाते है. पूरी तरह से चूतिया बनाने का खेल चलता है अधिक्तर सरकारी अस्पतालों मे. यहाँ पर आम दवाएँ जो मरीजो को मुफ्त मे दी जानी चाहिये... या बुजुर्गों के इलाज की दवायें.. या गर्भवती महिलाओं के लिये योजनाये.... सभी सिर्फ नाम मात्र की है... इसके लिये भी यहाँ के कर्मचारियों के द्वारा मरीजों को परेशान कर लिया जाता है.और इतना परेशान किया जाता है कि दोबारा वो सरकारी योजनाओं के लाभ की बात सपनें में भी नहीं सोचते है.यहाँ का कोई भी कर्मचारी सही समय पर नहीं होता है. सबसे मिलने के लिये इंतजार और लंबा इंतजार करना ही पडता है, यहाँ के डाँक्टर्स को ना कभी रोक लगाई जाती है कि वो प्राइवेट प्रैक्टिस को इतना बढावा क्यों देते है नर्सिंग होम की कमाई के लिये क्यों मरीजों को परेशान करते है. मानवरूप मे इस तरह के भगवान और उनके चेलों से प्रेम की भाषा तो कोसों दूर नजर आती है.एक बात और जो देखने को मिलती है की इस लोगों को स्वागत सत्कार का मौका सिर्फ मेडिकल कम्पनियों के प्रतिनिधि खूब देते है. और उन्ही की सेवा सत्कार का परिणाम होता है कि डाक्टर्स को हर वर्ष मेडिकल कम्पनियों की तरफ से उनका दिया टारगेट पूरा करने के लिये फारेन टूर और अन्य सुविधाये और सेवाये भी बेरोकटोक दी जाती है. इस तरह की अप्रत्यक्ष रूप से दीजाने वाली सुविधा शुल्क का कोई माई बाप नहीं है. ना कोई इन पर लगाम लगाने के लिये आगे आता है.सरकार तो इस तरह के रिवाजों पे कोई भी प्रतिक्रिया नही देती है.
          अजीब है स्वास्थ्य विभाग और उसकी योजनाएँ,,,, भोपाल से समय समय में घोषणाएँ होती है पर मरीजों तक पहुँचना सिर्फ एक स्वपन ही होती है.ऐसा नहीं है कि सरकारी अस्पतालों के ऊपर आलाकमान नहीं है पर उनका निरीक्षण सिर्फ दिखावटी होता है, पहले से अस्पताल को पता होता है जिसके चलते वो अधिकारियों की भरपूर सेवाखुसामद करते है जिससे कमियाँ अपने आप छिप जाती है... निरीक्षण के दिन तो ऐसा लगता हैकि इससे अच्छा अस्पताल तो पूरे देश मे नहीं है.इस तरह के रवैये के चलते स्वास्थ विभाग चाहकर भी परदे के पीछे की तस्वीर नहीं देख पाता है.पूरी तस्वीर सिर्फ देखकर सोचने वाली होती है.देखने मे सब सामान्य सा दिखता है पर महसूस करने पर क्षोभ भी होता है और पीडा भी होती है. यही इस जहाँ की रीत है यदि अस्पतालों को जन सामान्य के लिये हित कर बनाना है तो पहले इन्हे नैतिक शिक्षा का पाठ पढने की आवश्यकता है. और फिर सी.एम.ओ. सी.एम.एच ओ. और हर व्यक्ति जो इस सेवा कार्य से जुडा हुआ है उनके स्वनुशासन की बहुत जरूरत वरना चाहे सरकार सिर के  बल भी खडी हो जाये चाहे स्वास्थ्य मंत्री दिन रात एक कर दे पर इनकी कालगुजारी से जनता और सर्वहारा वर्ग को नही बचाया जा सकता है इसी तरह आपरेशन्स मे औजार छूटते रहेंगे. गलत पतों पर शव प्रेषित किये जायेंगे. इसी तरह पब्लिक डाक्टर्स को सरे आम पीटेगी. क्योकी जनता इस तरह की मजाकबाजी कब तक इनके द्वारा बर्दास्त करती रहेगी.
अनिल अयान.सतना

बीमारियाँ बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारी जिंदगी मे आती है. और कब तक इनका ठिकाना रहेगा यह तो बीमार होने वाला व्यक्ति भी नहीं जानता है.बीमारी ,बीमार और अस्पताल का संबंध बिल्कुल लंगोटिये यार की तरह रहा है. जब भी बीमारी हमारी जिंदगी में आती है तो मजबूरी मे हमें अस्पताल रूपी यमलोक जाना ही पडता है. और यह स्थिति से सभी रूबरू होते है.आम आदमी को उस वक्त अपने आम तबके के होने का आभास हो जाता है जब वो गल्ती से सरकारी अस्पताल पहुँच जाये. जहाँ बीमारी चार दिन मे सही होने वाली होगी वहाँ चार सप्ताह में भी सही नहीं होती है. सरकारी अस्पताल यानी आपकी स्थिति एक जानवर से भी बदतर होती है यहाँ के लोग है भगवान और आप इंसान. इसके बीच का गैप इतना ज्यादा होता है कि आप चाह कर भी यहाँ के स्टाफ से मानवीयता की उम्मीद नहीं कर सकते है.
          सरकारी अस्पताल का हाल यूँ होता है कि मरीज डाक्टर की दवा खाकर ही मरते है. और डाक्टर बहुत ही सफाई से यह कह देता है कि भगवान के आँगे भला किसी की कैसे चल सकती है. सब कहने की बाते है. सरकारी अस्पताल का रवैया देख कर तो यह लगता है कि इस तरह की इमारते हमारे समाज मे सिर्फ मरीज से रुपया चूसने के लिये ही बनायी जाती है जिसमे एक वार्ड ब्वाय से लेकर एक अधिकारी तक सिर्फ मरीज और उसके परिवार वालों की चरसी उकेलने से बाज नहीं आते है. सिलसिला तब शुरु होता है जब उसे ओपीडी में घंटो खडे होकर सिर्फ दिखाने के लिये पर्ची कटवाने का इंतजार करना पडता है. फिर डाँक्टर साहब का इंतजार , उनके पास इतना समय कहाँ कि वो आम जन की बान को सुन सकें वो तो नर्सिंग होम्स और प्राइवेट प्रैक्टिस मे काफी व्यस्त रहते है. अब मरीज चाहे तो डाक्टर के घर जाकर या क्लीनिक जाकर अपना इलाज कराये वरना इलाज करवाने के लिये सूरज के डूबने तक का इंतजार करे,,,, मरीज और उसके परिवार वाले इस तरह की स्थिति देख कर झोलाछाप डाक्टर्स का सहारा लेने के लिये मजबूर है क्योंकि ना उनके पास उतना पैसा है और ना वक्त की डाक्टर साहब के नखडों को बरदास्त कर पाये. सरकारी अस्पताल की एक और खासियत होती है यहाँ पर कोई काम मुफ्त में नहीं होता है. हाँ मुफ्त रूप का जामा पहना दिया जाता है. मानवीयता तो यहाँ पर शर्म से पानी पानी नजर आती है. यहा पर भर्ती होने वाले मरीज तब ही यहाँ से जाते है जब वो जान जाते है कि अब मरने की स्थिति आगई है या फिर मरीज अब इन डाक्टर्स के बस का नहीं है.
यहाँ पर किसी मरीज को तभी सूचना दी जाती है जब वो पूरी तरह से टूट चुका होता है और दवाएँ मर्ज को सही कर पाने  मे असमर्थ हो जाते है. पूरी तरह से चूतिया बनाने का खेल चलता है अधिक्तर सरकारी अस्पतालों मे. यहाँ पर आम दवाएँ जो मरीजो को मुफ्त मे दी जानी चाहिये... या बुजुर्गों के इलाज की दवायें.. या गर्भवती महिलाओं के लिये योजनाये.... सभी सिर्फ नाम मात्र की है... इसके लिये भी यहाँ के कर्मचारियों के द्वारा मरीजों को परेशान कर लिया जाता है.और इतना परेशान किया जाता है कि दोबारा वो सरकारी योजनाओं के लाभ की बात सपनें में भी नहीं सोचते है.यहाँ का कोई भी कर्मचारी सही समय पर नहीं होता है. सबसे मिलने के लिये इंतजार और लंबा इंतजार करना ही पडता है, यहाँ के डाँक्टर्स को ना कभी रोक लगाई जाती है कि वो प्राइवेट प्रैक्टिस को इतना बढावा क्यों देते है नर्सिंग होम की कमाई के लिये क्यों मरीजों को परेशान करते है. मानवरूप मे इस तरह के भगवान और उनके चेलों से प्रेम की भाषा तो कोसों दूर नजर आती है.एक बात और जो देखने को मिलती है की इस लोगों को स्वागत सत्कार का मौका सिर्फ मेडिकल कम्पनियों के प्रतिनिधि खूब देते है. और उन्ही की सेवा सत्कार का परिणाम होता है कि डाक्टर्स को हर वर्ष मेडिकल कम्पनियों की तरफ से उनका दिया टारगेट पूरा करने के लिये फारेन टूर और अन्य सुविधाये और सेवाये भी बेरोकटोक दी जाती है. इस तरह की अप्रत्यक्ष रूप से दीजाने वाली सुविधा शुल्क का कोई माई बाप नहीं है. ना कोई इन पर लगाम लगाने के लिये आगे आता है.सरकार तो इस तरह के रिवाजों पे कोई भी प्रतिक्रिया नही देती है.
          अजीब है स्वास्थ्य विभाग और उसकी योजनाएँ,,,, भोपाल से समय समय में घोषणाएँ होती है पर मरीजों तक पहुँचना सिर्फ एक स्वपन ही होती है.ऐसा नहीं है कि सरकारी अस्पतालों के ऊपर आलाकमान नहीं है पर उनका निरीक्षण सिर्फ दिखावटी होता है, पहले से अस्पताल को पता होता है जिसके चलते वो अधिकारियों की भरपूर सेवाखुसामद करते है जिससे कमियाँ अपने आप छिप जाती है... निरीक्षण के दिन तो ऐसा लगता हैकि इससे अच्छा अस्पताल तो पूरे देश मे नहीं है.इस तरह के रवैये के चलते स्वास्थ विभाग चाहकर भी परदे के पीछे की तस्वीर नहीं देख पाता है.पूरी तस्वीर सिर्फ देखकर सोचने वाली होती है.देखने मे सब सामान्य सा दिखता है पर महसूस करने पर क्षोभ भी होता है और पीडा भी होती है. यही इस जहाँ की रीत है यदि अस्पतालों को जन सामान्य के लिये हित कर बनाना है तो पहले इन्हे नैतिक शिक्षा का पाठ पढने की आवश्यकता है. और फिर सी.एम.ओ. सी.एम.एच ओ. और हर व्यक्ति जो इस सेवा कार्य से जुडा हुआ है उनके स्वनुशासन की बहुत जरूरत वरना चाहे सरकार सिर के  बल भी खडी हो जाये चाहे स्वास्थ्य मंत्री दिन रात एक कर दे पर इनकी कालगुजारी से जनता और सर्वहारा वर्ग को नही बचाया जा सकता है इसी तरह आपरेशन्स मे औजार छूटते रहेंगे. गलत पतों पर शव प्रेषित किये जायेंगे. इसी तरह पब्लिक डाक्टर्स को सरे आम पीटेगी. क्योकी जनता इस तरह की मजाकबाजी कब तक इनके द्वारा बर्दास्त करती रहेगी.
अनिल अयान.सतना