बुधवार, 7 अगस्त 2013

अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन

अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन
सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है. सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस अपाहिज प्रशासन में मौत का आशन
सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है. सतना के बीच बाजार में जो भी हुआ उसके बारे में कोई विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है. परन्तु यहाँ भी तय है की इस तरह के हादसे अपने शहर की शान्ति के लिए घातक है. आज प्रश्न यह उठता है की ऐसे हादसे होते क्यों है. कौन जिम्मेवार होता है इस तरह के हादसों के लिए. आज जिस तरह सतना के बीच बाजार में एक भारी वाहन घुस कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है.
आज भले ही प्रशासन कुछ भी बहाने बना ले परन्तु यह  भी तय है की लोगों की जानों की कीमत सिर्फ बहानेबाजी नहीं होसकती है. हम क्यों भूल जाते है की जिस तरह यह हादसा हुआ उस तरह के कई हादसे इस शहर में हो चुके है. और तब ही नों इंट्री की बात को हवा मिलती है. कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है और प्रशासन भी अपने काम में उसी तरह लग जाता है. जैसे  की कोई बुरा सपना देखा हो. आज जरूरत है की नियमों  पर पुनः समीक्षा हो और यह तय किये जा सके की ऐसे हादसों के लिए पुलिश के आलावा और कौन से कारक है जो सतना के प्रशासन के थू थू करने के लिए जनता को मजबूर करते है. प्रशासन हमें सुरक्षित रखने के लिए पुलिस देती है. पुलिस अमले की जवाबदारी है की जनता के रक्षा करे. प्रशासन ने नियम बनाया की सुबह से रात तक भारी वाहन प्रवेश करे तो भी प्रवेश होते वाहनों के लिए जिम्मेवार कौन है. क्या पुलिस प्रशासन इतना निकम्मा हो गया की उसके घर के खर्चो के लिए भारी वाहनों के द्वारा दी जाने वाली बकसीस से दिन गुजर रहे है. क्या सरकार को और वेतनमान बढाने की आवश्यकता है ताकि पुलिस वाले इस तरह के नीचतापूर्ण कार्य बंद करने की महान कृपा करे. और नो इंट्री का सख्ती से पालन हो. यह भी सच है की पिछले कुछ महीनों से पुलिश अपहरण कांडो में इतना व्यस्त हो गयी के उसे इस मामले में सोचने का कोई अवसर ही नहीं मिला. प्रशासन को मुख्यमंत्री के स्वागत और सुरक्षा व्यवस्था की चिंता अधिक थी. आम जनता तो सिर्फ इनके लिए कीड़े मकोडो की तरह ही शायद है. दो दिन पहले हुए इस हादसे ने प्रशासन के गाल में जिस तरह का तमाचा लगाया है वह प्रशासन मुख्यमंत्री जी की यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था के दौरान भी नहीं भूलेगा. मन में यह ख्याल क्यों रहा था उस दिन की अपने सतना के अमन चैन को भंग करने के लिए कही यह एक राजनैतिक साजिस तो नहीं थी. परन्तु. ज्यादा हताहत दोनों धर्मों के लोग हुए और सबसे ज्यादा फुटपाथ के वो लोग जिनकी कोई जात थी और कोई पात. वो तो सिर्फ गरीब थे. एक तरफ गम इस बात का है की प्रशासन की नपुंसकता का एक और नमूना इस रमजान के पाकीज मौके में देखने को मिला .ऐसा लगने लगा है इस शहर में किसी के साथ कुछ भी हो सकता है  परन्तु प्रशासन शिखंडी के तरह मौन बना रहेगा भविष्य में भी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. कलेक्टर का देर से पहुँचना और फिर विधायक का आप खोना कहीं कहीं एक घातक परिणाम की आशंका पैदा कर रहा था. यह दर्द विदारक घटना कई प्रश्न समाज और प्रशासन के सामने खड़े करते है. की क्या इसी तरह से सड़क सुरक्षा व्यवस्था रहेगी. क्या. इसी तरह सड़क आम जन के खून से लाल होती रहेगी. क्या इसी तरह प्रशासन सोता रहेगा. क्या जिलाधीश इसीतरह बहाने बनाते रहेगे. क्या पुलिस से बेहतर जिम्मेवारी जनता निभाती रहेगी.
अब जागने की जरूरत है. शासन और पुलिस दोनों को क्योंकि सिर्फ नियमों को तार तार करने की जिम्मेवारी और आम जन को मौत की शूली में चढाने की जिम्मेवारी बस उनकी नहीं है. बल्कि इन सब से ज्यादा जरूरत है आम नागरिक के मन से अपने प्रति एक सम्मान पैदा करने के लिए अच्छे कर्म  करने की. सिर्फ मंत्रियों और आला कमान के अधिकारियो से पीठ ठोकवा कर जनता का सेवक जनता के लिए लाभकारी और फलदायी नहीं होगा बल्कि जनता के बीच जाकर उसकी सुरक्षा का जिम्मा उठाना ही प्रशासन और पुलिस का प्रथम और अंतिम रास्ता होना चाहिए. यह एक मौका है नो इंट्री के नियमो को सख्त करने और जवानों को मुस्तैद करने का. नहीं तो यह पब्लिक सब जानती है की कहाँ से उसे अपने कदम उठाने होते है और फिर उसके लिए वो किसी से भी इजाजत नहीं लेती है भले ही धरा १४४ क्यों लगी हो.कर लोगों को अपनी चपेट में लिया वह कोई आम बात नहीं है.
आज भले ही प्रशासन कुछ भी बहाने बना ले परन्तु यह  भी तय है की लोगों की जानों की कीमत सिर्फ बहानेबाजी नहीं होसकती है. हम क्यों भूल जाते है की जिस तरह यह हादसा हुआ उस तरह के कई हादसे इस शहर में हो चुके है. और तब ही नों इंट्री की बात को हवा मिलती है. कुछ दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है और प्रशासन भी अपने काम में उसी तरह लग जाता है. जैसे  की कोई बुरा सपना देखा हो. आज जरूरत है की नियमों  पर पुनः समीक्षा हो और यह तय किये जा सके की ऐसे हादसों के लिए पुलिश के आलावा और कौन से कारक है जो सतना के प्रशासन के थू थू करने के लिए जनता को मजबूर करते है. प्रशासन हमें सुरक्षित रखने के लिए पुलिस देती है. पुलिस अमले की जवाबदारी है की जनता के रक्षा करे. प्रशासन ने नियम बनाया की सुबह से रात तक भारी वाहन प्रवेश करे तो भी प्रवेश होते वाहनों के लिए जिम्मेवार कौन है. क्या पुलिस प्रशासन इतना निकम्मा हो गया की उसके घर के खर्चो के लिए भारी वाहनों के द्वारा दी जाने वाली बकसीस से दिन गुजर रहे है. क्या सरकार को और वेतनमान बढाने की आवश्यकता है ताकि पुलिस वाले इस तरह के नीचतापूर्ण कार्य बंद करने की महान कृपा करे. और नो इंट्री का सख्ती से पालन हो. यह भी सच है की पिछले कुछ महीनों से पुलिश अपहरण कांडो में इतना व्यस्त हो गयी के उसे इस मामले में सोचने का कोई अवसर ही नहीं मिला. प्रशासन को मुख्यमंत्री के स्वागत और सुरक्षा व्यवस्था की चिंता अधिक थी. आम जनता तो सिर्फ इनके लिए कीड़े मकोडो की तरह ही शायद है. दो दिन पहले हुए इस हादसे ने प्रशासन के गाल में जिस तरह का तमाचा लगाया है वह प्रशासन मुख्यमंत्री जी की यात्रा की सुरक्षा व्यवस्था के दौरान भी नहीं भूलेगा. मन में यह ख्याल क्यों रहा था उस दिन की अपने सतना के अमन चैन को भंग करने के लिए कही यह एक राजनैतिक साजिस तो नहीं थी. परन्तु. ज्यादा हताहत दोनों धर्मों के लोग हुए और सबसे ज्यादा फुटपाथ के वो लोग जिनकी कोई जात थी और कोई पात. वो तो सिर्फ गरीब थे. एक तरफ गम इस बात का है की प्रशासन की नपुंसकता का एक और नमूना इस रमजान के पाकीज मौके में देखने को मिला .ऐसा लगने लगा है इस शहर में किसी के साथ कुछ भी हो सकता है  परन्तु प्रशासन शिखंडी के तरह मौन बना रहेगा भविष्य में भी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. इस हादसे के बाद सतना को अब हाई टेक होना चाहिए. और सरकार को चाहिए की  पुलिस को और प्रायोगिक बनाये ताकि इस तरह की आकस्मिक परिस्थितियों से निपटा जा सके और पहले तो यह कोशिश की जानी चाहिए की इस तरह  के नियम विरोधी कृत्य पुलिस के द्वारा किये जाये. मंगलवार की इस काली शाम में सबसे ज्यादा खतरा तो सांप्रदायिक दंगो के भाडाकने और प्रशासनिक सिटी कोतवाली , सिटी अस्पताल के आस पास बवला फैलने का था. क्योकि जिस तरह पुलिस और जनता के बीच  तू तू मै मै हो रही थी वह उग्रता को और बढाने वाली थी. कलेक्टर का देर से पहुँचना और फिर विधायक का आप खोना कहीं कहीं एक घातक परिणाम की आशंका पैदा कर रहा था. यह दर्द विदारक घटना कई प्रश्न समाज और प्रशासन के सामने खड़े करते है. की क्या इसी तरह से सड़क सुरक्षा व्यवस्था रहेगी. क्या. इसी तरह सड़क आम जन के खून से लाल होती रहेगी. क्या इसी तरह प्रशासन सोता रहेगा. क्या जिलाधीश इसीतरह बहाने बनाते रहेगे. क्या पुलिस से बेहतर जिम्मेवारी जनता निभाती रहेगी.

अब जागने की जरूरत है. शासन और पुलिस दोनों को क्योंकि सिर्फ नियमों को तार तार करने की जिम्मेवारी और आम जन को मौत की शूली में चढाने की जिम्मेवारी बस उनकी नहीं है. बल्कि इन सब से ज्यादा जरूरत है आम नागरिक के मन से अपने प्रति एक सम्मान पैदा करने के लिए अच्छे कर्म  करने की. सिर्फ मंत्रियों और आला कमान के अधिकारियो से पीठ ठोकवा कर जनता का सेवक जनता के लिए लाभकारी और फलदायी नहीं होगा बल्कि जनता के बीच जाकर उसकी सुरक्षा का जिम्मा उठाना ही प्रशासन और पुलिस का प्रथम और अंतिम रास्ता होना चाहिए. यह एक मौका है नो इंट्री के नियमो को सख्त करने और जवानों को मुस्तैद करने का. नहीं तो यह पब्लिक सब जानती है की कहाँ से उसे अपने कदम उठाने होते है और फिर उसके लिए वो किसी से भी इजाजत नहीं लेती है भले ही धरा १४४ क्यों लगी हो.

सोमवार, 5 अगस्त 2013

डीठ लगी आजादी के समीकरण

डीठ लगी आजादी के समीकरण
आज हम स्वतंत्रता की ६५वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहे है और यह भी जानते है कि आज के समय में कितना जरूरी हो गया है ,समझना कि आजादी के मायने क्या है. जिस तरह के संघर्ष के चलते अंग्रेज भारत छॊड कर गये और भारत को उस समय क्या खोकर यह कीमती आजादी मिली यह हमे हर समय याद रखना होगा. आज  ६० वर्ष के ऊपर होगया है भारत अपने विकसित होने की राह सुनिश्चित कर रहाहै. वैज्ञानिकता, व्यावसायिकता, वैश्वीकरण के नये आयाम गढ रहाहै. आज के समय समाज, राज्य, राष्ट्र और अन्य विदेशी मुद्दे ऐसे है कि आज के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान में पानी फिरता नजर आ रहा है.ऐसा महसूस होता है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज अपने राजनेताओं के गुलाम हो गये है भारत के हर राज्य अपनी जनसंख्या बढाने में लगे हुये है. पहले जहाँ भारत की प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधन समुचित थे यहाँ के विकास के लिये आज के समय में भारत को हर क्षेत्र में आयात ज्यादा और निर्यात कम करना पड रहा है,भारत ने जितना विकास किया और विकास दर बढाई है उतना ही भारत की मुद्रा स्फीति की दर में गिरावट हुई है. आज भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आने के लिये जगदोजहद करने में लगा हुया है. और दूसरी तरफ आतंकवाद, और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे भी कहीं ना कहीं भारत को घुन के समान खत्म करने में लगे हुये है. ऐसा लगता है कि गाडी की लाल बत्तियाँ वही है सिर्फ सवारियाँ बदल गयी है. आज जो भी राज्य और केंद्र की कुर्सी में बैठ रहाहै वह सब अपने राजनैतिक समीकरण बनाने में लगे हुये है.आज के समय में भारत का संविधान भी सुरक्षित नहीं है.इसके साथ साथ भी खिलवाड करने , बलात्कार करने से राजनेता बाज नहीं आरहे है,आज के समय में भाषा गत मुद्दे, क्षेत्र के मुद्दे,जाति धर्म के मुद्दे इस तरह छाये हुये है कि उसके सामने देश को प्रगति और विकास के विचार विमर्श करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है. राष्ट्रीय पार्टी के नाम पर यूपीए, और एनडीए गठबंधन अपनी सरकार बनाने में लगे हुये है. आज सिफ भारत को भौतिक रूप से आजादी मिल गयी है परन्तु सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक, आजादी के सामने भारत आज भी पाश्चात सभ्यता के पीछे घिघिया रहा है.
  आज के समय सिर्फ राजनैतिक समीकरण बनाने के किसी के पास कुछ भी नहीं सूझता है. चाहे वह छात्र नेता हो या राजनैतिक मठाधीश सभी अपने अपने समीकरण से कुर्सी की राजनीति के दलदल में अपने को डुबोने मे लगे हुये है. राजनैतिक स्थिति यह है भितरघात से बचने की कोशिश में खुद भी भितरघाती बन जाते है. आजादी के बाद आज के समय मे एक सर्वहारा वर्ग से पूँछे की बाबा तुम्हे आजादी के पहले और बाद में क्या अंतर दिखाई पडता है तो चाहे किसान हो, मजदूर हो, बुजुर्ग हो, या कामगार हो वह सब यही कहेंगें कि पहले साहूकारों से, बिचौलियों से कर्जा लेकर अपना जीवनयापन करते थे आज सरकार घर आकर जबरन कर्जा दे जाती है. और फिर मार  मारकर वसूल करती है. आज पाश्चात सभ्यता का प्रभाव है कि दो पीढियाँ एक साथ टेलीविजन का मजा नही ले सकती है. कब शीला की जवानी. टिकू जिया, जलेबी बाई जैसे गाने बडे बुजुर्गों को अपने साथ बैठे नाती पोतों से अलग उठ कर जाने के लिये विवश कर देंगें यह वो भी नहीं जानते है.आज के समय में सब कारक उठे है परन्तु आज के समय  में सिर्फ चारित्रिक अवमूल्यन इस तरह हुआ है कि ऐसा लगता है हर रिश्ते बेमानी से है. सगा बाप अपनी बेटी के साथ बिस्तर में शारीरिक संबंध बनाता है और समाज उसे सिर आँखो में बिठाता है.आज के समय मे आरक्षण की आग इस तरह फैली हुई है कि आज के समय में आरक्षित जातियाँ ही इसका दुरुपयोग करने में लगी हुयी है. और सवर्णों को आरक्षण की आवश्यता आन पडी है.आज के समय बौद्धिक आजादी के नाम पर लोग अन्य जातियों धर्मों को गाली देने में अपनी शान समझते है. आज के समय में रुपया डालर और अन्य देशो की मुद्राओं की तुलना में लगातार गिरता ही जा रहा है.आज के समय में मँहगायी सुरसा की तरह अपना मुह फैला रही है और गरीबी को निगलने में आतुर है. आज लोकतंत्र में तंत्रलोक मिलता नजर आरहा है. और पब्लिक प्रापर्टी को लोग अपने घर की जागीर समझ कर अतिक्रमण करने में उतारू होगये है. आज के समय सिनेमा और खेल दोनो सेंसर और डोपिंग टेस्ट की कगार में खडे हुये है. पूरा देश अपनी आजादी के गुमान और गुरूर में इतना मादक होगया है कि उसे ना अपने अतीत के संघर्ष की फिक्र है और ना इस बात का भान है कि भविष्य में भी कोई उसे फिर किसी तरीके से अपना उपनिवेश बना सकता और वो कुछ भी नहीं कर सकता है. आज के समय में भारत के पडोसी ही दुश्मन बने हुये है,. और तब पर भी भारत उनसे भाई चारे की बाँह फैलाये गले लगाने के लिये आतुर नजर आता है. इतने वर्ष होने के बाद भारत आज भी वैचारिक रूप से गुलाम है. बस गुलाम बनाने वाले अपना नकाब बदल लेते है. आज के समय में नपुंसक केंद्र की सत्ता अपने घरेलू लडायी में ही उलझी नजर आती है. आज के समय में लाल किले में तिरंगा फहरा लेने , परेड की सलामी लेलेने से, और संसद मे बैठ कर जूतम पैजार करने भर से सच्ची श्रृद्धाँजलि होगी तो यह सरासर गलत है. आज के समय में जरूरत है कि बेरोजगारी को कम करके आने वाली पीढी को आतंकवादी, अराजक, और डकैत बनने से रोका जाये, पलायन करने से रोका जाये. और यह प्रयास किया जाये कि नजर लग चुकी आजादी का अपने प्रयासों के सार्वभौमिक बनाया जाए नहीं तो. आज के जनप्रतिनिधि... प्रति जन निधि संचय करने में अपने आप के साथ साथ देश को भी विदेशियों के हाँथों बेंचते रहेंगें और आम जनता देश की आजादी के जश्न मनाती रहेगी.
अनिल अयान श्रीवास्तव,सतना.

रविवार, 4 अगस्त 2013

क्षेत्र के विकास में राजनैतिक बट्टा.

क्षेत्र के विकास में राजनैतिक बट्टा.
केंद्र की राजनीति में फिर से एक नया मोड आगया है. जिसके तहत नये राज्यों की माँग जोर पकडती जा रही है. और इसके चलते लोकसभा के चुनाव भी प्रभावित होने के आसार नजर आने लगे है, तेलंगाना की घोषणा के बाद जिस तरह का माहौल आंघ्राप्रदेश में बना हुआ है वह एक राजनैतिक नौटंकी के अलावा और कुछ भी नही है. और यह भी तय है कि मंत्रियों का इस्तीफा इसका एक भाग है हम सब जानते है कि देश के विकास में नये राज्यों के विकास का मह्त्वपूर्ण योगदान रहाहै.
भारत जैसे गणतंत्र और लोकतांत्रिक लघुमहाद्वीप में जितने अधिक नये राज्य या प्रदेश बनेंगे उतना ही अधिक देश का विकास तय है. और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. हाँ यह भी तय है कि यदि केंद्र सरकार मजबूती से राज्य सरकारों में अपना सामन्जस्य बना कर रखे तो देश दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा क्योंकी एक समान भाषा ,बोली, और संस्कृति वाले लोग अपने समान व्यवस्था के चलते जीवन यापन करेंगे और उस क्षेत्र का समुचित विकास भी करेंगें क्योंके उनके पास समुचित सत्ता का अधिकार और अर्थ मौजूद होगी. आज भी केंद्र सरकार के पास राज्यों के द्वारा अनुमोदित बहुत से ऐसे प्रस्ताव है जिसमे नये राज्यों को बनाने का प्रस्ताव रखा गया है और वह है कि इस प्रस्तावों पे इसलिये गौर नहीं कर पा रही है क्योंकी कहीं ना कहीं उसके स्वार्थ की चपातियाँ यहा नहीं सेंकी जा रही है. और उसे इस  वक्त भारतीय जनता पार्टी की छीछालेदर करने से फुरसत कहाँ है.
आज के समय में देश में लगभग ३० राज्यों को बनाने की माँग तेज हो गयी है और इस माँग का उठना इसलिये जायज है क्योंकी इस जरिये ही सही उस क्षेत्र का विकास और तेजी से होगा . इस बारे में संबंधित राज्य सरकारों ने पहले से केंद्र के पास अनुमोदन भेज दिया है और और इस इंतजार में है कि कब कैबिनेट इस पर अपनी मोहर लगा देगा. जिसके चलते काफी लंबे समय चल रहे आंदोलनों और संघर्ष को देर से ही सही विराम तो मिलेगा. परन्तु परिणाम सिर्फ सिफर आ रहा है. तेलंगाना के बनने से ही माहोल इतना गरमा गया है अब केंद्र की हिम्म्त ही नहीं है कि वह और राज्यों की माँग को अपने ठंडे बस्ते से निकाल कर पब्लिक के सामने नया परिणाम रखे. आज के समय में तेलंगाना ,विदर्भ, गोरखालैड, कार्बी. बोडोलैड, कामतापुर,मिथिलांचल, बुंदेलखंड, बघेलखंड , सौराष्ट्र, विंध्यप्रदेश, सीमांघ्र, ब्रजप्रदेश, सहित ३० राज्यों की कहानी आज क्या होने वाली है यह कोई नहीं जानता है,. हमारे देश का संविधान भी कहता है कि यदि क्षेत्र का विकास नये राज्य बनाने से होता है तो राज्य , जिले ,कस्बे, और नयी तहसीले बनाने में कोई हर्ज नहीं है. यदि इन राज्यों के बनाने में मुद्रा और मानव संसाधन खर्च होता है तो इन जगहों में उपस्थित प्राकृतिक संपदा और जन शक्ति से नये विकास के पथ भी खुलते है. और इससे भारत के विकासशील देश से विकसित देश के रास्ते और साफ होंगे.जो लोग यह कहते है कि इस तरह के विकास से क्षेत्रवाद पनपता है और व्यक्तियों राजनीति, धर्म, जाति, क्षेत्र , भाषा के नाम में बाँटने की एक साजिस है , तब मुझे उनसे एक ही प्रश्न करने का मन करता है कि आज ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहाँ पर राजनीति नहीं है. और यदि विकास के लिये बंटवारा होता है अच्छा है.मैने अभी देखा है कि छत्तीसगढ बना, झारखण्ड बना, उत्तरांचल बना. कहाँ पर विकास नहीं हुआअ. है यह तो तय है कि यदि क्षेत्र का निर्माण हो रहा है और वहाँ का कोई नेतृत्व नया प्रदेश बनाने में लगा हुआ  है तो वहाँ का विकास तय है कि होगा. पर यह बात भी तय है कि नया राज्य बनाने और उसकी राजधानी बनाने के साथ केंद्र सरकार को नयी जिम्मेवारियों को ढोने  के लिये कंधों को मजबूत करना पडॆगा. और इस मामले में शायद हमारे देश के केंद्र में बैठी सरकार की स्थिति अभी उतनी परिष्कृत नहीं है इसी लिये वो क्षेत्रवाद को मुद्दा बनाकर नये राज्यों को गठन करने मे आना कानी करने में लगी हुयी है. हो सकता है कि मेरा नजरिया आप सभी से अलग हो. परन्तु मेरा मानना है कि नये राज्यों के गढन में संभावनायें भी है और आशंकाये भी संभावनायें इस लिये है कि प्रगति और विकास का नया रास्ता खुलेगा और उस क्षेत्र के लोग ज्यादा तीव्रता से विकास करेंगे और देश का विकास होगा, आशंकायें इसलिये है कि वोट बैंक में  यह देखा जायेगा की केंद्रीय पार्टियों में किसका पक्ष ज्यादा मजबूत हो रहा है , भाजपा का या काग्रेस का. क्योकीं केंद्र की पार्टी का यदि वोट बैंक कमजोर हो जायेगा तो नये राज्य कभी ना बनेंगें. चाहे कोई जितना भी सर पटक कर मर जाये. इसलिये मुझे लगता है कि देश की आज की स्थिति को देख कर लगता हैकि आज जिस तरह भ्रष्टाचार, बढ रहा है और चरित्र का पतन हो रहाहै . उसके लिये देश को जरूरत है कि नये आयाम खोजे जाये ताकि विकास के नये कदम बढाने में मदद मिले. और इस हेतु नये राज्यों का गढन बहुत आवश्यक है. क्योंकि इसके बिना पिछ्डे क्षेत्रों के अविकसित लोगो को आँगे बढने का मौका मिलना तय है नहीं तो ये राजनीतिज्ञ अपने वोट और स्वार्थ के चलते नये राज्यों की फाइले ठंडे बस्ते में ही डाले रह जायेगें.

शनिवार, 27 जुलाई 2013

बेरहम भूख और गरीबी ,कब से नेताओं के करीबी...



बेरहम भूख और गरीबीकब से नेताओं के करीबी,...

पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि इस समय सत्ता पक्ष के नेता नपाडी गरीबी और भूख का अच्छा खासा तमाशा बनाये हुये है.जिसको देखो वो ही इस पर ढेर सारे कमेंट करके अपने को मीडिया के सामने ग्लोबलाइज करना चाहता है.खाना ,रोटी-सब्जी, दाल-चावल, इन सब का हिसाब रखने की कोशिश में लगे हुये है. और अपने बयानो के जरिये जनता का ध्यान खींचने की कोशिश करने में लगे हुये है. ऐसा लगता है कि जैसे बंदर के हाँथों मे अदरक लग गयी है और वह उसके स्वाद पाने के लिये बौराया फिर रहा है. इस खाने की कीमत का हिसाब लगाने वाले ये जनप्रतिनिधि आज तक अपने घर में खर्च होने वाले सामान्य खर्चों का हिसाब नहीं लगा पाये है. और आज इस देश का दुर्भागय की वह सब आज भूख, भूखे, गरीब गरीबी. भोजन और खिलाने वालों का हिसाब लगाने लगे है.राजनीति के धतूरे से बावरे हुये ये सब चुनाव २०१४ की जगदोजहद में अपने बयानों से वोट इकट्ठा करने की जिस तरकीब को जनता में आजमाने में लगे हुये है. पर वो भूल जाते है कि आज के समय की पब्लिक सब जानती है कि इस वक्त सरकार भी सिरफिरी हो गई है और जो जैसा चाहता है वैसा बयान देकर मीडिया में छाना चाहता है. ताकि जब चुनाव लडे तो उसको उस प्रोपेगेंडा का लाभ मिल सके और अपनी पार्टी का शुभचिंतक बन सके.यह पूरा देश इस वक्त इसी तरह की आग से जल रहा है. यहाँ दलाली, कलाली, मवाली, से लेकर धरम और कुकर्म की मंडी बनती जा रही है. राजनीति के अखाडे है. औरतों का क्रय विक्रय करने वाले अब बयानबाजी पे उतारू हो गये है. गिरोहबाजी का यह हाल है कि इस वक्त चुनाव की स्थिति का कुप्रभाव दिखने लगा है ..इसी वजह से राज बब्बर जैसे नेता अब होटल और ढाबे के सस्ते खाने की चिंता करने लगे है और भी अन्य नेता साथ साथ अपना हाथ इस बहती गंगा में धोते जा रहे है. खान १२,,,, या एक रुपये में मिले तो भी इन सभी को क्या फर्क पडता है ये तो १२ लाख से १२ करोड के मूत्रालय में मूत्र विसर्जन करते है. और बात करते है गरीबों के ससते खाने की शायद वो नहीं जानते है कि
"भूख जब जवान होती है, जिंदगी एक इंतिहान होती है, एक कदम भी कोई चल नहीं पाता, पैरो में जब थकान होती है," जिन्हे आज तक रुपयों के दम पर नीलाम की गई हर फरमाईसो को पूरा किया गया हो वह क्या जानेगा कि खाना २ रुपये में कहाँ मिलता है. यदि एक पता पूछा जाये तो इन नेताओं के मुँह में दही जम जायेगा. तब किसी के मुँह से कोई शब्द नहीं निकल सकता है.
    एक बात और मैने देखा है कि इस तरह की बयान बाजी के चलते हमारे प्रधानमंत्री जी, सोनिया जी और अन्य काँग्रेस की पैरवी करने वाले लोग किस बिल में घुस जाते है समझ में नहीं आते है. राहुल गाँधी की तो बोलती बंद हो जाती है और सरकार की अस्मिता में बट्टा लगाने वाले सरे राह लूट ले जाते है,आज भी आम आदमी के कुछ आम सवाल जो जबाव नहीं दे पाये उन्हे इस बात जिक्र करने का तो कोई हक नहीं है. ये सवाल आपसे सोचता हूँ कि साझा कर लेता हूँ. २५० रु का गैस सिलेन्डर ९५० रु का क्यो दिया जा रहा है. १४रु किलो की चीनी ५० रु किलो में क्यों दी जा रही है.३५ रु लीटर का पेट्रोल ७५ रु लीटर में क्यों मिल रहा है. २५ रु किलो की दाल ९० रु. किलो में क्यों मिल रही है. और तो और १५ रु किलो का टमाटर ८० रुम, किलो में क्यों मिल रहा है. राज बब्बर साहब शायद इन सवालो के जवाब देने में किनारा कर सकते है क्योकी उनकी सरकार ही इस सब प्रश्नों की जिम्मेवारी ले सकती है.यदि मुम्बई की बात करते है तो उन्हे यह भी पता होना चाहिये कि मुम्बई के कई बडे अस्पतालों के पास कुछ ऐसे धर्मशालाये है जहाँ मरीजों और उनके साथियों को मुफ्त में भोजन कराया जाता है. और हम गुरुद्वारे के लंगरों को क्यों भूल जाते है जिसमें हर रोज अनगिनत आने वाले भक्त जनों को मुफ्त में भोजन कराया जाता है. आज के समय में इतने रुपये में मरने के लिये जहर तक नसीब नहीं होता है परन्तु खाये अघाये लोगो की यह प्रवृति होती है कि वह अंगुली करने में लगे रहते है . ना किसी को चैन से रहने देते है. और ना खुद चैन से रहते है. आज के समय में यह सच है कि भारत दिनों दिन गरीब होता जारहा है. विकास दर की तीव्रता और जनसंख्या दर में तीव्रता दोनो एक साथ चल रही है. और कोई चाह कर भी इसे नहीं रोक सकता है. परन्तु जिस जनता ने इन नेताओं को संसद पहुँचाया है वह शायद भूल गये है कि सिविल लाइन और संसद के अंदर के रेट और बाहर के रेट में बहुत अंतर होता है. योजना आयोग जिस ३४ रुपये की इतनी पैरवी करता चला आ रहा है वह भी प्रायोगिक आँकडो से बहुत दूर है और आज के समय पर देश के बाह्य और आँतरिक खतरों के मुद्दे तैयार हो रहे है उनपर चर्चा और बयान आना चाहिये परन्तु उन पर कोई एक भी मुद्दा नहीं सामने आता है. सिर्फ गरीब गरीबी और भूख का मुद्दा ही उछालने की जो नंगी प्रवृति है वह् कहीं ना कहीं देश को तबाह और बर्बाद करने की पहल करने में सहायक होती शाबित हो रही है. रही बात भूख की तो सिर्फ इतना ही कहता चाह्ता हूँ कि फुटपाठ मे पडे बेबस गरीब से पूँछो तो जवाब यही आता है कि
बेरहम भूख मौत से बडी होती है.
सुबह मिटाओ शाम खडी होती है.

और कालिका त्रिपाठी जी की ये पक्तियाँ याद आती है. कि
"सियासत में इलाही और कितने सीन देखेंगे
हरे बस्तर में बिछती खून की कालीन देखेंगे
बडी संजीदगी से रहनुमाई बेरहम होगी
बडी शर्मिंदगी से मुल्क की तौहीन देखेंगे."


- अनिल अयानसतना.

मौत की डील बनी मिड डे मील.......



कब तक सहे
मौत की डील बनी मिड डे मील.......
अनिल अयान,

उडीसा , गोवा और बिहार के स्कूलों  में घटी एम.डी.एम. की कहानी खत्म कर के रख दी है. मिड डे मील यानी मध्यान भोजन योजना का क्रियान्वयन जिस उद्देश्य को लेकर किया गया था. वह किनारे चलागया है. मिड डे मील का हाल बिहार के स्कूलों में होना और फिर गोवा और उडीसा के स्कूलों में इसकी पुनरावृत्ति यह पुष्टि करती है की हमारी सरकार बच्चों को किसी फिल्म का पात्र बना कर रख दी है. रियल स्टोरी की बजाय रील स्टोरी की बात ज्यादा इसमें जान पडती है. जिस समय यह बयान सामने आया कि खाना खाने के तेल से नहीं बल्कि वाहन चलाने वाले तेल से बनाया गया था. तब मुझे लगा जैसे कि मिड डे मील कोई लाभकारी योजना नहीं बल्कि बच्चों की जिंदगी को शील करती मौत की डील है. मौत की वह डील जो सरकार और समाज के वो स्वसहायता समूह  चला रहे है जिनके बच्चे खुद भी उसी स्कूल में पढाई कर रहे है. अब हम यह कह सकते है कि स्वार्थ की भूँख इतनी ज्यादा बढ गई है कि आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों को और उनकी मासूमियत को मौत के घाट उतार कर खून से सना खाना उन्ही नन्ही सी जान को परोसा जा रहाहै और नेता और संबंधित अधिकारी गण सरकार की इस योजना को धता बताकर अपने धतकरम में बहुत ज्यादा खुश हो रहे है. यह शुक्र है कि इस बार यह सब सतना के स्कूलों में नहीं घटा वरना हर बार इस योजना को टटोलने में पता चलता है कि यह योजना में छेद करने वाले और इसकी सतह को छन्नी बनाने वाले इसी के अंदर छिपे हुये है. जैसे कि घुन गेंहूँ के अंदर छिप कर उसे खत्म कर देता है. मै कभी कभी यह सोचता हूँ कि जिन लोगो को यह काम सौपा जाता है वह इस तरह के काम को अंजाम तक पहुँचाने में कोई परहेज क्यों नहीं करते है. क्या इनको यह नहीं लगता है कि उन नन्हे मुन्हे बच्चों के माता पिता के दिल में क्या गुजरेंगी. और खुदा ना खासता यदि खुद के घर में इसी तरह हो जाये तो इन सबका क्या हाल होगा.

          सरकार की ये योजना बच्चों को स्कूल तक ले जाने की और उन्हें पौष्टिक भोजन मुहैया  कराने की थी परन्तु यह दूसरा ही अंजाम सरकार को दिखा रही है. यह योजना किसी तरह की खामी नहीं रखती है परन्तु इसके क्रियान्वयन और मानीटरिंग की कहानी बिगडी ही रहती है. जब सही ढंग से इस योजना के हर स्तर को निगरानी में रखा जायेगा तो यह तो तय है कि इस तरह का भ्रष्टाचार कम होगा और घोडे में लगाम भी लगेगी.इस तरह के अपराधियों को सजायें मौत की सजा ही तय होना चाहिये. परन्तउ भारत की न्यायपालिका इतनी लचर है कि इस तरह के अपराध उनकी नाक के नीचे भी हो जाये तो भी वो अपना निर्णय सुनाने में सदी गुजार देती है. कई लोग तो इस तरह की घटनाओं में अफसोस जाहिर करके रफा दफा कर देते है.यदि यही घटना किसी बडे स्कूल में या किसी बडे कालेज के कैंटीन में हो जाये तो सरकार समाज और समाज सेवी संगढन स्कूल की नींव तक खोद डालेंगें.परन्तु इस मामले में तो कोई भी कुछ नहीं प्रतिक्रिया या और कुछ बयान बाजी नहीं कर रहा है. क्योकीं सब जानते है कि चुनाव के मौसम में रिस्क लेना खतरे से खाली नहीं है. और कोई भी तालाब में रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं लेना चाहते है. आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों के लिये कोई संगढन आँगे नहीं आना चाहता है. ना कोई जन प्रतिनिधि जुबान खोलना चाहता है. देश के प्रधान मंत्री जी तो अपने अगले चुनाओं के वोटो की गणित को बनाने में लगे हुये है. और अन्य जन प्रतिनिधि चूहों की तरह अपने बिलों के अंदर छिप गये है. जैसे सभी चूडियाँ पहन ली हों यह सच है की इस तरह की योजना सिर्फ बच्चों का पढाई में व्यवधान पैदा करने के अलावा और कुछ काम नहीं करती है. पूरे खेतों का कचडा और स्तरहीन अनाज गरीबों में बाँटने और एम.डी.एम. में खर्च करने के लिये ही आता है. सरकार की चाहे आँगनवाडी योजना हो या यह योजना इसके अनाज को जब कोई खरीद कर अपने दुधारू पशुओं के भोजन में मिलाकर दूध की पैदावार बढाता नजर आता है तो बहुत दुखः होता है और शर्म भी आती है क्योंकी जिस अनाज को पशुओं के भोजन के लिये प्रभारी से ब्लैक में खरीदा जाता हो और उसे स्वेत क्राँति की दर को बढाने का काम किया जा रहा हो उस तरह के भोजन को आम सर्वहारा वर्ग के बच्चों की मौत का सामान तैयार करना कहाँ तक उचित है. इससे बेहतर कि उन्हे सल्फास की गोलियाँ ही देकर खत्म कर सरकार अपनी योजना पूरी कर ले.इस तरह की गतिविधि केन्द्र्सरकार और संबंधित राज्य सरकार को जनता के प्रश्नों का शिकार बना देती है. मुझे लगता है इस तरह की मील से बेहतरहै की सरकार बच्चों को कच्चा खाना अच्छे स्तर का मुहैया कराये. स्कालरशिप दे. अनुदान दे, रोजगार का मौका दे. परन्तु इस तरह की मौत की डील को बंद कर. समाज , शिक्षक और बच्चों का अमूल्य समय जीवन और क्षमता तो ना नष्ट करे. अन्यथा सरकार के इस तरह के कार्य नेकी कर और दरिया मे डाल वाली परिस्थित ही पैदा करने में कारगर होगी. और इसके अलावा और कोई फायदे मंद परिणाम देने में हिजडे की तरह ही शाबित हो पायेगी. सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि वो स्वार्थके चक्कर में अपने आगामी वोटरों को जाने अंजाने मौत के घाट ही उतारने में तुली हुयी है.

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र


किसकी बपौती नहीं है मुंशी प्रेमचंद्र
३० जुलाई को मुंशी प्रेमचंद्र का जन्म दिवस है. सोचता हूँ कि प्रेम चंद्र में क्या था जो हर वर्ग अपना माई बाप मान कर उनके नाम से ऐश करना चाहता है. चाहे प्रगतिशील हों, चाहे वाम पंथी हों, चाहे भारतीय संस्कृति के पोषक संस्थायें हो. और चाहे कायस्थ समाज हो सब प्रेमचंद्र के नाम की सोने की मोहर को लिये भँजाने की कोशिश में लगे होते है. सभी का यह मानना है कि प्रेमचंद्र जैसा युग दृष्टा उपन्यास कार और कहानी कार शायद ही भविष्य में भारत की धरती में भविष्य में पैदा होगा. लेकिन भारत में लोगों की फितरत रही है कि जब भी कोई फर्श में होता है उसकी कोई पूँछ परख नहीं होती है और जब कोई अर्श में होता है तो सब उसे ही अपना माई बाप मान लेता है. यही सब करते चले आये है.
    प्रेमचंद्र जिन्हे कहानी और उपन्यास का चितेरा जादूगर कहा जाता है.उनकी हर कहानी आज भी कुछ न कुछ बयान करती नजर आती है. वो जैसे उस समय भविष्यवाणी करके चले गये थे कि उनके पात्र वर्तमान परिस्थितियों के फ्रेंम मे उसी तरह फिट होंगे जैसे की वो उस वक्त हुआ करते थे. हर पात्र आज भी काल जयी बना हुआ है और भविष्य में भी बना रहेगा. प्रेमचंद्र की कहानी और उपन्यास की फेहरिस्त की बात करें तो शायद आज वह उपयुक्त समय न होगा क्योंकी आज यह बात करना जरूरी है कि जिस व्यक्ति का काम उसके नाम को इतना आँगे बढाया है कि उसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया हो. उसके लिये इस तरह की गुटबाजी कहाँ तक उचित है. और कहाँ तक यह बात सही है कि प्रेमचंद्र को लेकर इस तरह के विवाद पैदा करे. प्रेमचंद्र ऐसे कहानी और उपन्यासकार है जिनकी सोजे वतन जैसी कृति स्वतंत्रतापूर्व जला दी गई थी.और उसके बाद से ही उन्होने यह प्रेमचंद्र लबादा ओढ कर अपना लेखनकार्य शुरू किया जो अनवरत चलता रहा. लोग कहते है कि प्रेम चंद्र  कब तक चलेंगें और इस सदी तक लोग प्रेमचंद्र के नाम को जानेगें. उन सब का जवाब यही है कि प्रेम चंद्र वो नाम है जो हिन्दी साहित्य के समापन के साथ ही खत्म होगा. उसके पहले ना वो खत्म हो सकता है और ना कोई खत्म कर सकता है. देश में ही नहीं वरन विदेश में भी जहाँ पर हिन्दीप्रेमी है वो प्रेमचंद्र के दीवाने है. प्रेमचंद्र को भारत देश ही नहीं वरन पूरा विश्व अध्यन कर रहा है. प्रेम चंद्र का कथासम्राज्य इतना विस्तृत है कि कोई पाठक जितना चाहे उतना पढे,उसे गढे और एहसास करे कि प्रेमचंद्र किस कलमकार का नाम है.
   आज प्रगतिशील लेखक संघ,दलित लेखक संघ,हिन्दी साहित्य परिषद,हिन्दी साहित्य सम्मेलन, और कायस्थ समाज जैसे संगठन प्रेमचंद्र के नाम की रोटियाँ सेकने की कोशिश में लगे हुये है. सब प्रेमचंद्र को अपना गाडफादर मान कर उसके नाम की असर्फियाँ भुनाने मे लगे हुये है.प्रगतिशील लेखक संघ ने तो यह सोच रखा  है कि प्रेमचंद्र उसी के नाम पेटेंट है और इसका नाम कोई भी उपयोग नहीं कर सकता है क्योंकि प्रगतिशील लेखकों का मानना है कि प्रेमचंद्र ही वह कथाकार है जिसने हर सर्वहारा वर्ग की पीडा का वर्णन किया है. जो प्रगतिशीलता का सबूत है. इसी तरह दलित लेखक संघ का मानना है कि प्रेमचंद्र उनके माई बाप है जिन्होने दलितो की पीडा अपनी कहानियों में लिखा है,. मै भी मानता हूँ कि उनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन का दर्शन, दलितों की पीडा, और सर्वहारा वर्ग की मार्मिक दास्तान लिखी है और उनकी किसानों के लिये लिखी गयी कथायें अद्वितीय है. पर क्या इसका मतलब यह है कि हम उनके नाम को अपने बाप की बपौती बनाकर नाम का दुरुपयोग करें.क्या यह काफी नहीं है आज भी सरकार ने प्रेमचंद्र सृजनपीठ का गठन करके प्रेमचंद्र का नाम अमर कर दिया है और उस पर कहानियों के लिये काम भी किया जा रहा है.शोध का काम हर जगह किया जा रहा है. मै इतना जानता हूँ कि प्रेमचंद्र को पढना हमारी मजबूरी है यदि हम एक अच्छे पाठक है क्योंकि आज जो लिखा जा रहा है वह अकालजयी है ज्यादा समय तक याद नहीं रहता है. और यदि आज भारत में हिन्दी साहित्य के अंतरगत कहानी और उपन्यास में किसी को पढना है जो आज से कई दशक पहले भी कालजयी था और आज भी कालजयी है ,आने वाले कई दशकों में भी कालजई रहेगा तो हमारी विवशता है प्रेमचंद्र को पढना ही पडेगा.क्योंकी हमारे पास कोई आप्शन ही नहीं है. प्रेमचंद्र की कहानियाँ एक दर्द को बयान करती है जो एक किसान का है, सर्वहारा वर्ग का है, दलित का है, और उस सभी व्यक्ति का है जो दबा और कुचला है अत्याचार से ग्रसित है. यदि इस बिन्दु को लेकर सब अपने अपने तरफ प्रेमचंद्र को खींचना शुरू कर देंगे तो यह दिन दूर नहीं होगा जब प्रेमचंद्र के विचारो को खून के आँशू बहाना पडेगा. और साहित्यकारों को इतना भी वख्त ना मिलेगा कि वह मुंशी प्रेमचंद्र की मैयत मे जाकर आँशू बहा सकें. शायद यही नियति का विधान है. आज के समय मे चाहिये कि बिना उन्हे अपने घर की बपौती माने उनके कार्यों पे चर्चा होनी चाहिये. उनके कार्यों पे शोध होना चाहिये और ऐसे कार्य होने चाहिये कि जिस पर सभी को गर्व हो जिसको आगामी पीढी अनुगमन कर सके और यह जान सके कि भारत का साहित्यिक इतिहास कैसा था. यदि हम इसी तरह गृह युद्ध मचाते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जब प्रेमचंद्र की विचारधारा इन विभिन्न पंथियों के घर में टंगे मृग खाल की तरह हो जायेगी और पाठक बेचारा विवश होगा साहित्य मे मचे यह कुरुक्षेत्र का साक्षी बनने के लिये.
अनिल अयान,सतना

मंगलवार, 25 जून 2013

बारिश से धुलता नगर निगम का मेकप

बारिश से धुलता नगर निगम का मेकप
बरसात आते ही हमारे आसपास जब बाढ के बाद जल भराव की स्थिति निर्मित होने लगे तो ऐसा लगता हैकि दौंगरा के गिरने के पहले ही सब कुछ लबालब हो गया है. लबालब सडक,घर-घाट,पार्क,मैदान और सबसे बडी बात नालियाँ भी लबालब.क्या किया जासकता है सब नगर निगम की मेहरबानी है. नालियों का पानी जब सडक से बहने लगे  और सडक भी नाली की तरह दिखने लगे तब ऐसा लगता है कि ये भी सावन मनाने लगी है. और इनको भी बारिस का सुरूर छाने लगा है.बेचारी नौतपा से तपी नालियाँ अपने ऊपर पानी के बहाव बर्दास्त नहीं कर पाती है. और इस तरह बारिस बता देती है कि नगरनिगम के सफाई कर्मचारियों ने कितनी सफाई से इन्हे साफ किया है. और कैसे कैसे धतकरम किये है. और उनके कार्यों की औकात कितने समय तक है.ब्लैक आउट में बिजली विभाग का भी यही रोना रहता है.पहले तो जनता इस लिये झेलती थी कि मेंटीनेंस की वजह से कटौती झेलनी पडती थी. और अब तो वह इस लिये परेशान है कि लोवोल्टेज की वजह से या हाई वोल्टेज की वजह से सारे बिजली के सामान फूँक जाते है.एक सामान्य सा कलाम स्वच्छ सतना अपना सपना वह इन सब के चलते अधूरा सा लगता है. यही वजह है कि सतना राज मार्ग और राष्ट्रीय मार्ग के आस पास और कुछ वार्डों को छोड कर सामान्य रूप से स्थिति दयनीय है.बारिस के समय में कालोनियों के अंदर घुसते ही बरसात का टाँडव अपने आप दिखाई देने लगता है. जैसे बरसात नहीं कोई सुनामी आकर अपना काम करके लौट गई है. नगरनिगम का वार्षिक बजट जितना है उसमें से एक तिहाई भाग वार्ड के विकास में खर्च होना चाहिये. कई जगहों पर बहुत ही काबिले तारीफ काम हुआ है. अच्छी नालियाँ भी बनाई गयी थी. परन्तु आज भी वहाँ गंदगी का अंबार लगा हुआ है. यह सच है कि काम तो इफरात किये गये परन्तु रखरखाव के नाम पर शून्य कदम तय किया गया,यह वही कदम है जो सिर्फ़ सोचा जाता है. और उसके लिये नियुक्तियाँ की जाती है.वेतनमान भी बनता है और एक समय के बाद उनसे वह काम नहीं कराया जाता है.सफाई कर्मचारी सिर्फ सफाई करना , झाडू लगाना और कचडे को फेंकना जानते है.नालियों की दुर्गति तो उन्हे दिखाई ही नहीं पडती है.
   नालियाँ और बारिस में उनकी स्थिति देख कर नगर निगम के सफाई अभियानों और कामों के ढोल की पोल खुल जाती है.सीवेज सिस्टम की ऐसी की तैसी हो जाती है दो तीन दिन तक तो सडकें अपना वास्तविक रूप भूल जाती है.इतना ही नहीं जनता नगर निगम से और भी आशायें है.शहर में पार्क की कमी, दर्शनीय स्थलों की मरम्म्त और नवीनी करण और वार्डों का मूलचूल विकास कहीं ना कहीं जनता को रोजमर्रा की ख्वाहिशों से दूर करता नजर आता है. नगर निगम के तत्वावधान में प्रशासनिक स्तर पर बहुत से काम हुये है. जो विकास कार्यों की गाथा का गुणगान रेल्वेस्टेशन,चौराहों और मार्गों में करते है. परन्तु सिविललाइन ,पुलिस कालोनी,बाजार ,कबाडी टोला और भरहुत नगर, अन्य ऐसे मोहल्ले जिनका कोई माई बाप नहीं है और यदि माई बाप है वह  सुसुप्तावस्था में अपने घर के पलंग तोडते है. उनकी दुर्गति और विकास में बाधक बन रहे रोडों को भी हटाना जरूरी है.
 एक ज्वलंत उदाहरण  मुख्तयारगंज स्थित व्यंकटेश मंदिर की स्थिति जो मेरी नजर में एक दशक से अधिक पूरा कर चुका है परन्तु इसकी स्थिति अपने अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही है.और मुहुर्त की बाट जोह रहा है.यह तो एक उदाहरण है सूची में और भी बहुत से नाम अभी शेष है.जब से सतना में नगर निगम की स्थापना हुई तब से बहुत से काम हुये,लेकिन जितने भी काम हुये वो सिर्फ सरकार को दिखाने के लिये और अपना वोट बैंक बनाने के लिये किये गये.नगरनिगम के कर्मचारी सिर्फ अतिक्रमण हटाने और किसी काम का प्रारंभ करने के लिए ही तेज तर्रार होते है जहाँ एक बार काम शुरू हो गया उसके वाद यह बंद भी हो जाये. या किस गति से चलेगा इसकी कोई खोज खबर नहीं ली जाती है.कुछ साल पहले सफाई अभियान के तहत बडे बडे कन्टेनर कचडा इकट्ठा करने के लिये उपलब्ध कराये गये थे. और यह भी कहा गया था कि समय समय पर सप्ताह में एक बार इस कचडे को नगर निगम खुद उठवा कर साफ सफाई बनाये रखेगा.परन्तु हुआ क्या वो कन्टेनर ही गल गये मुर्चा लग गया उनमे टाउन हाल के पीछे परन्तु वह कार्य द्रुत गति से हुआ ही नहीं. यही सब के चलते बारिश की हल्की सी बौछार नगर निगम के कामों को धो देती है और वह बेचारा हाँथ में हाँथ धरे देखने को विवश होता है.यह सच है कि प्रशासन अकेले ही सफाई स्वच्छता नहीं फैला सकता है समाज का भी भरपूर सहयोग चाहिये परन्तु आम इंशान जब नगर निगम के आफिस में जाता है तो वह सिकायत करने से सिर्फ इस लिये डरता है कि कहीं उसे ही इस दलदल में ना फँसा दे और उसे जेव ढीली करने पड जाये. हमारे आसपास होने वाली गंदगी को हम रोक सकते है और रोकते भी है परन्तु घरों में पानी भरने और उसे निकालने के लिये भी लोग एडी चोंटी का जोर लगायें यह कहाँ तक सही होगा. हाथ से हाथ मिलाकर ही हम इस सतना को स्वच्छ सतना बना सकते है. अन्यथा इसी तरह बारिस नगर निगम की करतूतों को में पानी फेरती रहेगी.

सोमवार, 17 जून 2013

व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र


व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र
२००४-०५,२००८-०९ और आज २०१३-१४ वो राजनैतिक महाक्रमण काल रहे है जब देश को आडवानीवाद का दंश झेलना पडा है और आज भी यह प्रभाव भारतीय जनता पार्टी को बैकफुट में लाने के लिये काफी है. चाहे वो अटल जी के अटल इरादों के साथ खडे आडवानी हो,चाहे वो जिन्ना की तारीफ करने वाले आडवानी हो,चाहे पिछले चुनाव की हार के जिम्मेवार प्रतिनिधि आडवानी हो, और आज के नरेन्द्र मोदी के शत्रु समान व्यवहार करने वाले आडवानी हो, उन्होने हर मुकाम मे भाजपा को अपने घर की मुर्गी समझा है जब चाहा तब इस्तीफा थमा दिया जैसे इस्तीफा कोई भीख हो, पिछले दो बार यही रवैया अपनाये हुये आड्वानी जी यही सोच रहे थे कि इस बार भी भाजपा के आला कमान के लोग आर एस एस के साथ उनके पीछे भागेगे और उनसे मिन्नते करेंगे कि चलिये आपके बिना हमारा और राजनीति का भला नहीं होने वाला है. मुझे यह समझ मे नहीं आता है कि गोवा के निर्णयों के बाद जब मोदी के नाम पर मोहर लगा दीगई तो फिर भी ये अपनी पदलोलुपता का गुणा भाग लगाकर क्या हासिल करना चाहते है. एक बार तो इन्होने अपनी औकात पार्टी को दिखा दी कि इनके कंधे मे यदि चुनाव की बंदूख से सत्ता का सपना देखना है तो वह पिछली बार की तरह खाली हाथ ही  मलना रह जायेगा. जहाँ तक मुझे पूरा घटना चक्र समझ मे आता है तो आडवानी कुछ गिने चुने मामलों को छोडकर संघीय विचार धारा का समर्थन कहीं किये हों. और इसी का पर्याय रहा जिसके अंतर्गत संघ के प्रस्तावित नरेन्द्र मोदी के विरोध मे खूँटा गाड दिया और पूरी भाजपा को एक तेज तूफान में डाल दिया.और चुपचाप शतरंज के खेल की अगली बाजी का इंतजार करने लगे.
  इस घटना चक्र ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई नेता अपने आप को पार्टी का माईबाप समझने का भ्रम पालने लगे तो उसके साथ पार्टी को और उसके सिद्धांतो के परिपेक्ष में क्या कदम उठाना चाहिये.९० वर्ष पूरे कर रहे संधीय विचारधारा को धता बताने वाले आडवानी जी को यह आभास होगया कि १९९० के बाद भाजपा सिर्फ उन्हे एक बोझ की तरह ढो रही थी. वरना कब का बाहर का रासता दिखा दी होती.आडवानी जी यह याद रख सकते है कि उन्होने भाजपा को बनाया है और भाजपा को उन्हे प्रधानमंत्री बनाना ही चाहिये.परन्तु उनका कर्तव्य है कि वो यह भी तो जाने कि उनको भाजपाई किसने बनाया है.संघ ने यह पुष्टि कर दिया कि उसने आडवानी के राजनैतिक कैरियर को पैदा किया है  और संस्था से बढ कर कार्यकर्ता का कद नहीं है परन्तु आडवानी जी इस मन के फेर में है कि उन्होने भाजपा को अपने खून पसीने से पैदा किया है पाला पोसा है और यह  भाजपा के ऊपर उनका उधार है जिसे भाजपा को उन्हे पीएम बना कर शूद सहित चुकाना ही होगा जो किसी मायने में सच नही है.व्यक्तिगत वर्चस्व बनाम संस्थागत समान्जस्य का कुरुक्षेत्र जो इस समय लडा जा रहा है वह किस परिणाम तक भाजपा को ले जायेगा यह तो नही पता परन्तु यह तक है कि मोदी जी के इरादे जरूर फौलाद से ज्यादा मजबूत हो जायेंगें. क्योंकी उन्होने गुजरात चुनाव जीतने के बाद ही कहा था कि यदि लोग उन पर पत्थर उछालते है तो वह उन पत्थरों से मंजिलों को पाने की सीढी बना लेगे. यहाँ तो मामला और ज्यादा गंभीर है.
   यह मामला तो ठीक उसी तरह लगने लगा है जिस तरह कम्युनिस्ट १९६४ में बंट गये और आजाद भारत में कांग्रेस के बीच टकराव के कसीदे सुनायी पडे थी. यह भी सच है की आडवानी के तरफ की भावनात्मक सोच को लेकर भाजपा दूरगामी निर्णय नहीं ले पाती क्योंकी डूबने सूरज के साथ चलने वालों को शाम और रात का सामना तो करना ही पडेगा. संघीय विचारधारा जैसे अनुशासित विचारों के साथ के बावजूद यदि आडवानी जी सिर्फ तीन दायित्वधारी पदों से इस्तीफा दिया और अन्य उसी तरह बरकरार रखे थे. तो यह भी तय था कि उन्हे आज भी यह यकीन था कि शायद भाजपा अपना सिर झुका रह उनके वर्चस्व को कुबूल कर लेगी.वो भी क्या करे मानवोचित दुर्गुण से प्रेरित है. और अपना परिणाम भुगत रहें है. लेकिन यह भी तय है की खुशी में लिपटे इस दुख का इलाज जरूरी है इसके पहले की यह नासूर बनकर पूरे शरीर का सत्यानाश कर दे.किसी मुद्दे में जब आडवानी जी ने अपने आप को भीष्म कहा तो मुझे पूछने का मन हुआ कि वो भाजपा को किस सेना की संज्ञा देने के इच्छुक है कौरवों या पाण्डवों की सेना. भाजपा को चाहिये कि वो इस शतरंज के दाव की तरह अपनी चाल में चाणक्य नीति लाये और अवसरवादी आडवानी जी को भी रथ का हिस्सा बना कर इस चुनावी महासमर को विजयी करे परन्तु अर्जुन अर्थात पार्थ की भाँति संघ रूपी केशव को अपना विजय रथ जरूर सौंप दे और आस्वस्त हो जाये क्योंकी अभी वो भ्रम द्वंद के छल छद्म में भ्रमित सी महसूस होती है.
अनिल अयान,सतना.

सोमवार, 10 जून 2013

जिया ने क्या संदेश दिया



जिया ने क्या संदेश दिया
फिल्मों मे कैरियर की महत्वाकांक्षा का एक नामी गिरामी नाम है जिया खान एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री जिसने वालीवुड की सरहद में जाकर जाना कि वास्तविकता में यह किस जन्नत का नाम है. निःशब्द, हाउसफुल, और गजनी जैसी फिल्मों मे अदाकारा की भूमिका मे दिखी जिया खान ने लगभग सबके जिया को मन से जिया.जिन्दगी की जंग को इस तरह हार जाना उसके लिये बहुत कठिन था परन्तु आज वख्त है यह सोचने का कि जिया खान ने अपने जाने के बाद अपनी श्रेणी की अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की तरह युवा चहेतों को साथ ही साथ पूरे समाज के युवाओं और अन्य पीढी को क्या संदेश दिया है. क्या उसने नयी शोहरत का रास्ता अपनाया. या आत्मग्लानि ,अकेलेपन, हार ने मजबूर कर दिया कि अपनी जिंदगी को मौत के सामने आत्मसमर्पित कर दे. क्या सब भूल जाने वाली बात है? या इस बात की इंतजार करने वाली बात है कि हमारे घर की जिया का हम इसी तरह के परिणाम की उम्मीद के साथ बुलंदी मे पहुँचाने की चाह रखें. पिछले पंद्रह दिनों से लगभग यह बात मीडिया में छायी हुई है कि बालीवुड का वास्तविक चेहरा क्या है. हम सब जानते है कि जिया खान का नाम उन नेत्रियों मे सुमार होचुका है जिन्होने वख्त के पहले अपनी मौत को गले लगा लिया और पूरा देश, बालीवुड और समाज सिर्फ उनके नाम पर श्रृद्धांजलि और सहानुभूति ही अदा कर सका.
  हमारे देश का सबसे बडा मनोरंजन का बाजार है मुम्बई , एक ऐसी चकाचौंध जिसके सामने सारा ज्ञान और सारा दर्शन दर्शन लेने के लिये कतार में खरा नजर आता है. और आज के समय मे युवाओं की लम्बी फेहरिस्त में ९० प्रतिशत युवा आज इसी चकाचौंध की दुनिया के सितारे बनने के लिये संघर्ष करने पहुच जाते है इस जन्नत  में.स्कूल और कालेज के युवा उत्सव गवाही देते है कि जितने प्रतिभागी कार्यक्रमों भाग लेकर  निर्णायक मंडल के आशीर्वाद के पात्र बनते है उन सब को अपने अंदर एक अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य वो सारे किरदार सपने मे दिखने लगते है जो इस चकाचौंध मे उन्हे पब्लिक फिगर बनाने में मददगार होते है. परन्तु जनाब वास्तविकता कुछ और ही होती है . हर साल मध्यम शहरी और कस्वाई क्षेत्र से जाने वाले युवाओं का प्रतिशत ८० प्रतिशत है जिसमें ३० प्रतिशत भाग तो मुम्बई की गलियों में गुम जाते है. ४० प्रतिशत भाग संघर्ष मे समाप्त हो जाते है. २० प्रतिशत युवाओं को अवसर की सर्तें विकलाँग बना देती है. और बचे कुचे युवाओं का अधिकतर समूह घर वापसी के डर से पलायन कर जाते है कहीं जाकर १०० मे से ३ से ५ युवा अपने को हर परिस्थिति में समर्पित करके चमक के सितारों तक का सफर प्रारंभ करते है. इस बालीवुड मे करोडो में १० कहीं जाकर पब्लिक फिगर बन पाते है. और उनका जमीर जानता है कि इस शोहरत और बुलंदी को पाने के लिये उन्होने मुम्बई मे क्या खोया और क्या पाया है. कितने दिन कितनी राते उनकी ,उनकी मर्जी के बगैर बेंच दीगई है अनजान हाँथों में.मुम्बई वह महासागर है जहाँ बडी मछली अपनी शोहरत को बढाने के लिये छोटी मछलियों का उपयोग और उपभोग करती है जिसकी कोई भी समय सीमा नहीं है  क्योंकी यदि आप इस श्रेणी में नही आना चाहते तो जिस दरवाजे से आप अपने सपने लेकर गये है वही दरवाजे आपकी बिदायी करने के लिये आपके अंतिम साथी जरूर साबित होते है.
   जिया खान की मौत ने यह बात समझाई है कि इस महासागर में दोस्त कोई नहीं है सब खरीदार भी है और दुकानदार भी है. यह समय बताता है कि आपको खरीदार कब बनना है और दुकानदार कब बनना है. बालीवुड वन वे रास्ता है जिसमें एक समय मे सिर्फ प्रवेश कर सकते है या निकल सकते है प्रवेश करते समय आप कुछ भी ना हों पर निकलते समय सिर्फ और सिर्फ आप पराजित ही होंगे. अवसरवाद का वह घना चक्रव्यूह है जिसमे समाजिक सारे रिस्ते असमाजिक नजर आते है. अवसाद , अकेलापन, छलावा, खरीदफरोक,तनहाई,शोहरत ये सब वो झूठे फसाने है जो किसी और के बारे में सुनने मे हमें बहुत मधुर महसूस होते है. परन्तु एक बार हम उस जगह में अपने को रख कर सोचते है  तो रूह को पता चलता है कि इस महासागर में मनोरंजन के लिये अदाकारा और अदाकार को जिस्म और रूह के हर भेद को खुले आम मनोरंजन के इस बाजार में मन-बेमन,प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष,रूप से भूखे जानवरों के सामने रखना ही पडता है नहीं तो आप भी जिया खान की श्रेणी मे खडे कर दिये जायेंगें या फिर मजबूर कर दिये जायेंगे.अब सवाल यह उठता है कि हम सब कितने सहभागी है इस सब में और हम सब का क्या रोल हो सकता है इस महासागर में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिये.आज के हम जैसे उपभोकताओं की उपभोगवादी सोच ने वालीवुड को मजबूर कर दिया है हर इवेंट को हमारी कसौटी मे खरे उतरे और खरे उतरने की होड में हर फिल्म, हर अदाकारा, हर प्रोग्राम, हर सिने पत्रिका,वेबसाइट, सब ने बाजारूपन अख्तियार कर लिया है. क्योकी बाजार में बाजारवाद का पहला उसूल है कि अपने को शीर्ष मे रखने के लिये बाजारू हो जाओ. कुल मिला कर यदि दर्शक और श्रोता अपना नजरिया बदल ले तो उस पर केंद्रित बाजार भी अपने आप समय के साथ बदल जायेगा. पर यह भी सच है कि यह भारत है और इस जगह मे इस सोच हो लागू करना कुत्ते की पूँछ को सीधी करने जैसा दुरूह कर्म ही है. पर उम्मीद ना छोडना ही विजेता की फितरत है.

फिल्मों मे कैरियर की महत्वाकांक्षा का एक नामी गिरामी नाम है जिया खान एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री जिसने वालीवुड की सरहद में जाकर जाना कि वास्तविकता में यह किस जन्नत का नाम है. निःशब्द, हाउसफुल, और गजनी जैसी फिल्मों मे अदाकारा की भूमिका मे दिखी जिया खान ने लगभग सबके जिया को मन से जिया.जिन्दगी की जंग को इस तरह हार जाना उसके लिये बहुत कठिन था परन्तु आज वख्त है यह सोचने का कि जिया खान ने अपने जाने के बाद अपनी श्रेणी की अभिनेत्रियों और अभिनेताओं की तरह युवा चहेतों को साथ ही साथ पूरे समाज के युवाओं और अन्य पीढी को क्या संदेश दिया है. क्या उसने नयी शोहरत का रास्ता अपनाया. या आत्मग्लानि ,अकेलेपन, हार ने मजबूर कर दिया कि अपनी जिंदगी को मौत के सामने आत्मसमर्पित कर दे. क्या सब भूल जाने वाली बात है? या इस बात की इंतजार करने वाली बात है कि हमारे घर की जिया का हम इसी तरह के परिणाम की उम्मीद के साथ बुलंदी मे पहुँचाने की चाह रखें. पिछले पंद्रह दिनों से लगभग यह बात मीडिया में छायी हुई है कि बालीवुड का वास्तविक चेहरा क्या है. हम सब जानते है कि जिया खान का नाम उन नेत्रियों मे सुमार होचुका है जिन्होने वख्त के पहले अपनी मौत को गले लगा लिया और पूरा देश, बालीवुड और समाज सिर्फ उनके नाम पर श्रृद्धांजलि और सहानुभूति ही अदा कर सका.
  हमारे देश का सबसे बडा मनोरंजन का बाजार है मुम्बई , एक ऐसी चकाचौंध जिसके सामने सारा ज्ञान और सारा दर्शन दर्शन लेने के लिये कतार में खरा नजर आता है. और आज के समय मे युवाओं की लम्बी फेहरिस्त में ९० प्रतिशत युवा आज इसी चकाचौंध की दुनिया के सितारे बनने के लिये संघर्ष करने पहुच जाते है इस जन्नत  में.स्कूल और कालेज के युवा उत्सव गवाही देते है कि जितने प्रतिभागी कार्यक्रमों भाग लेकर  निर्णायक मंडल के आशीर्वाद के पात्र बनते है उन सब को अपने अंदर एक अभिनेता, अभिनेत्री और अन्य वो सारे किरदार सपने मे दिखने लगते है जो इस चकाचौंध मे उन्हे पब्लिक फिगर बनाने में मददगार होते है. परन्तु जनाब वास्तविकता कुछ और ही होती है . हर साल मध्यम शहरी और कस्वाई क्षेत्र से जाने वाले युवाओं का प्रतिशत ८० प्रतिशत है जिसमें ३० प्रतिशत भाग तो मुम्बई की गलियों में गुम जाते है. ४० प्रतिशत भाग संघर्ष मे समाप्त हो जाते है. २० प्रतिशत युवाओं को अवसर की सर्तें विकलाँग बना देती है. और बचे कुचे युवाओं का अधिकतर समूह घर वापसी के डर से पलायन कर जाते है कहीं जाकर १०० मे से ३ से ५ युवा अपने को हर परिस्थिति में समर्पित करके चमक के सितारों तक का सफर प्रारंभ करते है. इस बालीवुड मे करोडो में १० कहीं जाकर पब्लिक फिगर बन पाते है. और उनका जमीर जानता है कि इस शोहरत और बुलंदी को पाने के लिये उन्होने मुम्बई मे क्या खोया और क्या पाया है. कितने दिन कितनी राते उनकी ,उनकी मर्जी के बगैर बेंच दीगई है अनजान हाँथों में.मुम्बई वह महासागर है जहाँ बडी मछली अपनी शोहरत को बढाने के लिये छोटी मछलियों का उपयोग और उपभोग करती है जिसकी कोई भी समय सीमा नहीं है  क्योंकी यदि आप इस श्रेणी में नही आना चाहते तो जिस दरवाजे से आप अपने सपने लेकर गये है वही दरवाजे आपकी बिदायी करने के लिये आपके अंतिम साथी जरूर साबित होते है.
   जिया खान की मौत ने यह बात समझाई है कि इस महासागर में दोस्त कोई नहीं है सब खरीदार भी है और दुकानदार भी है. यह समय बताता है कि आपको खरीदार कब बनना है और दुकानदार कब बनना है. बालीवुड वन वे रास्ता है जिसमें एक समय मे सिर्फ प्रवेश कर सकते है या निकल सकते है प्रवेश करते समय आप कुछ भी ना हों पर निकलते समय सिर्फ और सिर्फ आप पराजित ही होंगे. अवसरवाद का वह घना चक्रव्यूह है जिसमे समाजिक सारे रिस्ते असमाजिक नजर आते है. अवसाद , अकेलापन, छलावा, खरीदफरोक,तनहाई,शोहरत ये सब वो झूठे फसाने है जो किसी और के बारे में सुनने मे हमें बहुत मधुर महसूस होते है. परन्तु एक बार हम उस जगह में अपने को रख कर सोचते है  तो रूह को पता चलता है कि इस महासागर में मनोरंजन के लिये अदाकारा और अदाकार को जिस्म और रूह के हर भेद को खुले आम मनोरंजन के इस बाजार में मन-बेमन,प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष,रूप से भूखे जानवरों के सामने रखना ही पडता है नहीं तो आप भी जिया खान की श्रेणी मे खडे कर दिये जायेंगें या फिर मजबूर कर दिये जायेंगे.अब सवाल यह उठता है कि हम सब कितने सहभागी है इस सब में और हम सब का क्या रोल हो सकता है इस महासागर में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिये.आज के हम जैसे उपभोकताओं की उपभोगवादी सोच ने वालीवुड को मजबूर कर दिया है हर इवेंट को हमारी कसौटी मे खरे उतरे और खरे उतरने की होड में हर फिल्म, हर अदाकारा, हर प्रोग्राम, हर सिने पत्रिका,वेबसाइट, सब ने बाजारूपन अख्तियार कर लिया है. क्योकी बाजार में बाजारवाद का पहला उसूल है कि अपने को शीर्ष मे रखने के लिये बाजारू हो जाओ. कुल मिला कर यदि दर्शक और श्रोता अपना नजरिया बदल ले तो उस पर केंद्रित बाजार भी अपने आप समय के साथ बदल जायेगा. पर यह भी सच है कि यह भारत है और इस जगह मे इस सोच हो लागू करना कुत्ते की पूँछ को सीधी करने जैसा दुरूह कर्म ही है. पर उम्मीद ना छोडना ही विजेता की फितरत है.

नक्सलवाद यदि आबाद तो देश बरबाद


नक्सलवाद यदि आबाद तो देश बरबाद
पिछले पंद्रह दिन से एक नया मुद्दा छत्तीसगढ में बहुत गरमाया हुआ है नक्सलवाद और माओवाद का कुप्रभाव और उसमे पिसते भारतीय जन.आम लोग हो या फिर खास किसी को नहीं छोडते है ये नक्सली जैसे इनकी विशेष दुश्मनी होती है हम सब से. चीन के माओ की जुवान को समेटे ये लोग हमे हमारा अधिकार सिर्फ बंदूख की नोंक से ही मिल सकता है.भारत का सत्यानाश करने में तुले हुये ये लोग कहीं ना कहीं भारत में आंतरिक आतंकवाद फैला रहे है.भारत वैसे भी अपने बाह्य मामलों में काफी परेशान रहा है. और परेशान होता चला आरहा है तो फिर यह नया मुद्दा कहीं ना कहीं देश की आंतरिक शांति व्यव्स्था को बिगाडने का नया खेल खेलते नजर आता है.कभी कभी लगता है कि नक्सल और माओवाद में मुख्य धारा का अंतर क्या है. क्यों ये शासन के विरोध में डंडा गाडे रहते है. क्यों ये मार काट में ज्यादा यकीन करते है. क्या इन्हे शांति प्रिय नहीं है. ऐसे बहुत से सवाल है जो कहीं ना कहीं हम सब के सामने खडे यक्ष प्रश्न की भाँति अटूट से नजर आते है.
   माओ के फालोवर जब भारत में आये तो उन्होने उन स्थानों को अपना निशाना बनाया जहाँ बेगारी और गरीबी अधिक थी. जहाँ शासन की ओर से कोई कारगर प्रयास नहीं किया गया.इतिहास गवाह रहा है कि दार्जिंलिंग और पश्चिम बंगाल के ऐसे बहुत से घटना चक्र है जो इस प्रकार घातक आँदोलनों को हवा देते रहे और देश की आंतरिक सुरक्षा को ठेंगा दिखाते रहे. जब यह झारखंड और फिर उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में पहुंचे तो वहाँ की सरकार को अपने दांतों तले अंगुली दबाना पड गया. फिर ये लोग दक्षिणी राज्यों और मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के उन आदिवासी इलाकों को अपना गढ बनाने की कोशिश में कामयाब हुये जिन जगहों पर सबका ध्यान लगभग ना के बराबर था........ युवाओं के हुनर को खरीद कर अपने अनुसार अन्याय के खिलाफ ये एक साथ मोर्चा खोलने की आदत बना चुके ये गिरोह कदम दर कदम अपने हौसलों को बढाते रहे.आंध्रा प्रदेश की यह स्थिति है जिसमे गनपंथी,आर.श्रीनिवासन,गणेश उइके और कट्टकम सुदर्शन जैसे ऐसे महानुभाव है जो पूरे आँध्रा मे अपना वर्चस्व स्थापित करने की सोच को लिये आगे बढ रहे है.इस हमले के बाद भारते में अलगाववादियों की स्थिति हावी होने जैसी हो गई है. ऐसा लगता है जैसे असुरक्षा का माहौल आज अपने पर पसारे आगे बढ कर देश को निगलने के लिये आतुर हो रहा है.१९६० के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष देश की एकता और अखण्डता को नष्ट करने में लगा हुआ है.पढे लिखे ये नौजवानो की बदहवास फौज अपने पहले चरण में इतनी तेज गति से विद्रोह मचायी है कि पूरा देश अपने कर्मों में पश्चाताप इसलिये कर रहा है कि पहले इस मुद्दे पे कारगर कदम क्यों नहीं उठाये गये. जो काँग्रेस आज शासन और प्रशासन की दुहायी देरही है वह खुद ही विपक्ष में बैठे कभी माओ और नक्सलवादियों के खिलाफ बनाये जारहे कानून के सामने खूँटा गाडे खडी हुई थी. यह मै स्वीकार करता हूँ कि नक्सली हमले की वजह से भारत के कई राज्य अपना विकास नहीं कर पा रहे है.ना हि विकास की बातें सोच रहे है. उनका पूरा ध्यान इस समस्या को दूर करने के लिये लगा हुआ है. परन्तु दूसरा पहलू देखे तो यही राजनेता जब नक्सली हमलों मे सिर्फ शोक व्यक्त करके रह जाते है. या फिर बयानबाजी करके अपने आप को पापुलर करने के लिये मीडिया में धुरंधर बनकर चर्चाओं  में भाग लेते है तब इनका जमीर कहाँ सो जाता है. तब इनके लोग अपने परिवार और देशवासियों के परिवार की चिंता करके चुप हो जाते है. कोई कारगर कदम उठाने से परहेज क्यों कर जाते है. आज जब राजनैतिक प्रभुसत्ता पर आक्रमण हुआ तो काँग्रेस ऐसे चिल्लारही है या बौखला रही है जैसे कि किसी ने उसके घर में आग लगा दी है.गोरिल्ला आक्रमण का जवाब शायद किसी सरकार के पास नहीं है.
   इस तरह की घटनाओं में यह होना चाहिये कि ऐसे देश व्यापी मुद्दों में पूरे देश की राजनीति और राजनीतिज्ञों को एक साथ खडे होकर कारगर कदम उठाने चाहिये. जिन लोगो को यह भ्रम है कि सेना इस का सबसे सार्थक उपाय है तो इस बात में मुझे लगता है कि हम सिविलियन क्षेत्र में सेना को पूरा प्रशासन नहीं सौप सकते है. क्योंकी सेना को जिस तरह से ला और आर्डर सुधारने का काम सौपा जाता है वहाँ सिर्फ ओपन फायरिंग के अलावा कोई रास्ता नहीं है और इस काम के लिये यदि ऐसा किया जाता है तो यह मान लेना चाहिये कि जितने नक्सली मारे नहीं जायेंगे उससे कहीं ज्यादा बेगुनाह अपने बेगुनाह परिवार को इस मुठभेड में मरता देखने के बाद बंदूखें उठा लेंगें और इस तरह समस्या और बढ जायेगी. क्योंकी सेना की मुठभेड में गोलियाँ यह नही देखेंगी की नक्सली कौन है या आम जन कौन है. सरकारों को चाहिये की यदि इस आंतरिक घुसबैठ से निजात पाना है तो उसे सवसे पहले  हर जगह पर विकास कार्य बराबर करना होगा. चाहे वो विकसित जगह हो या आदिवासी जगह, चाहे वह फारवर्ड हो या बैकवर्ड इलाका. क्योंकी नक्सली वहीं अपना रहने का स्थान चुनते है जहाँ गरीबी और विकासहीनता अधिक है. अन्यथा भविष्य में सरकार से ज्यादा हुनर मंद युवा नक्सलियों के पास है जो साठ्योत्तर पार कर चुकी सरकार के हर हौसले को पस्त करने का दम रखती है.नक्सलियों के फालोवर सिर्फ युवाओं की उस उर्जा को इस्तेमाल करते है जिसे हम बेरोजगारी का जामा ओढा कर कचडे के डिब्बे में डाल देते है. सरकार को चाहिये हि अपनी सुरक्षा व्यवस्था को सुदृण करने के साथ साथ पारदर्षी विकास करें इसतरह के बाह्य और आंतरिक मामलों में एक जुट होकर खाली जगह को भरें वरना नक्सली तो बैठे ही है सरकार की अनियमितताओं और खाली जगहों को भरकर अपनी नयी सत्ता स्थापित करने के लिये.और यह भी तय है कि हम और हमारे सरकार उनके सामने घुटने टेकने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते है.यह छत्तीसगढ में हुआ नक्सली हमला चींख चींख कर कह रहा है.