सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

‘‘साठ्योत्तर संविधान’’ की मुबारकबाद

‘‘साठ्योत्तर संविधान’’ की मुबारकबाद
पैंसठ वर्ष हो चुके हैं हमें हमारा संविधान प्राप्त किये हुये,परन्तु आज भी हमारी सामजिक स्थिति किसी पूंजीवादी व्यवस्था के पीछे चलती नजर आती है।आज भी आम इंसान अपने अधिकारों और कर्तव्यों के किनारा करता नजर आता है।ऐसा लगता है कि ये संविधान सिर्फ शिक्षित लोगों और सत्ता में बैठे लोगों के लिये बना कर सौंपा गया है।साक्षर लोगों को आज भी रोटी ,कपडा और मकान के लिये चिंता होती आज भी सर्वहारा वर्ग और अविकसित स्थानों की जनता आम सुविधा के नाम पर ठेगा देखती हुई नजर आती है।हमारा संविधान भले ही पाँच देशों की संवैधानिक खूबियों से संवर गया हो परन्तु हमारे देश की औसतन जनता उन देशों की जनता से सैकडों साल पीछे जी रही है।
ब्रिटिष एक्ट के अनुसार जब देश चलाने में अछमता नजर आई तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी ने संविधान सभा को जन्म दिया । इसका प्रमुख कारण यह भी था कि ब्रिटिश शासन के द्वारा दिया गया यह एक्ट  जो १९३५ में बना था सिर्फ आयातित नियम कायदों का दस्तावेज ही था इससे उपनिवेशीय सोच तो तैयार की जा सकती थी परन्तु अच्छे नागरिक तैयार नहीं किये जा सकते थे।कांग्रेस की जिद के चलते २६ नवंबर १९४९ में तैयार हो चुका संविधान २६ जनवरी को लागू किया गया क्योंकि उसने 1935 को इसी दिन पूर्ण स्वराज की घोषणा की थीे।संविधान सभा चुने हुये तत्कालिक राजनीतिज्ञ ब्रिटेन,संयुक्त राष्ट्र अमेरिका यूएसए,आयरलैंड,कनाडा और फ्रांस की यात्रा करके संविधान की अच्छी बातें तो आयातित किये। परन्तु अफसोस जनता को भारत के लायक ही बने रहने दिया गया।उनके लिये कोई भी नीति और योजना का आयात नहीं किया गया। आज तक 122 परिवर्तन होने के बाद भी हमारे संविधान में ३९५ आर्टिकल्स और १२ अनुभाग है। भारत की विकासशील स्थिति आज भी विकसित राष्ट्रों में परिवर्तित नहीं हो सकी है।
आज भी संविधान की ऐसी धारायें है जो कुछ समय के लिये रखी जानी चाहिये थे परन्तु उन पर ध्यान ना देने के कारण गले की हड्डी बन चुकी हैं।इसका उदाहरण धारा-370-72 और धारा 374-78 जिसमें आज भी कानून और न्याय व्यवस्था उहापोह में है।इतने सारे अमेंडमेंट एक्ट पास हो चुके हैं कि आयातित संविधान पूरी तरह से संकरित हो चुका है। आज की वर्तमान परिस्थितियों की आवश्यकता है कि हमारे देश का संविधान हमारे देश की सामाजिक आर्थिक राजनैतिक व्यवस्था को ध्यान में रख कर निर्मित की जाये।क्योंकि वर्तमान संविधान में आज भी आयातित होने की छाप दिखाई देती है।जो हमारे देश के देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार एक रत्ती भर भी मिलान नहीं खाता है।यदि हमें अपने देश को विकसित राष्ट्र की श्रेंणी में खडा करना है तो यह आवश्यक है कि संविधान निर्मात्री सभा का पुर्नगठन किया जाये और वर्तमान संविधान का पुनरावलोकन करके वांछनीय परिवर्तन किये जायें। वो परिवर्तन आम जन मानस के लिये लाभप्रद हों
वर्तमान भारत में गणतंत्र होने के बावजूद हर राज्य अपने शासन  के लिये स्वतंत्र नहीं है।उसे केंद्र की भूमिका को मानना ही पडता है।यदि केंद्र में विपक्षी सरकार है तो उसे अपने कोश के लिये संघर्ष करना पडता है।ऐसा लोकतंत्र किस मतलब का है जिसमें राज्यों को सरकार बनाने का अधिकार है परन्तु उसका उपभोग करने का अधिकार पूँछ कर मिलता है।सत्ता का विकेंद्रीकरण आज के समय की माँग है।हमारा संविधान ऐसा होना चाहिये कि गलत काम करने में सजा और निर्दोष के लिये माफी हो।फास्ट ट्रैक कोर्ट को मुख्य धारा में आना चाहिये।न्याय व्यवस्था में आतंकवाद,नक्सलवाद,और अन्य आंतरिक राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान त्वरित होना चाहिये।संविधान के परिवर्तनशील करने और अधिक सख्त करने की जरूरत है।राज और काज में एकरूपता होनी चाहिये।मंत्रालयों में संबंधित विषय विशेषज्ञों को उच्च पदों में पदासीन करना चाहिये।अंततः सीधी शब्दों में बात की जाय तो प्रशासन और सरकार के बीच सामन्जस्य इतना तीव्र होना चाहिये की योजनायें बिना सरकारी बिचैलियों और दलालों के हाथ में गये जरूरतमंदों के हाथों में नियत समय में पहुँच सके।सरकार और नागरिकों के मध्य सीधा संवाद स्थापित किया जा सके।तभी राजनीतिशास्त्र का यह लैटिन भाषा का शब्द रिपब्लिका का सही अर्थ भारत को समझ में आयेगा। वरना नाम के लिये गणतंत्र बनने से और गणतंत्र दिवस मनाने से हम अपने देश को विकसित राष्ट्र में सुमार नहीं कर पायेंगें।क्योंकि हमारे देश के संविधान के मूल तत्व,धर्मनिरपेक्षता, अधिकार और कर्तव्य ,सौहार्दता ,भाईचारा ,विश्वबंधुता,एकता और अखंडता सभी खतरे में हैं क्योंकि जिस समय संविधान बना था उस समय का परिवेश और आज के समय के परिवेश में जमीन और आसमान का अंतर है।क्योंकि जनसंख्या विस्फोट की कगार में खडा हमारा देश आज भी अपने आर्थिक संघर्ष से पीछा नहीं छुडा पाया है इस लिये इस सरकार की समझदारी इसी में है कि इस पंचवर्षीय में  संविधान के अनावश्यक तत्वों को जरूरतमंद एक्टों से परिवर्तित करके कानून और व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करें तभी पैसठ वर्ष पुराना  साठ्योत्तर संविधान खुद को जवान महसूस करेगा।
अनिल अयान,सतना
9479411408

प्राथमिक शिक्षा की अपंग दीक्षा

प्राथमिक शिक्षा की अपंग दीक्षा
माँ हर बालक की प्रथम गुरु होती है।वह हर उस बात को अपने बच्चे को सिखाती है जिससे उसकी जीवन शैली सर्वोत्तम बन सके।बालक घर की दहलीज पार कर ज्ञानार्जन के लिये प्राथमिक विद्यालय के द्वार में दस्तक देता है। यहीं पर वह साक्षर होता है,यहीं से उसे शिक्षा का प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है। आज के समय में वह प्रमाण पत्र हर बालक के लिये उपलब्ध है।इसके वितरण में किसी प्रकार की भी अड़चन नहीं है।क्योंकि शासन का आदेश हर विद्यालय मानता है जिसके अनुसार हर बच्चे को उत्तीर्ण करना आवश्यक है, जैसे यह अधिकार उन्हें जन्म से ही शासन दे चुका है कि वह प्राथमिक शिक्षा में उत्तीर्ण तभी से हो जाता है जब से उसे अक्षर ज्ञान आना प्रारंभ हो जाता है।
मुझे वह समय अच्छी तरह याद है जब मै पाँचवीं और आठवी की परीक्षा देने किसी शासकीय विद्यालय में देने जाता था। उस समय प्राथमिक शिक्षा का अस्तित्व सिर्फ साक्षर करना ही मात्र नहीं था, बल्कि बच्चे को ज्ञानार्जन का अवसर देना भी था।उसका उचित मूल्याँकन करना भी उसके उत्तीर्ण होने में शामिल हुआ करता था।उस समय में ज्यादा शिक्षा अभियान या शिक्षा मिशन नहीं चलते थे।ना ही शिक्षा गारंटी शालाओं की संख्या अधिक थी।बाकायदे परीक्षा के लिये बच्चे की तैयारी उसका शिक्षक और पालक दोनो करवाते थे और उसके उत्तीर्ण होने के बाद ही छठवीं कक्षा में एडमीशन होता था। परन्तु समयसापेक्ष परिवर्तनों के चलते प्राथमिक शिक्षा अब साक्षरता मूलक शिक्षा में परिवर्तित हो गयी है।एक समय था जब पाँचवीं पास करना कठिन होता था। बच्चे दिन रात एक करके परीक्षा की तैयारी की जाती थी।परन्तु जैसे जैसे परीक्षा परिणाम बिगडने लगे, वैसे वैसे सरकार का सरकारी शिक्षकों से मोहभंग होने लगा या यह करें कि प्राथमिक शाला के शिक्षक शिक्षिकाओं के कौशल से यकीन हटने लगा और उसके चलते जितने प्रवेशित उतने उत्तीर्ण की परंपरा का निर्वहन प्रारंभ हो गया।और यह काम पाँचवी क्या आठवीं तक की कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिये भी लागू कर दिया गया। 
आज की वास्तुस्थिति यह है कि ये परीक्षायें जो कि जिला स्तरीक्ष शिक्षा विभाग के अधीनस्थ आयोजित होती थी,वो अब विद्यालयीन स्तरीय हो चुकी हैं।परीक्षा सिर्फ कापी भरने की खाना पूर्ति तक सीमित होकर रह गई है क्योंकि वार्षिक परीक्षाफल शत प्रतिशत लाना एक मात्र ध्येय हो चुका है। उस समय के मोह भंग का आधार पूर्णतः निराधार था।वास्तविकता यह है कि शिक्षक मेहनत तब करेगा जब उसे पढाने का अवसर मिलेगा। वो सुबह से शाम तक विभागीय कार्यों में उलझा रह जाता है।जो काम कार्यालय सहायक और लिपिक का है उसे सरकारी शिक्षक और शिक्षिकायें कर रहीं है तब इन परिस्थितियों में  गुणवत्तायुक्त प्राथमिक शिक्षा कहाँ से आ पायेगी।आज की वर्तमान स्थिति में समग्र आई डी इसका सबसे बडा उदाहरण शिक्षा विभाग के पास है जिसके अंतर्गत विद्यालय के शिक्षक शिक्षिकाओं की प्राथमिकता यह पहले है बाद में पढाना क्योंकि इसमें ऊपर से पूर्ण करने का ज्यादा दबाव है।
सर्व शिक्षा अभियान,सब पढे सब बढे,और शिक्षा का अधिकार दिग्भ्रमित हो चुके हैं,दूसरे अर्थों में साक्षरता के चारो तरफ चक्कर लगाते नजर आते हैं।हमें इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिये कि यदि विद्यालयीन शिक्षा की प्रथम सीढी में ही रेवडी बाँटी जायेगी तो उत्पाद गुणवत्ताहीन ही निकलेगा।और उसका परिणाम यह निकलता है कि कमजोर बच्चे दसवीं की परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने के भी काबिल नहीं बन पाते हैं। अब इस स्तर पर शत प्रतिशत उत्तीर्ण का मिशन शून्यतम स्तर पर पहुँच जाता है।
अब शिक्षा के झंडावरदारों को समझना होगा की आज के समय के जितने भी शिक्षक शासकीय सेवा में आ रहें है वो अतियोग्य और गुणवत्ता हेतु दी गई परीक्षा पास करके आ रहें हैं वो पाँचवीं और आँठवी पास पुराने जमाने के मास्टर साहब नहीं हैं।यदि इनकी योग्यता का इस्तेमाल आने वाली पीढी को ज्ञानार्जन हेतु नहीं किया जा रहा है तो इसके लिये दोषी कौन है।सरकार के ऐसे बहुत से विभाग है जिसमें कार्यरत कर्मचारियों का आने वाली पीढी के भविष्य से कोई लेना देना नहीं हैं यदि शिक्षकों की बजाय अन्यत्र कामों के लिये उन व्यक्तियों की सेवायें ली जायेगीं तो शिक्षकों का समय सही जगह लग पायेगा।परीक्षा नीतियों के बदलाव की नितांत आवश्यकता समाज को महसूस होती है।यदि प्रारंभ से ही उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता खत्म कर दी जायेगी तो बच्चा पढेगा भी और शिक्षक पढायेंगें भी। सरकार की पहल ही शिक्षकों की योग्यता का सही मूल्याँकन और आने वाली पीढी के द्वारा उपार्जित ज्ञान को सही दिशा निर्धारित करेगा।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

चाइना को हर बार आइना क्यों

चाइना को हर बार आइना क्यों
भारत की तरफ से फिर एक बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज्य अपनी विदेश यात्रा के लिये चाइना को चुना।वो विगत दिनों भारत और चाइना के रिस्तों में नई उर्जा डालने की कोशिश कर रही थी।हम सब जानते हैं कि दिल्ली विधान सभा चुनावों की जीत के सपने के बाद अब हमारे प्रधान मंत्री जी मई में चाइना जाने की तैयारी में हैं।हमारी विदेश मंत्री की यह यात्रा उनकी प्रस्तावना के रूप में स्वीकार की  जा रही है। पर इस यात्रा का औचित्य क्या निकला यह मेरे समझ के परे है। क्योंकि चाइना के साथ हमारे संबंध छिपे नहीं हैं। आज भी भारत चाइना का सीमा विवाद ,भारत के गले की हड्डी बना हुआ है।
जिन छ सूत्रीय माडल को लेकर विदेश मंत्री बीजिंग गई थी उनकी तरफ नजर डालें तो उसमें दोनो देशों को परिणामोंन्मुखी कार्ययोजना बनाना,व्यापक आधार वाले द्विपक्षीय रिस्तों की शुरुआत करना,सामान्य क्षेत्रीय व वैश्विक हितों के लाभ की बात,व्यापार सहयोग के नए क्षेत्रों का विकास,राजनैतिक संवाद का दायरा और व्यापक बनाना, और एशियाई सदी का लक्ष्य पाने के लिये साझा रणनीति बनाना। इस छ सूत्रीय संवाद में भारत चाइना सीमा विवाद और कैलास मान सरोवर मार्ग जैसे वो मूलभूत मुद्दे किसी कोने में जम्हाई लेते नजर आये।विदेस मंत्रियों और सदस्य मंडल की बैठक में क्या सिर्फ मोदी की मई में चाइना यात्रा को फाइनल करना  और वांग सी को इंटरटेन करने का जिम्मा उनके पास था।वो कहती नजर आई कि यह चाइना में विजिट इंडिया २०१५ की शुरुआत है मतलब आने वाले समय में भारत सिर्फ चाइना को मनोरंजित करने का काम करेगा।अपने मूलभूत मुद्दों को भूल कर इस तरह की यात्राओं का मतलब कितना देश वासियों के हित में है।
वो चाइना मीडिया फोरम को संबोधित कहते हुये जब कहती हैं कि चाइना भारत का सबसे बडा  व्यापारिक साझेदार है तब उन्होने सीमा मामले पर अपनी जुबान पर ताला क्यों लगा रखीं।बार बार भारत के विदेश मंत्रालय का दावा करना कि बस से जासकेंगें कैलाश मान सरोवर, उन दावों का क्या होगा।क्या विदेश मंत्रालय आज तक अन्य रास्ता खोलने पर विचार करना बंद कर चुका है।अपने अंतिम संवाद में हमारे विदेश मंत्री का यह कहना कि सीमा पर शांतिपूर्णं शर्त जरूरी है कहाँ तक सही है।हम भूल जाते हैं कि चाइना लाइन आफ कंट्रोल को बार बार पार कर कथित भारत अधिकृत चाइना को हथियाने या ये कहें भारत में घुसबैठ करने में अपनी एडी चोटी का जोर लगा रहा है।वो वहाँ पर चैकियाँ, सडकें,टेलीफोन लाइन,और अपनी कालोनियाँ लगभग सौ किलोमीटर तक बना चुका है।और भारत के सैनिकों को आज तक यह अधिकार दिया गया कि वो उनको पीछे खदेड सके ।तब भारत के विदेश मंत्री का इस तरह घिघियाना कब बंद होगा।
एक ओर भारत २६ जनवरी को नारी शक्ति प्रदर्शित करता है और वहीं दूसरी तरफ विदेश मंत्री वो नारी शक्ति जिन्हें वास्तविक रूप से अधिकार है अपनी शक्ति और संबल का प्रदर्शन करने का वो वहाँ शांति पूर्ण शर्त की बात करती नजर आ रहीं हैं। क्या भारत को नहीं पता कि वो चाइना सीमा में कितना फंड खर्च कर रहा है।दोटूक बात करने का वादा जो हमारे प्रधान मंत्री जी चुनाव के उम्मीदवार के रूप में कर रहे थे उन वादों की तिलांजलि देने का क्या मतलब है। व्यावसायिक और वैश्विक निवेश और साझेदारी को द्वितीयक प्राथमिकता देते हुये पहले भारत को इन विवादों को सुलझाने के लिये सीधे संवाद कर परिणाम निकालना चाहिये।और अपने क्षेत्र को अपना बनाना चाहिये।इसके लिये भारत को चाहे जितना विरोध झेलना पडे।जितने रक्षा इतजाम करना पडे।भारत को अपने अतीत में मिले चाइना के युद्ध नहीं भूलना चाहिये।उसे यह नहीं भूलना चाहिये कि चाइना सिर्फ भारत के उपभोक्ताओं का उपभोग कर रहा है और करता रहेगा और जब भी उसके नुकसान की बात की जायेगी यानि सीमा और अन्य रक्षा सौदों की बात की जायेगी तब वो सीधे सीधे मुकर जायेगा और बात को घुमा फिरा देगा।आज विदेश मंत्री को चाहिये कि इन मुद्दों  सीधा संवाद भविष्य की यात्राओं में तय किया जाये और मसलों का हल निकाला जाये। ना कि उनको बातों से उलझाकर अपनी विदेशी यात्राओं के आँकडों में इजाफा मात्र किया जाये।
अनिल अयान,सतना,9479411407

‘आप’ के सपनों की दिल्लीc





‘आप’ के सपनों की दिल्ली
बनारस की हार का परिणाम दिल्ली में आ चुका है। दिल्ली को नया मुख्यमंत्री मिल चुका है।दिल्ली ने जिस तरह आम आदमी पार्टी को बहुमत दिया है वह अद्वितीय है।शपथ लेने के समय में जिस तरह अरविंद केजरीवाल बोल रहे थे उससे साफ लग रहा था कि वो अपने किये चुनावी कुम्भकर्णी वायदों को पूरा करने से डरने लगे हैं।उन्होने दिल्ली वासियों को अर्धशतकीय वादों के जहाज में चढा कर अपनी सत्ता तो हासिल कर लिया पर उनकी आपूर्ति कहीं ना कहीं चक्रव्यूह के समान उनके सामने खडी हुई है। एक बार दिल्ली में सत्ता में काबिज होने के बाद लोकसभा चुनाव की मृग मारीचिका ने उन्हें दिल्ली की जनता और भाजपा के चुनावी निगाहों में गुनहगार बना दिया था।उनकी बुराई ,उनके ऊपर शब्द कटाछ ,और खूब व्यंग्य बाण छोडे गए। परन्तु केजरीवाल जी ने अपने संयम को कायम रखा।जब उसके दो कदवार राजनीतिज्ञ भाजपा में शामिल हुए तब भी वो अपना संयम बनाये रखे।जब उनके ऊपर काले धन का वार हुआ तब भी वो संयमित होकर अपनी जुबान में लगाम रखे।उस समय दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे वास्तविक जनसंघी याद आगये।
उसी समय भाजपा के दो महापुरुष सवाल पे सवाल और उत्तेजित होते नजर आये।जितनी ताकत भाजपा ने दिल्ली की जीत के लिये लगाई उसका परिणाम दिल्ली की जनता ने दे दिया। जनता ने बता दिया पार्टी के यदि कदवार उम्मीदवार नहीं है तो भगोडे उच्च कद के उम्मीदवार को भी जनता स्वीकार नहीं करेगी।जनता ने जिस तरह केजरीवाल जी को क्षमा दान देकर कुर्सी दान दिया वह दिल्ली के सांस्कारिक होने का पुख्ता सुबूत है।अब सवाल यह है कि भाजपा की कुंभकर्णी नींद इस हार से खुलेगी।उस को स्वीकार कर लेना चाहिये कि भाजपा अपनी ही राजधानी में किरायेदार की तरह हो गई है।और वहीं केजरीवाल को इस बात को स्वीकार कर लेना चाहिये कि तालाब में बैरी मगरमच्छ के साथ अब आने वाला समय बिताना है।
उनके द्वारा पहली ही चाय भेंटवार्ता में पूर्ण राज्य की माँग करना कहीं ना कहीं महानगरीय क्षेत्रवाद को दिखाता है।हम सब जानते है कि ऐसा बहुत कम हुआ है कि किसी देश की राजधानी एक स्वतंत्र राज्य हो।राजनीतिशास्त्र और राष्ट्रीय परिकल्पना के अनुसार यह असंभव है कि मोदी जी दिल्ली को पूर्ण राज्य बना कर खुद को दिल्ली का किराये दार बना ले ।लोकतंत्रीय प्रणाली के अनुसार आज भी दिल्ली में अधिक्तम अधिकार पुलिस व्यवस्था के पास है।यह पर  जेड सुरक्षा क्षेत्र अधिक है।यहाँ पर अधिक्तर राज्य स्तरीय अधिकार द्वितीयक सरकार के पास होता है।अधिक्तर यहाँ पर केंद्र के निर्णय चलते है।परन्तु यह माँग केंद्र सरकार के लिये गले की हड्डी बनती जारही है।यदि माना जाये कि कभी ऐसा होता है तो क्या केद्र-राज्य संवैधानिक अधिकारों की पुनः समीक्षा की जायेगी।सुरक्षा और सामाजिक शांति व्यवस्था के साथ राष्ट्रीय मुद्दों की व्यवस्था साथ साथ पर विलगित होकर कार्य करेगी।यदि ऐसा होता है तो केंद्र के पास राजस्व और नीतियो के विलगन का बोझ बढेगा।
कभी कभी लगता है कि केजरीवाल जी अब भूल जाते है कि वो देश की संवैधानिक धारा से जुड चुके हैं।और वो केंद्र की अधीनस्थ विधानसभा के मुखिया है।इन सब परिस्थितियों के चलते उनकी इस तरह की नींवहीन माँग उनके अस्तित्व के खतरे को बढाता है। उनको इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि उनकी दीवार के सामने भाजपा के सारे के सारे धुरंधर परास्त हो चुके जरूर हैं पर काम उनको उसी पार्टी की केंद्र सरकार के साथ कदम से कदम मिला कर करना है।हाँ उनके और प्रयास सार्थक है परन्तु यह कहना की काले धन में अपने राज्य को मुक्त करना,भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन करना।आम जन की भागीदारी को बढाना।इस पर जोर देना होगा।उन्हें अपने मंत्रिमंडल में युवा चेहरों को स्थान देना होगा।केंद्र से मिल अपने राज्य के लिये नीतियों के अनुसार कार्यकरना होगा।और अपने अहंकार को नियंत्रित करते हुये अतिउत्साहित बयान बाजी से खुद और अपने मंत्रिमंडल को बचाने की मुहिम चलाना होगा तभी उनके उद्देश्य पूरे हो सकते है।अन्यथा वादों के महल में मोदी जी भी चुनाव जीते है और उनके नेतृत्व का परिणाम हमारे सामने है। राजनैतिक समझ और वैचारिक परामर्श के साथ ही केजरीवाल दिल्ली में स्थित होकर खुद की शाख बना सकते है वरना विरोधियों के बीच अपना अस्तित्व बनाये रखना कठिनतम होगा।ऐसे वायदे जो उनकी शाख को खराब करें और केद्र से गतिरोध बढायें ,उनको त्यागना ही दिल्ली हेतु आप के सपनों को साकार कर सकते है।संवैधानिक नियम कायदों के विरोध में जाकर माँग करने से टकराव की स्थिति ही बनती है हल नहीं निकलता है।


अनिल अयान,सतना.9479411407

अच्छे दिन बनाम मँहगे दिन

अच्छे दिन बनाम मँहगे दिन
बजट आने के बाद तस्वीर काफी कुछ साफ हो गई है।आम जनता को समझ में आने लगा है कि यह बजट सिर्फ उद्योगपतियों की चाटुकारिता करने वाला है।यह बजट यह बताता है कि किस तरह उद्योगपतियों और करोडपतियों से अरब पतियों की फिक्र सरकार को आम जन से ज्यादा है।आम जन तो सिर्फ ढेंगा देखने के लिये मजबूर है।बजट से पहले यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि शायद वित्त मंत्री जी आम जन की जेब का ध्यान रख कर कुछ रियायत देगें परन्तु उन्होने सीधे सीधे अपने भाषण में यह कह दिया कि आम जन अपना ध्यान खुद रखे।हम सिर्फ उनके जीवन को इंस्योर्ड करेंगे।सरकार शायद भूल चुकी है कि आम जन से किये वायदे इस बजट में धूल फाँकते नजर आये हैं।वोट के लिये किये गये झूटे वादों के ढोल की पोल खुलने लगी है।
सरकार ने आम दैनिक उपभोग की वस्तुओं को मँहगा कर आम जन की कमर टोड दी है।सरकार ने उन वस्तुओं के दाम को कम करने का ऐलान किया है जिसका आम जन से कम और खास वर्ग से अधिक ताल्लुकात है।सरकार ने मनरेगा और निर्भया के फंड में बढोत्तरी कर मन मोहने का प्रयास तो किया परन्तु वहीं दूसरी सबसे बडी चपत सर्विस टैक्स को १४ः करके लगा दिया है।इस बढोत्तरी से हर वस्तु और सेवा क्षेत्र का मूल्य अधिक्तम हो जायेगा।हम सब जानते हैं किं उत्पादन से ज्यादा बाजार सर्विसिंग के बूते पे चल रहा है।जहाँ पर आपको रसीद की बात याद आयेगी वहीं पर टैक्स आपको अदा करना होगा।आमजन का रोटी कपडा मकान इतना मँहगा हो गया है कि वो कई प्रकार के टैक्स देकर अपने जीवन को सिर्फ सुरक्षित ही कर सकता है।लोन की बात की जाय तो ब्याज दर मँहगी होने से लोगों का मोह भंग होना तय ही है। बाजार का ध्यान रखना,अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना,देश का विदेशों से संबंध मजबूत करता,और जनता के अच्छे दिन की परिकल्पना को जनता के सामने रखने का जो कार्य सरकार ने इस बजट के माध्यम से किया है वह मंच से सुनने में प्रभावी और आकर्षक लगता है और कानों को बहुत सुकून देता है परन्तु आज जब सामने खडा है तो मँहगाई वाले ये दिन जेब और आम जन की दैनिक अर्थव्यवस्था को टोडने का काम अधिक कर रहा है।अब समझ से परे है कि जब आम जन की अर्थव्यवस्था ही डगमगाई हुई नजर आयेगी तो क्या पूँजी पतियों के उद्योगों के दम से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो पायेगी।आम जन का उसमें कोई योगदान सरकार नहीं चाहती है क्या।
अन्य बजट की स्थित पे नजर डाला जाये तो समझ में आता है कि रेल बजट से जनता को कोई रियायत नहीं मिली है।ना किराया घटा है और ना ही कोई नई ट्रेन चलाने का प्रावधान और घोषणा की गई है।इस क्षेत्र में भी सर्विस और यातायात टैक्स बढने से जनता के जेब को नजरंदाज कर दिया गया है।सरकार का मध्य प्रदेश में भी यही हाल रहा है।कर्ज पर लदे होने के बाद भी वित्त मंत्री जी ने वो वायदे किये जिससे मध्य प्रदेश की जनता असंतुष्ट नजर आयी है।वायदों से आमजन की पेट पूजा तो होती नहीं है।सत्ता के मठाधीशों से जनता को अपेक्षा होती है कि वो उनके प्रतिनिधि है तो उनका भरपूर ख्याल रखेगें।परन्तु यहाँ तो दूसरा ही राग अलापा जा रहा है अच्छे दिन का राग अब मँहगे दिन की ओर बढ रहा है।बजट की उपलब्धि यही देखी जा सकती है कि इससे सेनसेक्स की बढोत्तरी ज्यादा नहीं आपायी ।उद्योगपतियों के बयान बजट को देश की अर्थव्यवस्था के अनुकूल बताया वहीं दूसरी ओर राजनेताओं ने इसे विकास दर को १०ः से ज्यादा ले जाने के लिये भागीरथ प्रयास का पहला चरण बताया।आम जन के मुँह से सिर्फ निराशावादी वि़चार ही निकल कर सामने आये।
अब तो ऐसा लगने लगा है कि सरकार का हर जन प्रतिनिधि मंत्री बनने के बाद प्रति जन निधि संचय करने की स्कीम चलाकर जनता की प्राप्त राशि को सरकार के खाते में पहुँचाने की कवायद में लगा हुआ है।क्या अच्छे दिन सिर्फ उद्योग पतियों और अरब पतियों के लिये बस सरकार देना चाहती है या अच्छे दिन का तात्पर्य मँहगे दिन से था। जो सुनने में तो बहुत मधुर था परन्तु जब सामने आया तो उतना ही कडवा होगया।अच्छे दिन का यह प्रथम बजट जनता का सरकार से मोहभंग करने वाला रहा।बजट के बाद पेट्रोल और डीजल का तीन रुपये बढ जाना कहीं ना कहीं व्यापार और बाजार को और ऊँचाई पर पहुँचा देगा। इन बजटों के बाद जनता के लिये अच्छे दिन की परिभाषा बदल चुकी है। ऐसे अच्छे दिन का परिणाम जनता की जेब से से निकलता नजर आयेगा।इंस्योरेंस के दम पर जीवन यापन करने की इस पहल में सरकार बहुत खुश हो सकती है परन्तु जनता दुखी है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४0७

उपमहाद्वीप में वर्चस्व की खोज

उपमहाद्वीप में वर्चस्व की खोज
दक्षिण एशिया के अंतिम छोर में हिंद महासागर के नाम से चिन्हित हमारे प्रधानमंत्री की श्रीलंका,सेशल्स और मारीशस यात्रा पूरी होने के बाद इस उपमहाद्वीप में अपने वर्चस्व की खोज करती ज्यादा नजर आती है। भारत कहीं ना कहीं चीन को अपना प्रतिद्वंदी मानता रहा है। इस यात्रा में मालदीव को छोड देना इस वर्चस्व की लडाई की प्रमुख चाणक्य नीति है। भारत को अच्छी तरह से पता है कि चीनी सरकार ने आज कल सामुद्रिक रेशम पथ की नीति को अंजाम दे रहा है। जो भारत को कहीं ना कहीं खल रहा है।और उसे खलना भी चाहिये। क्योंकि सन 1902 में लार्ड कर्जन ने हिंद महासागर को भारतीय सामुद्री क्षेत्र कहा था।और आज के समय में रेशम पथ नीति के चलते चीन अपने वर्चस्व को इस क्षेत्र में दोहरा रहा है। भले ही उन्होने प्रति स्पर्धा की बात ना कहीं हो परन्तु हमारे प्रधानमंत्री जी को यह बात अच्छी तरह से पता है कि कान पकडना मूल उद्देश्य है कैसे पकडा गया है यह कोई मायने आज की राजनीति में नहीं रखता है।
मालदीव के राष्ट्रपति यामीन चीन के मुराद हैं और वो नहीं चाहते की भारत का साथ देकर वो चीन की नजरों में किरकिरी बनें।वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के नेता और पूर्व राष्ट्रपति नशीद भारत के मुरीद थे इस वजह से हमारे प्रधानमंत्री जी ने मालदीव को नकार दिया और वहाँ की यात्रा को निरस्त करके श्रीलंका में बौद्ध अनुयायियों को संबोधित करने के साथ श्रीलंका का दिल जीत लिया। 28 वर्ष पहले समाप्त की गई इस तरह की यात्राओं को दोबारा प्रारंभ करके हमारे प्रधानमंत्री जी ने श्रीलंका को अपने पक्ष में मिलाने की प्रस्तावना रख दी है। मालदीव को नकारना और श्रीलंका को अपने पक्ष में मिलाना कितना सार्थक होगा यह सोचने वाली बात है।
पिछले पाँच दशक का चिट्ठा उठाकर देखें तो श्रीलंका में चीन 70 करोड डालर से अधिक निवेश कोलंबो और अन्य क्षेत्रों में निवेश सिर्फ इसलिये किया ताकि वो सामुद्री मार्ग में श्रीलंका की जमीन से अपना मार्ग प्रशस्त कर सके जो पूर्व में यूरोप होता हुआ पोलैंड तक जाता था।इस मार्ग में यदि चीन का वर्चस्व काबिज हो जाता है। तो अन्य देशों को चीन की चाटुकारिता करने के लिये मजबूर होंगें। हमारे प्रधानमंत्री मारीशस और सेशल्स की सरकार को अपने साथ लेकर इस सामुद्री आधिपत्य की पहल कितनी सफल होगी यह तो आने वाला वक्त बतायेगा। परन्तु हमारे प्रधानमंत्री जी को यह बात का भान होना चाहिये कि क्या चीन के विरोध में जाकर श्रीलंका भारत का खुलकर समर्थन देगा। वो भी जानता है कि भाई बंधु राजनीति के लिये ज्यादा वफादार नहीं होते बल्कि अपने धर्म के लिये ज्यादा वफादार होते हैं। भारत और श्रीलंका राजनैतिक भाई बंधु ठहरे जबकि चीन और श्रीलंका धार्मिक भाई बंधु हैं। भारत के इन देशों के साथ पूर्व इतिहास में कैसे रिस्ते रहें हैं यह हम सबसे छिपी नहीं है। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही इस देशों को भारत की सागर माला कहा हो परन्तु आज के समय में यह सागर माला भारत के वर्चस्व से बाहर जाती नजर आ रही है। इस क्षेत्र  में गाहे बगाहे चीन काबिज है। भारत की यह स्वस्थ वैश्विक विदेश नीति भले ही हो। भारत भले ही उन्हें वीजा और व्यवसायिक निवेश की खुली छूट दे पर भारत इस यात्रा से क्या खोया क्या पाया,इसका आंकलन करने में हम घाटे में नजर आते हैं।
आने वाले समय में क्या हिंदमहासागर यात्रा भारत के पक्ष में निर्णय दे पायेगी। क्योंकि भारत की राजनीति की पृष्ठभूमि और इन देशों की राजनैतिक पृष्ठभूमि में धार्मिक समानता का मूल विभेद है।चीन को मिला कर ये देश बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। धार्मिक आस्था के मायनों में ये देश परम मित्रों मे है। अब देखना है कि धार्मिक आस्था के रिस्ते ज्यादा वफादार हैं या राजनैतिक पडोसियों के रिस्ते ज्यादा वफादार हैं। इस उपमहाद्वीप में भारत और चीन की तुलना की जाये तो भारत चीन से ज्यादा शक्तिशाली है। हमारी पहल वाकयै काबिले तारीफ है। परन्तु चीन भी सामुद्र के सरताज का ओहदा यूँ ही नहीं छोडेगा। उपमहाद्वीप में वर्चस्व की खोज करती यह यात्रा हिंदमहासागर में भारत के व्यावसायिक लाभ को कितना बढा पायेगी इस बात की निर्भरता चीन श्रीलंका के राजनैतिक और धार्मिक रिश्ते की डोर पर टिकी है।
अनिल अयान, सतना
9479411407/9479411408

धर्मांतरण के ज्वलंत सवाल

धर्मांतरण के ज्वलंत सवाल
धर्मांतरण के नाम पर हमेशा से विरोध रहा है।विशेषकर ईसाइयों और मिशनरियों का विस्तार इस देश की राजनीति को हमेशा से गर्म करता रहा है।राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद भी हम सबसे छिपा नहीं है। हमेशा ही जब भी दो धर्मों के त्योहार एक ही दिन को पडते हैं तब प्रशासन के हाथ पाँव फूलने लगते हैं। वर्तमान केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयान जिसमें उन्होने अल्पसंख्यकों के सुरक्षा का जिम्मा अपनी सरकार के हाथों में लेकर सभी अल्प संख्यकों को आस्वस्त किया है उसके बाद से ही उप्र और बिहार में चर्च में हमले और नन के साथ बलात्कार जैसी घटनाओं का प्रारंभ हुआ।इन घटनाओं ने धर्मांतरण के विषय पर नई बहस छेड दी है। और गृह मंत्रालय की यह कोशिश कितनी  प्रभावी होगी यह बताना कठिन है।क्योंकि दिया तले अंधेरा खुद नजर आ रहा है।
भाजपा का संबंध जिस विचारधारा से है उसमें देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की ही प्राथमिकता है।इसके लिये सारे हिंदू वादी संगढन एक मत हैं।यह उनके अनुसार सही है क्योंकि हिंदू धर्म पुरातन है और अन्य धर्म इसकी ही संतति है।उनके मत के अनुसार यह देश पहले हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता था।जो विवेचना के तर्क सम्मत में खरा उतरता है।इन परिस्थितियों के चलते अपने अपने ढोल और अपने अपने पोल बजाने की कला का बेजोड उदाहरण जो सामने हम सबके आया है वह कितना सार्थक है यह सोचने का विषय है।या फिर राजनीति का एक हतकंडा है जो समय समय पर सभी राजनैतिक व्यक्तित्वों पर लागू होता है।
स्वतंत्रता के बाद सभी को संविधान सभा ने उपासना और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया था।जिसके अंतर्गत माननीय प्रधानमंत्री जी ने दिल्ली के एक अल्पसंख्यक मिशनरी कार्यक्रम में यह बयान दिया कि हर नागरिक के अपनी पसंद के धर्म को अपनाने और मानने के अधिकार की रक्षा के लिये उनकी सरकार वचन बद्ध है। वहीं दूसरी ओर उनकी पार्टी और विहिप जैसे हिंदू धर्म रक्षा मंच के उच्च पदाधिकारी भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं।उनकी तरफ से ये बयान आता है कि जहाँ पर ईसाई है हीं नहीं वहाँ पर चर्च का निर्माण गलत है।इस तरह एक ही पार्टी के अलग अलग छोरों से अलग तरह की बाते निकल कर सामने आती हैं।
 हमारे केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रदेश अल्प संख्यक आयोग के सामने कई सवाल रखे और बाद में ट्वीटर में उन्हें दुनिया के सामने रखा।हमें उन सवालों पर भी गौर करना चाहिये।क्या धर्मांतरण जरूरी है,क्या धर्म परिवर्तन के बिना समाज सेवा नहीं किया जा सकता है।क्या धर्म  परिवर्तन के बिना भारत में सभी धर्म फल फूल नहीं सकते,और क्या भारत देश अपनी जनसंख्या की पहचान एवं स्वरूप में बदलाव की इजाजत देता है।इन ज्वलंत सवालों पर एक स्वस्थ्य और गंभीर बहस की जरूरत है।यदि मीडिया में इस तरह की बहस होती है तो सभी प्रतिनिधि अपना अपना राग अलापते हैं और संयोजक उनका चेहरा देखता रह जाता है।
धर्म का स्ंबंध सदैव आत्मीय उन्न्यन से रहा है वो आस्था जिसे धारण किया जा सके उसे धर्म मानना चाहिये।और इस हेतु इच्छित मार्ग चुनने के लिये किसी को रोकना और व्यवधान उतपन्न करके उसे प्रताडित करना अनुचित है।धर्म का मूल अरथ धारण करने से है। गतिरोध तब आता है जब लालच, सुविधाये,और मुद्रा देकर या फिर जबरन दूसरा धर्म धारण करने के लिये कोशिश की जाती है।इसके लिये मिशनरीज और अन्य संगढन कैंप लगाते हैं।उन्हें वैचारिक रूप से परिवर्तित किया जाता है क्या इस प्रयासो के लिये देश में कानून बनने के बावजूद इसके सक्रियता के बारे में कार्य करना चाहियैं
घर वापसी जैसे कार्यक्रम ,केरल जैसे राज्य में धर्म परिवर्तन जैसे विषय इनका निदान क्या है।कई हलकों से य ेप्रश्न उभरकर आते हैं कि घरवापसी के गर्माये माहौल के बीच चर्च के हमलों के बीच इस तरह के सवालात और बयान धर्म निरपेक्षता का छिद्रान्वेषण है या कुछ और उनकी पहल और अल्प संख्यको की सुरक्षा का भार लेकर देश को सर्वधर्म सम्भाव का मसीहा बनाने कीपहल की गई है।परन्तु इस देश के धार्मिक ,सामाजिक,और शैक्षिक स्तर सुधारने के लिये यह जरूरी है कि इन ज्वलंत सवालों पर धार्मिक संगढन बैठ कर चर्चा करें अन्यथा इस सरकार के द्वारा किये ये वायदे आने वाले समय में व्यर्थ ही नजर आयेंगें।क्योंकि यह सहअस्तित्व की लडाई है जो अपने अंजाम तक पहुंचने के लिये बेचैन नजर आ रही है।
अनिल अयान सतना.

आप के उनचास दिन तब और अब

                                                                        आप के उनचास दिन तब और अब
इस बार केजरीवाल की आप पार्टी सरकार ने उनचास दिन पूर्ण कर लिया है। इस बार लोकसभा चुनावों के बाद मिली करारी हार के बाद से ही आप पार्टी ने विधानसभा चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। उसी का नतीजा था की पूर्ण बहुमत के साथ आप पार्टी की दिल्ली में सरकार बनी।सरकार इस बार आसानी से अपने कार्यकाल के उनचास दिन पूर्ण कर ली।समय के साथ यह कहा जा सकता है कि केजरीवाल और उसकी टीम ने पिछली बार की तरह इस बार आप को राजनीति के दांव पेंच से लैस करके ही चैन पायी। यही कारण था कि आप के उनचास दिनों में एक नजर डाले तों तब के उनचास दिन और अब के उनचास दिनों में सरकार काफी हद तक संयमित रही है।परन्तु आंतरिक उठापटक के चलते इस बार भी आप पार्टी मीडिया में छाई रही।केजरीवाल ने इस बार विरोधियों को पूर्णतः बायकाट कर दिया।समय रहते राजनैतिक समझ का प्रचलन इस सरकार को निश्चित ही एक अच्छे मुकाम तक ले जायेगी।एक तुलनात्मक तरीके से देखें तो पता चलेगा कि किस तरह केजरीवाल जी ने इस बार सरकार और पार्टी संयोजन दोनो के लिये सभी साथियों को अपने रास्ते से बेदखल कर दिया।       
            यदि तब की केजरीवाल सरकार पर नजर डालें तो कई बातें सामने आती है।तब की सरकार में आप ने गठबंधन का सहारा लेकर सरकार बनाई थी।आप के सारे मंत्री लगभग राजनीति में नये और अनुभवहीन थे।राजनीति की ए,बी,सी,डी तक वो नहीं जानते थे।कांग्रेस ने बीच भंवर में जिस तरह से आप का साथ छॊडा था वह आप के लिये एक सीख साबित हुई।आप पार्टी ने पिछली बार एक समाजिक सेवक से राजनैतिक पार्टी के रूप में खुद को बदली थी।पिछले बार आपके कई निर्णय और कार्य आम जनता के लिये कारगर सिद्ध हुये।उन्होने दिल्ली को सुरक्षित बनाने की पहल की और यदि विरोध किया तो धरने और आंदोलन के रूप में जनता के सामने आया।जनता को यह लगा कि सरकार उससे पूँछ कर उसके विकास के लिये कार्य कर रही है।जनत अके मन में संतोष था।केजरीवाल सरकार ने लोकपाल का पुरजोर समर्थन किया और उसके लिये जनता जनता जनार्दन और अन्य पार्टियों से चरचा भी की परन्तु कोई परिणाम नहीं मिला एक कमी की वजह से वो राजनीति की डगर से भटक गई वो थी जनता की सेवा करने की बजाय लोकसभा का ज्यादा मोह कर जाना और तो और जिस जनता से पूँछ कर सपथ लेना उसी से बिना पूँछे इस्तीफा दे देना।जनता को समझ में आ गया कि आप पार्टी लालची और अन्य पार्टियों की तरह कुर्सियों का मोह लिये हुये है।और इसी का परिणाम था कि उनचास दिन का अनुभव रखने वाली आप लोकसभा चुनाव में अपना मोहभंग करके हार का चेहरा देखने को मजबूर हुई।
            दिल्ली वासियों को लगा कि आप की पहली गल्ती थी जो अनुभवहीनता के बल पर की गई थी।वह मोदीमय भाजपा का कार्यकाल भी देख चुकी थी।और कांग्रेस के दस साल का दंश झेल चुकी थी।अतः इस विधानसभा चुनाव में उसने दोबारा आप को पूर्ण बहुमत देकर विजयी बनाया ताकि वो दिल्ली को देश का सबसे अच्छा राज्य बनाने में कुछ तो कदम उठाये।इस बार तो आप के अंदर ही जूतम पैजार देखने को मिल गई।एक व्यक्ति कुमार विश्वास को छोड कर अन्य लोगों ने यहाँ तक की केजरीवाल खुद अपना आपा खो बैठे।स्टिंग आपरेशन की ऐसी आंधी चली और विभीषणगिरी ऐसे चली की आप के आंतरिक कलह सडक में दिखाई पडा।परन्तु इस बार की सरकार ने पहले की तरह कोई गल्ती नहीं की।लोकपाल को कोसो दूर फेंक दिया।आम जनता की बजाय समाज के धन्ना सेठों को मनोरंजन करने का काम किया।अन्य पार्टियों के साथ सामन्जस्य बिठा कर काम किया।केंद्र सरकार से उसका गतिरोध जरूर रहा।स्वतंत्र राज्य की मांग और अन्य राजनैतिक मुद्दों में कहीं ना कहीं पार्टी को विरोध झेलना पडा।परन्तु पिछली बार से हुये कम विरोध की वजह से इस बार के उनचास दिन ज्यादा सरल थे।
            इस बार की सरकार के बाद केजरीवाल को एक अप्रैल को केजरीवाल दिवस का केंद्र बिंदु बनना पडा।जनता को मूर्ख बनाने के कदवार नेता के रूप में छवि लोगों के सामने प्रकाश में आयी।अपने विरोधियों को बेदखल करना पार्टी के लिये जन्मघुट्टी की तरह था।परन्तु लोकपाल को छोडना कहीं ना कहीं अन्ना आंदोलन और जनता के साथ छलावा के रूप में सामने आयी।सरकार भले ही इन दिनों को अच्छे दिन के रूप में ले रही हो परन्तु हकीकत यह है कि इस तरह की पार्टी का भविष्य़ कितना उज्ज्वल और कालजयी है यह विचार का विषय है।दिल्ली की दशा और दिशा आज के समय में क्या है और क्या होगी यह इसी पार्टी की जिम्मेवारी है।और यह भी हम सब जानते है किं दिल्ली सिर्फ राज्य नहीं है वरन केंद्र का नेतृत्व यहीं से हो रहा है।और यदि यहाँ पर अस्थिरता रहेगी तो देश में अस्थिरता बनी ही रहेगी।केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते केंद्र सरकार की भी जिम्मेवारी है कि दिल्ली हर मायने में देश के विकास के सहायक हो।

अनिल अयान सतना

किसान हुआ लाचार, है बेफिक्र सरकार

किसान हुआ लाचार, है बेफिक्र सरकार
भारत को कृषि प्रधान देश की श्रेणी में जब खडा किया गया और लाल बहादुर शास्त्री ने जब जय जवान जय किसान का संदेश दिया तब उन लोगों ने नहीं सोचा होगा कि कृषि प्रधान देश का अन्नदाता अपने ही देश में खून के आंसू रोने के लिये लाचार हो जायेगा। आज की स्थिति पूर्णतः विपरीत हो चुकी है। अनियमित बरसात के होने से किसानों की स्थिति बहुत ही ज्यादा गंभीर हो चुकी है। वो चाहकर भी उबर नहीं पा रहा है। देश के २० से अधिक राज्यों में बरसात की अनियमितता ने किसानों की कमर तोड कर रख दी है। किसान पूरी तरह से टूट चुका है और उसकी समझ से यह परे है कि इस वर्ष उसका चूल्हा कैसे जलेगा। इस साल की दोनो रबी और खरीफ की फसलें मौसम के बदले मिजाज के चलते खत्म हो चुकी है। पहले तो ठंड की फसल को कोहरा, ओला और कडकडाती ठंड ने तबाह कर दिया और अब गर्मी के मौसम में असमय बारिस ने किसानो और कृषि दोनों की हालत खस्ता कर दी है।
यूँ तो सरकारें कहने को फाइलों में सक्रियता दिखाई हैं, और हुये नुकसान का जायजा लेने के लिये अधिकारियों की टीम बनाकर मूल्यांकन करने के आदेश दे चुकी है। परन्तु वह मूल्यांकन कितना ज्यादा कठिन है कि अब तक हो ही नहीं पाया है। किसान अपनी फसल के लिये लिये गये कर्ज के बोझ से दम तोड रहें हैं। उनका सुनने वाला कोई नहीं है। यही वजह रही है कि मध्य प्रदेश मे आत्म हत्या करने वाले किसानों की संख्या दहाई के आंकडे से ऊपर पहुँच चुकी है। और पूरे देश में यह संख्या शतकीय पारी खेल चुकी है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या किसानों का पालनहार कोई नहीं बचा है। सरकार को माइक के सामने घोषणायें करने से फुरसर नहीं है और विपक्षी दलों को गैर सरकारी संगढनों की तरह दौरे कर सहानुभूति देने से फुरसत नहीं है। ताकि आने वाले समय में अन्नदाताओं के वोट तो कम से कम उन्हें मिल सकें।रही बात सहायता की तो उस जगह पर सिर्फ आश्वासनों की लंबी कतारें नजर आ रहीं है। यही वजह है कि दमोह और देवास से विगत चैबीस घंटों में दो और किसानों के आत्म हत्या करने की खबर ने संख्या में इजाफा किया है।
कृषि प्रधान देश में इतना सब कुछ होने के बाद जब केंद्रीय मंत्रियों और राज्य मंत्रियों के अटपटे बयान मीडिया के सामने आते हैं तो ऐसा लगता है कि वो इस देश के वासी हैं ही नहीं वो जैसे भारत में कुछ समय के लिये अपना समय व्यतीत करने के लिये आये है और भ्रमण करके चले जायेंगें। ऐसा लगता है कि वो कभी इन किसानों के पास वोट की भीख मांगने गये ही नहीं थे और भविष्य में ना कभी जायेंगें। बयान सुनने के कृषि मंत्री जी के बयान सुनने के बाद तो ऐसा महसूस होता है कि किसान उनके सबसे बडे दुश्मन हैं जो उनके घर का सारा धन लूटने आये हों।सरकार की तरफ से कोई ठोस सहायता निकल कर सामने नहीं आयी। जिन सरकारों ने मुआवजे की घोषणायें की भी हैं वो नुकसान की तुलना में बहुत ही कम है। ऐसा लगता है की ऊँट के मुँह में जैसे जीरा थमा दिया हो। हर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि किसान के खेतों से ही वो भूमि अधिग्रहण के सपने संजोये बैठी है और देश व्यापी बहस का मन बनाये बैठी है। किसानों की फसल से ही कृषि उपज मंडियाँ पूरे देश में धरल्ले से दौड रहीं है और जायज ना जायज लाभ भी मिल रहा है। देश के नागरिकों का पेट भरने की जिम्मेवारी कृषि पर केंद्रित उद्योगों की नींव यहीं से बनती है।सरकार का वोट बैंक गांवों से ही निर्मित होता है।तब भी किस बात का इंतजार किया जा रहा है यह समझ के परे है।
सरकार को चाहिये की समय रहते इस वर्ष को राष्ट्रीय कृषि आपदा वर्ष घोषित करके किसानों की मदद करे। अपने भंडार खोले और किसानों को आवश्यकतानुसार सहायता प्रदान करे। बहुत पहले एक फिल्म बनी थी पीपली लाइव।क्या सरकार पीपली लाइव की तरह किसानों की  आत्म हत्याओं के थोक आंकडों का इंतजार कर रही है। समय रहते यदि ऐसा नहीं होता है तो सामाजिक, कृषि संगढनों और आम लोगों को आगे आना होगा और इस आपदा से किसानों को बचाने के लिये उनसे साथ कुछ कदम साथ चलकर संबल तो बढा सकते हैं। यही इंसानियत और नागरिकता की गुहार भी है।
अनिल अयान,सतना


विदेश यात्राओं से लाभ किसे

विदेश यात्राओं से लाभ किसे
फ्रांस जर्मनी और कनाडा जैसे विकसित सोच रखने वाले राष्ट्रों की यात्रा करने के बाद पूरा विदेश मंत्रालय और देश इस बात से प्रसन्न है कि यह यात्रा अब तक की पूर्व यात्राओं से ज्यादा सुखद रही है। हमारे प्रधानमंत्री जी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में पहले पडोसी मुल्कों को अपने मोदी मय आचरण का कायल बनाया और उसके बाद पूर्व देशों की यात्रा कर कुछ चमत्कार करने की कोशिश की और अब यूरोप के पश्चिमी देशों की यात्रा करके अन्योक्ति पूर्ण परिणाम लाने की पहल करने में तथाकथित सफलता प्राप्त की है।
कनाडा यात्रा से हमारे प्रधानमंत्री ने कनाडाई यूरेनियम भारत में आयातित करने में सफल रहे,जो इंदिरा गांधी के शासन काल के पश्चात कनाडाई सरकार के द्वारा रुका हुआ था।अगले पांच साल में तीन  हजार टन रेडियोएक्टिव यूरेनियम की प्राप्ति भारत को इस यात्रा से हुई।कनाडा खनिज का बादशाह है और आने वाले समय में खनिज मित्रता का एक रास्ता खुलता नजर आता है। जर्मनी में आर्थिक और राजनैतिक समझ के गहरे होने की बात की जा रही है।आतंकवाद पर दोनो  के उठे एक सुर सकारात्मक पहल साबित हुई। यह भी संभव है कि संयुक्त राष्ट्र में जर्मनी भारत को अपना सहयोगी बना सके। फ्रांस से राफेल के ३६ विमानों का आयात भी भारत के लिये चमत्कारिक मानी जा रही है।फ्रांस के अरेवा द्वारा जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाना और पांडुचेरी और नागपुर को चुस्त शहर बनाने की भी पहल हुई है। पिछली यात्राओं की  तरह ही इस बार वादों का ताज महल खडा हुआ है। अब देखना यह है कि क्या इन वादों के ताज महल में ये देश भारत का साथ दे पाते हैं कि नहीं। क्योंकि समय गवाह रहा है कि अभी तक जितने भी वादे विदेश यात्राओं मे हुये वो अधिक्तर फाइलों तक सीमित रह गये।
कनाडा पहले भी भारत का यूरेनियम निर्यातक रहा परन्तु सत्तर के दशक में उसने भारत के साथ यह संधि इसलिये तोड दिया क्योंकि भारत ने उस समय परमाणु करार के विरोध में जाकर कार्य किये।जर्मनी से भारत की कभी भी नहीं बनी परन्तु इस यात्रा ने सिर्फ और सिर्फ लीपापोती करने का काम किया है।क्योंकि वो भारत को ज्यादा पसंद नहीं करता है।ना ही व्यावसायिकता को बढाना चाहता है।रही बात फ्रांस की तो वो सिर्फ भारत को बाजार बना कर अपना व्यवसाय कर रहा है।उसने कभी भारत के साथ मिलकर सेना के लिये आवश्यक औजारों के निर्माण हेतु उद्योंगों के बारे में कोई करार नहीं किया। उसने परमाणु संयंत्र लगाने की बात की परन्तु आयुध और विमानन निर्माण उद्योगों में मौन रहा।
और कभी कभी लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री देश में मेक इन इंडिया का राग अलापते हैं और फिर विदेश यात्राओं के दौरान वही वादे जो उन्होने देशवासियों के साथ किये है, भूलकर आयात संधि में हस्ताक्षर करते हैं।क्या यह दोहरा व्यक्तित्व नहीं है।भारत को चाहिये था कि इन देशों से तकनीकि और संयंत्र हेतु करार करता। खुद का अर्थ खर्च करके इन देशों के वायदों का पुलिंदा साथ लाना देश के व्यापारियों और उद्योगपतियों के खाते वाहवाही जा सकती है परन्तु आम जन के लिये सिर्फ ठेंगा दिखाया है। आप खुद सोचिये राफेल विमानो को अयात करने में जितना खर्च आ रहा है उतने में इस संयंत्र की तकनीकि को संधि के द्वारा भारत तक लाया जा सकता था। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि ये देश विकसित देश हैं। और विकासशील देशों के साथ सिर्फ व्यावसायिक समझौते ही करेंगें।वो कभी भी नहीं चाहेंगें कि एक विकासशील देश जो कभी उपनिवेशीय गुलाम था वह उनके कद में बैठे।
विदेशी दौरे में गये मोदी जी के भाषणों को सुनकर ऐसा लगा कि वो चुनावी रैली को संबोधित कर रहें हो।जिसमें स्वगुणगान अधिक था और तथ्यात्मक विचारधारा का समावेश कम था। अंततः भारत वह देश है जहाँ बीपीएल में लोग दो जून की रोटी को मोहताज है और आईपीएल में लोग करोडों सिर्फ मनोरंजन के लिये खर्च कर रहें है।भारत विदेशों से भले ही आयात कर अपने को सर्वशक्तिमान घोषित करके संयुक्त राष्ट्र संघ में झूठी शान बना ले परन्तु इस प्रकार के दौरों से भारत सिर्फ अपना ही व्यय करता है।परिणाम हमेशा वायदों के रूप में भारत को मिला है जिसका क्रियानवयन भारत के हाथ में नहीं रहा।आज आवश्यकता है कि मौलिक रूप से भारत बुनियादी मजबूती के लिये काम करे और अन्य देशों से सहयोग प्राप्त करे।
अनिल अयान

क्यों मीडिया पे दोष मढ़ती है ‘आप’

क्यों मीडिया पे दोष मढ़ती है ‘आप’
जंतर मंतर का मैदान एक किसान की आत्म हत्या का गवाह बन चुका है। किस तरह अपना सब कुछ खोने के बाद मृतक किसान रैली में आया और अरविंद केजरीवाल से मिलकर अपनी समस्या का निदान खोजने की कोशिश करता रहा।कोशिश असफल रही तो उसने सभी पुलिसकर्मियों और आप पार्टी के संग आये कार्यकर्ताओं के सामने आत्म हत्या कर लिया। आप अगले अडतालिस घंटे तक कोई भी सहानुभूति व्यक्त नहीं कर पायी।अंततः जब कुछ बोल निकले तो वो भी मीडिया के विरोध में थे।यह पहली बार नहीं था कि जब आप पार्टी के संयोजक ने मीडिया को आड़े हाथों लिया हो। आप की शुरुआत भी कहीं ना कहीं मीडिया में प्रचार प्रसार से ही हुई थी। मीडिया वह माध्यम था जो आप को पूरे देश तक पहुँचाने का काम किया।आप के संघर्ष और किये गये अच्छे और बुरे कार्यों की समीक्षा भी मीडिया ने पूरी तरह से किया। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ था जब गजेंद्र की मौत के बाद हुये मीडिया कवरेज से पूरी पार्टी सकते में आ गयी। कभी यह आरोप लगाया गया कि मीडियाकर्मी अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहे है।कभी यह आरोप लगाया गया कि मीडिया ने अन्य पार्टियों से हाथ मिलाकर आप को विवादों में खडा कर दिया। और भी बहुत कुछ जो मीडिया की शान के खिलाफ रहा।मीडिया ने इस बार भी घटना को घटना के नजरिये से प्रस्तुत करने की बजाय उसका छिद्रांणवेषण करके प्रस्तुत करने की कोशिश की ताकि जनता को इस घटना की गहराई के बारे में अधिक से अधिक जानने का अवसर मिले। किसानो की हितैषी बनी आप पार्टी के सामने एक किसान खुद को फांसी मे लटका लिया तो भी पूरी की पूरी पार्टी सिर्फ मूक दर्शक की भांति तमाशबीन बनी रही।जनता और पुलिस कर्मियों को अपने काम को ईमानदारी से करने की पैरवी करने वाली पार्टी खुद ही अपने दायित्वों को निर्वहन करने में असमर्थ रही।और कुंभकर्णी नींद से जगी भी तो अपने घडियाली आँशू बहाने से बाज नहीं आयी।
पत्रकारिता ही वह माध्यम है जो लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है।इसके चलते ही पूरी दुनिया का हर व्यक्ति जागरुक बना हुआ है।वो समाज में घटने वाली हर घटना को जागरुकता से देखता है,समझता है और फिर अपनी प्रतिक्रिया देता है।मीडिया हर प्रकार से समाज, देश-दुनिया के प्रति जागरुकता को फैलाने का काम करती है।पार्टियों का बार बार यह दोष देना कि मीडिया ही दोषी है और वह दूध की धुली हुई है यह सरासर गलत है।प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया ऐसे माध्यम है जिसके चलते पढ़े लिखे आदमी से लेकर अनपढ,बच्चे से लेकर हर उमर का व्यक्ति इससे लाभान्वित होता है।समाचार पत्रों और समाचार चैनल अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये क्रमशः रीडरशिप और टीआरपी पर आधारित होते है और इन्हें होना भी चाहिये।क्योंकि वो बाजार में अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये कार्य कर रहे हैं। मीडिया समाज के हर उस कोने तक पहुँचती है जहाँ पर उसे कुछ विशंगति दिखाई देती है।उसको खबर से खोजबीन करने तक ले जाने का काम भी मीडिया का ही है।कई लोगों का यह मानना कि मीडिया एक खबर को हर बार टेलीकास्ट करती है तो यह भी जरूरी है क्योंकि वह चैनल या समाचार पत्र पूरे देश के लिये होता है एक बार में यह आवश्यक नहीं है कि हर व्यक्ति प्रसारित होने वाली खबर को देखे ही।हाँ एक बात जरूर है कि लाइव चैनलों में आने वाली बहसों में भाषा और संयम दोनो की कमी देखने को मिलती है।निष्कर्ष निकले, ना निकले परन्तु आरोप प्रत्यारोप असंतुलित सा नजर आता है।प्रिंट मीडिया इस हद तक इलेक्ट्रानिक मीडिया से श्रेष्ठ हैं।
रही बात राजनीति की तो आज के समय में चुनाव से लेकर हर राजनैतिक पहलू को मीडिया लोगों के घरों तक पहुँचने के लिये अपना माध्यम चुनती है।मीडिया वह अस्त्र है जिसके सहारे आज के समय में चुनाव जीता जाता है।मीडिया जिसका समर्थन कर दे वह विजयपथ चलने के लिये तैयार खडा होता है।क्योंकि मीडिया से तेज कोई भी किसी के घर में संपर्क एक समय पर और एक साथ नहीं कर सकता है।पार्टियाँ अपने स्वार्थ की बात हमेशा से करती चली आयी हैं।जब उनके फायदे की बात होती है तो वह मीडिया के गुणगान करती है और जब उनकी कमी को मीडिया लोगों के सामने रखती है तब वह पार्टी मीडिया को कटघरे में खड़ी कर देती है।इस बार आप पार्टी का मीडिया को आडे हाथों लेना भी कुछ ऐसा ही था।आप के लिये यह आवश्यक है कि आने वाले समय में वो आंतरिक कलह से बचकर मीडिया को साथ लेकर चले और राजनैतिक क्षेत्र में अनुभव हासिल करे।समय सापेक्ष चल रही मीडिया पर यदि वो बार बार व्यवधान डालेगा तो उसकी राजनैतिक उम्र को खतरा हो सकता है।क्योंकि आप के लिये मीडिया से बैर लेना अपनी कार्यकुशलता में ब्रेकर लगाने की तरह ही है।
अनिल अयान,सतना

मोदी कार्यकाल का एक साल

मोदी कार्यकाल का एक साल
विगत १६ मई को मोदी सरकार ने एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया।माननीय नरेंद्र भाई मोदी का सत्ता में आना ही भारत की जनता के लिये  एक आश्चर्यजनक घटना थी। कांग्रेस के दंश को दस वर्ष तक झेलने के बाद भारत की जनता ने भाजपा को पूर्ण बहुमत से मोदी को सरकार चलाने की बागडोर सौंपी। एक वो दिन था और एक आज का दिन है। दिन,महीना और साल जनता को इस सरकार के रवैये से वाकिफ होने में ज्यादा देर नहीं लगी। आज जनता को पता चल चुका है कि सरकारें वहीं रहती हैं,सोच वही रहती है,राजनीति वही रहती है सिर्फ काम करने का ढंग बदल जाता है। जनता के घर का धन सरकार देश के लिये कितना इस्तेमाल होता है यह किसी से छिपा नहीं है।कांग्रेस की हर कमी को लोकसभा चुनाव प्रचार में भाजपा ने मोदी के माध्यम से इस्तेमाल किया,गुजरात का यह राजनैतिक व्यक्तित्व बनारस से जब विजयी हुआ तो लगा कि यह राजनीति का जादूगर है।राजनीति में एक बडे परिवर्तन का समय आ चुका है।ना खाऊँगा ना खाने दूँगा की नीति ने जनता को बहुत प्रभावित किया।मुद्रा बैंक की स्थापना भी अर्थशास्त्र की दृष्टि से एक सराहनीय कदम था। काश्मीर से लेकर नेपाल तक आपदा प्रभावित स्थानों में अपने हाथ खोल कर मदद करना एक सुविचारिक पहल थी साथ ही साथ विदेश यात्राएँ भी सार्थक पहल थी। भारत के स्तर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने और पडोसी राष्ट्रों के प्रति अपनी समप्रभुता को मजबूत करने की पहल भी मोदी का प्रभावी कदम था।
इन सब के चलते मोदी के कार्यकाल में उनके कैबिनेट मंत्रियों की फिसलती जुबान ने कहीं ना कहीं सरकार को हमेशा विवादों में रखा।इस एक साल में भारतीय जनता पार्टी के पुराने जमाने के धुरंधर नेताओं की छुट्टी होने के बाद कुछ चेहरे जनता के सामने भाजपा के परचम को थामें नजर आये।जिसमें अमित शाह इनके सेनापति के रूप में जनता से रूबरू हुये।इस सरकार की कई योजनायें देखा जाये तो सिर्फ राजस्व बढाने के लिये ही प्रारंभ की गई।इनके प्रायोगिक रूप में आने पर यह सामने आया कि जनता हमेशा की तरह इस बार भी परेशान हुई।इसके अंतर्गत जन धन योजना के बीमा लाभांश के लालच में जनता ने अपना पैसा ही सरकार को खातों के माध्यम से दान कर दिया। और जिनको बीमा का पैसा मिलना भी था वो इसलिये खाली हाथ वाले बने रहे क्योंकि बैंको से पैसा निकालने की औपचारिकता ही उनकी सिरदर्द बन गई। भूमि अधिग्रहण और क्लीन इंडिया की पहल भी कुछ ऐसी ही रही।सरकार विवादों आखिरकार घिर ही गई।सरकार के द्वारा दागी मंत्रियों को कुर्सियाँ सौंपने के विवाद में भी मोदी सरकार विवादों में घिरी रही। विदेशी दौरों के बौछार करने वाले हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे रिकार्ड बना लिया।परन्तु इन यात्राओं का परिणाम लगभग शून्य ही नजर आया। यात्राओं के दौरान देश के विकास के लिये जो भी वायदे जनता के सामने आये वह सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह गई हैं।स्मार्ट सिटी और गंगा एक्शन प्लान जैसे कुछ सपने ऐसे थे जो पूरे होने में अधिक समय लेने वाले है। एक साल पूरा होते होते डीजल पेट्रोल और रसोई गैस के दामों में बढोत्तरी भी जनता की कमर टॊडने जैसे ही रहा।
सरकार ने जितने भी वायदे चुनाव प्रचार के समय किये वो पूरे होने की बजाय अल्पकालिक रियायत के रूप में सामने आये।परमानेंट निदान और लाभ की बजाय घुमा फिरा कर जनता को हेरा फेरी के चक्कर में फंसा दिया। नमो नमो का असर सरकार के छः माह पूर्ण होने के बाद ही निचले स्तर के चुनावों में देश के कई राज्यों में करारी हार का सामना करना पडा।देश के वो मुद्दे जिसमें मोदी सरकार को तेज तर्रार फैसले लेना चाहिये था वहाँ पर वो मौन होकर विपक्षी दलों से ही हाथ मिलाकर कुर्सी हथिया ली।जिसमें महाराष्ट्र और जम्मू काश्मीर विधान सभा जीता जागता उदाहरण है। काश्मीर मुद्दे में सरकार का निष्क्रिय रवैया और चीन के सीमा विवाद को सुलझाने के बजाय चीन के रिस्ते को प्लस वन तथा हिंदी चीनी भाई भाई के नारे लगाने वाले मोदी अपने ही जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। एफ डी आई की दरों में लगातार हुई बढोत्तरी ने यह साबित कर दिया किया मोदी भारत को विदेशियों का बाजार बनाना चाहते हैं। भारत को आर्थिक लाभ पहुँचाने बजाय भारत को वो प्लेटफार्म बनाना चाहते हैं जहाँ अन्य देश के व्यवसायी आकर पैसा कमाये।एक वर्ष में इस सरकार ने जनता का धन धनवानों को सौंप कर देश के आर्थिक ढांचे को मजबूत करने का ढोंग किया है। पूरी जनता को पता है कि यह सरकार व्यापारियों और उद्योगपतियों को आंगे बढाने और सबको ऊँचे सपने दिखाने का कार्य कर रही है। बजट ने यह बता दिया कि अच्छे दिन मँहगे दिन में बदल चुके हैं।  मोदी वो जादूगर है जिनके पास वाक्पटुता है और शब्दों का वो माया जाल है जो देश के अलावा विदेशों को भी मोह लेता है।परन्तु हमें नहीं भूलना चाहिये कि जादूगर सिर्फ मनोरंजन करके उँचे सपने दिखाता है। यदि सरकार को आगे बढना है तो जरूरी है कि मूलभूत समस्याओं से निजात पाया जाये। वरना दूर के ढोल सुहावने भले ही हो पर कर्कसत से सरकार भी नहीं बच पायेगी।

कट्टर संघर्ष बनाम गुर्जर आंदोलन

कट्टर संघर्ष बनाम गुर्जर आंदोलन
गुर्जर वो जाति जो आजादी के कई वर्ष पूर्व से ही राजस्थान के अधिक्तर क्षेत्र ,मध्यप्रदेश के मालवा और भोपाल के आसपास और छत्तीसगढ के कुछ इलाकों में फैल चुकी थी। इनका कोई विशिष्ट इतिहास नहीं मिलता परन्तु यह तय रहा कि ये अपने आप को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में मानते रहे हैं। विगत दिनों जिस तरह का कट्टर संघर्ष राजस्थान के जयपुर से अन्य रेलमार्ग के ट्रैक में दिखा वह देश के लिये आने वाले समय में चिंता का विषय बन चुका है। इस तरह का जातिवाद अन्य राज्यों के लिये भी सिरदर्द बन सकता है। विशेष कर उनराज्यों में जहाँ पर भाजपा की सरकार मौजूद है। विगत एक पखवाडे से इस वर्ष चर्चा का विषय बन चुका गुर्जर आंदोलन किस तरह आरक्षण के लिये कट्टर संघर्ष को चुना वह अपने ध्येय के प्रति एकात्म दृढ विश्वास को हम सबके सामने रखा है। इस पूरे आंदोलन के दौरान देखा गया कि केंद्र और राज्य सरकार का कोई भी इनके विरोध में बयान नहीं आया, और ना ही इनके विरुद्ध किसी कार्यवाही की मांग की गई।
कविता श्रीवास्तव,जनरल सेक्रेटरी, पीपल यूनियन फोर सिविल अफेयर्स, राजस्थान ने २०११ में गुर्जर आंदोलन के बारे में  १०० पृष्ठों की विशेष रिपोर्ट में बताया कि १९४० से निवास कर रहे गुर्जर जाति के लोग १९८० तक अपने अधिकारों के लिये जागरुक हुये और गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के रूप में नेतृत्व राज्य स्तर तक पहुँचाया। इतना ही नहीं, कट्टर संघर्ष का रूप २००५ से २००८ के मध्य राजस्थान के पीपलखेडा , दौसा , किशनगढ और अन्य आस पास के इलाकों में चक्काजाम और हिंसात्मक रवैये के साथ उग्र हुये। हमारे लिये ये भी जानना आवश्यक है कि १९९४ में राजस्थान के तत्कालिक मुख्यमंत्री श्री भैंरों सिंह शेखावत के द्वारा गुर्जर समेत पांच जनजातियों को जिसमें गुर्जर ,रैका ,बंजारा ,गढियालोहार ,गरडिया को ८ अगस्त १९९४ को ओबीसी कोटे में शामिल करने के लिये विधेयक प्रस्तावित किया गया। परन्तु आरक्षण की आग को हवा देने का काम गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय सचिव किरोडी सिंह बैसला के द्वारा और २००३ के विधानसभा चुनावों मे अपनी वोट बैंकिंग को मजबूत करने के उद्देश्य से भाजपा की उम्मीदवार वसुंधरा राजे सिंधिया के द्वारा किशनगढ की परिवर्तन यात्रा के दौरान किया गया। जिसमें उन्होने कहा कि वो इन जातियों को अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत लाने के लिये मोर्चा सम्हालेंगी। सत्ता में आने के बाद वो ५ प्रतिशत तक आरक्षण इन्हें प्रदान करेंगी। श्री मती श्रीवास्तव के अनुसार इस जाति को आरक्षण प्रदान करने का कोई भी नियम और कायदा कानून नहीं है। परन्तु राजस्थान में भाजपा की सरकार आने के बाद इन्हें विशेष पिछडा वर्ग-एसबीसी वर्ग का निर्माण कर ५ प्रतिशत आरक्षण की बात को विधानसभा से हाँ की मोहर लग गई।
आरक्षण पर नजर डालें तो सीट रिजर्वेशन फ़ोर एडूकेशनल इस्टीट्यूट्स ऐंड पब्लिक सेक्टर एक्ट २००८ ले अनुसार पढाई और नौकरी के लिये किसी भी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश में ५० प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है। राजस्थान में अभी २१ः ओबीसी, १६ः एससी, और १२ः एसटी को प्राप्त है। अब यदि ये ५ः और जुडते हैं तो यह बढकर ५४ः हो जायेगा। यह आंकडा कानूनन रूप से गलत है। और जयपुर हाई कोर्ट की सीनियर वकील इंदिरा जय सिंह ने जब २००८ में इस संदर्भ में  पीटीशन दाखिल की तो जयपुर हाईकोर्ट के एन. के. सिंह और जे. के. रंका न्यायपीठ ने तुरंत स्टे लगा दिया और अगली सुनवाई के लिये फरवरी २०१९ का समय चुना। एक वो समय था और एक आज का समय।इतना सब कुछ होने के बाद गुर्जरों की महत्वाकांक्षायें इतनी ज्यादा विस्तार ले चुकी हैं कि वो अब सरकार की अनुसूचित जनजाति मे शामिल होकर आरक्षण के नियमों को सिथिल कर निर्णय पाने के लिये कट्टर संघर्ष कर रही है। अब सोचने की बात यह है कि यदि इस जाति को एसटी कोटि में शामिल किया जाता तो ८२ अन्य पिछडा वर्ग की जातियाँ भी परिवर्तन के लिये संघर्ष करेंगी।और देश में एक नया जातिगत संघर्ष की स्थिति निर्मित हो जायेगी।
भाजपा के शासन काल मे अधिक्तर इस प्रकार की सहप्राप्त जातिगत आरक्षण संघर्ष का पूर्णविराम कैसे होगा यह अब तक सरकार तय नहीं कर पाई है।मई के इस संघर्ष के बाद जयपुर हाईकोर्ट ने तो गुर्जर समुदाय के वकील की दलील तक सुनने से इंकार कर दिया।और इस संघर्ष को तुरंत खत्म करने के लिये एसटीएफ और अन्य पैरा मलेट्री सेना की टुकडियो को भेजा। परन्तु क्या इस काम को अंजाम देने के लिये राजस्थान सरकार और पुलिस बल निष्क्रिय और बेजार हो चुका है या यह सब भाजपा सरकार की सहपर हुआ। कुछ भी हो परन्तु इस आरक्षण की जातिवादी आग से पूरा देश,इस राजमार्ग और रेलमार्ग प्रभावित रहा।कई ट्रेनें रद्द हो गई,राजमार्ग-८,११,१२ पूरी तरह से बंद रहे। कार्यपालिका को चाहिये कि इस तरह के जातिवादी संघर्षों को जड से उखाड फेंकने के लिये कडे से कडे नियम कानून बनाकर पालन करना चाहिये।वरना यह आग अन्य गुर्जर बाहुल्य राज्यों में फैलने से रोकने के लिये हमारी भाजपा सरकार को नाकों चने चबाने पड जायेंगें।
अनिल अयान,सतना

योग में भिड़ा धार्मिक जोग

योग में भिड़ा धार्मिक जोग
२१ जून को मनाये जाने वाले  अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के पूर्व ही योग को लेकर एक बडी बहस शुरू हो गई है। योग के नाम पर हिंदू संगढन और मुस्लिम संगठन योग की पैरवी करने में लग गये हैं। योग को धर्म से जोडने के लिये राजनीति के स्टंट किये जा रहे हैं। मुस्लिम संप्रदाय के राजनैतिक मठाधीश योग को नकार रहे हैं क्योंकि योग के अंतर्गत सूर्य नमस्कार में आने वाले संस्कृत के श्लोकों में हिंदू देवी देवताओं की अराधना की गई है। जो मुस्लिम समुदाय के लिये धार्मिक रूप से गलत होगा। इस विवाद में  जिस प्रकार आल इंडिया मजलिस ए एत्तेहाद उल मुस्लमान सबसे ज्यादा विरोध दर्ज कर किया है वो कितना सच है इस बात को जानने की आवश्यकता है कि क्या सूर्य नमस्कार में वाकयै देवी देवताओं की उपासना है या फिर मामला कुछ और है।इधर आयुष मंत्री श्री पद नायक ने बार बार इस बात को स्पष्ट किया है कि मुस्लिम समुदाय के लिये योग के अंतर्गत सूर्य नमस्कार के समय सभी मुस्लिम भाई अल्लाह का नाम ले सकते हैं। एक तरफ सुषमा स्वराज का यह कहना कि योग में सरल आसनों के जरिये योग दिवस मनाया जाना चाहिये।  लोगों को सूर्यनमस्कार करने के लिये प्रतिबंधित नहीं करना चाहिये। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह योग के विरोध में धार्मिक जोग भिडाना सही नहीं है। हम सब जानते है कि योग,प्राणायाम,और सूर्यनमस्कार कहीं ना कहीं हमारे स्वास्थ्य से भी जुडे हुये हैं और आवश्यकता पडने पर हर धर्म के लोग मेडीटेशन के नाम पर योगासनों को कर के जीवन में स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं। बाबा रामदेव का यह बयान देना कि योग का एक रूप मुस्लिम समुदाय में नमाज अदा करना भी है। यह बात सभी के गले से नहीं उतरती है।
योग जो वैदिक कालीन परंपरा से उत्पन्न हुआ है। जिसका जिक्र हिंदू धर्म के उपनिषद और बौद्ध धर्म पाली में सर्वाधिक मिलता है। बाद में पतंजलि ने योग शूत्र की रचना कर के योगविद्या को जन जन तक पहुँचाया है। अस्सी के दसक से योग को योग गुरुओं के द्वारा सर्वाधिक प्रचार प्रसार किया गया। आठ आर्थोडाक्स स्थितियों के द्वारा योग को फिजिकल एक्सरसाइज के अलावा भी मेंटल और स्प्रिचुअल मेडिटेशन का माध्यम बनाया। संस्कृत शब्द युज से बना योग का शाब्दिक संसकृत अर्थ जोडने से लेकर है। हिंदी में योग को गणित के जोड से मिलान किया गया है। चक्रयोग ,क्रियायोग ,मनयोग ,राजयोग और हठयोग आदि कई प्रकार के योग अलग अलग प्रकार के स्वास्थ्य से जुडे हुये हैं। बारह आसनों में किया जाने वाला सूर्य नमस्कार वास्तव में सूर्य की आराधना है। सूर्य नमस्कार मुख्य रूप से हठयोग का भाग है जिसमें आसन ,उपासन ,मंत्रोचारण, प्राणायाम से बना हुआ है। पुरातन काल में इस योग से व्यक्ति सूर्य और उसमें निहित उर्जा को स्वयं में समाहित करने का प्रयास किया करता था जो हिंदु धर्म के अनुसार सूर्य सहित प्रकृति के अन्य तत्व भी देवताओं के रूप में पूजे जाते थे। रही बात नमाज़ की तो वह मुस्लिम संप्रदाय का प्रार्थना का स्वरूप है। सलत और सलह अरबी लफ़्ज है जो इस्लाम में आवश्यक नमाज़ के रूप में हर व्यक्ति को अदाकरनी होती है।पांच वक्त की नमाज़ और उसके सभी नियम का जिक्र सुरा जो कि क़ुरआन का प्रथम अध्याय में मिलता है जिसमें अपनी दुआ खुदा तक पहुचाना है। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि इस प्रार्थना में कहीं भी मेडीटेशन का जिक्र नहीं मिलता है।
योग,सूर्य नमस्कार के संदर्भ में यदि  इतिहास में नजर डालें और धार्मिक दृष्टि से देखा जायेगा तो उपनिषदों से उतपन्न हुआ योग वाकयै ही हिंदू धर्म की संपत्ति है। यह बात और है कि इस क्रिया को आज बौद्ध, जैन,सिक्ख,इसाई धर्म के लोग अपने स्वास्थ्य लाभ के लिये कर रहे है। परन्तु योग गुरु का यह कहना भी गलत है कि नमाज़ में योग समाहित है। क्योंकि कहीं भी इसकी पुष्टि नहीं मिलती है। इस प्रक्रार के प्रलाप धार्मिक विद्वेश पैदा करते है। वास्तविकता तो यह है कि योग के सूर्यनमस्कार भाग में बिना श्लोकों के यह पूर्ण नहीं होता है। समय सापेक्ष इसमें बदलाव किये गये है। परन्तु इसके लिये पूरे देश में प्रोटोकाल लाना भी सही नहीं है। क्योंकि अपने धर्म के अनुसार हर व्यक्ति हो यह अधिकार है कि वो सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी इच्छाअनुसार भाग लेकर लाभ प्राप्त करें। इसे ऐच्छिक रूप से जनता के लिये मनाना चाहिये। क्योंकि प्रोटोकाल से जनता में तानाशाही शासन का संदेश जाता है जो लोकतंत्रात्मक प्रणाली की सरकार के लिये सही नहीं होगा। परन्तु विगत कुछ समय से सरकार ने हमेशा ही प्रोटोकाल के जरिये सभी धर्मों को एक कार्य के बहाने एकत्र करने का काम किया है। अब धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को समझना है कि क्या वो धर्म के नाम पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का विरोध करते हैं। या फिर स्वास्थ्य लाभ के नजरिये से इसका फायदा उठाते है। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग प्रोटोकाल में सूर्य नमस्कार में मंत्रों की जगह पर अल्लाह का नाम लेने की छूट दे दी है। जिसका जिक्र उपनिषद के अनुसार पूरी तरह से गलत है। सूर्यनमस्कार बिना मंत्रोच्चारण के पूर्ण होता ही नहीं है।
अनिल अयान,सतना

लाचार मैगी बन गई अछूत

लाचार मैगी बन गई अछूत
पिछले कई दिनों से मैगी जैसे फटाफट खाद्य पदार्थ पर काफी विवाद गर्माया हुया है। जिससे पूरे देश में अच्छी खासी बहस छिड गई है।और तो और इस खाने को लेकर फिल्मी सितारे माधुरी प्रीति और अभिताब भी सरकार की गिरफ्त में आगये है। उनके ऊपर कई राज्यों में आईपीसी के सेक्शन 420,272,273,और 109 के तहत केस फाइल हो चुके हैं।उनके ऊपर जहरीले खाद्य पदार्थ की ब्रांड पब्लिसिटी का आरोप लगाया गया है। भारत से उठा यह विवाद भारत ही नहीं वरन अन्य विकसित देशों में मैगी के लिये गले की हड्डी बन गया है। यह खाने की वस्तु आम जन की आदत बन गई है। इसके लाभ और हानि के बारे में कोई नहीं सोच रहा है। इसके पीछे इसका स्वादिष्ट होना और अन्य खाद्य पदार्थ की तुलना में जल्दी तैयार होना भी है। देश के प्रधानमंत्री कार्यालय से भारत के 80 प्रतिशत राज्यों  मे मैगी नाम का उत्पाद प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब देखना यह है कि लोकतंत्रात्मक देश में जहाँ भी सरकार भी जनता निर्धारित करती है वहाँ मैगी और इससे मिलते जुलते उत्पाद के साथ न्याय हो पायेगा भी कि नहीं। क्योंकि अभी मैने मैगी जैसे उत्पादो का जिक्र किया अर्थात जब गाज गिरी तो मैगी ही क्यों अन्य मैगी तरह अर्थात नूडल्स के उत्पादक कम्पनियों के सैंपल की जांच होनी चाहिये।
नेसले के अलावा नूडल्स जैसे उत्पाद बनाने वाली 10 कम्पनीज अपना उत्पाद बेंच रही है जो बाजार में ग्राहकों के द्वारा खरीदे जा रहे है और मैगी के प्रतिस्पर्धी बन चुके है। परन्तु वो इस विवाद के बाद भी सेफ हैं। इसकी वजह क्या मानी जाय,क्या उनका टर्न ओवर नेसले के बराबर नहीं  है या फिर उसका प्रचार प्रसार कोई बालीवुड की सेलीब्रेटी की बजाय टीवी के एक्टर कर रहे हैं। या सरकार से उनका कोई विवाद नहीं हुआ। खैर जो भी हो लेकिन वो भी इस संदेह के घेरे में आते है।पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करते हुये भारत में फास्ट फूड के नाम से जो व्यापार चल रहा है वो  भारत के आर्थिक विकास में जितना लाभकारी है उतना ही स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भी है।साफ्ट ड्रिंक्स, तम्बाखू उत्पाद, और कैनिंग के नाम पर पैकेजिंग किये जाने वाले लंबे समय तक चलने वाले उत्पाद भी खाद्य सुरक्षा के घेरे में आते है। विभिन्न प्रकार की वाइन, देशी और विदेशी शराब भी इस घेरे में आती है। परन्तु इन उत्पादों को सैंपलिंग करने का समय किसी के पास नहीं है। ना ही इनके बारे में खोज खबर लेने का प्रावधान है।
फ्रांस में हेनरी नेसले द्वारा 1866 में गठित हुई नेसले कंपनी आज के समय में 150 से अधिक उत्पाद भारत के अलावा 20 अन्य देशों में चला रही है जिसका व्यापार वार्षिक आय व्यय हजार मिलियन का होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि 1980 के बाद भारत में आयी मैगी नाम की नूडल्स आज तीन दशक के ऊपर की हो गई है तब सरकार के खाद्य विभाग को होश आया कि इसमें भी लेड और एमएसजी मोनोसोडियम ग्लूटामेट की अधिक मात्रा 2.5 से 3.5 तक की बजाय 5.3 से 8.4 तक हो सकती है। एक बात यह भी मानी जा रही है कि कम्पनी की तरफ से सरकार का यथोचित सहयोग ना करने की वजह से उसे ही सिर्फ फास्टफूड उद्योग में निशाना बनाया गया। भारत में नेसले के प्रमुख इस बात को हर बार कहते आये है कि कुछ सैंपल्स को छोड कर मैगी में खराबी नहीं   है। कम्पनी ने यह भी माना है कि की एमएसजी एक एमीनो एसिड है जो टेस्ट इनहैंसर के लिये उपयोग किया जाता है। कभी कभी तो अन्य कंपनियाँ पीजा बर्गर और अन्य फास्ट फूड में स्वाद को बढाने के लिये  बैक्टोसोफ्टोन नाम का रसायन भी मिलाते है जो सुअर की आंत से स्त्रावित होने वाले पोर्साइन नाम के रसायन से बनता है। परन्तु उनको जाँच के दायरे में नहीं लिया गया।
इस सब विवाद होने के बाद सरकार ने कभी अपने काम की जाँच क्यों नहीं करायी और उसके खिलाफ केस क्यों नहीं चला उदाहरण के लिये स्कूलों में जाने वाले मध्यान भोजन की सामग्री में और पकाने में बहुत से स्वास्थ्य संबंधी गडबडी पाई गई परन्तु सरकार का रवैया उसके लिये उदासीन है। शराब से संबंधित सरकार का आबकारी विभाग फलफूल रहा है उस संदर्भ में स्वास्थ्य विभाग मौन है। हर जगह तम्बाखू उत्पाद और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन,उपभोग और व्यापार सरकार के आदेश के विरोध में ढंके की चोंट में चलाया जा रहा है परंतु सरकार ने उन उद्योगों का कुछ नहीं कर पायी या करना नहीं चाह रही है। यह बात भी सत्य है कि आज के समय में जो पानी हम पीते है उसमें भी लेड,सल्फर और कैल्शियम की सीमा से अधिक मात्रा मिली हुई है।और जिस सफाई प्लांट की बात की जाती है उसमें ऐलम,क्लोरीन और ब्लीचिंग की मात्रा भी क्वालटी के अनुसार अनियमित है फिर भी स्वास्थ्य मंत्रालय,और संबंधित विभाग, एफडीए फूड एंड ड्रग एडमिनेसट्रेशन कुछ नहीं कर पा रही है।
पूरी विवाद को समझने के बाद लगता है कि फास्टफूड उद्योग और जंक फूड उद्योग इस घेरे में आता है। इनको भी सैंपलिंग की जानी चाहिये। पूरे बाजार में स्वदेसी का यह सीतयुद्ध का प्रारंभ है जो कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष ऐजेंडा भी है यह नेसले और आईटीसी के बीच सरकार के घनिष्ट होने के प्रदर्शन का आगाज भी है। क्योंकि आईटीसी वह उत्पादक कंपनी है जो भारत के इन उत्पादों के बाजार में नेसले के टक्कर की भारतीय कंपने है जिसका २५० से भी अधिक उत्पाद बाजार और घरों की शोभा बढा रहे हैं। पूरे विवाद में नूडल्स उत्पादक कंपनियों में नेसले की मैगी को अछूत की तरह अपने समाज से बहिस्कृत कर दिया गया है। और इस काम में भारत के सभी राज्यों ने भरपूर सहयोग दिया है। रही बात स्वास्थ्य की दुहाई देने की तो अन्य हानिकारक उत्पादों,उसके उत्पादक उद्योगों और ब्रांड पब्लिसिटी करने वालों के खिलाफ भी कार्यवाही होनी चाहिये। जो हमारे लिये कैंसर की तरह हैं। तभी मैगी के साथ हुये इस अछूत रवैये के खिलाफ और स्वास्थ्य के पक्ष में सही न्याय हो पायेगा। यदि मैगी हानिकारक है तो उसके साथ साथ जहर परोस रहे उद्योगों और उनके उत्पादों के साथ भी   मैगी की तरह व्यवहार होना चाहिये।

अनिल अयान सतना

सीबीआई बनाम व्यापमं रू सिंहावलोकन

सीबीआई बनाम व्यापमं रू सिंहावलोकन
व्यावसायिक परीक्षा मंडल की स्थिति आज के समय पर ष्न घर की ना घाटष् के जैसे हो चुकी है। मण्प्रण् सरकार की स्थिति को नीचे गिराने के लिये यह आज के समय पर सबसे ज्यादा उपयोग किया जाने वाला अस्त्र बन गया है जिसके चलते विपक्ष भी इस जालसाजी के अंदर अपने राजनैतिक कैरियर की राह खोजने में लगा हुआ है। व्यापमं घोटाले से हुई मौतों ने भाजपा की सरकार की मुश्किलें सातवें आसमान में पहुँचा दी है। सन १९९८ से शुरु हुई इसकी नींव की पोल जब खुली तो २००० में पहली एफ आई आर दाखिल की गई। तब से लेकर आज तक ५५ से अधिक एफ़ण्आईण्आरण् दर्ज की जा चुकी है। ४०० से अधिक विद्यार्थियों के भविष्य को अंधे कुएँ में ढकेला जा चुका है। मौतों का आंकडा ५० से ऊपर पहुँचने के लिये तैयार बैठा है। इसके बावजूद भी मुख्यमंत्री जी का २००९ में कमेटी के द्वारा इसकी जाँच करवानाए उसके बाद २०११ में इस काम को एसण्टीण्फ को सौंपने की औपचारिकता निभानाए इतनी मौंतों के बाद भी उनकी पार्टी द्वारा मौतों को मात्र आसंका जताकर मुकर जाना अमूमन सही नहीं है। हल्के से इन घटनाओं को लेकर उसमें मौन धारण कर लेना कोई आज का खेल नहीं है। इसके पूर्व भी सदन में सूचना के अधिकार के अंतर्गत पूँछे गए सवालों पर मुख्य मंत्री जी ने अलग अलग समय पर विरोधाभाषी बयान देकर इस मामले को सही दिशा से घुमाने का प्रयास किया। जिसमें जनवरी २००९ में उन्होने यह कहा कि फेक परीक्षार्थियों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कर कार्यवाही की जा रही है। ३१ मार्च २०११ में उन्होने यह कहा कि गलत ढंग से एडमीसन लिये डाक्टर्स के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है उनको चिन्हित किया जा चुका है। २३ मार्च २०१२ को उन्होने सदन में कहा कि गुनहगारों को फारेंसिक लैब में टॆस्ट के लिये भेजा जा चुका है। अभी तक कोई भी रिपोर्ट नहीं आई है। जबकी प्रारंभिक रिपोर्ट उस वक्त तक आ चुकी थी। इसके साथ राज्यपाल रामनरेश यादवएलक्षमी कांत शर्माए राज्य मंत्री कुलस्ते जी का मेडिकल कालेजों में अनुचित दबाव भी यह बताता है कि इस घोटाले में व्यापमं के साथ.साथ भाजपा का अधिक्तम मंत्रिम्ंडल भी सहभागिता दर्ज करवा रहा है। जिससे गठित कमेटी और एसटीफ किसी सफलतम नतीजे में पहुँचने में असफल रही है। अब जब मजबूरनवश मुख्यमंत्री को सीबीआई जाँच की अनुशंसा करनी पडी है तब भी हाई कोर्ट की हिम्म्त नहीं थी कि वो इस बारे में सीबीआई को निर्देश दे सके। इस वजह से सुप्रीम कोर्ट को इसमें सीधे सीधे दखल देना पडा।
हमें यह जान लेना चाहिये कि १९४१ में गठित हुई सोशल पोलिस इस्टैबलिसमेंट के सिपाही ही आज सीबीआई के जवान माने जाते है। सीबीआई १ अप्रैल १९६३ के गढन के बाद कुछ सालों तक तो निष्पक्ष रूप से काम करती रही क्योंकि पहले यह स्वतंत्र रूप से काम कर रही थी। परन्तु आज के पर राजनीति इसकी ड्राइविंग सीट पर बैठी हुई है। गृह मंत्रालय के अधीन काम करने के साथ.साथ इसे प्रधानमंत्रीएविपक्ष के मुख्य सदस्य और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी मानना पडता है। जब तक इसे सेंट्र्ल विजिलेंस कमीशन सपोर्ट और डायरेक्ट करती थी तब तक यह कुछ हद तक सही राह में थी परन्तु आज तो इसमें कई और राजनैतिक समीकरण आकर जुड गये है। इसके टुकडे करके स्टेट पुलिस में सीआईडी की ब्रांच खोल दी गई। और राजनैतिक दबाव जिला पुलिस से सीआईडी और सीआईडी से सीबीआई पर स्थानांतरित हो गया। इसके चलते सीबीआई के जोगिंदर सिंह और बीआर लाल भी कुछ गोलमाल के चलते सीबीआई के लिये ब्लैक स्पाट साबित हुये। इतना ही नहीं सीबीआई के कई केस और उसमें सीबीआई की भूमिका को भी संदेह की श्रेणी में शामिल कर दिया गया। जिसमें इसरो स्पाई रिंग स्कैमए हवाला स्कैमएनिठारी हत्याकांडए सोहराबुद्दीन केसएभोपाल गैस कांडए२.जी घोटालाएप्रियदर्शिनी मट्टो मर्डर केश और कोलमाइन्स राइट्स एलाटमेंट केस में सीबीआई को वो सफलता नहीं मिली जो कभी  पहले इसके खाते में दर्ज थी।
अब देखना यह कि जुलाई अंतिम सप्ताह तक क्या सीबीआई कोर्ट को सही और सत्यापित रिपोर्ट सौंप सकती है। यह तो तय है कि मध्य प्रदेश में सीबीआई के लिये राह इतनी सरल नहीं है जितनी कि पहले के कई केस में रही है।यहाँ पर सरकार के कई मंत्री जाँच के घेरे में पहले से है।कई मंत्री जेल के अंदर इसी घोटाले की वजह से कैद हो चुके है।राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक जहाँ संदेहास्पद स्थिति के अंतर्गत आरहा हो वहाँ पर सही फैसला आना गरम तपते रेगिस्तान में किसी प्यासे द्वारा पीने के पानी की तलाश की तरह ही है। सबसे बडी बात यह है कि एसटीफ की जाँच के दौरान ही यदि आधा सैकडा मौतें हुई हैं तो सीबीआई जाँच के चलते क्या गारंटी है कि कोई अपराधी या संदिग्ध व्यक्ति मौत के मुँह में नहीं समा जायेगा।सीबीआई के लिये यह केस शेर के मुँह से उसका शिकार निकालने की तरह है। यदि सीबीआई इस केस को हल करने में सफल होती है और आरोपियों और जुडे राजनैतिक व्यक्तियों को सजा मिलती है तो मृतकों और धोखा खाये विद्यार्थियों के प्रति न्याय होगा। अन्यथा सीबीआई की असफलता की लिस्ट में एक नाम और जुड जायेगा। यह तो तय है कि आने वाले समय मे भाजपा सरकार के लिये यह व्यापम गले की हड्डी शाबित होगी । और आने वाले चुनाओं में इसका असर भी दिख सकता है। अब सरकार के पक्ष की बात यही है कि वो सीबीआई की मदद करके इस गुत्थी को तुरंत सुलझाये और अपनी साख जनता के बीच और मजबूत करे।सीबीआई को सेंट्रल विजिलेंस कमीशन सपोर्ट करे और सही ढंग से बिना किसी राजनैतिक दबाव में काम करने दे ताकि वो अपनी शाख को मध्य प्रदेश में और ज्यादा दृढ कर सके।



अब जाति पूछिये साधु की

अब जाति पूछिये साधु की
भाजपा सरकार ने कुछ दिनों पूर्व यह घोषणा की कि वो कांग्रेस द्वारा शुरू की गई जातीय जनगणना के आंकडे अगले साल तक प्रकाशित करेगी। आंकडों का विश्लेषण करने का समय भी उन्हें मिल जायेगा और साथ में आंकडॊं का पुष्टीकरण भी हो जायेगा। अचानक भाजपा का जातीय जनगणना को प्रकाशित करने का निर्णय गले से नहीं उतर पा रहा है। उसका बार बार खुद को राष्ट्रवादी पार्टी घोषित करने के बाद अचानक जातिवादी निर्णय लेना और उस पर इतना जल्दी अमल करना किसी राजनैतिक लाभ के चलते ज्यादा तीव्र नजर आरहा है।कांग्रेस ने जब इस जनगणना को सन २०१० में बंद कर दिया था तब उसको यह अहसास हो गया था कि इससे जातिवाद फैलने का डर है और यह उसके लिये नुकसानदेह हो सकता है। डाँ हट्टन कमेंटी में यह बात स्पष्ट की गई कि हर जनगणना के समय जाति परिवर्तन होना है इनकी कैटेगरी बदल दी जाती है और आज के समय पर भारत में जातियों का आंकडा ४५ लाख के ऊपर पहुँच चुका है।शुरुआत में कांग्रेस का यह सोचना था कि जातिगत आंकडे मिलजाने से गरीबी और अमीरी के बीच के आंकडों की खाईं को खत्म किया जा सकता है। परन्तु देर से ही सही उनकी आंख खुली और उस पर विराम लगाया गया। हम सब को ज्ञात है कि बिहार चुनाव इस समय भारत के सिर पर हैं और इस राज्य में जातिवाद का प्रभाव सबसे अधिक है।यदि भाजपा इस घोषणा के साथ बिहार चुनाव की बहती नदी में हाथ धोना चाहती है तो यह उसका तात्कालिक लाभ ही होगा। दीर्घकालिक हानि उसको बाद में भोगना पडेगा।इस घोषणा में अमल होने के बाद तो अब जनगणना वाले साधु की भी जाति पूँछने में लग जायेंगें क्योंकि उनका मकसद जातिगत लोगों की संख्या प्राप्त करना होगा।
इस प्रकार की आग का यदि हम इतिहास जाते हो इतिहास के झरोंखे से यह नजर आता है कि १८५७ में बनी हंटर रिपोर्ट के चलते बंगाल विभाजन की नींव पडी और उसको विभाजन का दंश झेलना पडा। १९४७ में भारत पाक विभाजन के लिये भी जातिगत संघर्ष और क्षेत्रवाद हाबी रहा। इस सब को बर्दास्त न करपाने के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस प्रकार की जनगणना का विरोध करके ११ जनवरी १९३१ को जनगणना बहिष्कार दिवस के रूप में गांधीवादी समर्थकों को मनाने के लिये प्रेरित किया। इस तरह के ऐतिहासिक तथ्यों के बावजूद यदि भाजपा अपने तात्कालिक लाभ के लिये जातीय जनगणना का प्रक्षेपास्त्र छोडने का विचार कर रही है तो वह सरासर गलत और स्वार्थवश है।हम सबको पता है कि जाति नाम का दंश हमारी पीठ में हमारे पुरखों के द्वारा पत्थर से कुरेद दी गई है। हम चाहकर भी इसे खत्म नहीं कर सकते है। जिस भी व्यक्ति ने इसके विरोध में जाकर निर्णय लिया वो पूरी तरह से समाज से पृथक करा दिया गया। अब सोचिये यदि सरकार ही इस तरह के निर्णय को समर्थन देगी तो देश का क्या हाल होगा। प्रख्यात समाजवादी डाण्राममनोहर लोहिया ने जात तोडो का नारा लगाते हुये अपने समाजवाद को इसके लिये झोंक दिया उनकी मृत्यु के उपरांत उन्ही के अनुयायी जातिवाद के धन्नासेठ बनकर राजनैतिक लाभ के लिये अन्य पार्टियों में आ गये। जातिगत आरक्षण वह भीख है जिसे हर आरक्षित वर्ग हंसते हंसते लाभ लेने के लिये रेवडी बांटने वाले की कतार में लग जाता है भले ही वह चाहे अमीर हो या गरीब। हर स्थान में जाति की बात की जाये तोए कोस.कोस में पानी की तरह जैसे भाषा और बोली बदलती है वैसे ही जाति भी सवर्ण और अवर्ण में बदल दी जाती है। एक ही जाति एक स्थान में आरक्षित वर्ग का लाभ लेती है और दूसरे स्थान में अनारक्षित होने का दंश झेलती है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिस वर्ग को जातियों का मलाई दार परतें कह कर संबोधित कियाएजो हर जाति के भुजबली होते है वो इस प्रकार की जनगणना का लाभ जरूर ले रहें होंगें । और यह उन लोगों का समूह है जो कि जाति का बहाना बनाकर बार बार जातीय जनगणना का राग अलापते नजर आते हैं।यदि हमें गरीबी मिटानी है तो हमें जनगणना से गरीबों के आंकडे इकट्टे करने होंगें।जिससे सभी वर्गों के गरीब आ जायेंगें। और इस प्रकार हम उन लोगों को अलग करने में भी सफल हो जायेंगें जो जातिगत नेतागिरी करने के लिये लालायित होते है। यदि सरकार का इस जनगणना के प्रति यह उद्देश्य है कि इससे जातिगत गरीबी को खत्म कर सकेंगें तो उनके लिये कई सवाल मन में आते हैं। जिसका निराकरण शायद इस फैसले से नहीं मिलता है।
जातिगत जनगणना से व्यक्तिगत पहचान कैसे सुरक्षित रहेगीघ् जातीय आंकडों से गरीबी को कैसे मिटाया जा सकता हैघ् जातीय आंकडों का समाज में शिक्षा पर क्या प्रभाव पडेगाघ् जातीय आंकडों से उत्पन्न सामाजिक विद्वेष को कैसे रोका जा सकता हैघ् जातिवादी जहर राजनीति को अल्पकालिक सफलता तक पहुँचा सकता है। परन्तु समाज और नागरिक को यह शनै शनै खोखला कर रहा है अब जरूरी है कि राष्ट्रवाद को जातिवाद में परिवर्तित करने से बचाने का प्रयास किया जाये।तभी देश की स्थिति कुछ सुधर सकेगी। हमें देश में शिक्षा और आर्थिक सुधार की ओर अग्रसर होने के लिये सोचना पडेगा ना कि जातीय और क्षेत्रीय विभाजन की रेखा खींचने के बारे में अल्पकालिक निर्णय लेने के लिये सोचना चाहिये।
अनिल अयानएसतना

यहाँ हर खंड पाखंड

यहाँ हर खंड पाखंड
यह हमारे देश की विशंगति है कि हिन्दू भक्तों की आस्था के साथ हमेशा ही धार्मिक पाखंड हुआ है और उनकी आस्था तार तार हुई है।क्योंकि आज के समय में धर्म कर्म सिर्फ बाजार का रूप ले चुका है। हर जगह दिखावा का युग है। पहले के समय में बाबा,पीर,फकीर और अन्य प्रकार के साधू संत अपने तप के दम पर लोगों को आकर्षित करते थे।आज के समय में भक्त जन अपनी आस्था के अनुरूप जब गुरुओं का चुनाव करते हैं तो वो उनका ऐश्वर्य,वैभव और उनकी मोहक छद्म छवि को मन में रखकर चुनाव की प्रक्रिया को अंजाम देते हैं।जितना विवाद आज राधे माँ पर हो रहा है उतना ही विवाद कुछ दिनों पूर्व आशाराम बापू को उनके भक्तों के द्वारा जेल में मिलने के लिये भी हुआ था।हमारा देश अंधभक्ति का देश बनता जा रहा है। राधे माँ के आधुनिकीकरण पर इतना हल्ला आखिरकार मचा क्यों हुआ है।क्यों यह जमीन फटी जा रही है और आसमान टूट रहा है। राधे माँ का रूप धारण कर नख- सिख, सज-धज कर वो महिला सरे आम लोगों को बेवकूफ ही बनाये जा रही है। तो भी लोग उसका पक्ष लेकर उसका समर्थन कर रहे हैं। जब कुछ साल पहले उसके ष्आई लव यू भक्तोंष्  की क्लिपिंग टीवी में दिखाई गई थी और विवाद हुआ था तब लोगों ने कोई खास कार्यवाही नहीं की थी।उस समय का समर्थन ही आज की इस विडंबना की जड बनी है।
समय गुजरने के साथ साथ जब तथाकथित धर्मगुरु और अहं ब्रह्मास्मि का भाव रखने वाली राधे माँ विवादों में फंसती चली गई तब मीडिया और अन्य लोग उन पर हाबी होते गये।हमे यह नहीं भूलना चाहिये कि भारत धर्म बाहुल्य देश है और इस देश मे सनातन धर्म मानने वाले हर उस तपस्वी का सम्मान हुआ है जो उस योग्य है।यहाँ पर इस परिपाटी को चलाने के लिये मठों का निर्माण किया गया है वहाँ शंकराचार्य नियुक्त किये गये हैं। उनके अपने धार्मिक नियम कायदों के अनुसार धर्मगुरुओं की पढाई होती है और उनका संस्कार होता है तब जाकर कोई अपना शिष्य बना सकता है और दीक्षा दे सकता है या ले सकता है। परन्तु विगत कई वर्षों से स्वघोषित महामंडलेश्वर और धर्मगुरु और तथाकथित गुरु मातायें, देवियाँ और साध्वियाँ सामान्य जनता को धर्म पर आस्था के नाम पर अच्छा खासा व्यवसाय चला रहे हैं। भक्तों की आस्था के साथ आधुनिक उपकरणों के माध्यम से भी आधुनिकीकरण हुआ है। और मीडिया के कई चैनल्स इसी धार्मिक बाजार की टीआरपी से अपने कर्मचारियों को वेतन भुगतान कर रहे हैं।कई अच्छे नामी गिरामी चैनल्स में इस प्रकार के भक्तिमय आयोजनों को बडे बडे धनाड्य लोगों द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के रूप में रिपीट टेलीकास्ट किया जाता है।यह सब भी कहीं ना कहीं कारण है जनता के भ्रमित होने ले पीछे।आज के समय में जनता उन युवा गुरुओं और साध्वियों को अधिक सुनना पसंद करती है जो वास्तविक विषय के अलावा उनका मनोरंजन करने का भी काम करते हैं। युवा और आकर्षक रूप रंग वाले और रूप धारण कर नख- सिख तक सज-धज कर मंच से मनमोहक भाव भंगिमाओं के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले साधू-साध्वियों को लोग अपना गुरु मान बैठते है और अंततः भक्तों का शोषण भी इसी तरह के धार्मिक व्यापारी करते हैं।राधे माँ भी इसी तरह की स्वनामधन्य व्यापारी महिला है।
आज की समस्या उसका आधुनिकीकरण युक्त रूप नहीं बल्कि उसके द्वारा भरा जाने वाला वह स्वांग है जिस पर मोहित होकर लोग उसे गोद में उठाने और धन लुटाने के लिये पागल हुये जा रहे हैं।यदि ऐसा होता रहेगा और हम अपनी आस्था को अंध भक्ति में परिवर्तित होने से नहीं रोकेंगे तो आने वाले समय में एक नहीं कई राधे माँ आयेंगी और मूर्ख अंधविश्वासी भक्त उनके जयकारे लगाकर उनके चरणों की धूलि बनने के लिये खुद को प्रस्तुत कर देगें।हम जरा गिरेबान में झाँककर देखें कि ये आम लोग अपने मीठे बात करने के अंदाज से और टीवी चैनल्स की लाइट्स के सामने सरे आम लाग लपेट कर हम सबको बरगलाते हैं और हर प्रकार के धतकरम करवाते हैं और हम सब इन लोगों को भगवान से साथ स्थान देकर  माँ,बापू,दीदी और आस्था के अन्य रिस्ते बना लेते हैं। हम यह क्यों नहीं समझते कि ये आस्था के नाम पर अपना व्यापार चला रहे हैं। लोग इस प्रकार का व्यापार करने में छिपते छिपाते हैं परन्तु इस तरह के बहरूपिये अपना चोला परिवर्तित करके डंके की चोंट पर आप सब से मंजीरे और ढोलक बजवाते हैं, और खुद उस पर धार्मिक व्यावसायिकता का नृत्य करते हर जगह नजर आते हैं। इस समाज में जब तक अंधभक्ति आस्था की प्रतिरूपात्मकता बंद नहीं होगी तब तक ये लोग जनता और समाज को सरे आम पाखंड की आग में झोंक कर, स्वयं आनंदमय जीवन जीते हुये धरती में स्वर्ग का सुख भोगते रहेंगें।आज पाखंड को खंड खंड करने की आवश्यकता है।
अनिल अयान, सतना

वैचारिक स्वतंत्रता की वर्षगांठ

वैचारिक स्वतंत्रता की वर्षगांठ
आजाद भारत के ६८वी वर्षगांठ हम मना रहे हैं। वर्तमान देश की वास्तविक स्थिति हम सब से छिपी नहीं है।आजकल समय सापेक्ष जिस स्वतंत्रता की सबसे ज्यादा विध्वंसक स्थिति बनी हुई है, वह वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। समाज में हर वर्ग में इसके मायने बदले हुये नजर आ रहे हैं। हर क्षेत्र में विचारों के आदान प्रदान और इसकी स्वच्छंदतावादी नीति असफल नजर आरही है। किसी वर्ग के लिये यह स्वतंत्रता वरदान शाबित हो रही है किसी के लिये यह अभिशाप के रूप में सामने आ रही है। इसकी वजह यह है कि उच्च और प्रतिस्पर्धी वर्ग अपने विचारों को व्यक्त करते समय अपना आप खोते नजर आते हैं। बाजारवाद और राजनैतिक लाभ इसका प्रमुख कारण है। विगत दिनों हमारा देश जिन परिस्थितियों से गुजरा वह जितना चिंता का विषय रहा उससे कहीं ज्यादा चिंता का विषय यह रहा कि तथाकथित राजनैतिक,सामाजिक,और धार्मिक सत्ताधीन लोग अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाने या मीडिया के सामने प्रस्तुत करने से पहले यह भूल गये कि वो किस बात का समर्थन कर रहे हैं और इसका भारत की वर्तमान यथास्थिति पर क्या प्रभाव पडेगा। आज के समय पर विचारों को जनता के सामने लाने से पहले लोगों के द्वारा सोचने की प्रवृति छोडी जा चुकी है।
वैचारिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे ज्यादा बेडा गर्त राजनीति में हुई है। कुर्सी पा जाने का दंभ और ना पाने का क्षोभ राजनैतिक व्यक्तित्व की मिट्टी पलीत कर देता है। राजनैतिक फायदे के लिये ये लोग देश के विरोध में कुछ भी बोल देते हैं।भाषागत जूतम पैजार देखने को अधिक मिलती है।विगत दिनों याकूब मेमन की फाँसी हो या व्यापम घोटाले। संसद में सांसदों का निष्कासन हो या बिहार चुनावों की गर्मागर्मी। राधे माँ जैसे तथाकथित महाम्ंडलेश्वर विवाद हो या फिल्म इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष का विवाद सभी में वैचारिक अभिव्यक्ति की आजादी दुरुपयोग दिखा है। जहाँ पर वैचारिक आजादी का सही असर दिखना चाहिये वहाँ विलुप्त नजर आरही है। हमारे देश के पास आंतरिक कलह की चर्चा अधिक फैल रही है। मीडिया द्वारा परोसे जा रहे समसामायिक विमर्श भी सिर्फ बहसबाजी का रूप लेकर दम टोड देते हैं। सार्थक और स्वस्थ विमर्श और चर्चा का युग जा चुका है। आज के समय में वैचारिक आजादी के मायने विचारों की लीपापोती और विचारों के माध्यम से निकले शब्दों को आक्रामक बनाकर प्रहार करने की राजनीति की जा रही है।आज हम स्वतंत्रता की ६८वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहे है और यह भी जानते है कि आज के समय में कितना जरूरी हो गया है यह समझना कि आजादी के मायने क्या है। जिस तरह के संघर्ष के चलते अंग्रेज भारत छॊड कर गये और भारत को उस समय क्या खोकर यह कीमती आजादी मिली। आज  ६७ वर्ष के ऊपर हो गया है स्वतंत्र भारत जो अपने विकसित होने की राह सुनिश्चित करने की उहापोह में संघर्ष कर रहा है। वैज्ञानिकता, व्यावसायिकता, वैश्वीकरण के नये आयाम गढ रहा है। आज के समय समाज, राज्य, राष्ट्र और अन्य विदेशी मुद्दे ऐसे है कि आज के समय में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान में पानी फिरता नजर आ रहा है।ऐसा महसूस होता है कि पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और आज अपने राजनेताओं के गुलाम हो गये हैं, और दूसरी तरफ आतंकवाद, और आंतरिक सुरक्षा के लगातार बढते मुद्दे भी कहीं ना कहीं भारत को घुन के समान खत्म करने में लगे हुये है. आज जो भी राज्य और केंद्र की कुर्सी में बैठ रहा है वह सब अपने राजनैतिक समीकरण बनाने में लगे हुये है।आज के समय में भारत का संविधान भी सुरक्षित नहीं है।इसके साथ साथ भी खिलवाड करने, बलात्कार करने से राजनेता बाज नहीं आ रहे है,आज के समय में भाषागत मुद्दे, क्षेत्र के मुद्दे ,जाति धर्म के मुद्दे इस तरह छाये हुये है कि उसके सामने देश को प्रगति और विकास के विचार विमर्श करने का मौका ही नहीं मिल पा रहा है। आज के समय मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस सब मुद्दों पर अपने प्रभावी होने का स्वांग भर रही हैं। संसद में सरकार और विपक्ष के बीच होने वाले संवाद इस बात की शत प्रतिशत पुष्टि करते हैं।आज सिर्फ भारत को भौतिक रूप से आजादी मिल गयी है परन्तु सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक,आजादी के सामने भारत आज भी पाश्चात देशों के पीछे घिघिया रहा है। 
आजादी के बाद आज के समय मे एक सर्वहारा वर्ग से पूँछे की बाबा तुम्हे आजादी के पहले और बाद में क्या अंतर दिखाई पडता है, तो चाहे किसान हो, मजदूर हो, बुजुर्ग हो, या कामगार हो वो सब यही कहेंगें कि पहले जमींनदारों, साहूकारों से, बिचैलियों से कर्जा लेकर अपना जीवनयापन करते थे, आज सरकार घर आकर जबरन कर्जा दे जाती है और फिर उम्रभर इस कर्ज की ब्याज तले हमारी स्वतंत्रता कुचली जाती है।आज के समय बौद्धिक आजादी के नाम पर लोग अन्य जातियों धर्मों को गाली देने में अपनी शान समझते है।आज लोकतंत्र में तंत्रलोक मिलता नजर आरहा है।पूरा देश अपनी आजादी के गुमान और गुरूर में इतना मादक होगया है कि उसे ना अपने अतीत के संघर्ष की फिक्र है और ना इस बात का भान है कि भविष्य में भी कोई उसे फिर किसी तरीके से अपना उपनिवेश बना सकता और वो कुछ भी नहीं कर सकता है। आज के समय में भारत के  तथाकथित पडोसी ही दुश्मन बने हुये है, और तब पर भी भारत उनसे भाई चारे की बाँह फैलाये गले लगाने के लिये आतुर नजर आता है। इतने वर्ष होने के बाद भारत आज भी वैचारिक रूप से गुलाम है। बस गुलाम बनाने वाले अपना नकाब बदल लेते है। आने वाले यह प्रयास किया जाये कि नजर लग चुकी आजादी को अपने प्रयासों के द्वारा अपने स्तर सार्वभौमिक बनाया जाए।हम सब भारत के नागरिक है वैचारिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को देश के विकास में लगायें। देश के विकास को खुद का विकास मान कर हर कार्य करें तो देश निश्चित ही स्वमेव विकास करेगा। 
अनिल अयान,सतना

शौर्यांजलि का सबक जो आज भी मौजूँ है

शौर्यांजलि का सबक जो आज भी मौजूँ है
१९६५ के भारत और पाकिस्तान के बीच हुये युद्ध मे हासिल हुई जीत के ५० वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में भारतीय सेना २३ सितंबर तक शौर्यांजलि पर्व पूरे एक महीने मनायेगी। यह सिर्फ जीत का जश्न ही सिर्फ नहीं होगा बल्कि भारत के शौर्य और पराक्रम का जश्न होगा।विगत २३ सितंबर १९६५ में ही सीजफायर हुआ था। विगत दिनों तीनों सेनाओं ने इंडिया गेट में अमर जवान ज्योति पर सलामी दी और राष्ट्रपति ने इस दौरान उस युद्ध में शामिल जवानों से मुलाकात भी की और उनके परिजनों से उनके हाल चाल लिये। यह वो युद्ध था जब भारत और पाक के बीच सीधा और उस समय के आधुनिक शस्त्रों के साथ युद्ध हुआ था यह जीत और शौर्यांजलि सिर्फ मेजर रंजीत सिंह दयाल के नेतृत्व से मिली हाजीपीर की जीत मात्र नहीं थी बल्कि यह जीत इस बात का सूचक भी थी की यदि भारत की सेना को स्वंत्रतता दे दीजाये तो पूरा पाकिस्तान भी भारत के कब्जे में आ सकता है।उस वक्त हमारी सेना को १० प्रतिशत और पाकिस्तानी सेना को १७-२० प्रतिशत तक हानि हुई थी। उस वक्त के तत्कालिक प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी का ऐतिहासिक कदम कभी कभी भारत और पाकिस्तान के बीच आश्चर्यजनक स्थिति पैदा कर देता है। जो आज भी बनी हुई है।
हम इस बात को भी नहीं नकार सकते कि यह युद्ध पाकिस्तान की स्थिति खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की तरह ही कर दिया था । इसी युद्ध का परिणाम था कि पाकिस्तान के कब्जे में आये सिंध के कई इलाके बाद में भारत को नहीं लौटाये गये।ताशकंद समझौता और १९७१ का भारत पाक युद्ध भी इसी युद्ध के बाद टकरावपूर्ण स्थिति के जनक बने। यह जश्न भारत सरकार और सेना भले ही एक महीने मनाये परन्तु यह चिंतन भी करना चाहिये कि पाकिस्तान की राजनैतिक और मनोस्थिति ५० के दशक में क्या थी और आज के दशक में क्या है। क्या पाकिस्तान ने अपने रवैये को भारत के पक्ष में एक रत्ती भर भी झुकाया है? नहीं पाक ने अपने इरादे मजबूत किये हैं उस वक्त अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-८६ सैबर विमान दिये थे जिसके दम पर वह पाकिस्तान भारत के इलाके में कब्जा किया और आज भी वो पाकिस्तान की गुपचुप तरीके से मदद कर रहा है। पहले भी अयूब खान को यह यकीन था कि यदि पाकिस्तान सेना भारत भेज दे तो जम्मू काश्मीर के लोग भारत का विद्रोह कर देगें। और आज भी एनएसए स्तर की बैठक के लिये पाकिस्तान ने दस्तावेजध्डोजियर तैयार करके हुर्रियत नेताओं को भी शामिल करने की बात करने की कोशिश कर रहा था। यह बात और है कि यह वार्ता निरस्त हो गई।
पहले विकसित देशों का दबाव भारत के तत्कालिक प्रधानमंत्री श्री शास्त्री जी के ऊपर बहुत ज्यादा था और आज भी भारत सरकार के ऊपर अन्य देशों और संगढनों का दबाव बहुत ज्यादा है। भारत की सेना का शौर्य उस वक्त इतना ज्यादा था कि वो ६ सितंबर १९६५ को लाहौर की सीमा रेखा तक पहुँच चुकी थी और यदि लौटने का आदेश ना मिलता तो हाजीपीर के बाद अगला झंडा लाहौर में ही फहराता। परन्तु सिस्टम में राजनीति उस वक्त भी हाबी हुई और आज भी हाबी हैं । राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर पर वार्ता शुरू करने का फैसला भारत ने ही इस बार फिर से पाकिस्तान के लिये लिया था।यह बहुत आश्चर्य का विषय लगा क्योंकि पिछले वर्ष अगस्त में विदेश सचिव स्तर की वार्ता के ठीक पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त ने राय मशविरे के लिये काश्मीरी अलगाववादियों को आमंत्रित किया था तो भारत ने इस बात पर उचित कदम उठाते हुये वार्ता ही रद्द कर दिया था। उस वक्त पूरे देश ने मोदी सरकार के इस निर्णय का समर्थन किया था। परन्तु जब रूस के एक शहर उफा में मोदी जी की मुलाकात पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ हुई तो पुनः वही मान मनौअल का खेल शुरू हो गया।हमें खुद सोचना चाहिये कि चाहे वो सन ६५ हो या ७१ या फिर कारगिल युद्ध हो, हर जगह ही पाकिस्तान ने अपने मंसूबे स्पष्ट कर चुका है। इधर पिछले कई महीनों से पाकिस्तान के द्वारा लगातार काश्मीर के अलग अलग क्षेत्रों में कई किलोमीटर तक घुसपैठ जारी है। इधर हाफिज सईद और जकी उर रहमान लखवी के उदाहरणों को हम नकार नहीं सकते और यह मानने से इंकार नहीं कर सकते हैं कि पाकिस्तान ही आतंकवाद का फिरकापरस्त बना बैठा है और हमारे सामने खजूर की भाँति ऐंठा हुआ है। दाउद इब्राहिम की पत्नी के पाकिस्तान में उपस्थित होने के संकेत मिल रहे हैं। गुरुदासपुर के आतंकी हमले में पाकिस्तान का बडा हाथ होना और ऊधमपुर में पकडे गये आतंकवादी नवेद का आत्मविश्वास जो लाई डिटेक्टर टेस्ट में निकल कर सामने आये वो आंख मूद कर निगले नहीं जा सकते हैं।अभी जुमा की नमाज में काश्मीर में दोबारा आईएसआईएस और आतंकवादी संगठनों के झंडे लहराये जा रहे हैं और हमारी सरकार उसे नजरंदाज कर रही है।
सबक सीखने की बारी इस बार भारत की सेना और सरकार की है इस बात को हमें अपने दिमाग में गांठ बांध लेना चाहिये। इस सीख के मायने आज भी मौजूँ हैं।हमे अपने सुरक्षा मंत्रालय को आदेश दे देना चाहिये कि पाकिस्तान सिर्फ जम्मू काश्मीर को अपना बनाने का जुनून अपने सिर में भरे हर बार वार्ता के बहाने भारत को छलता रहा है। इसबार भी वह हमें छलने वाला ही थी। पाकिस्तान के सिरफिरेपन का सामना ६५ में जिस प्रकार हमें करना पडा था उसी तरह कभी भी इस बार भी जल्द करना पडेगा। अब हमें पह्ले की तरह भूल नहीं करनी है। हमें भी अपने जुनून उसी पल के लिये जवाब हेतु बचाकर रखना होगा। ताकि इस बार लाहौर और इस्लामाबाद भारत के नक्शे में आ जायें। यही सीख भारत को इस युद्ध की शौर्यांजलि से लेना चाहिये।
अनिल अयान सतना



संघम शरणं गच्छामि

संघम शरणं गच्छामि
सम्राट आशोक के सामने महात्मा बुद्ध ने जिन तीन मूल वाक्यों का जिक्र किया वो बुद्धं शरणं गच्छामि,धम्मं शरणं गच्छामि,और संघम शरणं गच्छामि। विगत दिनों मध्यांचल भवन में संपन्न हुई तीन दिवसीय चिंतन बैठक में यही मूल वाक्य के भाजपा द्वारा सुप्रयोग को दिखाया गया है। महात्मा बुद्ध ने सम्राट आशोक से यह कहा कि जब कोई मार्ग ना दिखे तो संघ की शरण में जाओ। रास्ता जरूर प्राप्त होगा। विगत तीनों दिनों में भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश मंत्री इस चिंतन बैठक में शामिल हुये, तथाकथित रूप से यह भी प्रकाश में आया कि मंत्रियों ने केंद्र सरकार का सन २०१३ से अब तक का लेखा जोखा संघ के सामने रख कर चिंतन बैठक में चिंतन करते हुये आने वाली समस्याओं की चिंताओं को खत्म करने का रास्ता प्राप्त किया है। यह रास्ता आने वाले समय में सरकार को अच्छे दिन प्राप्त करने में मदद करेगा। एक कम अनुभवी व्यक्ति को जिसतरह अधिक अनुभवी व्यक्ति से बैठक कर चिंतन जरूर करना चाहिये ताकि उसकी स्थिति में सुधार हो सके वही काम तो भाजपा संघ की शरण में जाकर कर रही है। यह काम तो भाजपा सरकार बनाने के पहले भी करती थी।
इस बात में कोई भी गुरेज नहीं है कि जब सरकार दो साल से सत्ता में बैठी है और  इसका परिणाम जनता के सामने आ चुका है। दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम जनता के सामने था,बिहार विधान सभा चुनाव खेल जारी है। इस बीच अच्छे दिन,भूमि अधिग्रहण बिल,वन रैंक और वन पैंशन,कालाधन वापसी के वायदे की पोल जनता के सामने धीरे धीरे आ रही है। विदेशों से भारत के रिस्ते जमीनी तौर पर कितने मजबूत हुये और कितने फाइलों में कैद होकर रह गये यह भी शास्वत रूप से जनता के सामने आ गये हैं। काम जारी समय चाहिये यह सूत्र सरकार का मूल मंत्र बन चुका है। इन सब परिस्थितियों के चलतें सरकार कितनी कालजयी होगी यह चिंतन संघ के साथ आवश्यक था। विगत तीन दिनों में केंद्र के अधिक्तर मंत्री मध्यांचल भवन पहुँचे और अपना प्रस्तुतीकरण देकर राय या मसविरा लिये। अन्य राजनैतिक दलों के नजरिये से देखें तो भले ही यह बैठक कई नये विमर्श खडे करती हो परन्तु भाजपा के नजरिये से यह अतिआवश्यक भी है। क्योंकि हम सबको पता है कि जनसंघ,भाजपा,और संघीय संगठनात्मक ढांचे की रूपरेखा और प्रस्तावना क्या है। भाजपा पहले से संघीय विचारधारा की पोषक थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। यह बात और है कि वह इस समय केंद्र की सत्ता में विराजमान है।सन दो हजार तेरह में श्री नरेंद्र मोदी को केंद्र तक पहुँचाने में संघीय व्यवस्था जिम्मेवार रही है। श्री नितिन गडकरी और श्री राम माधव जी संघ के प्रतिष्ठित स्वयंसेवक रहें हैं। जो आज भाजपा की सरकार में आज प्रमुख पदों में हैं।
परन्तु संवैधानिक नजरिये से देखें तो जब यूपीए की सरकार थी तो भाजपाइयों द्वारा यह कहा जाता रहा है कि फैसले मनमोहन सिंह नहीं वरन श्री मती सोनिया गांधी जी करती हैं या आदेश देती हैं। क्या यही घटनाक्रम इस बैठक के बाद नहीं हमारे सामने आ रही है। कि भाजपा पर संघीय प्रणाली हाबी है जो उसके काम करने के ढंग पर भी दिखती है। मंत्रियों को कार्ययोजना में चिंतन करने के लिये क्या प्रधानमंत्री जैसे प्रमुख संवैधानिक व्यक्ति की क्षमता में संदेह है जो इस चिंतन बैठक में राह तलाश रहे हैं। जो बार बार यह बयान दिये गये कि चिंतन बैठक परामर्श चल रहा था। जो भाजपा सरकार बनाने के पहले भी किया करती थी। तो शायद मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के पास इतना संवैधानिक अधिकार है कि वो किसी संगठन को अपने कार्यालय में परामर्श के लिये बुला सकता है वस्तुतः इस काम के लिये संघ की ड्योरी जाने की इजाजत संविधान कितना देता है। इस बैठक में राममंदिर,और  विहिप प्रमुख श्री प्रवीण तोगडिया जी के लेख जो आर्गनाइजर में प्रकाशित हुआ था उस पर भी काफी चर्चा हुई। जिसमें वो ये कहते हैं कि हिंदू को बच्चे पैदा कर हिंदुओं की संख्या में इजाफा करना चाहिये,और मुसल्मानों को दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर बुनियादी सुविधाओं से बेदखल कर देना चाहिये।यह लेख राजनीति में नई बहस शुरू कर दिया है। हमारे प्रधानमंत्री जी बार बार यही कहते हैं कि उनका सपना सबका विकास हो,तब भी इस तरह के घटनाक्रम में वो मौन क्यों हो जाते हैं। क्या बिहार के चुनावों के चलते वो भूमि अधिग्रहण बिल में यू टर्न लेने का फैसला संघीय परामर्श के आधार पर लिये हैं। ये कुछ सवालात हैं जो भाजपा और संघ के रिस्तों को पुनःसरकार बनने के दो सालों के बाद बहस के मुद्दे के रूप में सामने लाते हैं। 
यदि ये रिस्ते जन्म जन्मांतर के हैं तो संघ का बार बार यह कहना कि हम राजनैतिक संगठन नहीं है वरन सांस्कृतिक संगठन हैं हमारा काम हमारी विरासत को बचाना है कहाँ तक जायज हैं जब वो भाजपा के रिमोर्ट कंट्रोल के रूप में काम कर रहा है। संभवतः जनता को मान लेना चाहिये कि अब भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र ना होकर हिंदू बाहुल्य राष्ट्र के रूप में आने वाले भविष्य में जाना जायेगा। यदि संघीय विचार धारा का प्रभाव सरकार में तथाकथित रूप से दबाव के रूप में काम कर रहा है तो संविधान के नियमों और अधिकारों को ताक में रखकर जनता के सामने आभासी विकास दिखाने की आवश्यकता क्यों पड रही है। क्या यह सब सत्ता को हथियाने का आडंबर है। इस प्रकार की बैठकें सरकार को सिर्फ और सिर्फ कठपुतली बनाने का प्रभावी प्रयास ही तो हैं। सरकार को तटस्थ होकर जनता के पक्ष में स्वयंमेव निर्णय लेने की आजादी संगठनात्मक रूप से होनी चाहिये अथवा संघ को चाहिये कि भाजपा को यह रास्ता दिखाये जिसमें वायदों को पूरा करने का तरीका भी  शामिल हो, उद्देश्यों की पूर्ति अपनी जगह है और सरकार के दायित्व अपनी जगह अन्यथा इस पंचवर्षीय के पश्चात कोई ना कोई सरकार तो रहेगी जनता के पास बदलाव लाने का दूसरा विकल्प भी निर्णायक होगा।

अनिल अयान 
सतना.९४७९४११४०७   

नेपथ्य में बिलखती हिंदी

नेपथ्य में बिलखती हिंदी
आज हिंदी दिवस है। अभी अभी मध्य प्रदेश की राजधानी विश्व हिंदी दिवस मनाकर फुरसत की सांस ले रहा है। भोपाल नाम का नगर दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन को अपने नाम करने के लिये इतिहास में अमर हो गया। भारत में यह दो बारा हिंदी का महाकुंभ आयोजित किया गया। सन उन्नीस सौ पचहत्तर से आज तक का समय कुल चालीस वर्षों का है परन्तु इस सदी जनक छंलाग से हिंदी के मायने बदल दिये हैं। राजभाषा पखवाडा मनाते हमें कितने दशक हो गये परन्तु यह निश्चित नहीं हो पाया कि हिंदी को राष्ट्र भाषागत स्थान कब प्राप्त होगा। जिस राजभाषा पखवाडे की गूँज हर वर्ष सितंबर के दो सप्ताहों में शासकीय संस्थानों में दिखाई देता है वो कितना सफल होता है वो आयोजक खुद जानते हैं।यह भारत का दुर्भाग्य है कि तथाकथित इंटरनेट के माध्यम से हिंदी को विश्व की चैथी बहुतायत भाषा का स्थान दिया गया किंतु वह खुद भारत में अपने कुछ हिंदी भाषी राज्यों के दम पर अंतिम सांसे गिनती नजर आती है। भारत में जितनी भी भाषायें आज अपना आधिपत्य जमायें हुये हैं उनमें से हिंदी की स्थिति नेपथ्य में पर्दे के पीछे खडी उस नायिका की तरह है जो मंच में अपने अभिनय के आने की प्रतीक्षा में हर क्षण भारी महसूस करते हुये बिलखती है।
विगत दस से बारह सितंबर को विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें हिंदी के महारथी विश्व भर से शामिल हुये। मै यह महसूस करता रहा कि विदेश मंत्रालय और भारत सरकार के इस संयुक्त आयोजन में हिंदी बोलने वालों को प्राथमिकता दी गयी या हिंदी भाषा के साहित्य सृजन करने वाले साहित्यकारों को स्थान मिला क्योंकि दोनो ही खेमें इस आयोजन से खिन्न नजर आये और अपना विरोध कई माध्यमों तक सम्मेलन तक पहुँचाया गया। इन तीन दिनों के सम्मेलन में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिये कसीदे पढे गये। परन्तु हिंदी के भाषा विज्ञान,हिंदी की वर्तमान आवश्यकता,हिंदी की दशा और भविश्य गत दिशा,आदि पर कोई चर्चा या विमर्श नहीं हुआ। हिंदी साहित्य की चर्चा भी सिर्फ नाम मात्र की करके पुरुस्कारों का वितरण किया गया।हम जिस बहुभाषावाद के सिकंजे में फंसते जा रहे हैं उससे यही परिणाम निकलेगा कि मूल हिंदी के शब्द बिलखते नजर आयेगें और अन्य भाषाओं जैसे फारसी, उर्दू,अरबी, के मिश्रण से हिंदी अपने में ही गुम हो जायेगी। आज के परिवेष में भले ही हम  इस बात के लिये दंभ भरते हों कि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं वरन बाजारवाद का पर्याय बन चुकी है तो उन्हे मै इस बात से अवगत कराना चाहता हूँ कि हिंदी आज के समय में अपनी राजभाषा की अस्मिता बचाने में असफल हैं। आज के समय में अधिक्तर राजकाज हिंदी की बजाय हिंदी और अंग्रेजी में हो रहा है। राजस्व और न्यायालय की भाषा आम जन से कोसों दूर नजर आती है। और उच्च शिक्षा,बाजार,तकनीकि तक में हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण हिंगलिश पर्याप्त सुख भोग रही है।
कितना हास्यास्पद लगता है कि भोपाल में जहाँ हिंदी भाषा का प्रचुर भंडार है,विदेश और भारत के कुछ गिने चुने आदमकद तथाकथित तीन दिवसीय भ्रमण करके चले जाते हैं और भारत को राष्ट्रभाषा का हक दिलाने के लिये प्रधानमंत्रीजी के सामने किसी के मुंह से एक वाक्य तक नहीं निकलता है।हिंदी दिवस तो ऐसा लगता है कि हिंदी भाषा की सालाना बरसी का दिवस बन गया है। आप यकीन नहीं करेंगें कि हिंदी के लम्बरदारों द्वारा किये गये धतकरमों के परिणामस्वरूप हिंदी की तुलना में हिंदी की सहायक बोलियाँ अधिक फलफूल रही हैं जिसमें भोजपुरी,अवधी,हरियाणवी,मैथिली,और बुंदेली प्रमुख हैं। हिंदी को अपनो से और अन्य भाषाओं से ही संघर्ष करना पड रहा है।समाज की यह स्थिति है कि हिंदी माध्यम के विद्यालयों को छोड अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को शिक्षा दिलाने की होड लगी हुई है।क्यों ना लगे ये होड क्योंकि आज के समाज में हिंदी की थाली में खाने वाले ही हिंदी के विरोध में गुट बनाकर अपना अहम सहला रहे हैं।हिंदी से जुडे संस्थान हिंदी की बपौती की विरासत को बेंच कर विदेश में हिंदी को वैश्विक भाषा और संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक हक दिलाने की बात तो सीना ठोक कर करते हैं परन्तु अपने ही देश में हिंदी,हिंदी भाषा,हिंदी भाषी राज्यों,और अन्य भाषायी राज्यों में हिंदी भाषी लोगों की स्थितियों को सुधारने के समय दुल्हन की तरह चूडियाँ पहन कर मेंहदी सजालेते हैं।हिंदी साहित्य भी वाम और दक्षिण पंथ में बंट कर बंगाल के विभाजन की तरह अपना अपना राग अलाप रहे हैं। ऐसी स्थिति में हिंदी का बिलखना प्रलाप में बदल जायेगा। विश्व हिंदी सम्मेलन यदि भारत में भाषागत संवैधानिक परिवर्तन हेतु कुछ परिणाम प्रधान मंत्री जी के सामने रखता तो यह अपनी सार्थकता की ओर एक कदम और बढ जाता।
हिंदी को यदि वास्तविक स्थान दिलाना है तो हिंदी के सिंहासन में बैठे हिंदी की तंदूर में अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकना बंद करना होगा। सर्वप्रथम हिंदी को भारत में सम्मानजनक स्थान और राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिये राजनैतिक और संवैधानिक पहल करनी होगी।इस हेतु अन्य राज्यों का भी समर्थन जरूरी होगा।।जब हिंदी को अन्य भाषी राज्यों में भी उतना ही स्नेह मिलेगा जितना कि गिनती के हिंदी भाषी राज्यों में मिल रहा है तभी कुछ बेहतर हो सकता है। अन्यताः यह पखवाडा पितृ पक्ष के पंद्रह दिनों की तरह हर वर्ष मनाया जाता रहेगा और संबंधित संस्थान,विभाग,विश्वविद्यालय और हिंदी के चाटुकार सेवक लाभान्वित होते रहेंगें।अंग्रेजी हिंदी का अपहरण कर अपना लबादा उसे पहनाती रहेगी और हम बाजार में खडे होकर अपनी सहूलियत के लिये हिंगलिश को ससम्मान से अपनाते रहेंगें।हिंदी का बिलखना कब विलाप और उसके अंतिम सांसों की डोर बन जायेगा हम पहचान नहीं पायेंगें।
अनिल अयान,सतना
संपर्कः९४७९४११४०७