शनिवार, 2 अप्रैल 2016

वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी

वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी
अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आज देश की राजनीति नया मोड ले चुकी है।पूरा मीडिया और राजनीतिक दलों का गुट अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वामपंथ के नजरिये में इसके मूल्यांकन के तले विरोधी सुर सुनाई देने लगे है। जे एन यू से राष्ट्रद्रोह के बोलों का रूपांतरण राष्ट्रवाद के पूछ पकड कर पूरे देश में अपने पैर पसार रहा है। सभी विषय विशेषज्ञ इस पर अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे है। जब सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का रवैया अपनाती है तो अनुच्छेद ३५६ के तहत राष्ट्रपति शासन की मांग करने बैठ जाती है। कभी देश के शीर्ष के राजनेता और पत्रकार वामपंथ के शिकार होकर भावावेश में गर्व से खुद को राष्ट्रद्रोही मानने से कोई गुरेज नहीं करते है। सियासत के चलते कभी जातीय आरक्षण की आग राजस्थान के अंदर गुर्जर विरोध में तो कभी गुजरात के अंदर जाट विरोध के रूप में अभिव्यक्ति की आजादी को तथाकथित उपयोग  व दुरुपयोग करते नजर आते है। यह सब अभिव्यक्ति की आजादी की विभिन्न रंगीनियां हम सबके सामने आती है।
      अभिव्यक्ति की आजादी के चलते सीमा पर बहुत समय से मदेशियों के आंदोलन को सही ठहराया जाता है और नेपाल प्रभावित होता है।आज के समय पर देश सुलग रहा है जाट आंदोलन की आग में गुजरात से फैली यह आग देश के कई कोनों मे अपनी लपटें बिखेर चुकी है। देश की सरकार को आज भी इसकी चिंता कम और जे एन यू विवाद में अपनी गर्दन फंसाने से फुर्सत नहीं मिल पा रही है। आरक्षण भी अभिव्यक्ति की आजादी से उपजी अवसरवादिता का परिणाम ही तो है। जातीय समीकरण के चलते हर जाति के लोग अपने आप को इस छत्रछाया के तले सुरक्षित करना चाहता है। देखिये जनाब यह तो तय बात है कि हमारे पूर्वजों ने जातियों को हमारी पीठ में हमेंशा के लिये गोदवा दी है। पीढी दर पीढी हम अपनी जाति की मुर्दा लाश को अपने जीवन भर रोते मरते ढोते हैं। राजनीति में   हर राजनैतिक दल का यही प्रयास होता है कि उसको फायदा देने वाली जातियों को वो आरक्षित करे और वोट बैंक में अपने खाते के धन को बढाये। पूर्व की यूपीए सरकार ने कुछ ऐसे ही कर्म को अपने समय में पूर्ण करने की कोशिश की थी परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज कर दिया था। अब खच्चर सरकार जाटों के चक्कर में बहुत बुरी तरह से फंस गई है। कभी तो यह भी देखा गया है कि कुछ राज्यों में राजपूत और ब्राह्मणों को भी आरक्षण की छत्रछाया देने की चिंगारी भडकाने की पहल कर करने में दल लगे हुये हैं। वसुंधरा राजे सरकार पिछले साल कुछ इसी तरह गुर्जर आंदोलन या कट्टर आरक्षण के पक्ष में अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर उपजे तमाशे में फंसी थी। संविधान में आरक्षण और उसकी बारीकियों को पहले से स्पष्ट कर दिया गया है। तब भी इन लोगों को अपनी अभिव्यकित को व्यक्ति करने से फुर्सत हो तब तो कुछ परिणाम तक पहुंचा जाये।
      जे एन यू में अभिव्यक्ति की आजादी के सुर इस तरह बिगड गये हैं कि इसकी राह पर देश के अन्य विश्वविद्यालय भी इसकी राह पकड लिये हैं।जे एन यू में भगवा रंग अपने रंग में रंगने के पीछे युद्ध स्तर पर पड गया है। और कांग्रेसियों को यह बात गले नहीं उतर रही है। जूतम पैजार की वह स्थिति बनी हुई है कि न्यूज चैनल्स चर्चा के नाम पर अच्छी खासी टीआरपी बटॊरने में सफल हो रही है। केंद्र की राजनीति नहीं चाहती की यह मामला सुलझे इस लिये रोज नया प्रोपेगेंडा मीडिया तैयार करके दिन भर जनता को परोसती है।अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वामटापू के बीच तूतू मैमै की फैंटेसी लिखी जा रही है। उधर दिल्ली में जल संकट भी किसी दल अभिव्यक्ति की आजादी का एक रूप ही है।कोर्ट को अपने निर्णय तक पहुंचने तक नहीं दिया जा रहा है। बाहर ही बाहर काग्रेस और भाजपा के नुमांइदे आपस में कटे मरे जा रहे हैं। एक दूसरे पर शब्दों के शस्त्र चलाये जा रहे है,उससे से भी यदि पेट नहीं भर रहा तो एक दूसरे पर मारा पीटी का कारनामा कर रहे हैं। इस समय एक विशेष माहोल बना हुआ है कि यदि देश में अपने आप को हाईलाइट करना है तो भाजपा पर बयान बाजी करो और कांग्रेस के समर्थन में बात करो नहीं तो केजरीवाल सरकार के खिलाफ चुटकी लो,, ‘कभी कभी भाजपा विरोधी रुख भी अपना लो,बस फिर क्या मीडिया आपको ढूंढेगी और अपने चैनल की चर्चा का हिस्सा बनाकर आपको वैचारिक वमन करने का भरपूर अवसर देगी। इस तरह आप अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को बाजारवाद के दरवाजे में न्योछावर कर सकते हैं और बुद्धिजीवी बनकर मजे लूट सकते है। राजनीति का यह दस्तूर बन चुका है कि जब आप विपक्ष में हो तों आरक्षण,लेफ्ट राइट,और टांग खिंचाई को हवा दीजिये और सरकार का ढोल बजाइये जनता को उग्र बनाइये। और जब आप सरकार में पहुंचिये तो इनकी उग्रता का दुष्परिणाम भोगिये और अपना माथा ठोकिये। तब विपक्ष वाले आपकी टांग खींचेगें। यही तारतम्य चलता रहेगा और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बाजारवाद और समाजशास्त्र फलता फूलता रहेगा।अभिव्यक्ति की आजादी अब आम और बुद्धिजीवी वर्ग के अलावा नेताओं के घर में ज्यादा फल फूल रही है। पर हमेशा से ही आम जनता कहती थी,कहती है और भविष्य में भी कहती रहेगी वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


बच्चे बन रहे हैं कलमघिस्सू

बच्चे बन रहे हैं कलमघिस्सू ( मैकाले)
मार्च के पहले सप्ताह से सभी विद्यालयीन बच्चों की बोर्ड परीक्षायें प्रारंभ होने वाली हैं। बच्चे रटन्तविद्या का उपयोग परीक्षा करके की कापियां भरने के लिये तैयार है। यह हमारी परंपरा रही है कि हमारे शिक्षा के परमात्मा और अंग्रेजों के भारत में अंतिम वंशज लार्ड मैकाले ने जो क्लर्क बनाने के लिये शिक्षा की पालिसी छॊड गये थे वो आज भी हमारे द्वारा उपयोग की जा रही है। हमने कभी भी बदलाव करने की नहीं सोची। क्योंकि हमने हमेशा से ही पका पकाया हजम करने की आदत डाल रखी है। बच्चे साल भर एक बने बनाये पाठ्यक्रम के सांचे में अपने आप को ढालते हैं और बने बनाये फ्रेम की परीक्षाओं में प्रश्नपत्र हल करके अच्छे से अच्छे नंबर प्राप्त करके अपना रिजल्ट बनाते है।वो कभी भी किताबी ज्ञान के बाहर से अनुभव लेने की नहीं सोचते हैं और ना ही उन्हे फुरसर है। शिक्षा विभाग ही परीक्षायें करवाता है और विद्यालयीन शिक्षा में बच्चे अव्वल आते हैं। परन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि यही विभाग आगामी नौकरी के लिये भी दोबारा परीक्षायें करवाता है नौकरी दिलवाने के लिये भी। अब सोचने की बात यह है कि यदि शिक्षा विभाग एक बार परीक्षा करवाकर बच्चों का मूल्यांकन करवाता है तो दो बारा परीक्षा करवाने की आवश्यकता क्यों होती है। सभी जब परीक्षाओं में सफल हैं तो नौकरी पाने के लिये दोबारा परीक्षा करवाने का क्या औचित्य है। इसका जवाब किसी ने आज तक खोजने की कोशिश नहीं की।
      लार्ड मैकाले ने अपने शासन काल के दौरान भारतीयों को शिक्षित करने की कवायद इसलिये की ताकि वो अंग्रेजी शासन में अग्रेजी अधिकारियों के अधीनस्थ प्रशिक्षित होकर कार्य कर सकें और उनके सामने सिर उठाने के काबिल ना हो सकें। मैकाले ने उस समय लोगो कों सिर्फ कलम घिसने वाला क्लर्क ही बनाने की पहल की। आज भी हम यही काम कर रहे हैं। आज भी बच्चे उसी फ्रेम में परीक्षायें देकर वेल ट्रेंड (बहुप्रशिक्षित) बन रहे हैं। परन्तु दंश यह है कि हम उन्हें वेल एडूकेटेड अर्थात शिक्षित बनाने का दुःस्वप्न देख रहे है। हमारे बच्चे शिक्षा को याद करके जीवन में उतारना चाहते है। परन्तु क्या रटने से हम किसी विषय या बिंदु को आत्मसात कर सकते हैं? शायद नहीं क्योंकि समझने की प्रक्रिया याद करने की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न है। आज के समय में शिक्षा पालिसी जितना दोषी है उतना ही दोषी आज के अभिभावक हैं आज के समय में अभिभावक भी रिजल्ट ओरियेंटेड हो चुके हैं उन्हें बच्चों के नालेज ओरियेंटेड होने से कोई सरोकार नहीं है। वो रिजल्ट खुलने के दिन अपने बच्चे का नाम मैरिट लिस्ट  में सबसे ऊपर देखना चाहते है। वो चाहते हैं कि हमारा बच्चा १०० प्रतिशत रिजल्ट लेकर आये भले ही वो परीक्षा के बाद वो उस रटे रटाये उत्तरों को भूल जाये। इस उद्देश्य के लिये बच्चों पर अनावश्यक दबाव होता है। ये दबाव विद्यालय, शिक्षक, समाज से अधिक अभिभावको का अधिक होता है। वो समाज  में अपने स्तर को ऊँचा उठाने के लिये बच्चे के परीक्षा परिणाम को स्टेटस सिंबल बना कर देखते हैं। बोर्ड परीक्षाओं में यह सबसे ज्यादा देखा गया है। जो बच्चे के भविष्य के हिसाब से कदापि सही नहीं होता है। इस दबाव के चलते बच्चों को आत्महत्या तक करनी पड़ जाती है। हमें बच्चों को यह समझाना होगा कि रिजल्ट कैरियर के लिये एक अहम पहलू हो सकता है परन्तु वह इतना भी अहम नही है जितना की ज्ञान। इसलिये बच्चों को रिजल्ट के साथ साथ ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिये ताकि वो अपने ज्ञान के दम पर जीवन यापन कर सके। परीक्षाओं के दौरान एक मानसिक बीमारी एग्जाम फियर को भी हम नकार नहीं सकते हैं।
      हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि बच्चा यदि ज्ञानवान है और उसका रिजल्ट कुछ कम भी है तो वो अपने ज्ञान के दम पर अच्छे मुकाम तक पहुंच सकता है। हमारा ज्ञान हमारी सफलता को हमारा पीछा करने के लिये मजबूर कर देती है। नौकरी में दो प्रकार से लोग सेवाए देते हैं। एक जुगाड से (सोर्स से) और दूसरा ज्ञान से (रिसोर्स से) पहले किस्म के लोगों को हमेशा जुगाड की आवश्यकता होती है और दूसरे किस्म के लोगों को हमेशा अवसर खुद बखुद मिल जाते हैं। इसलिये रिसोर्स की तरफ बच्चों को जाना चाहिये। लार्ड मैकाले के फ्रेम से निकल भारतीय शिक्षा दर्शन की तरफ भी शिक्षा विभाग को जाना चाहिये जिसमें गांधी की बुनियादी शिक्षा और स्वामी विवेकानंद की मानव निर्माण की शिक्षा अपने में विशेश स्थान रखती है। शिक्षा विभाग को चाहिये कि वो शिक्षा पालिशी को बदले और परीक्षा प्रणाली को भी समय की मांग के अनुसार परिवर्तित करे ताकि बच्चे वेल एडूकेटेड होकर समाज में जायें ना कि वे ट्रेंड होकर। हम उन्हें नौकर ना बनायें एक अच्छा व्यवसायी बनायें। सरकार की शिक्षा नीतियों से सरोकार रखने वाले एनसीईआरटी,एनसीटीई,सीबीएसई,आईसीएसई,माध्यमिक शिक्षा मंडल जैसे राज्य के बोर्डों से उम्मीद की जाती है कि इस तरह की परीक्षा प्रणाली में नवाचार शामिल करके बच्चों को कलम घिस्सू बनाने से देश को बचायें। पुरानी परंपरागत शिक्षा व्यवस्था को पोस्टमार्टम करके नवीनीकृत रूप में ढालने की आवश्यकता है। बच्चों का मूल्यांकन परीक्षा नामक हौआ से नहीं बल्कि लगातार रूप से सर्वांगीण होना चाहिये। हमें ध्यान रखना चाहिये कि हम अभिभावक यदि अपने बच्चे को यह समझाये कि जीवन है तो परीक्षा है सफलता और असफलता सिर्फ पडाव है और इसके अलावा कुछ नहीं तो बच्चों की इस अनावश्यक दबाव वाली आत्म हत्यायें जरूर घटेंगीं।
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

कर्जदारों के स्टेटस सिंबल

कर्जदारों के स्टेटस सिंबल
हमारा देश इस वक्त हाई प्रोफाइल बैंकिंग कर्जदारों से जूझ रहा है.देश की अर्थव्यवस्था चाह करके भी इन लक्ष्मी पुत्रो से उबर नहीं पा रहा है.अभी हमारे माननीय विजय माल्य देश के बैंकरों के कर्ज को लेकर विदेश में ऐशो आराम कर रहे हैं.देश चाहकर भी इन कर्जदारों का बाल भी बांका नहीं कर पा रहा है.४०० करोड के ऊपर के कर्ज को चाहकर भी न चुकाने की बात करने वाले भारत के ऐसे कर्जदार अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से टोड मरोड कर रख दिया है. यदि हम इन कर्जदारों की बात करे तो समझ में आता है कि देश की सरकार और प्रशासन इनके सामने खुद को मजबूर और निम्न स्तर का मानकर मौन धारण कर लेता है.बैंकरों की नीतियां भी इस तरह की परिस्थितियों के चलते प्रश्नों के घेरे में आजाती हैं. सोचने वाली बात है कि इस प्रकार दोहरी नीति से भारत के नागरिकों और आम जन का जमा धन किस दिशा में जा रहा है.एक आम इंशान को यदि बैंक से कर्ज लेने का विचार आता है तो उसे उस कर्ज को बैंक से लेने के वास्ते बैंक मैनेजर के आफिस के इतने चक्कर काटने पडते हैं कि वो कर्ज की उम्मीद खो बैठता है. यदि धोखे ब धोखे उसे कर्ज मिल गया और समय पर उसकी किस्त नहीं अदा कर पाये तो उसकी जमीन जायजाद सब कुर्की कर लिया जाता है.वो सरकारी अमले के सामने गोहार लगाता रह जाता है तब भी कोई सुनवाई नहीं होती है. परन्तु यहां पर स्थिति कुछ और ही है. विजय माल्या जैसे उद्योगपति सिर्फ अकेले नहीं है इसके पूर्व भी उनके जैसे भारत में बहुत से उद्योगपति खुद दीवालिया दिखाकर रुपयों के गद्दों में रातें काटते हैं. सरकार की नजर में ये दीवालिया और असहाय बने रहते हैं.परन्तु आंतरिक रूप से ये लक्ष्मी के वरद पुत्र के रूप में सुख सुविधाओं को भोग रहे होते हैं.
      किंगफिशर जैसे उद्योगों की पूंजी से भी असंतोष होने पर जब कर्ज के लिये बैंकर्स के दरवाजे खटखटाये जाते हैं उस समय बैंक किस उदारवादिता का परिचय प्रदान करता है.क्या कर्ज की राशि और उसकी कुर्की की आवश्यकता बैंक को नहीं होती है.और जब ये बाहर जाकर विदेश के ऐशो आराम भोगते हैं तो भारत की सरकार विजय माल्या जैसे पूंजी पतियों को कैसे लुक आउट नोटिस तक समेट कर मामला रफा दफा कर देती है.हमें इस बात को संज्ञान में लेना होगा कि पूंजीपतियों का यह मंसूबा होता है कि सरकारी खजाने का प्रयोग करके अपना व्यापार खडा करें  और घाटा दिखाकर सरकार और जनता का पैसा हजम कर लिया जाये. सोचने वाली बात यह है कि बैंक की नीतियां क्या कर्ज कर्जदारों का स्टेटस सिंबल देखकर देती है और वसूली में उनका रुतबा और शोहरत की देखा सिखी काम होता है.आम कर्ज लेने वालों को कोई रियायत क्यों नहीं है जो समय पर अपनी हर किस्त देता है और उसे कर्ज के लिये इतना चक्कर क्यों लगाना पडता है.हमारे देश में जब चुनाव होते हैं तो इस प्रकार के पूंजीपतियों को कैसे संसद में जाने की अनुमति और जनमत मिलता है यह भी सोचने का मुद्दा है. मीडिया और राजनैतिक पार्टियों में इनका रुतबा तो इतना है कि आज ट्वीटर में इनके मिजाज ये बताते हैं कि मीडिया और राजनैतिक पार्टियां किस तरह इनकी आर्थिक गुलाम हैं. सीबीआई और न्यायालय को ये लोग ढेंगा दिखाकर देश को यह बता रहे हैं कि आज के समय में अर्थव्यवस्था और विकास सब इनकी झोली में सुरक्षित है.जब चाहे विजय माल्या जैसे लोग अपनी झोली के दम पर नियम कायदों को अपने जूतों के नीचे रौंद सकते हैं
      ४०० करोड का कर्ज क्या भारत के आईडीबीआई बैंक और अन्य बैंकरों को वापिस कैसे मिलेगा.यह जवाब किसी के पास नहीं है.यहां तक की सरकार के पास भी नहीं.भविष्य में देश में ऐसी घटनायें ना हो इस लिये आवश्यक है कि सरकार के साथ रिजर्व बैंक की  आर्थिक लोन नीतियों को हर वर्ग के लोगों के लिये समान होनी चाहिये.विजय माल्य जैसे कर्जदारों की नाक में नकेल कसने के लिये न्यायालय,सीबीआई और अर्थव्यवस्था से जुडे हुये हर जिम्मेवार ब्यूरोक्रेट्स को इनके दबदबे से बाहर निकल कर काम करना जरूरी है.सरकार का सरोकार यह भी है कि पूंजीपतियों को उनकी पूंजी के अनुरूप कर्ज दिया जाये तो नियमित समयावधि के अनुसार वापिस भी लिया जाये अन्यथा कठोर कार्यवाही की जाये.सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि कर्जदारों को यदि अपने स्टेटस सिंबल के अनुसार ओहदा और रुतबा प्रदान किया जायेगा तो घर-घर,शहर-शहर,ऐसे उद्योगपति तैयार होंगें और जिस थाली में खायेंगें उसी में छेद करके विदेश का ऐशो आराम भोगेगें .जनता का पैसा इसी तरह बैंक के हाथों से निकल कर इधर उधर फिरता रहेगा.ये लोग सरे आम संसद में अपना हक जताते रहेंगें और संसद की गरिमा अमीर लक्ष्मीपुत्रों के स्टेट्स सिंबल के चलते शर्मसार होती रहेगी.हम सिर्फ ढोल पीटते रहेंगें.जो हमारी नियति है और विधान भी है.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

बचत पर सरकारी डांका

बचत पर सरकारी डांका
अच्छे दिन का स्वांग भरने वाली सरकार अब आम जन की बचत पर घातक वार कर चुकी है. अच्छे दिन का रामराज्य कितने दिन तक आम जन ने भोगा है यह तो जनता नहीं जानती है परन्तु यह तो वह समझ गई है कि अब उनकी बचत की थैली में सरकार ने डांका डाल कर बैंको के लाकर्स में में जप्त कर ली गई है. सरकार ने जिस तरह भविष्य निधि को निकालने की उम्र ५८ साल करने का निर्णय लिया और मार्च गुजरते गुजरते वो डाकघरों की प्रमुख योजनाओं की ब्याज दरों में अच्छी खासी और भारी भरकम कटौती करके आम जन और सर्वहारा वर्ग की कमर तोडने का काम भी बखूबी पूरा कर लिया है. अच्छे दिन की झलक और बचत में बुरे दिनों के अढैया और सारे साती की नजर बाजारवाद के सहारे जरूर आम जन को दिखने लगी है. सरकार को आज के समय में बैंको से सरोकार सबसे ज्यादा है. जहां पर एक तरफ सरकार स्विस बैंकों में जमा काला धन ला नहीं पाई और सिर्फ ढकोसलों से ही काम चलता रहा  वहीं दूसरी ओर देश का सफेद धन उद्योग पतियों की काली नजर से काला होकर जरूर विदेश में ऐश करने के लिये सदुपयोग किया जा रहा है.यह सब देश की सत्ता और सरकार को उद्योग पतियों के घर की तिजोडियों के अंदर वैचारिक रूप से  गिरवी होने का अप्रत्यक्ष संकेत ही तो है. हम सबको पता है कि आम जन वोटबैंक बनाने के काम में आता है जबकी उद्योगपति चुनाव के समय में राजनैतिक पार्टियों की आर्थिक रीढ की हड्डी को मजबूत करने का महत्वपूर्ण दायित्व हर वर्ष ही निभाते हैं.
      सरकार ने रिजर्व बैंक की अनुसंशा में जिस तरह से एक दो नहीं बल्कि डाकघर की सभी ११ योजनाओं की ब्याज दरों में थोक के भाव छटनी और कटौती किया वह आम जन की समझ के परे है.  भले ही सरकार तीन महीने में ब्याज दरों की जितनी भी समीक्षा कर ले परन्तु यह तो तय है कि आम जन अपनी छोटी छोटी बचत से जो थोडा बहुत भविष्य के लिये जमा करके रखता है उसमें भी सरकार ज्यादा कुछ लाभ देने के पक्ष में नहीं है. हां सरकार बैंको के द्वारा मिलने वाले लोन और विभिन्न प्रकार की योजनाओं में भारी भरकम छूट का मन बनाये हुये है. मासिक आय योजना से लेकर वरिष्ठ नागरिक बचत योजना सहित १२ योजनाओं की ब्याज दरें जिस तरह १.३-१.५ प्रतिशत कम कर दी गई है. उसके चलते एक अप्रैल से आम जन को बाजार के भाव अपनी बचत योजनाओं को गिरवी रखना पडेगा. सरकार यह बिल्कुल भी नहीं चाहती कि आम जन अपने पैसे से कोई भी विकास का काम, या समाज में स्तर सुधारने की पहल कर सके. वो चाहती है कि हर व्यक्ति घर बनवाने से लेकर बच्चे की पढाई तक के लिये सरकार के द्वारा बैको के माध्यम से कर्ज ले. और उम्र भर बैंको की किस्त और ईएमआई भरता रहे.सरकार हर इंसान को बैंको की जटिल प्रणाली के कब्जे में रखना चाहती है.सरकार चाहे जिस भी पार्टी की हो परन्तु कुछ प्रश्न इस प्रकार के निर्णयों से जरूर जेहन में घूमते हैं. कि यदि नौकरी पेशा व्यक्ति पीएफ ५८ साल तक निकाल नहीं पायेगा. इन योजनाओं से उसे खास कर लाभ नहीं होगा तो कर्ज में वो कब तक खुद को स्वतंत्र महसूस करेगा. इस फैसले से फायदा किस सेक्टर को सबसे अधिक और सबसे ज्यादा नुकसान किसे है. क्या बैंक सरकार के सरकारी दामाद हैं जिनको इस दायरे से कोसों दूर रखा गया है.और सबसे बडा सवाल तो यही है कि सरकार इस तरह की कटौती आम जन की बचत की थैली में ही क्यों की है.     
      रिजर्व बैंक पिछले साल से चार बार रैपो रेट कम कर चुका है. बैंक उधर अपनी कर्ज की ब्याज दरों में कमी करना नहीं चाहते हैं. सरकार भी इस सब कटौतियों से सारा धन बैंक के पास भेजने के लिये भूल भुलैया तैयार कर रही है. जिसमें फंस कर आम इंसान अपनी अंतिम सांस लेने के लिये विवश होगा.सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि आज भी भारत देश में पोस्ट आफिस की सुविधाओं का लाभ लेने वाला जनता का बडा भाग मौजूद है. जो अपनी बचत के कुछ लाभ के लिये इस प्रकार की योजनाओं में फुटकर किस्तों से पैसा लगाकर भविष्य को सुखी बनाने का सपना उम्र भर बुनता रहता है. इस पूरे मुद्दे में सरकार ने जनता को मजबूर किया है कि वो बैंक के पास जाकर कर्ज ले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करें और उम्र भर कर्ज की किस्त अपनी तनख्वाह से कटाते हुये स्वर्गवासी हो जाये. वो पोस्ट आफिसों की सुविधाओं से दूर होकर बाजारवाद के विकास के लिये देश के बैंको को अपनी कमाई का अधिक्तर रकम सुपुर्द करें.क्या बैंक अपनी ब्याज दरों को कर्ज के अनुसार इस निर्णय के बाद कम करेंगें.यह प्रश्न अब भी बरकरार है. इस पर ना सरकार कुछ बोल रही है. और ना ही रिजर्व बैंक अपनी चुप्पी तोडने का मूड बना रहा है. सरकार भले ही इस निर्णय के लिये जितना खोखला दावा कर ले  कि बचत की ब्याज दर घटाने से पूरी अर्थव्यवथा की ब्याजदरें अपने आप नीचे आयेंगी.और बैक आम जन के सहयोगी के रूप में काम करेंगें.यह तो वही बात हुई कि कब तेली की तीस मन तेल होगा और कब राधिका नाचेगी.भविष्य निधि पर आम नौकरी पेशा वाले कर्मचारियों पर मार और अब उनकी बचत के रुपयों पर मिलने वाली सरकारी ब्याजदरों की कटौती दोहरे तरीके से रोटी कपडा मकान और जीवन शैली को बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित करेगी. अब सरकार को सोचना है कि क्या वो अर्थव्यवस्था के शेख चिल्ली के सपनों वाले फायदे के लिये आम जनता और नौकरी पेशे के कर्मचारियों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाकर बाजार में नीलाम करेगी. या सफेद धन को वापिस भारत में लाकर बैंको की प्यास को बुझाकर जनता को कुछ चैन की सांस और राहत मुहैया करने के लिये पहल करेगी.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

शिक्षा का अधिकार, हुआ बडा लाचार

शिक्षा का अधिकार, हुआ बडा लाचार
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ के सभी विद्यालयों में शिक्षा के अधिकार योजना के लिये बहुत से नियम कानून बनाये गये है.बहुत सी कार्ययोजना बन कर तैयार हुई है.परन्तु इन कार्ययोजनाओं का सुखद परिणाम नहीं प्राप्त हो सके है.कागजी तौर पर भले ही इसकी भरपाई की जा सकी हो परन्तु जमीनी हकीकत बहुत ही शर्मनाक है.शिक्षा के सिपेहसलार भले ही इसके संदर्भ में एक दूसरे को दोषी बनाते रहे, लेकिन दाल पूरी की पूरी काली ही नजर आ रही है.इसका फायदा गैरसरकारी विद्यालय भर पूर उठा रहे है.
शिक्षा संहिता के अनुसार शिक्षा का अधिकार हर बच्चे को प्राप्त है जिसमें प्राथमिक और पूर्वमाध्यमिक शिक्षा तक सब को समुचित शिक्षा का प्रावधान है.यह प्रावधान सिर्फ शासकीय विद्यालयों में ही बस नहीं लागू होता है वरन अशासकीय विद्यालयो पर भी बखूबी लागू होता है.भारत सरकार के सिटीजन चार्टर के अंतर्गत  सीबीएसई और आईसीएसई काउंसिल की नियमावली में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी गई है कि भारत में रहने वाले हर बच्चे को किसी भी माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार होता है.और कोई भी संस्था किसी जाति धर्म,अर्थ और समाजिक स्तर को कारक मानकर किसी बच्चे को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती है.इसका अर्थ यह हुआ कि हर संस्था को यह शैक्षिक दायित्व निर्वहन करना ही पडेगा जिसके अंतर्गत वह किसी भी बच्चे को उसके अभिवावक की गरीबी रेखा,वार्षिक आय आदि कारको की वजह से प्रवेश देने से रोक नहीं सकती है.परन्तु इतने वर्षों के बाद भी इस आरटीई का क्या हाल है वह हम सबसे छिपा नहीं है.हर रोज किसी ना जिले या कस्बे के गैरसरकारी विद्यालयों की स्थिति और इस नियम के उल्लंघन के समाचार सुनने को मिलते है.
मध्यप्रदेश में 40 विद्यालय इंडियन काउंसिल आफ सेकेण्डरी एजूकेशन से मान्यताप्राप्त है.और सेंट्रल काउंसिल आफ सेकेण्डरी एजूकेशन से बहुत से विद्यालय संचालित है.माध्यमिक शिक्षा मंडल से भी विद्यालय संचालित होते है. शासकीय और अशासकीय विद्यालयों का अनुपात देखा जाये तो 60-40 का अनुपात आज बना हुआ है.बहुत से पैरेंट्स अपने बच्चों को अशासकीय विद्यालयों मे दाखिला दिलवाना चाहते है.प्रबंधन के पास दाखिला ना देने केलिये बहुत से बहाने होते है.शिक्षा के अधिकार को या तो बहुत से पैरेंट्स जानते नहीं है, और यदि जानते है तो उनकी प्रक्रिया को देख कर लगने वाले समय से बचने के लिये मजबूरी में कोई कदम नहीं उठा पाते है.
शिक्षा के अधिकार के लिये नियुक्त संकुल और ब्लाक के शिक्षा विभागीय अधिकारी जब तक इस काम के लिये समय निकाल पाते है तब तक इन विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया पूरी हो चुकी होती है.क्योंकि सीबीएसई और आईसीएसई के विद्यालयों में प्रवेशप्रक्रिया अप्रैल में ही पूरी कर ली जाती है.उसके लिये भी इतनी सारी फार्मेलटीज होती है कि उसे पूरा करने में ही पैरेंट्स असुविधा महसूस करते है.शिक्षा का अधिकार क्या माध्यमिक शिक्षा मंडल के द्वारा संचालित विद्यालयों के लिये होता  है.अन्य मान्यता प्राप्त विद्यालयों के लिये इस योजना कोई महत्व नहीं है.इसका जवाब किसी के पास नहीं है.कई बार तो वार्षिक आय,माता पिता की शिक्षा,सामाजिक स्तर को प्रमुख कारण बनाकर इन विद्यालयों में पैरेंट्स को इस अधिकार के तहत खाली हाथ ही वापस लौटना पडता है.दोगला चेहरा रखने वाला यह अधिकार वास्तव में उन विद्यार्थियो को मदद नहीं कर ही नहीं पाता जिनकी समस्या को दूर करने के लिये बनाया गया था.माध्यमिक शिक्षा मंडल के द्वार संचालित विद्यालयों की स्थिति यह है कि यदि इन विद्यालयों में प्रवेश मिल भी गया तो अगले सत्र का कोई ठिकाना नहीं होता कि उसे नियमित रखा जायेगा कि नहीं क्योंकि फीस की राशि दे पाना बच्चों के पैरेंट्स के बस की बात नहीं हो पाती है.
एक प्रश्न अभी भी जरूरत मंदो के दिमाग में गूँजता है कि क्या यह अधिकार सिर्फ शासकीय विद्यालयों तक सीमित होचुका है.या इसका इसी तरह दोहन गैरसरकारी विद्यालय करते रहेंगें.और इस तरह के दोहन के लिये शिक्षा विभाग के बेबस नियम कानून से बंधे अधिकारी और कर्मचारी वर्ग है,या मान्यता प्राप्त बोर्ड के नियम कानूनों की आड में जरूरत मंदो की आँखों में धूल झोंकने वाले ये विभिन्न अशासकीय विद्यालयों के प्रबंधन अधिकारी.शासन को जब कभी कुंभकर्णी नींद से जागने की फुरसत मिलती है तब इस अधिकार की विवेचना,और पर्यवेक्षण समितियाँ बनती है.बैठकें होती है.आदेश निकाले जाते है और वह भी इस अधिकार की तरह फाइलॊं में कैद होकर रह जाते है.कब इस तरह के अधिकार मासूम बेबस बच्चॊं तक पहुँचेंगें .कब वो स्वस्थ माहौल में शिक्षा प्राप्त कर पायेंगें यह कोई नहीं जान पाया है.आज इस चर्चा करने की आवश्यकता से कहीं ज्यादा अशासकीय विद्यालयों के प्रबंधन में शासन की पकड को मजबूत बनाने की आवश्यकता है.तभी परिणाम लाभकारी बन पायेगा
अनिल अयान.

भारत बनाम इंडिया के बीच बेबस स्वतंत्रता

भारत बनाम इंडिया के बीच बेबस स्वतंत्रता
मैने यह नहीं देखा कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने किस तरह अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त कराया.अंग्रेजों का शासन काल कैसा था.किस तरह अत्याचार होता था.परन्तु इतनी उम्र पार होने के बाद जब मैने विनायक दामोदर सावरकर की १८५७ का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम  पुस्तक को पढा तो अहसास हुआ कि उस समय की मनो वैज्ञानिक दैहिक पीडा क्या रही होगी.क्यो और कैसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज हुआ.अपने पूर्वजों से कहते सुना कि सतना रियासत का भी इस समर में बहुत बडा योगदान था.उसके बाद सतना के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार श्री चिंतामणि मिश्र की पुस्तक सतना जिला का १८५७ हाथ में आई और उसे पढ कर जाना कि आजादी प्राप्त करने के लिये लोहे के चने चबाने पडे थे.आज हम आजाद मुल्क में सांस ले रहे है.जम्हूरियत और गणतंत्र की बात करते है.धर्म निरपेक्ष होने का स्वांग रच कर अपनी वास्तविकता से मुह चुरा रहे है.आजादी ६५ वर्श पूरा होने को है परन्तु क्या हम आजाद है? और जिन्हें यह अहसास होता है कि वो आजाद है वो अपनी आजादी को क्या इस तरह उपयोग कर पाया है कि किसी दूसरे की आजादी में खलल ना पडे.शायद नहीं ना हम आजाद है और ना ही हम अपने अधिकारों के सामने किसी और की आजादी और अधिकार दिखते है.आज भारत बनाम इंडिया के वैचारिक कुरुक्षेत्र की जमीन तैयार हो चुकी है.आजादी के दीवानो ने भारत के इसतरह के विभाजन को सोचा भी ना रहा होगा.इसी के बीच हमारी आजादी फंसी हुई है. दोनो विचारधाराओं के बीच हर पर यह स्वतंत्रता पिस रही है.
स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने यह कभी सपने में भी ना सोचा होगा कि आने वाले समय में उन्हें आतंक वादी की तरह पाठ्यक्रमों में बच्चों के सामने लाया जायेगा.वो भी इस लिये क्योकि सरकार वामपंथ और दक्षिण पंथी रवैया अपनाये हुये है.जो सरकार आती है वह अपने पंथ के सेनानियों को शहीद और अन्य को आतंकवादी के रूप में पाठ्यक्रम में सुमार कर देती है.उस समय बिना किसी स्वार्थ के बलिदान देने वाले सच्चे सपूतों को आज स्वार्थपरिता के तले गुटने टेकने पड रहे है. आज लाल बहादुर शास्त्री जी का जय जवान जय किसान का नारा बेमानी हो चुका है.बापू का भारत के कृषि प्रधान होने का सपना मिट्टी में मिल चुका है. आज ना किसान की जय है और ना ही जवान की जय है.किसान आज भुखमरी,लाचारी और बेबसी से आत्महत्या करने के लिये मजबूर है.पहले के समय में लगान ना देने में जमीदार लोग किसानों को पेडों से लटकाकर कोडे मरवाते थे.पुलिस के जवान उन्हे जूते की मार देते थे.आज के समय में यदि कर ना दिया जाये तो पटवारी और राजस्व विभाग उनकी जमीन की जप्ती कर लेते है.किसान क्रेडिट कार्ड सिर्फ छलावा है.यदि पटवारियों और सरपंचों को घूस ना दी जाय तो किसानी का मुआवजा भी नहीं मिल पाता है.शास्त्री जी का किसान,और बापू के कृषि प्रधान देश में कृषि और कृषक ही आत्महत्या करने के लिये बेबस है.
जवानों की स्थिति यह है कि युवा वर्ग आज अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त है.कैरियर में शार्टकट रवैया उन्हें मंजिलों से ज्यादा दूर कर दिया है.युवा जवान वर्ग अपने रोजगार के लिये भटक रहे है.प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये सरकार के द्वारा की गई मनमानी के जवाब में अहिंसात्मक आंदोलन ,धरना प्रदर्शन करने में व्यस्त है.समाज में उनके लिये ना कोई सकारात्मक स्थान है और ना ही समर्थन है.सुरक्षा के जवानों की यह स्थिति है कि आजादी इतने वर्षों के बाद भी उनको ना सुविधाये मुहैया कराई गई और तो और उनके शस्त्रों में भी धांधलेबाजी और घोटाले किये गये.जिन दुश्मन देशो से वो भारत को बचाने के लिये हर मौसम में सीमा में डटे रहे,आतंकवादियों और घुसबैठियों को भारत की सीमा के नजदीक ना आने दिया.हमारे देश के रहनुमा उन्ही देशो के साथ मित्रता का संबंध बनाने के लिये योजनाये बनाते रहे राजनैयिक सलाहकार आतंकवादियों से मिलकर उन्ही की भाषा में बात करने लगे.
आजादी के इतने सालों के बाद स्त्री सुरक्षा और सशक्तीकरण का स्वांग भरने वाला भारतीय गणतंत्र राष्ट्र, गनतंत्र की व्यवस्था को पालन करने में लग गया.जिसकी लाठी उसी की भैंस की कहावत का पालन होने लगा.जब गणतंत्र, गनतंत्र में परिवर्तित हुआ तो उसमें दिल्ली,उ.प्र.और बिहार,सबसे आगे निकल गये.बंदूखों की नोक में अत्याचार होने लगे,अस्मिता लूटे जाने लगी,हमारा देश विकास की होड में इतना आगे निकल गया कि,मूल्यों के लिये जगह ही नहीं बची,आजाद भारत की यही परिकल्पना हमारे पूर्वजों ने देखी रही होगी,धर्मनिरपेक्षता का यह हाल है कि लोग धर्म को अपनी स्वार्थ की रोटियाँ सेकने और हवस मिटाने का स्थान बना लिया.कोई धर्म के नाम को कैश करने लगा और कोई धर्म की आड लेकर राजनीति के अखाडे में दाँव आजमाने लगा.धरम के नाम पर दंगो और अराजकता की आग ने अमन,शांति सुख,चैन,सब को जला कर खाक कर दिया. यहा पर  स्वतंत्रता का अधिकार किसी को मिला तो इतना मिला कि वो इतना अमीर होता चला गया और इतना अमीर होगया जिसके दम पर वो सरकार को झुकाने लगा.और दूसरे की स्वतंत्रता पर डांका डालने लगा.वैचारिक स्वतंत्रता और भाषा गत आजादी का इस्तेमाल सबसे ज्यादा वोट बैंक के लिये राजनेताओं के द्वारा किया गया..वाक युद्ध में तो मर्यादा तार तार होती रही.
इस आजाद मुल्क के शुरुआती दिनों में भारत के राजनेता भी ईमानदार,लोकतंत्र और गणतंत्र की परंपरा का निर्वहन करने वाले हुआ करते थे.समाज में धर्म निरपेक्षता और आजादी का जश्न हर गली मोहल्ले में देखा जा सकता था.पंद्रह अगस्त को छुट्टी की तरह राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाता था.आज बाजारवाद और वैश्वीकरण ने इस राष्ट्रीय त्योहार को निगल लिया है.आज के समय पर पंद्रह अगस्त छुट्टी का दिन अधिक और आजादी की वर्षगांठ कम नजर आता है.आज हर जगह सब अपने अपने में व्यस्त है.देश के बारे में जागरुकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के ८० प्रतिशत युवाओ और बच्चों को अभी यह नहीं पता की देश का राष्ट्रगान और राष्ट्र गीत क्या है राष्ट्र चिन्हों की कोई जानकारी ही नहीं है.इनसबके लिये जितना सरकार दोषी है उतना हम सब भी गुनहगार है.यदि हम आने वाली पीढी को समुचित जानकारी नहीं प्रदान करेंगें तो वह भारत में तो रहेगी परन्तु भारत के बारे में जानेगी कुछ भी नही.स्वतंत्रता दिवस मनाना , स्वतंत्रता की रक्षा के लिये वचन बद्ध होना,और स्वतंत्रता की कीमत को समझकर उसकी रक्षा करना तीनो में बहुत ही बडा अंतर है.आजादी के इस जश्न को आज व्यापक बनाने की आवश्यकता है ताकि इसकी याद और गूँज आने वाली पीढी के जहन में लंबे समय तक बनी रहे.

अनिल अयान ,सतना

लव-जेहाद, हकीकत या फसाद ?

लव-जेहाद, हकीकत या फसाद ?

भारत में इस वक्त सबसे ज्यादा खतरा, हमारी बहनों और बेटियों के जीवन में लगातार नजर गडाये संकट की आँधी से है.आतंक के जेहाद का रिस्तों के माध्यम से जीवन में प्रवेश करते ही उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और अन्य राज्यों में हाहाकार मच गया.कभी कभी मै सोचता हूँ जब इस चक्रव्यूह में महिला खिलाडी जैसी जागरुक लडकी फंस गई तो अन्य मासूम लडकियों का क्या होगा. हमारे देश की विडंबना है कि हमारे यहाँ ख्वाहिशों से खिलवाड करके अधिक्तर महिलायें शिकार हो जाती है.कभी यह सुनने को नहीं मिला कि किसी लडके ने किसी मुस्लिम लडकी को हिंदू धर्म में सम्मिलित करने के लिये उस पर जोर जबरजस्ती किया हो.यह काम अधिक्तर ईसाई और मुस्लिम संप्रदाय से अधिक्तर सुनने को मिला है.इसकी वजह चाहे हिंदू धर्म की अतिउदारवादिता हो या अन्य धर्मों की अति सक्रियता हो.
प्रेम में जेहाद की कल्पना नहीं की जा सकती है.क्योंकी प्रेम जिस्मानी हो सकता है या रूहानी हो सकता है.और जेहाद में प्रेम नहीं हो सकता है.जेहाद का मूल अर्थ है जगदोजहद अपने अस्तित्व के लिये जगदोजहद करना.परन्तु आतंक के साथ इसके अर्थ बदल गये है.जेहाद का अर्थ बदल कर आतंक का भय हर धर्म के अनुयायियों में पैदा कर देना. भारत में हिंदुओं के मन में मुस्लिम धर्म हेतु समर्पण पैदा करने के लिये डराना धमकाना और प्रताडित करके मजबूर कर देना.अलकायदा और हिजबुल मुजाहिद्दीन के जारी किये गये वीडियो में यही उद्देश्य की पूर्ति करने के लिये भारत में आतंकी संगढन की स्थापना करने की बात की गयी है.प्रेम को जेहाद के साथ जोडने के मायने प्रेम का अपमान है.भारत में इश्क जेहाद का असर जितना दिखा है.उसमें दोषी कौन है यह सोचने का विषय है.यदि हम उस महिला खिलाडी की बात करें जो इश्क जेहाद में अपने जीवन के सारे सपनो को खत्म कर लिया,उसके यदि विवाह प्रसंग को गौर करें तो समझ में आयेगा कि उसने रंजीत नाम के तथाकथित हिंदू युवक से महज एक सप्ताह के अंदर विवाह वंधन में बंध गई.यह कैसा विवाह है जिसमे एक चट मंगनी पट ब्याह से भी ज्यादा जल्दबाजी की गई.मुझे लगता है कि जितना गल्ती उस तथा कथित रंजीत नाम के युवक की है.उतनी ही गल्ती उस महिला खिलाडी की भी है.क्योंकी विवाह जैसे संस्कार जान पहचान वाले परिवार के साथ किये जाते है.
यदि इस तरह का जेहाद आतंकवाद का एक और जिंदा मानव हथियार है तो यह भारत के लिये आने वाले समय में बहुत बडा खतरा है.इसके बारे में भारत की सरकार को यथोचित निर्णय लेना होगा.परन्तु इस मामले को सियासी रंग देना बहुत गलत है.क्योंकि चैनल वालों ने पीडिताओं के जीवन के बारे में जिस तरह कार्यक्रम बना कर लाईव टेलीकास्ट किया उससे यह तो साफ है कि धर्म परिवर्तन करवाने के लिये किया जाने वाला कृत्य धार्मिक और सामाजिक रूप से बहुत बडा गुनाह है.इस तरह की सर्रियत ना तो कुर’आन में लिखी हुई है और ना ही अन्य धर्म ग्रंथों में.लेकिन इस संदर्भ के जितने भी केस सामने आये है उसमें लडकी वालों के परिवार के तरफ से कोई भी बयान नहीं आये.ऐसा क्यों हुआ.इसका जवाब इस लडकियों के पास भी नहीं था.जब भी हम अपने माता पिता के निर्णयों के विरोध में आकर कदम उठाते है तो इसका परिणाम यही निकलता है. इस पूरे मामले में महिला आयोग के किसी भी अधिकारी या सदस्य का कोई बयान क्यों नहीं आया.क्या वो इस मामले से अनभिग्य थी.संसद मे महिला सांसदों और मंत्रियों की तरफ से कोई  बयान नहीं आया.ऐसा लगा कि इस प्रकार के विवाह में धोखा खाई इन महिलाओं की जल्दबाजी को सब लोगों ने बखूबी  समझ लिया हो. लेकिन मीडिया और सियासत जिस तरह इस मुद्दे को सियासी रंग दिया जा रहा है और इस अपराध के लिये पूरे मुस्लिम धर्म को कटघरे में खडा किया जा रहा है वह गलत है.क्योंकि कोई धर्म जेहाद की ट्रेनिंग नहीं देता है.लवजेहाद के जितने भी पहलू निकल कर सामने आये है उसमें एक बात तो साफ है कि विवाह करके जेहाद के मकसद को पूरा करने से हम तभी रोक सकते है जब हम अपने परिवार में पारिवारिक संस्कार विकसित करेंगें बेटे-बेटियों को भी यह बात समझना होगा कि संस्कारों को पूर्णकरने में परिवार पूर्ण सहमति लेनी ही चाहिये.सरकार को चाहिये कि इस प्रकार के अपराधों को रोकने के लिये कडाई से नियम और कानून बनाये जाये और जल्द से जल्द निर्णय हो,धर्म के धर्म गुरुओं को चाहिये कि एक दूसरे पे छीटाकसी करने की बजाय अपने धर्म की परिधि को पार ना करने की सलाह दे और आतंक के खिलाफ मिलकर जंग लडें.मिल जुल कर जंग लडेंगें तो लव जेहाद जैसे आतंकवाद के नये नये शस्त्र भी हमारे साहस के सामने घुटने टेक लेंगें.हमें हर हालत में अपनी युवा पीढी को जागरुक बनाना पडेगा.

अनिल अयान.सतना.

राजभाषा पखवाडा बना कमाई का अखाडा

राजभाषा पखवाडा बना कमाई का अखाडा
विगत दिनों राजभाषा पखवाडा का आयोजन किया गया. एक सितम्बर से १४ सितम्बर तक की गतिविधियाँ हिंदी के लिये समर्पित रही.राजकाज की भाषा के विकास और उत्थान के कसीदे सीमा से परे हो कर पढे गये.हिंदी के सेवक हिंदी की सेवा करते दिखे.अन्य लहजे में कहें तो गाहे बगाहे हिंदी से अपनी सेवा करवाने वाले इस पखवाडे में हीं सिर्फ हिंदी की दिखावटी सेवा कर मेवा पाने का प्रयास हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी करके कल ही फुरसत हुये.यदि हम परिणाम की बात करेंगें तो यह भी बेमानी होगा.
संविधान सभा में जब हिंदी की स्थिति को लेकर जब दो दिवसीय चर्चा का आयोजन १२ सितम्बर १९४९ से १४ सितम्बर १९४९ तक हुआ तब भी तत्कालिक राष्ट्रपति स्व.डा राजेन्द्र प्रसाद, ने अंग्रेजी में ही अपना उद्बोधन दिया.प्रधान मंत्री स्व.जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजी की पैरवी ज्यादा की थी.तब से लेकर आज तक भाषा संबंधी अनुच्छेदों राजभाषा अनुच्छेद ३ ग और १४ क में तीन सौ से अधिक बार संशोधन किया गया जो आज के समय में भाग १७ के रूप में संविधान में उपस्थित है.संवैधानिक स्थिति के अनुसार तब से आज तक भारत की राजभाषा हिंदी है और अंग्रेजी सह भाषा है.तब से लेकर आज तक संविधान सभा की अनुशंसा में इस १४ दिन राजभाषा पखवाडे के रूप में मनाये जाने लगे.उस वक्त डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देवनागरी लिपि को भारत की राष्ट्रीय लिपि बनाने की भी अनुशंसा की थी परन्तु उस बात को आज भी दबा कर खत्म कर दिया गया.
एक वह दिन था और एक आज का दिन, राज भाषा पखवाडा का चलन जगत में चलने लगा .हर छोटी बडी संस्था राजभाषा के प्रचार प्रसार के साथ राष्ट्रभाषा के रूप में स्थान दिलाने के लिये हर वर्ष एक नाटक का मंचन करते है.परन्तु परिणाम सिफर होता है.प्रायोगिक रूप से देखे.कि हिंदी हमारी रोजमर्रा की भाषा रही है.परन्तु आज के समय में भागदौड और बाजारवाद के अवसरो के दरमियान यह भी हिंदी और इंगलिश का मिश्रित रूप हो गई है.जिसे आज के समय हिंगलिश के रूप में जाना जाने लगा है.जो आज भी चलन में है.विशुद्ध हिंदी या यह कहें की तत्सम और तद्भव शब्दों से बनी हिंदी से कार्य और ज्यादा दुरूह् हो रहे है.अधिक्तर हिंदी माध्यम विद्यालय अंग्रेजी माध्यम मे बदल गये है.यहाँ तक आगामी पीढी को अंग्रेज बनाने की कवायद हम नर्शरी से शुरू कर देते है.आज के समय में अंग्रेजी ना बाँच पाने और बोल पाने वाला व्यक्ति अनपढ और गंवार समझा जाने लगा है.सिविल सर्विसेस परीक्षा का बखेडा अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है.ऐसी स्थित में राष्ट्र भाषा तक पहुँचने की कवायद बेमानी सी नजर आती है.आज के समय में अधिक्तर राजकीय काम अंग्रेजी से होता है.ऐसा लगता है कि हिंदी पहले कभी भाषा की माकान मालिक थी आज तो वह अंग्रेजी के फ्लैट में किराये से रहने को मजबूर हो चुकी है.
राजभाषा के पखवाडे में जितने लोग और विद्वान दिखने वाले लोग माइक के सामने हिंदी को ऊपर उठाने की बात करते है वो ही सही मायनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा न बनाये जाने के पैरोकार है.क्योंकी यदि हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो गई तो उनकी अच्छी खासी आमदनी वाली दुकान में ताला लगा समझिये.कहने को आज के समय में हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा,और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति जैसी कई संस्थायें है जिनको शासन और सरकार ने हिंदी के विकास के लिये बहुत सी जिम्मेवारी सौपी है.परन्तु यहाँ भी रेवडियाँ ही बाँटी जा रही है.अपने अपने दफ्तरों में बैठ कर इनके अधिकारी सरकारी दामाद बने बैठे है  अधिक्तर योजनायें और खर्च करने के लिये सरकार के द्वारा दिये जाने वाला फंड लैप्स हो जाता है और गाहे बगाहे सितम्बर माह मे हिंदी के कसीदे पढने के लिये समाज और देश भर में निकलते है.
क्या इसी तरह से हिंदी का विकास होगा.आज जरूरत है कि यह प्रयास हो कि इस तरह की संस्थाओ के अस्तित्व को समाप्त कर संयुक्त आयोग गठित करने की. जमीनी स्तर पर प्रयास किया जाये.जागरुकता अभियान चलाये जाये. शिक्षा विभाग उच्च शिक्षा विभाग का सहयोग बच्चों और युवाओं में हिंदी के प्रति रूझान बढाने में मदद करे.अन्य राज्यों में भी हिंदी भाषियों को स्थान और सम्मान मिलने के साथ साथ रोजगार मिले.वरना हिंदी का अस्तित्व खतरे में आन पडा है कुछ राज्यों को छोड कर हिंदी के बोलने वाले वख्ता कम होते जा रहे है.अन्य भाषी राज्य हिंदी को अपने राज्य के लिये कलंक समझते है.हमें अपने मन के भ्रम को टॊड कर वास्तविकता की जमीन मे कदम बढाना होगा और हिंदी को पहले धरातल मे घर घर की बोली बनानी होगी.राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिये अन्य भाषा भाषी राज्यों को अपने पक्ष में करना होगा.अभी फिल हाल यह प्रयास होना चाहिये कि हर दिवस हिंदी दिवस हो.

अनिल अयान.सतना.

क्या भारत दिखायेगा, चाइना को आइना

क्या भारत दिखायेगा, चाइना को आइना
विगत दिनों चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी को उनके जन्म दिन का तोह्फा प्रदान किया .वह निवेश और  गुजरात को गुआंगडोंग को सिस्टर प्रोविंस राज्य के रूप में सहमति के रूप मे रहा.निवेश के नाम पर भारत को ६-७ लाख करोड का मसौदा भारत के पक्ष में रहा.भारत में चाइना की औपचारिक प्रतिनिधि मंडल सदस्यों की यात्रा का लाभ सबसे अधिक गुजरात को मिला.जिसमे बरोडरा के के करीब ४०० एकड जमीन पर बनेगा जिसमे चाइना के द्वारा किये गये करार के अनुसार भारत मे वह निवेश करेगा.सबसे अधिक समय जिनपिंग ने भारत के प्रधान मंत्री मोदी को दिया और जाते जाते चाइना की जमीन में भी कदम रखने के लिये आमंत्रित करके गये.इस यात्रा से भारत की राजनीति भी पुनः एक बार गर्मा गई.इस यात्रा से भारत को कितना लाभ हो गा इस का प्रभाव तो आने वाला समय बतायेगा.जो भी परन्तु भारत के हर नागरिक को इस मुलाकात के परिणाम का इंतजार है.
वहीं दूसरी तरफ लेह लद्दाख में फ्लैग मीटिंग मे भारत और चाइना के  सैन्य अधिकारियों की बैठक राष्ट्रपति की मुलाकात की सफलता को धता बता कर बेनतीजा खत्म कर दिये भारत की मनाही और रोक-टोक के बाद भी चाइना अपने सैनिकों और घुसबैठियों को पीछे करने के फिराक में नजर नहीं आया.चाइना मे इस बार तो भारत के हिंद महासागर से आने वाले जलमार्ग को भी अपने देश का हिस्सा बताने में लगा हुआ है.भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो को उतनी जानकारी नहीं है जितनी की चाइना के द्वारा भारत की सरजमीन और सैनिकों की जानकारी रखी जाती है.चाइना ने भारत की सीमा रेखा में आने वाले भूभाग को चाइना अपना बता रहा है और ना जाने कितने वर्ग किलोमीटर का इलाका भारत से छीन कर चाइना अपने देश में मिला चुका है.परन्तु भारत के प्रधान मंत्री जी ने इस संदर्भ में जिनपिंग से कोई गहरी चर्चा नहीं की.ना ही कोई विदेशी सुरक्षा नीति और संधि पर समझौता हुआ.
भारत में चाइना का व्यवसाय जितना तेजी से फैला है सामान जितना सस्ता है उतना ही ना भरोसा करने वाला है.चीनी सामान ने भारत की कम्पनियों को इलेक्ट्रानिक,मोबाइल और टेलीकाम,इलेक्ट्रिक उत्पादों में जमींजोद कर दिया उसके बाजजूद एफ,डी.आई.का पल्लू पकडे हमारे प्रधान मंत्री जी चाइना का प्रचार प्रसार करने में कोई कसर नहीं छोडे.क्या निवेश करके भारत को चाइना अपना उपनिवेश देश बनाने की फिराक में है.यह प्रश्न आज हर भारत वासी के मन मे है.हम पहले भी व्यवसाय के आड में ब्रिटिश देश की उपनिवेशवादिता के शिकार कई शतक वर्षों तक रहे है.आज फिर अपना इतिहास दुहराने की कोशिश में लगे हुये है.हमारे टीवी चैनल भारत और चाइना की जितनी भी तुलना कर लें.परन्तु भारत का अस्तित्व का सबसे बडा ग्रहण चाइना का प्रतिबिंब है हमारी आजादी के कुछ वर्षों के बाद भी भारत चीन युद्ध हो चुके है. परन्तु हम अपनी आर्थिक दृढता के लिये अपनी सुरक्षा के सबसे बडे घातक पडॊसी देश के साथ हाथ मिलाने के लिये तैयार है.उसे मित्र बनाने की कगार में है.पर क्या वह देश हमारा मित्र देश बनने के लायक है इस बात पर भी विचार करना चाहिये.हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जिस घुसबैठ के लिये लेह लद्दाख मे हमारी हजारों की संख्या  मे सैनिक इसी चाइना की सुरक्षा सैनिको की घुसबैठ के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी हुई है.हमें चाइना से सतर्क रह कर उसके सीमा में किये गये घुस बैठ का जबाब देना चाहिये.पर हम उसे अपने ही घर में बुला कर मेहमान बनाकर अपनी सुरक्षा के साथ मजाक कर रहे है.प्रधान मंत्री जी भी अपने गुजरात के विकास के लिये देश की सुरक्षा के संदर्भ मे मौन रह कर चीनी भारत भाई भाई का भाव दिखाया है.
यदि चाइना भारत को अपना मित्रदेश बनाना चाहता है तो भारत की सीमा विवाद और घुसबैठ को पूरी तरह से समाप्त करके सुरक्षा संधि का प्रस्ताव मानना चाहिये.उसके बाद ही अन्य आर्थिक और राजनैयिक करार होने चाहिये.वर्ना वह दिन दूर नहीं कि चाइना भारत की वायु सीमारेखा को भी जल और जमीन की सीमा में घुसपैठ की तरह अपने देश में मिला लेगा.मै इस मुलाकात के विरोध मे नहीं हूँ.लेकिन मेरा मानना है कि किसी भी देश को सबसे पहले किसी से हाथ मिलाने से पहले पूर्व मे उस देश के साथ संबंध को जरूर एक बार बाचना चाहिये.और भारत की सुरक्षा का मामला वह मामला है जो भारत के लिये सबसे ज्यादा महत्व पूर्ण है और इस कटघरे मे चाइना भारत के साथ किसी तरह की मित्रता ना तो पूर्व मे दिखाया है और ना ही इस मुलाकात के बाद दिखायेगा.हाँ हमारा देश अपनी उदारवादी सोच के चलते हर बार  उसके स्वागत में स्वागत गीत गाता रहेगा.और धीरे धीरे वो भारत को अपना उपनिवेशित देश बना लेगा तब भी हम उससे किस निवेश की अपेक्षा करेंगे.
अनिल अयान.सतना

श्रम सुधारो में विलुप्त होता श्रमिक



श्रम सुधारो में विलुप्त होता श्रमिक

श्रमेव जयते का प्रारम्भ  हमारे प्रधान मंत्री जी की नवीनतम योजनाओं में से एक है.इस  योजना का उद्देश्य श्रमिको को अपने जीवन स्तर सुधारने के लिए सरकार के योगदान  को बढ़ाना है.वास्तविकता में आज के समाज में श्रम और श्रमिक की परिभाषा परिवर्तित हो गयी है. श्रम का रूप भी बदला है.

 गौरतलब है कि श्रम सुधार हमेशा से विवादित मुद्दा रहा है। इस पर तब तक कोई मतैक्य नहीं हो सकता, जब तक सरकार कोई ऐसा एजेंडा सामने ना रख दे, जो निवेशकों और श्रमिकों दोनों को अपने हित में लगे। प्रधानमंत्री ने जो कहा, उसका संकेत है कि वह इस अंतर्विरोध से परिचित हैं। उनके द्वारा पेश नजरिए में दो मुख्य बिंदु तलाशे जा सकते हैं। पहला यह कि कारोबार की स्थितियां आसान बनाना आज भारत की सबसे बड़ी जरूरत है। यह मेक इन इंडिया अभियान की सफलता के लिए अनिवार्य है। दूसरा यह कि श्रम सुधारों को श्रमिक वर्ग के नजरिए से देखा जाना चाहिए।


भारत में हम ढाबों, रेस्तरां, बाजारों व होटलों में अक्सर बच्चों को काम करते देखते हैं। ये दृश्य हम में से बहुतों की अंतरात्मा को कचोटते हैं, परंतु कुछ ही समय में हम सब कुछ भूलकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं। बल्कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में हम सब कहीं न कहीं इन बाल श्रमिकों की सेवाएं ले रहे होते हैं।
विश्व श्रम संगठन के अनुसार, दुनिया भर में 5 से 10 करोड तक घरेलू कामगार हैं, जिनमें से बाल श्रमिकों की संख्या 30 फीसदी तक है। ये बच्चे अक्सर बहुत कम वेतन पर काम करते हैं। इनमें से बहुत से बच्चों से जबरन क्षमता से अधिक काम कराया जाता है। कई बच्चे शारीरिक व यौन शोषण का शिकार होते हैं। भारत में आजादी के बाद बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत से सांविधानिक प्रावधान किए गए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 है।

पं्रधानमंत्री ने इंस्पेक्टर राज को खत्म करने, भविष्य निधि संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए तकनीकी समाधानों का एलान किया है। मगर अभी ये साफ नहीं है कि फैक्टरी इंस्पेक्टर जो निरीक्षण करते हैं, उनके बारे में कंपनियों के स्व-प्रमाणन की विश्वसनीयता को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? औचक निरीक्षण के लिए कंप्यूटर से कारखानों की चयन प्रणाली पर्याप्त होगी, इस बारे में आशंकाओं के निवारण की जरूरत पायेगी। यूनिवर्सल अकाउंट नंबर से बेशक भविष्य निधि का संचालन कर्मचारियों के अनुकूल हो जाएगा। प्रशिक्षण (एपरेंटिसशिप) को प्रोत्साहित करने के बारे में घोषणा भी महत्वपूर्ण है, जिसके मुताबिक प्रशिक्षुओं को दिए गए भत्तों पर खर्च हुई रकम का आधा हिस्सा सरकार कंपनियों को लौटा देगी। इससे कारखाने अधिक से अधिक कर्मियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे उन कर्मियों को बेहतर रोजगार मिलने की संभावना बनेगी।हर वक्त की आवश्यकता रही श्रम की आवश्यकता को समझे परखे और उसे नियोजित करे. हम आई आई टी की तरफ भागते है पर हम आई टी आई को भूल जाते है.यहाँ पर यह कैसी विषंगति है.

मोदी के चुनावी नारों में अधिकतम प्रशासन, लघुतम शासन भी शामिल था। यदि वे गैरउत्पादक विभागों को समाप्त कर सकें, अतिरिक्त स्टाफ की सेवाएं ग्रामीण विकास में ले पाएं, गरीबों से ज्यादा अमीरों को फायदा पहुंचाने वाली सबसिडियों में कटौती कर सकें और सामाजिक विकास के ऐसे कार्यक्रमों को समाप्त कर सकें, जो बजट का एक बड़ा हिस्सा निगल लेते हैं और इसके बावजूद जरूरतमंदों की मदद नहीं कर पाते, तो यह एक अच्छी शुरुआत होगी।बहरहाल, मजदूरों के नजरिए से एक बड़ा मुद्दा कारखानों में न्यूनतम मजदूरी, निर्धारित कार्य-स्थितियों और सामूहिक सौदेबाजी के प्रावधानों पर कारगर अमल कराने का भी है। सरकार इसके लिए क्या व्यवस्था करती है, यह देखने की बात होगी। श्श्रमेव जयतेष् के प्रधानमंत्री के नए नारे को साकार करने के लिए यह करना आवश्यक होगा।अन्यथा नारो का उपयोग कहा कहा होता है हम सब इससे वाकिफ है.

अनिल अयान

विंध्य को ठेंगा दिखाती, इंदौर इनवेस्टमेंट समिट

विंध्य को ठेंगा दिखाती, इंदौर इनवेस्टमेंट समिट
ग्लोबल इनवेस्टमेंट समिट का परिणाम आ चुका है.।मध्यप्रदेश को  डिजिटल कैपिटल बनाने का प्रयास २०१५ तक करने का वादा करके इनवेस्टर्स वापिस लौट चुके है।एक लाख करोड से अधिक निवेश का प्रस्ताव पारित किया गया है।मध्य प्रदेश का भविष्य अब क्या निर्धारित होगा? यह प्रश्न आज से आने वाले भविष्य में छिपा हुआ है। हम सब को पता है कि शिवराज सिंह के मुख्य मंत्रित्व काल में इसके पूर्व भी दो बार निवेश हेतु अखिल भारतीय स्तर की मीटिंग कराई जा चुकी है। परन्तु वह समय था और यह समय है जिसमें हम आंकलन कर सकते है कि मध्य प्रदेश में औद्योगिक विकास का बोया गया पौधा आज किस हाल में है।
मध्य प्रदेश का दुर्भाग्य उस समय प्रारंभ हुआ था जब मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ विभाजित होकर अलग राज्य बना। आज भले ही लोग गर्व से विकास दर ११.८ बताई जा रही हो परन्तु छत्तीसगढ के संसाधनात्मक योगदान ना मिल पाने का दुख हमें आज भी है।हमारे प्रशासन की सबसे बडी कमजोरी है कि बैठकें अधिक होतीं है और उस पर अमल कम होता है। इसके पहले देश के अधिक्तर सुप्रसिद्ध उद्योगपतियों ने बहुत से वादे किये परन्तु वादे कभी मजबूत इरादे नहीं बन पाये। वजह वही,उपयुक्त सुविधायें और अवसर उपलब्ध ना कर पाना।हमें यह बात स्वीकार कर लेना चाहिये कि हमारे संसाधन का ६० प्रतिशत भाग आज भी छत्तीसगढ के पास जा चुका है।हम अपने संसाधनों का समुचित प्रयोग नहीं  कर पा रहे है।
हमारे पास गुड गवर्नेंस और कृषि का प्रमुख हथियार है। परन्तु हमारे पास इन शक्ति पुँजो को प्रयोग कर पाने की ललक नहीं है.सरकार के मंत्रीगण कार्यक्रमों में मुख्य आतिथ्य की आसंदी को सुशोभित करने से फुरसत नहीं है। आज हमें आवश्यकता है एक कारगर और प्रभावी नेतृत्व की, एक सशक्त नीति और मजबूत इरादों की। अपने लक्ष्य को निर्धारित करने और उसको सही लोकेशन के साथ उपयोग में लाने की प्रवृति को विकसित करने की।अब विंध्य को ही ले लीजिये। हम सब जानते है कि वर्तमान परिदृश्य में हमारे विंध्य से कितने प्रभावी राजनीतिज्ञ विधानसभा में बैठे है. कई लोग तो इस समिट में भी मौजूद थे।परन्तु आज  तक विंध्य को अपने खाली हाथ के साथ सरकार और राजनीतिज्ञों का चेहरा निहारने के अलावा कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।एक लाख करोड में उतना भी हिस्सा हमारे हाथ में नहीं आया जितने प्रतिशत में  पूरे मध्य प्रदेश मे विध्य प्रदेश का अस्तित्व है। हम सब जानते है कि सतना जिले में कई स्थानों में उद्योग लगाने के वादे हमारे मुख्यमंत्री जी कर के गये थे परन्तु आज तक वह वादे ठंडे बस्ते में है या प्रक्रिया बहुत धीमी है।
विंध्य प्रदेश कृषि,उद्योग,सब्जी,कोल्ड स्टोरेज,और वेयरहाउसिंग के क्षेत्र में बहुत सी संभावनायें है.उद्योगों के लिये चूना पत्थर,कोयला,बाक्साइड,और अन्य प्रकार के खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में हैं। परन्तु आज भी इन संसाधनों को आज इस समिट में सरकार,हमारे जन प्रतिनिधियों और उद्योगपतियों के द्वारा सरासर नकार दिया गया.यह विंध्य के साथ सौतेला रवैये से बढकर व्यवहार मध्य प्रदेश के द्वारा किया गया है।हमेशा से होता चला आया है कि विंध्य प्रदेश हर  मामले मे कहीं ना कहीं सौतेले रवैये से प्रताडित होता रहा है.यही वजह है कि पन्ना और छतरपुर जिले से सीधी जिले की स्थिति उद्योगों के मद्देनजर बहुत ही कमजोर रही है।इस सब स्थानों मे उद्योग और कृषि परिष्करण उद्योग विकसित होने की असीम संभावनाये है।यहाँ से उद्यमी युवाओं के निर्माण की महत्तम संभावनायें मौजूद है।सतना जिले में परसमनिया,मझगवाँ,और पन्ना जैसे स्थानों मे कृषि आधारित उद्योगों और खनिज तत्वों के प्रचुर स्रोत मौजूद है.मुख्यमंत्री जी जब परसमनिया आये थे अब उन्होने सतनावासियों से बहुत से उद्योगों और कृषि से संबंधित विकास की बात और वादे किये परन्तु उसका कोई लाभ सतना और विंध्य प्रदेश को नहीं प्राप्त हो पाया है.
अब समय आ गया है कि मध्य प्रदेश सरकार विंध्य प्रदेश को अनदेखा ना करे और अवसरों को परिणामों में परिवर्तित करे.कयोंकि यही हाल सन २००० से पहले छत्तीसगढ में आने वाले जिलों का भोपाल के द्वारा किया जाता था. हमें नहीं भूलना चाहिये कि विंध्य की भूमिका वही बता सकता है जो विंध्य की भूमि का है. और आज परिणाम हम सबके सामने है. विंध्य की अनदेखी करना मध्य प्रदेश की राजनैतिक,आर्थिक,सामाजिक और शैक्षिक प्रगति में सबसे बडा रिक्त स्थान निर्मित करेगा.इस लिये समय से पहले प्रशासन को जब जागे तभी सवेरा की कहावत को सार्थक करते हुये विंध्य प्रदेश को मालवा और भोपाल अंचल की तरह संमृद्ध बनाया जाये और संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग कर निवेश का सर्वोत्तम अवसर उपलब्ध कराया जाये.

अनिल अयान

उत्तर भारतीयों की महाराष्ट्र सरकार से अपेक्षा

उत्तर भारतीयों की महाराष्ट्र सरकार से अपेक्षा

देवेन्द्र फडनवीस महाराष्ट्र के नव मुख्यमंत्री के रूप में उभर कर सामने आने वाले है।पिछले एक पखवाडे से ज्यादा समय महाराष्ट्र की राजनैतिक रामलीला का मंचन टीवी चैनलो से लाइव प्रसारित किया गया था।अब चुनाव भी अपने परिणाम के साथ हम सबके सामने खडा हुआ है।अब सोचने की बात है कि इस राजनीति का भविष्य क्या होगा।यदि हम राजनीति के महाराष्ट्र संस्करण का जिक्र करें तो हम सब जानते है कि किस तरह सीट के लिये दोनो पार्टियों के बीच में वैचारिक और बौद्धिक कुरुक्षेत्र हुआ और आज दोनो मिल कर सरकार बना रहें है।और इसका प्रतिनिधित्व देवेंद्र फडनवीस ने करने जा रहे है।
महाराष्ट्र, शिवसेना के उदय,विकास और प्रचार-प्रसार का जीता जागता उदीयमान राज्य है।यह वही महाराष्ट्र है जहाँ मुम्बई के समुद्र तट के किनारे पर्यटकों के समूह देखे जा सकते है।यहीं पर बालीवुड फिल्म इडस्ट्री से इफरात धन और वैभव भारत के हिस्से मे आती है। बाम्बे स्टाक एक्सेंच जैसे मुद्रा स्पीथि को मजबूत करने वाले संस्थान भी महाराष्ट्र राज्य के खाते में आते है।आई.आई.टी जैसे तकनीकि से पारंगत संस्थान भी महाराष्ट्र में आते है।महाराष्ट्र भारत के सर्वांगीण विकास के लिये रीड की हड्डी का काम करता नजर आ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप महाराष्ट्र के कई शहरों का अर्थव्यवसथा के विकास में महती भूमिका है।महाराष्ट्र समुद्र तटीय राज्य होने के कारण व्यापार का अच्छा माध्यम बनकर पूरे देश में उभरा है।विभिन्न प्रकार के बंदरगाह भी आयात और निर्यात की बढोत्तर करते है।जल और वायुमार्ग की मौजूदगी का ही परिणाम है कि देश की तरक्की का ज्यादा दारोमदार दिल्ली की बजाय महराष्ट्र के महानगरों और बडे नगरों के कंधों में अधिक है.पूरा देश इस बात से वाकिफ है कि महाराष्ट्र की सत्ता जिस दल के पास होगी वह दल भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।यही वजह रही है कि भारतीय जनता पार्टी ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश की भांति महाराष्ट्र के चुनाव को सफल बनाने की बागडोर सौंपी. भाजपा को पूर्ण बहुमत की आशा थी ।परन्तु कहीं ना कहीं मोदी का नमों नमों उतना कारगर साबित नहीं हुआ ।इसी वजह से उसे गठजोर करने की आवश्यकता महसूस हुई.इस राजनीति यह इंद्र धनुष था जिसके चलते राजनीति के साम दाम दंड भेद के रंग हमें इस विधानसभाचुनाव में स्पष्ट दिखाई पडा।भाजपा को पूर्ण बहुतमत की आशा थी ।
हम सब जानते है कि महराष्ट्र जैसे मराठी भाषा बाहुल्य राज्य पर आज भी बाला साहब ठाकरे, और उनके उत्तराधिकारी,उद्धव ठाकरे एवं राज ठाकरे की तूती बोलती है।यही वजह है कि भारत में वो समय आ चुका है जब महाराष्ट्र के कई महानगरों में गैर मराठी भाषियों को बहुत बडे विरोधात्मक आंदोलनों और अराजकता का सामना करना पडा था।इसको लेकर सबसे ज्यादा उत्पात,भाषावाद,क्षेत्रवाद फैलाने वाले दल के रूप में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख थी।एक वो समय था जब महाराष्ट्र में इन्ही दोनो राजनैतिक दलों का राज चलता था।मराठी ना बोलने में अंग्रेजों जैसे सजा देने के लिये इन पार्टियों के गुर्गे उत्तर भारतीयॊं पर धावा बोल देते थे। अब जब वहाँ पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार वानखेडे स्टेडियम में शपथ लेने जा रही है।इस अवसर मे भारतीय जनता पार्टी में राजनैतिक चक्रव्यूह को भेद रही है।यह वही पार्टी है जिसने चुनाव के पहले सीटों के बटवारे से खफा होकर शिवसेना के हाथ मिलाने से साफ तौर से इंकार कर दिया था।और किसी हालत में गठबंधन के लिये गोहार लगाने से परहेज करने का वचन देश वासियों को दिया था.और उसका परिणाम हम सबके सामने है।
इस मौके में उत्तर भारतीयों को एक संबल मिला ।जिसके अंतर्गत उत्तर भारतीय नागरिक इस बात से आस्वस्त हों कि वो महाराष्ट्र से संबंधित महानगरों में अपने भविष्य को उज्जवल बनाने की रेस में अपनी जिंदगी की रेस को भाषावाद और क्षेत्रवाद के तले खत्म ना कर पायेंगें।उन्हें भी वहाँ जीवन यापन करने और धनोपार्जन करने का उतना ही अधिकार होगा जितना की मराठी बोलने वाले नागरिकों को है। यह विडंबना आज की नहीं परन्तु पहले भी कई बार देखने को मिली है कि महाराष्ट्र में भाषावाद का जहर घोल कर संप्रदायिकता को मराठियों की नशों में टीकाकरण किया जाता रहा है और इसका लाभ इन पार्टियों को चुनाव में मिला भी है।अप भाजपा को देखना है कि वो अपना स्वार्थ साध कर अपने गठबंधन बचाने के लिये शिवसेना के विधायकों का साथ देती है।या अपने निर्णयों में अन्य दलों की सहमति बनाकर क्षेत्रवाद और भाषावाद को खत्म करने की मुहिम छेडती है।जिससे उत्तरभारतीयों को कुछ नहीं तो मुम्बई जैसे महानगरों में चैन की सांस लेने का अवसर मिलेगा।
अनिल अयान . 

अभियान बनी एक परंपरा का सच


अभियान बनी एक परंपरा का सच
बहुत समय से देख रहा हूँ कि बच्चों को हाथ धुलाने का अभियान शासकीय विद्यालयों में चलाया जा रहा है।बच्चे हाथ धोकर अपने जीवन को शुद्ध करने का भ्रम पाल कर विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते हैं। बच्चे पढने में कम और मध्यान भोजन और हाथ धोने में ज्यादा ध्यान लगाते है। यूँ तो हाथ धुलाने की परंपरा का निर्वहन आदि काल से ही भारत वर्ष में चली आरही है। मेजबान अपने काम को खत्म करने के बाद और भोजन ग्रहण करने के पूर्व अपने हाथ पैर जरूर साफ करते थे।आज भी यह परंपरा का निर्वहन देश के हर घर में किया जाता है।हमारी सुबह हाथ धोने से होती है और सोने से पहले हम सब हाथ धोकर ही बिस्तर में जाते हैं।शिक्षा विभाग की यह पहल का क्या उद्देश्य है यह सोचने का विषय है।क्या सिर्फ स्वच्छता,और बच्चों को बीमारियों से बचाने के लिये यह अभियान चलाया जा रहा है या फिर इसके पीछे भी एक उच्च स्तरीय व्यापार नीति का संचालन सरकार द्वारा किया जा रहा है।
हाथ धुलाने के अभियान में हर स्कूल में विशेष प्रकार का साबुन,जग,बाल्टी,नल कनेक्शन,और पानी की टंकी की व्यवस्था की जाती है।साथ हर बच्चे का अपना अलग तौलिया निर्धारित किया जाता है।इसके लिये विद्यालय एक निविदा निकाल कर टॆडर बुलाता है और सस्ते रुपयों की दर में ये सब उचित दाम में खरीदा जाता है।यह प्रक्रिया हर विद्यालय में अपनाया जाता है।गाँव का वो बच्चा जो अपने परिवार की गरीबी को मिटाने के लिये सरकारी स्कूल में जाता है वह इस प्रकार लग्जरी तरीके से हाथ धोने में बहुत आनंद आता है और वह इस काम को घर में भी करने के लिये अपने गरीब माता पिता को बोलता है।अब उसके माता पिता की जिम्मेवारी बनती है कि यह सरकारी तरीका वह अपने घर में अपनाये।और इस तरह से इस व्यापार की प्रथम बिसात सफल होती है।इस सफलता का परिणाम है कि आज के समय में मध्यान भोजन के लिये स्वसहायता समूह शिक्षा विभाग के नजदीकी लोगों द्वारा चलाये जा रहे हैं। फिर मँहगे किस्म के साबुन,तौलिये आदि का आयात प्रारंभ किया जाता है।बच्चों की सुरक्षा और साफ सफाई के साथ साथ इस तरह का लाभ अन्य सामाजिक धन्ना सेठों को भी आकर्षित करता है।लोगों को किसी चीज का आदी बनाना है तो उन्हे इसी तरह से लग्जरी सामान उपयोग करने की आदत डलवाई जाती है ताकि बच्चों की सह में ही सही लोग अपने दैनिक जीवन में इस तरह के मँहगे और लग्जरी सामान की खपत कर सकें और शिक्षा के मंदिर को व्यापारिक प्रतिष्ठान बनाया जा सके।
इस अभियान के पूर्व में भी बच्चे हाथ धोते थे।इस के लिये कही नहीं लिखा कि मँहगे हाथ धोने वाले साबुन और मंहगे तौलिये इस्तेमाल किये जायें।प्राचीन काल में हाथ धोने के लिये राख का इस्तेमाल किया जाता था। कभी-कभी नीबू का पानी और ताजा पानी भी इस काम के लिये इस्तेमाल किया जाता था।फिर यह काम देशी निरमें से पूरा किया जाने लगा।और धीरे धीरे शहरी जीवन शैली में हैंड वाश सोप और हैंड वाश लिक्विड का इस्तेमाल किया जाने लगा।भारतीयता को अपनाने वाले शासकीय विद्यालय के ग्रामीण बालकों को शहरीय जीवन शैली की तरफ मोडने की यह साजिस सिर्फ इस लिये है क्योंकि हम भारत को इंडिया के रूप में परिभाषित करने की फिराक में लगे हुये है।ग्रामीण बालक जिन्हे अपनी सामान्य जीवन शैली को सुधारने और सर्वकालिक विकास के लिये विद्यालय के दरवाजे खटखटाता है।उसे बाजारवाद के इस प्रकार के पैने  हथियार परिवार वालों के साथ अपने गिरफ्त में जकड लेता है।शासन और प्रशासन विद्यालय को संबंधित व्यापारियों के हाथों धीरे धीरे सुपुर्द करने में लगे हुये है।कुल मिलाकर यह कहा जाये कि विद्यालय को व्यावसायिक प्रतिष्ठान के रूप में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोडी जा रही है तो बेमानी कुछ भी नहीं है।इस प्रक्रिया के चलते बच्चे के हाथों की सुरक्षा और साफ सफाई किस हद तक होती है यह तो अनुमान लगाना कठिन है परन्तु व्यापारियों की जेबों की भरपाई होना तय माना जा सकता है।
इस प्रकार के अभियान छात्र छात्राओं के विकास में कितना कारगर है यह तो विद्यालय की स्थिति देख कर समझा जा सकता है।विद्यालय में जहाँ शासकीय स्तर पर शौचालय,पीने के पानी की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाती है।मध्याहन भोजन में मिलावट का खेल खेला जाता। बच्चे बस्ता लेकर आते है और खाना खाकर घर बिना पढे चले जाते है।जहाँ बच्चों को अपने मास्टर साहब का नाम नहीं पता होता है।बच्चों की जगह पर उनके छोटे भाई बहन थाली में भोजन करते है।जहाँ बच्चों के फर्जी नाम रजिस्टर में सिर्फ संख्या की बढोत्तरी के लिये लिखे जाते है।वहाँ पर हाथ धुलाकर अपनी और व्यापारियों की जेब भरने की प्रक्रिया षडयंत्रकारी और बेमानी लगती है। अभियान होतो पारदर्शी हो अन्यथा बच्चों को विद्यालय लाने के लिये अच्छी पढाई और ज्ञान देकर आकर्षित किया जाना चाहिये ना कि उनके गरीब माता पिता की जेब खाली करने की चाल चल कर उन्हें धोका दिया जाना चाहिये।विद्यालय में यदि पठन पाठन से अधिक इन सब अभियानों में शिक्षक ध्यान देंगें तो फिर बच्चों का कैरियर तो ग्रामीण परिवेश में दम तोड देगा।
अनिल अयान,सतना        

जातियों के सांप्रदायीकरण से उपजता चक्रव्यूह

जातियों के सांप्रदायीकरण से उपजता चक्रव्यूह
धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद में टिका भारत का जाति.वर्णात्मक अस्तित्व खतरे में आ रहा है।भारत के सभी राज्य आज इस ओर अंधी दौड में भागे जा रहे है।आज की स्थिति यह है कि हर तरफ जातियों का  पराक्रम दिखा कर उसके प्रभाव से अन्य जातियों को अपनी जूतियों तले रौंदने का प्रयास जारी है।इतिहास गवाह रहा है कि जो जातियाँ अंग्रेजों के पहले से बहुसंख्यक रूप में राज्य करती थी आज वह अल्प संख्यक वर्ग में आचुकी है।परन्तु आज जाति के नाम पर राजनैतिक पार्टियाँ या तो ऐश कर रही है या तो जाति को उग्रवाद बनाकर उसके नाम को कैश कर रही है।
लार्ड क्लाइव से शुरू होकर आज की इस ग्लोबल पीढी तक जिनका इतिहास नहीं आया वो बखूबी जानते हैं कि दलितों के राजा वैदिक काल से मध्य काल तक पाये जाते थे।कई जातियाँ अपने राजवंश को सुरक्षित रखे हुई थी।धनगर मराठे एहोलकर राज्य के संस्थापक खुद चरवाहे का काम किया करते थे।आज जितने भी ओबीसी और पिछडे वर्ग के अंतर्गत जातियाँ आती है उनकी सत्ता द्क्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में शासन करती रही है।इतिहास यह भी जानता है कि कभी पूरे देश में राजपूतों और ब्राह्मणों का राज नहीं रहा इन रियासतों में ये जातियाँ एक रहवासी के रूप में ससम्मान पूर्वक निवास करती थीं।समय सापेक्ष जाति का संविलियन और विघटन हुआ है।बडी जातियों से कई छॊटी छोटी जातियों का पुनर्जन्म हुआ।आज जातिगत समूहों से जिस प्रकार क्षेत्रवाद उतपन्न हो रहा है वह देश की अर्थव्यवस्था और समाजिक व्यवस्था के लिये खतरनाक चक्रव्यूह की तरह है।
जब से मनुष्य संगढित होकर रहना शुरू किया तभी से वर्णव्यवस्था के अंतर्गत जाति वर्ग व्यवस्था का अनावरण हुआ था।हर व्यक्ति का अपना अपना काम निर्धारित कर दिया गया।जाति भारतीय संस्कृति की पुरातन और नीव के पत्थर के समान है।हर इंसान की पीढ में यह पूर्वजों के द्वारा अमिट रूप से कुरेद दी गयी है।कोई चाहकर भी इस दर्दनाक हकीकत से मुँह नहीं मोड सकता कि वो जाति से हटकर अपने अस्तित्व को कायम कर सकता है।यह भी सच है कि जड और रूढ स्थिति में जाति कभी नहीं रही है अन्यथा गैरलचीली व्यवस्था कभी भी समाज में ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती है।जो संगठन या लोगों के समूहों ने जाति को टोडने का प्रयास किया वो खुद समाज के एक हासिये में चले गये वो संगढन समाप्त हो गये है। और अंत में उन्हें अपनी अपनी जाति के अंतर्गत कुनबों में वापिस लौटना ही पडा है।देश में आज भी ऐसे स्थान है जिनके अंतर्गत जाति के हाहाकारी प्रभाव भी गाहे बगाहे दिख ही ही जाते है।हिंदू धर्म जिसे हम सब सनातन धर्म के रूप मे जानते है इसके अंतर्गत सबसे अधिक जातियाँ आती है और इन जातियों का विद्रोह भी देखने को मिल जाता है।पहले जातियों के नाटक का पटाक्षेप समाज में ही हो जाया करता था परन्तु आज इसका भी राष्ट्रीय स्वरूप देखने को मिलता है।
जब तक हम जाति को सामाजिक नजरिये से ना देखेंगें तब तक जतियों से सांप्रदायीकरण की चिंगारी धधकती रहेगी।भारतीय समाज की एक परंपरा के रूप में जाति को लेकर चलने से समाज की अनुकूलता बनी रहेगी।आज के समय में राजनैतिक पार्टियाँ जाति को परिवर्तित करके जातिगत समीकरण बनाने में लग गये।कई राजनैतिक पार्टियाँ तो जातिगत राजनीति की संवाहक बनी हुई है।वो जाति को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने मे पीछे नहीं हटती है।आज के समय में जातिगत असर साहित्य में भी दिखाई देने लगा है।जातियों को राजनैतिक स्वार्थ के तहत एससीएएसटीएऔर ओबीसी में बाँट दिया गया है।
राजनीति के साथ जाति सांप्रदायीकरण उत्प्लावित होकर क्षेत्रवाद के रूप  देश की संप्रभुता के लिये चक्रव्यूह के रूप में उपजा है।पूरे समाज को सवर्ण और अवर्ण के रूप में विघटित करके यह सांप्रदायीकरण देश को टुकडे टुकडे करने में भागीदार जरूर बनेगा।आज भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख आवश्यकता है कि जाति को समाज के एक घटक के रूप में देखे और इसको सांप्रदायिक बनाने से बचे।यदि जातियों का इसी तरह साप्रदायी करण होता रहेगा तो लोग जाति के नाम में एक दूसरे के खून के प्यासे इस वजह से हो जायेंगें ताकि वो अपनी जाति का वर्चस्व पूरे भूभाग में कायम कर सकें।आज के समय मे राजनैतिक पार्टियों के सह पर सवर्ण और अवर्ण के मध्य साम्प्रदायिक विद्वेष सांप्रदायीकरण का तीक्ष्ण प्रहार है।और इससे हमे बचकर रहना होगा।

अनिल अयानण्सतनाण्



अतिउत्साहित बयानों से उठते विवाद
राजनीति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से समाज को अब खतरे नजर आने लगे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम अब गलत दिशा की ओर जाने लगा है। पदलोलुपता के चलते राजनीतिज्ञ अपनी मर्यादा को भूलकर कुछ भी,किसी के बारे में और कभी भी बयान देने से बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते है।वो यह नही सोचते हैं कि दिये जाने वाले बयानों से राजनीति के मैदान में क्या उहापोह की स्थिति निर्मित हो जायेगी।उसका समाज में क्या प्रभाव पडेगा और तो और उनकी पार्टी और सरकार पर कितना दुष्प्रभाव पडेगा।अब वक्त आ गया है कि भविष्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पुर्नपरिभाषित किया जाना चाहिये।
बयानबाजी में पश्चिम बंगाल के मंत्रियों की बात की जाये,उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की बात की जाये,या फिर भारत की केंद्र सरकार के मंत्रियों और सांसदों की बात की जाय सभी एक से बढकर एक बयान देकर सुर्खियों में बने रहने की चेष्टा करते है और गाहे बगाहे विवादों में घिर जाते हैं।इस सरकार के बनने के बाद और नरेंद्र मोदी जी के कहने के बाद भी सांसद अपनी सीमा को लाँघ कर अभद्र बयान देते हैं।कभी राष्ट्रपिता बापू को गोली मारने वाले नाथू राम गोडसे को देशभक्त कहते हैं।कभी महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी की जाती है।कभी महिलाओं के पहनावे और उनकी नौकरी करने पर रोक की बात की जाती है।कभी पश्चिम बंगाल में महिला सांसदों के द्वारा अपने कपडे खुद फाडकर दूसरे पार्टी सांसदो के द्वारा किये जाने वाले बलात्कार की बात की जाती है। कभी निर्भया दुष्कर्म को बहुत छोटी घटना का रूप दिया जाता है। और कभी सांई के ऊपर अभद्र बयान दिये जाते है।कभी साधू,कभी संत,कभी साध्वी और कभी सांसद महिलाओं को केंद्र बिंदु बना कर अनाब सनाब ,अनर्गल प्रलाप करने से बाज नहीं आते है।
इस बार तो हद इस बात पे हो गई की साध्वी प्राची और साक्षी महराज वर्तमान सांसद भारतीयों को कितने बच्चे पैदा करने चाहिये इसका निर्णय कर बैठे।भले ही भाजपा के द्वारा साक्षी महराज को नोटिस दी गई पर साध्वी प्राची की जुबान पर कौन लगाम लगायेगा।क्या स्त्री को सिर्फ जननी का कार्य सौंपना चाहते है।और कोई दंपति कितने बच्चे पैदा करेंगें यह निर्णय करने और इसके माध्यम से हिंदू कहलाने की पुष्टि करने का अधिकार इन धर्म के ठेकेदारों को किसने प्रदान किया है।हम सब जानते है कि यह मुद्दा नितांत ही व्यतिगत है और इस तरह से बयान बाजी सरकार की गरिमा को धूमिल कर रहा है।साध्वी प्राची का इस बयान में टिके रहने का क्या तात्पर्य है क्या वो महिला होकर महिलाओं की पीडा और संघर्ष को नजरंदाज करना चाहती है।इस प्रकार के बयान अविवाहित सांसदों चाहे वह स्त्री हों या पुरुष हो के मुँह से शोभा नहीं देते है। उन्हें नहीं पता कि आज के समय में बच्चों को पैदा करने में ,पालन पोषण करने में और उनको इस समाज में सम्मान जनक स्थान दिलाने में कितनी मेहनत,संघर्ष और नियोजन करना पडता है।
एक तरफ प्रधानमंत्री जी वाईब्रेंट गुजरात के माध्यम से विदेशों को भारत की सर्वसत्ता का भान करा रहें हैं और दूसरी तरफ ये लोग अपने अनर्गल बयान बाजी से स्त्री को अपशब्द और व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत बातों और उनके बेडरूम तक घुसने की बात करते है। यदि ऐसा होने लगा तो छोटा परिवार सुखी परिवार,और परिवार नियोजन जैसी स्वास्थ्य मंत्रालय की योजनाओं को ठेंगा दिखाती नजर आती है।आज इस वर्तमान भारत में इस प्रकार के बयान बाजी करने में हिंदूवादी संगढनों को सरकार की नीतियों के विरोध में आकर बयान देने से कौन रोकेगा। नरेंद्र मोदी खुद सरकार के मुखिया इस प्रकार के अनर्गल अतिवादिता से ग्रसित नहीं है तो सरकार के सभी टीम मेंबर्स को उन्हें फालो करना चाहिये।आज के विकास के युग में भारत को हिंदूवादी राष्ट्र बनाने की जिदवाले बयान देना सर्वधर्म संभाव और सुशासन की परिकल्पना को फाँसी देने जैसा है।इसी तरह की बयान बाजी यदि होती रही तो वह दिन दूर नहीं है कि जब लोग नरेद्र मोदी को पसंद करेंगें परन्तु उनकी टीम के लीडरों से नफरत करेंगें।और मोदीमय भारत सिर्फ इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण वोटों की गणित बिगड जायेगी।इस उदाहरण वाराणसी के निकाय चुनावों में भाजपा को मिली करारी हार है। इस लिये यह ध्यान रखना चाहिये कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यदि अधिकार है तो मर्यादा में रहकर जुबान खोलना इस समाज के लिये एक कर्तव्य है जिसे सरकार में बैठे हर व्यक्ति को अच्छी तरह से समझ लेना होगा।
सोच समझकर बोलिये, जग में हर एक बोल।
वरना मिट ही जायेगा, इस जग से तेरा मोल।
अनिल अयान,सतना

अतिउत्साहित बयानों से उठते विवाद

अतिउत्साहित बयानों से उठते विवाद
राजनीति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से समाज को अब खतरे नजर आने लगे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम अब गलत दिशा की ओर जाने लगा है। पदलोलुपता के चलते राजनीतिज्ञ अपनी मर्यादा को भूलकर कुछ भी,किसी के बारे में और कभी भी बयान देने से बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते है।वो यह नही सोचते हैं कि दिये जाने वाले बयानों से राजनीति के मैदान में क्या उहापोह की स्थिति निर्मित हो जायेगी।उसका समाज में क्या प्रभाव पडेगा और तो और उनकी पार्टी और सरकार पर कितना दुष्प्रभाव पडेगा।अब वक्त आ गया है कि भविष्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पुर्नपरिभाषित किया जाना चाहिये।
बयानबाजी में पश्चिम बंगाल के मंत्रियों की बात की जाये,उत्तर प्रदेश के मंत्रियों की बात की जाये,या फिर भारत की केंद्र सरकार के मंत्रियों और सांसदों की बात की जाय सभी एक से बढकर एक बयान देकर सुर्खियों में बने रहने की चेष्टा करते है और गाहे बगाहे विवादों में घिर जाते हैं।इस सरकार के बनने के बाद और नरेंद्र मोदी जी के कहने के बाद भी सांसद अपनी सीमा को लाँघ कर अभद्र बयान देते हैं।कभी राष्ट्रपिता बापू को गोली मारने वाले नाथू राम गोडसे को देशभक्त कहते हैं।कभी महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी की जाती है।कभी महिलाओं के पहनावे और उनकी नौकरी करने पर रोक की बात की जाती है।कभी पश्चिम बंगाल में महिला सांसदों के द्वारा अपने कपडे खुद फाडकर दूसरे पार्टी सांसदो के द्वारा किये जाने वाले बलात्कार की बात की जाती है। कभी निर्भया दुष्कर्म को बहुत छोटी घटना का रूप दिया जाता है। और कभी सांई के ऊपर अभद्र बयान दिये जाते है।कभी साधू,कभी संत,कभी साध्वी और कभी सांसद महिलाओं को केंद्र बिंदु बना कर अनाब सनाब ,अनर्गल प्रलाप करने से बाज नहीं आते है।
इस बार तो हद इस बात पे हो गई की साध्वी प्राची और साक्षी महराज वर्तमान सांसद भारतीयों को कितने बच्चे पैदा करने चाहिये इसका निर्णय कर बैठे।भले ही भाजपा के द्वारा साक्षी महराज को नोटिस दी गई पर साध्वी प्राची की जुबान पर कौन लगाम लगायेगा।क्या स्त्री को सिर्फ जननी का कार्य सौंपना चाहते है।और कोई दंपति कितने बच्चे पैदा करेंगें यह निर्णय करने और इसके माध्यम से हिंदू कहलाने की पुष्टि करने का अधिकार इन धर्म के ठेकेदारों को किसने प्रदान किया है।हम सब जानते है कि यह मुद्दा नितांत ही व्यतिगत है और इस तरह से बयान बाजी सरकार की गरिमा को धूमिल कर रहा है।साध्वी प्राची का इस बयान में टिके रहने का क्या तात्पर्य है क्या वो महिला होकर महिलाओं की पीडा और संघर्ष को नजरंदाज करना चाहती है।इस प्रकार के बयान अविवाहित सांसदों चाहे वह स्त्री हों या पुरुष हो के मुँह से शोभा नहीं देते है। उन्हें नहीं पता कि आज के समय में बच्चों को पैदा करने में ,पालन पोषण करने में और उनको इस समाज में सम्मान जनक स्थान दिलाने में कितनी मेहनत,संघर्ष और नियोजन करना पडता है।
एक तरफ प्रधानमंत्री जी वाईब्रेंट गुजरात के माध्यम से विदेशों को भारत की सर्वसत्ता का भान करा रहें हैं और दूसरी तरफ ये लोग अपने अनर्गल बयान बाजी से स्त्री को अपशब्द और व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत बातों और उनके बेडरूम तक घुसने की बात करते है। यदि ऐसा होने लगा तो छोटा परिवार सुखी परिवार,और परिवार नियोजन जैसी स्वास्थ्य मंत्रालय की योजनाओं को ठेंगा दिखाती नजर आती है।आज इस वर्तमान भारत में इस प्रकार के बयान बाजी करने में हिंदूवादी संगढनों को सरकार की नीतियों के विरोध में आकर बयान देने से कौन रोकेगा। नरेंद्र मोदी खुद सरकार के मुखिया इस प्रकार के अनर्गल अतिवादिता से ग्रसित नहीं है तो सरकार के सभी टीम मेंबर्स को उन्हें फालो करना चाहिये।आज के विकास के युग में भारत को हिंदूवादी राष्ट्र बनाने की जिदवाले बयान देना सर्वधर्म संभाव और सुशासन की परिकल्पना को फाँसी देने जैसा है।इसी तरह की बयान बाजी यदि होती रही तो वह दिन दूर नहीं है कि जब लोग नरेद्र मोदी को पसंद करेंगें परन्तु उनकी टीम के लीडरों से नफरत करेंगें।और मोदीमय भारत सिर्फ इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कारण वोटों की गणित बिगड जायेगी।इस उदाहरण वाराणसी के निकाय चुनावों में भाजपा को मिली करारी हार है। इस लिये यह ध्यान रखना चाहिये कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यदि अधिकार है तो मर्यादा में रहकर जुबान खोलना इस समाज के लिये एक कर्तव्य है जिसे सरकार में बैठे हर व्यक्ति को अच्छी तरह से समझ लेना होगा।
सोच समझकर बोलिये, जग में हर एक बोल।
वरना मिट ही जायेगा, इस जग से तेरा मोल।
अनिल अयान,सतना