शनिवार, 2 अप्रैल 2016

वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी

वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी
अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आज देश की राजनीति नया मोड ले चुकी है।पूरा मीडिया और राजनीतिक दलों का गुट अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वामपंथ के नजरिये में इसके मूल्यांकन के तले विरोधी सुर सुनाई देने लगे है। जे एन यू से राष्ट्रद्रोह के बोलों का रूपांतरण राष्ट्रवाद के पूछ पकड कर पूरे देश में अपने पैर पसार रहा है। सभी विषय विशेषज्ञ इस पर अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे है। जब सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का रवैया अपनाती है तो अनुच्छेद ३५६ के तहत राष्ट्रपति शासन की मांग करने बैठ जाती है। कभी देश के शीर्ष के राजनेता और पत्रकार वामपंथ के शिकार होकर भावावेश में गर्व से खुद को राष्ट्रद्रोही मानने से कोई गुरेज नहीं करते है। सियासत के चलते कभी जातीय आरक्षण की आग राजस्थान के अंदर गुर्जर विरोध में तो कभी गुजरात के अंदर जाट विरोध के रूप में अभिव्यक्ति की आजादी को तथाकथित उपयोग  व दुरुपयोग करते नजर आते है। यह सब अभिव्यक्ति की आजादी की विभिन्न रंगीनियां हम सबके सामने आती है।
      अभिव्यक्ति की आजादी के चलते सीमा पर बहुत समय से मदेशियों के आंदोलन को सही ठहराया जाता है और नेपाल प्रभावित होता है।आज के समय पर देश सुलग रहा है जाट आंदोलन की आग में गुजरात से फैली यह आग देश के कई कोनों मे अपनी लपटें बिखेर चुकी है। देश की सरकार को आज भी इसकी चिंता कम और जे एन यू विवाद में अपनी गर्दन फंसाने से फुर्सत नहीं मिल पा रही है। आरक्षण भी अभिव्यक्ति की आजादी से उपजी अवसरवादिता का परिणाम ही तो है। जातीय समीकरण के चलते हर जाति के लोग अपने आप को इस छत्रछाया के तले सुरक्षित करना चाहता है। देखिये जनाब यह तो तय बात है कि हमारे पूर्वजों ने जातियों को हमारी पीठ में हमेंशा के लिये गोदवा दी है। पीढी दर पीढी हम अपनी जाति की मुर्दा लाश को अपने जीवन भर रोते मरते ढोते हैं। राजनीति में   हर राजनैतिक दल का यही प्रयास होता है कि उसको फायदा देने वाली जातियों को वो आरक्षित करे और वोट बैंक में अपने खाते के धन को बढाये। पूर्व की यूपीए सरकार ने कुछ ऐसे ही कर्म को अपने समय में पूर्ण करने की कोशिश की थी परन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज कर दिया था। अब खच्चर सरकार जाटों के चक्कर में बहुत बुरी तरह से फंस गई है। कभी तो यह भी देखा गया है कि कुछ राज्यों में राजपूत और ब्राह्मणों को भी आरक्षण की छत्रछाया देने की चिंगारी भडकाने की पहल कर करने में दल लगे हुये हैं। वसुंधरा राजे सरकार पिछले साल कुछ इसी तरह गुर्जर आंदोलन या कट्टर आरक्षण के पक्ष में अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर उपजे तमाशे में फंसी थी। संविधान में आरक्षण और उसकी बारीकियों को पहले से स्पष्ट कर दिया गया है। तब भी इन लोगों को अपनी अभिव्यकित को व्यक्ति करने से फुर्सत हो तब तो कुछ परिणाम तक पहुंचा जाये।
      जे एन यू में अभिव्यक्ति की आजादी के सुर इस तरह बिगड गये हैं कि इसकी राह पर देश के अन्य विश्वविद्यालय भी इसकी राह पकड लिये हैं।जे एन यू में भगवा रंग अपने रंग में रंगने के पीछे युद्ध स्तर पर पड गया है। और कांग्रेसियों को यह बात गले नहीं उतर रही है। जूतम पैजार की वह स्थिति बनी हुई है कि न्यूज चैनल्स चर्चा के नाम पर अच्छी खासी टीआरपी बटॊरने में सफल हो रही है। केंद्र की राजनीति नहीं चाहती की यह मामला सुलझे इस लिये रोज नया प्रोपेगेंडा मीडिया तैयार करके दिन भर जनता को परोसती है।अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और वामटापू के बीच तूतू मैमै की फैंटेसी लिखी जा रही है। उधर दिल्ली में जल संकट भी किसी दल अभिव्यक्ति की आजादी का एक रूप ही है।कोर्ट को अपने निर्णय तक पहुंचने तक नहीं दिया जा रहा है। बाहर ही बाहर काग्रेस और भाजपा के नुमांइदे आपस में कटे मरे जा रहे हैं। एक दूसरे पर शब्दों के शस्त्र चलाये जा रहे है,उससे से भी यदि पेट नहीं भर रहा तो एक दूसरे पर मारा पीटी का कारनामा कर रहे हैं। इस समय एक विशेष माहोल बना हुआ है कि यदि देश में अपने आप को हाईलाइट करना है तो भाजपा पर बयान बाजी करो और कांग्रेस के समर्थन में बात करो नहीं तो केजरीवाल सरकार के खिलाफ चुटकी लो,, ‘कभी कभी भाजपा विरोधी रुख भी अपना लो,बस फिर क्या मीडिया आपको ढूंढेगी और अपने चैनल की चर्चा का हिस्सा बनाकर आपको वैचारिक वमन करने का भरपूर अवसर देगी। इस तरह आप अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को बाजारवाद के दरवाजे में न्योछावर कर सकते हैं और बुद्धिजीवी बनकर मजे लूट सकते है। राजनीति का यह दस्तूर बन चुका है कि जब आप विपक्ष में हो तों आरक्षण,लेफ्ट राइट,और टांग खिंचाई को हवा दीजिये और सरकार का ढोल बजाइये जनता को उग्र बनाइये। और जब आप सरकार में पहुंचिये तो इनकी उग्रता का दुष्परिणाम भोगिये और अपना माथा ठोकिये। तब विपक्ष वाले आपकी टांग खींचेगें। यही तारतम्य चलता रहेगा और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बाजारवाद और समाजशास्त्र फलता फूलता रहेगा।अभिव्यक्ति की आजादी अब आम और बुद्धिजीवी वर्ग के अलावा नेताओं के घर में ज्यादा फल फूल रही है। पर हमेशा से ही आम जनता कहती थी,कहती है और भविष्य में भी कहती रहेगी वाह रे अभिव्यक्ति की आजादी।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७


बच्चे बन रहे हैं कलमघिस्सू

बच्चे बन रहे हैं कलमघिस्सू ( मैकाले)
मार्च के पहले सप्ताह से सभी विद्यालयीन बच्चों की बोर्ड परीक्षायें प्रारंभ होने वाली हैं। बच्चे रटन्तविद्या का उपयोग परीक्षा करके की कापियां भरने के लिये तैयार है। यह हमारी परंपरा रही है कि हमारे शिक्षा के परमात्मा और अंग्रेजों के भारत में अंतिम वंशज लार्ड मैकाले ने जो क्लर्क बनाने के लिये शिक्षा की पालिसी छॊड गये थे वो आज भी हमारे द्वारा उपयोग की जा रही है। हमने कभी भी बदलाव करने की नहीं सोची। क्योंकि हमने हमेशा से ही पका पकाया हजम करने की आदत डाल रखी है। बच्चे साल भर एक बने बनाये पाठ्यक्रम के सांचे में अपने आप को ढालते हैं और बने बनाये फ्रेम की परीक्षाओं में प्रश्नपत्र हल करके अच्छे से अच्छे नंबर प्राप्त करके अपना रिजल्ट बनाते है।वो कभी भी किताबी ज्ञान के बाहर से अनुभव लेने की नहीं सोचते हैं और ना ही उन्हे फुरसर है। शिक्षा विभाग ही परीक्षायें करवाता है और विद्यालयीन शिक्षा में बच्चे अव्वल आते हैं। परन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि यही विभाग आगामी नौकरी के लिये भी दोबारा परीक्षायें करवाता है नौकरी दिलवाने के लिये भी। अब सोचने की बात यह है कि यदि शिक्षा विभाग एक बार परीक्षा करवाकर बच्चों का मूल्यांकन करवाता है तो दो बारा परीक्षा करवाने की आवश्यकता क्यों होती है। सभी जब परीक्षाओं में सफल हैं तो नौकरी पाने के लिये दोबारा परीक्षा करवाने का क्या औचित्य है। इसका जवाब किसी ने आज तक खोजने की कोशिश नहीं की।
      लार्ड मैकाले ने अपने शासन काल के दौरान भारतीयों को शिक्षित करने की कवायद इसलिये की ताकि वो अंग्रेजी शासन में अग्रेजी अधिकारियों के अधीनस्थ प्रशिक्षित होकर कार्य कर सकें और उनके सामने सिर उठाने के काबिल ना हो सकें। मैकाले ने उस समय लोगो कों सिर्फ कलम घिसने वाला क्लर्क ही बनाने की पहल की। आज भी हम यही काम कर रहे हैं। आज भी बच्चे उसी फ्रेम में परीक्षायें देकर वेल ट्रेंड (बहुप्रशिक्षित) बन रहे हैं। परन्तु दंश यह है कि हम उन्हें वेल एडूकेटेड अर्थात शिक्षित बनाने का दुःस्वप्न देख रहे है। हमारे बच्चे शिक्षा को याद करके जीवन में उतारना चाहते है। परन्तु क्या रटने से हम किसी विषय या बिंदु को आत्मसात कर सकते हैं? शायद नहीं क्योंकि समझने की प्रक्रिया याद करने की प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न है। आज के समय में शिक्षा पालिसी जितना दोषी है उतना ही दोषी आज के अभिभावक हैं आज के समय में अभिभावक भी रिजल्ट ओरियेंटेड हो चुके हैं उन्हें बच्चों के नालेज ओरियेंटेड होने से कोई सरोकार नहीं है। वो रिजल्ट खुलने के दिन अपने बच्चे का नाम मैरिट लिस्ट  में सबसे ऊपर देखना चाहते है। वो चाहते हैं कि हमारा बच्चा १०० प्रतिशत रिजल्ट लेकर आये भले ही वो परीक्षा के बाद वो उस रटे रटाये उत्तरों को भूल जाये। इस उद्देश्य के लिये बच्चों पर अनावश्यक दबाव होता है। ये दबाव विद्यालय, शिक्षक, समाज से अधिक अभिभावको का अधिक होता है। वो समाज  में अपने स्तर को ऊँचा उठाने के लिये बच्चे के परीक्षा परिणाम को स्टेटस सिंबल बना कर देखते हैं। बोर्ड परीक्षाओं में यह सबसे ज्यादा देखा गया है। जो बच्चे के भविष्य के हिसाब से कदापि सही नहीं होता है। इस दबाव के चलते बच्चों को आत्महत्या तक करनी पड़ जाती है। हमें बच्चों को यह समझाना होगा कि रिजल्ट कैरियर के लिये एक अहम पहलू हो सकता है परन्तु वह इतना भी अहम नही है जितना की ज्ञान। इसलिये बच्चों को रिजल्ट के साथ साथ ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिये ताकि वो अपने ज्ञान के दम पर जीवन यापन कर सके। परीक्षाओं के दौरान एक मानसिक बीमारी एग्जाम फियर को भी हम नकार नहीं सकते हैं।
      हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि बच्चा यदि ज्ञानवान है और उसका रिजल्ट कुछ कम भी है तो वो अपने ज्ञान के दम पर अच्छे मुकाम तक पहुंच सकता है। हमारा ज्ञान हमारी सफलता को हमारा पीछा करने के लिये मजबूर कर देती है। नौकरी में दो प्रकार से लोग सेवाए देते हैं। एक जुगाड से (सोर्स से) और दूसरा ज्ञान से (रिसोर्स से) पहले किस्म के लोगों को हमेशा जुगाड की आवश्यकता होती है और दूसरे किस्म के लोगों को हमेशा अवसर खुद बखुद मिल जाते हैं। इसलिये रिसोर्स की तरफ बच्चों को जाना चाहिये। लार्ड मैकाले के फ्रेम से निकल भारतीय शिक्षा दर्शन की तरफ भी शिक्षा विभाग को जाना चाहिये जिसमें गांधी की बुनियादी शिक्षा और स्वामी विवेकानंद की मानव निर्माण की शिक्षा अपने में विशेश स्थान रखती है। शिक्षा विभाग को चाहिये कि वो शिक्षा पालिशी को बदले और परीक्षा प्रणाली को भी समय की मांग के अनुसार परिवर्तित करे ताकि बच्चे वेल एडूकेटेड होकर समाज में जायें ना कि वे ट्रेंड होकर। हम उन्हें नौकर ना बनायें एक अच्छा व्यवसायी बनायें। सरकार की शिक्षा नीतियों से सरोकार रखने वाले एनसीईआरटी,एनसीटीई,सीबीएसई,आईसीएसई,माध्यमिक शिक्षा मंडल जैसे राज्य के बोर्डों से उम्मीद की जाती है कि इस तरह की परीक्षा प्रणाली में नवाचार शामिल करके बच्चों को कलम घिस्सू बनाने से देश को बचायें। पुरानी परंपरागत शिक्षा व्यवस्था को पोस्टमार्टम करके नवीनीकृत रूप में ढालने की आवश्यकता है। बच्चों का मूल्यांकन परीक्षा नामक हौआ से नहीं बल्कि लगातार रूप से सर्वांगीण होना चाहिये। हमें ध्यान रखना चाहिये कि हम अभिभावक यदि अपने बच्चे को यह समझाये कि जीवन है तो परीक्षा है सफलता और असफलता सिर्फ पडाव है और इसके अलावा कुछ नहीं तो बच्चों की इस अनावश्यक दबाव वाली आत्म हत्यायें जरूर घटेंगीं।
अनिल अयान,सतना

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कर्जदारों के स्टेटस सिंबल

कर्जदारों के स्टेटस सिंबल
हमारा देश इस वक्त हाई प्रोफाइल बैंकिंग कर्जदारों से जूझ रहा है.देश की अर्थव्यवस्था चाह करके भी इन लक्ष्मी पुत्रो से उबर नहीं पा रहा है.अभी हमारे माननीय विजय माल्य देश के बैंकरों के कर्ज को लेकर विदेश में ऐशो आराम कर रहे हैं.देश चाहकर भी इन कर्जदारों का बाल भी बांका नहीं कर पा रहा है.४०० करोड के ऊपर के कर्ज को चाहकर भी न चुकाने की बात करने वाले भारत के ऐसे कर्जदार अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से टोड मरोड कर रख दिया है. यदि हम इन कर्जदारों की बात करे तो समझ में आता है कि देश की सरकार और प्रशासन इनके सामने खुद को मजबूर और निम्न स्तर का मानकर मौन धारण कर लेता है.बैंकरों की नीतियां भी इस तरह की परिस्थितियों के चलते प्रश्नों के घेरे में आजाती हैं. सोचने वाली बात है कि इस प्रकार दोहरी नीति से भारत के नागरिकों और आम जन का जमा धन किस दिशा में जा रहा है.एक आम इंशान को यदि बैंक से कर्ज लेने का विचार आता है तो उसे उस कर्ज को बैंक से लेने के वास्ते बैंक मैनेजर के आफिस के इतने चक्कर काटने पडते हैं कि वो कर्ज की उम्मीद खो बैठता है. यदि धोखे ब धोखे उसे कर्ज मिल गया और समय पर उसकी किस्त नहीं अदा कर पाये तो उसकी जमीन जायजाद सब कुर्की कर लिया जाता है.वो सरकारी अमले के सामने गोहार लगाता रह जाता है तब भी कोई सुनवाई नहीं होती है. परन्तु यहां पर स्थिति कुछ और ही है. विजय माल्या जैसे उद्योगपति सिर्फ अकेले नहीं है इसके पूर्व भी उनके जैसे भारत में बहुत से उद्योगपति खुद दीवालिया दिखाकर रुपयों के गद्दों में रातें काटते हैं. सरकार की नजर में ये दीवालिया और असहाय बने रहते हैं.परन्तु आंतरिक रूप से ये लक्ष्मी के वरद पुत्र के रूप में सुख सुविधाओं को भोग रहे होते हैं.
      किंगफिशर जैसे उद्योगों की पूंजी से भी असंतोष होने पर जब कर्ज के लिये बैंकर्स के दरवाजे खटखटाये जाते हैं उस समय बैंक किस उदारवादिता का परिचय प्रदान करता है.क्या कर्ज की राशि और उसकी कुर्की की आवश्यकता बैंक को नहीं होती है.और जब ये बाहर जाकर विदेश के ऐशो आराम भोगते हैं तो भारत की सरकार विजय माल्या जैसे पूंजी पतियों को कैसे लुक आउट नोटिस तक समेट कर मामला रफा दफा कर देती है.हमें इस बात को संज्ञान में लेना होगा कि पूंजीपतियों का यह मंसूबा होता है कि सरकारी खजाने का प्रयोग करके अपना व्यापार खडा करें  और घाटा दिखाकर सरकार और जनता का पैसा हजम कर लिया जाये. सोचने वाली बात यह है कि बैंक की नीतियां क्या कर्ज कर्जदारों का स्टेटस सिंबल देखकर देती है और वसूली में उनका रुतबा और शोहरत की देखा सिखी काम होता है.आम कर्ज लेने वालों को कोई रियायत क्यों नहीं है जो समय पर अपनी हर किस्त देता है और उसे कर्ज के लिये इतना चक्कर क्यों लगाना पडता है.हमारे देश में जब चुनाव होते हैं तो इस प्रकार के पूंजीपतियों को कैसे संसद में जाने की अनुमति और जनमत मिलता है यह भी सोचने का मुद्दा है. मीडिया और राजनैतिक पार्टियों में इनका रुतबा तो इतना है कि आज ट्वीटर में इनके मिजाज ये बताते हैं कि मीडिया और राजनैतिक पार्टियां किस तरह इनकी आर्थिक गुलाम हैं. सीबीआई और न्यायालय को ये लोग ढेंगा दिखाकर देश को यह बता रहे हैं कि आज के समय में अर्थव्यवस्था और विकास सब इनकी झोली में सुरक्षित है.जब चाहे विजय माल्या जैसे लोग अपनी झोली के दम पर नियम कायदों को अपने जूतों के नीचे रौंद सकते हैं
      ४०० करोड का कर्ज क्या भारत के आईडीबीआई बैंक और अन्य बैंकरों को वापिस कैसे मिलेगा.यह जवाब किसी के पास नहीं है.यहां तक की सरकार के पास भी नहीं.भविष्य में देश में ऐसी घटनायें ना हो इस लिये आवश्यक है कि सरकार के साथ रिजर्व बैंक की  आर्थिक लोन नीतियों को हर वर्ग के लोगों के लिये समान होनी चाहिये.विजय माल्य जैसे कर्जदारों की नाक में नकेल कसने के लिये न्यायालय,सीबीआई और अर्थव्यवस्था से जुडे हुये हर जिम्मेवार ब्यूरोक्रेट्स को इनके दबदबे से बाहर निकल कर काम करना जरूरी है.सरकार का सरोकार यह भी है कि पूंजीपतियों को उनकी पूंजी के अनुरूप कर्ज दिया जाये तो नियमित समयावधि के अनुसार वापिस भी लिया जाये अन्यथा कठोर कार्यवाही की जाये.सरकार को यह ध्यान रखना होगा कि कर्जदारों को यदि अपने स्टेटस सिंबल के अनुसार ओहदा और रुतबा प्रदान किया जायेगा तो घर-घर,शहर-शहर,ऐसे उद्योगपति तैयार होंगें और जिस थाली में खायेंगें उसी में छेद करके विदेश का ऐशो आराम भोगेगें .जनता का पैसा इसी तरह बैंक के हाथों से निकल कर इधर उधर फिरता रहेगा.ये लोग सरे आम संसद में अपना हक जताते रहेंगें और संसद की गरिमा अमीर लक्ष्मीपुत्रों के स्टेट्स सिंबल के चलते शर्मसार होती रहेगी.हम सिर्फ ढोल पीटते रहेंगें.जो हमारी नियति है और विधान भी है.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

बचत पर सरकारी डांका

बचत पर सरकारी डांका
अच्छे दिन का स्वांग भरने वाली सरकार अब आम जन की बचत पर घातक वार कर चुकी है. अच्छे दिन का रामराज्य कितने दिन तक आम जन ने भोगा है यह तो जनता नहीं जानती है परन्तु यह तो वह समझ गई है कि अब उनकी बचत की थैली में सरकार ने डांका डाल कर बैंको के लाकर्स में में जप्त कर ली गई है. सरकार ने जिस तरह भविष्य निधि को निकालने की उम्र ५८ साल करने का निर्णय लिया और मार्च गुजरते गुजरते वो डाकघरों की प्रमुख योजनाओं की ब्याज दरों में अच्छी खासी और भारी भरकम कटौती करके आम जन और सर्वहारा वर्ग की कमर तोडने का काम भी बखूबी पूरा कर लिया है. अच्छे दिन की झलक और बचत में बुरे दिनों के अढैया और सारे साती की नजर बाजारवाद के सहारे जरूर आम जन को दिखने लगी है. सरकार को आज के समय में बैंको से सरोकार सबसे ज्यादा है. जहां पर एक तरफ सरकार स्विस बैंकों में जमा काला धन ला नहीं पाई और सिर्फ ढकोसलों से ही काम चलता रहा  वहीं दूसरी ओर देश का सफेद धन उद्योग पतियों की काली नजर से काला होकर जरूर विदेश में ऐश करने के लिये सदुपयोग किया जा रहा है.यह सब देश की सत्ता और सरकार को उद्योग पतियों के घर की तिजोडियों के अंदर वैचारिक रूप से  गिरवी होने का अप्रत्यक्ष संकेत ही तो है. हम सबको पता है कि आम जन वोटबैंक बनाने के काम में आता है जबकी उद्योगपति चुनाव के समय में राजनैतिक पार्टियों की आर्थिक रीढ की हड्डी को मजबूत करने का महत्वपूर्ण दायित्व हर वर्ष ही निभाते हैं.
      सरकार ने रिजर्व बैंक की अनुसंशा में जिस तरह से एक दो नहीं बल्कि डाकघर की सभी ११ योजनाओं की ब्याज दरों में थोक के भाव छटनी और कटौती किया वह आम जन की समझ के परे है.  भले ही सरकार तीन महीने में ब्याज दरों की जितनी भी समीक्षा कर ले परन्तु यह तो तय है कि आम जन अपनी छोटी छोटी बचत से जो थोडा बहुत भविष्य के लिये जमा करके रखता है उसमें भी सरकार ज्यादा कुछ लाभ देने के पक्ष में नहीं है. हां सरकार बैंको के द्वारा मिलने वाले लोन और विभिन्न प्रकार की योजनाओं में भारी भरकम छूट का मन बनाये हुये है. मासिक आय योजना से लेकर वरिष्ठ नागरिक बचत योजना सहित १२ योजनाओं की ब्याज दरें जिस तरह १.३-१.५ प्रतिशत कम कर दी गई है. उसके चलते एक अप्रैल से आम जन को बाजार के भाव अपनी बचत योजनाओं को गिरवी रखना पडेगा. सरकार यह बिल्कुल भी नहीं चाहती कि आम जन अपने पैसे से कोई भी विकास का काम, या समाज में स्तर सुधारने की पहल कर सके. वो चाहती है कि हर व्यक्ति घर बनवाने से लेकर बच्चे की पढाई तक के लिये सरकार के द्वारा बैको के माध्यम से कर्ज ले. और उम्र भर बैंको की किस्त और ईएमआई भरता रहे.सरकार हर इंसान को बैंको की जटिल प्रणाली के कब्जे में रखना चाहती है.सरकार चाहे जिस भी पार्टी की हो परन्तु कुछ प्रश्न इस प्रकार के निर्णयों से जरूर जेहन में घूमते हैं. कि यदि नौकरी पेशा व्यक्ति पीएफ ५८ साल तक निकाल नहीं पायेगा. इन योजनाओं से उसे खास कर लाभ नहीं होगा तो कर्ज में वो कब तक खुद को स्वतंत्र महसूस करेगा. इस फैसले से फायदा किस सेक्टर को सबसे अधिक और सबसे ज्यादा नुकसान किसे है. क्या बैंक सरकार के सरकारी दामाद हैं जिनको इस दायरे से कोसों दूर रखा गया है.और सबसे बडा सवाल तो यही है कि सरकार इस तरह की कटौती आम जन की बचत की थैली में ही क्यों की है.     
      रिजर्व बैंक पिछले साल से चार बार रैपो रेट कम कर चुका है. बैंक उधर अपनी कर्ज की ब्याज दरों में कमी करना नहीं चाहते हैं. सरकार भी इस सब कटौतियों से सारा धन बैंक के पास भेजने के लिये भूल भुलैया तैयार कर रही है. जिसमें फंस कर आम इंसान अपनी अंतिम सांस लेने के लिये विवश होगा.सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि आज भी भारत देश में पोस्ट आफिस की सुविधाओं का लाभ लेने वाला जनता का बडा भाग मौजूद है. जो अपनी बचत के कुछ लाभ के लिये इस प्रकार की योजनाओं में फुटकर किस्तों से पैसा लगाकर भविष्य को सुखी बनाने का सपना उम्र भर बुनता रहता है. इस पूरे मुद्दे में सरकार ने जनता को मजबूर किया है कि वो बैंक के पास जाकर कर्ज ले अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करें और उम्र भर कर्ज की किस्त अपनी तनख्वाह से कटाते हुये स्वर्गवासी हो जाये. वो पोस्ट आफिसों की सुविधाओं से दूर होकर बाजारवाद के विकास के लिये देश के बैंको को अपनी कमाई का अधिक्तर रकम सुपुर्द करें.क्या बैंक अपनी ब्याज दरों को कर्ज के अनुसार इस निर्णय के बाद कम करेंगें.यह प्रश्न अब भी बरकरार है. इस पर ना सरकार कुछ बोल रही है. और ना ही रिजर्व बैंक अपनी चुप्पी तोडने का मूड बना रहा है. सरकार भले ही इस निर्णय के लिये जितना खोखला दावा कर ले  कि बचत की ब्याज दर घटाने से पूरी अर्थव्यवथा की ब्याजदरें अपने आप नीचे आयेंगी.और बैक आम जन के सहयोगी के रूप में काम करेंगें.यह तो वही बात हुई कि कब तेली की तीस मन तेल होगा और कब राधिका नाचेगी.भविष्य निधि पर आम नौकरी पेशा वाले कर्मचारियों पर मार और अब उनकी बचत के रुपयों पर मिलने वाली सरकारी ब्याजदरों की कटौती दोहरे तरीके से रोटी कपडा मकान और जीवन शैली को बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित करेगी. अब सरकार को सोचना है कि क्या वो अर्थव्यवस्था के शेख चिल्ली के सपनों वाले फायदे के लिये आम जनता और नौकरी पेशे के कर्मचारियों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाकर बाजार में नीलाम करेगी. या सफेद धन को वापिस भारत में लाकर बैंको की प्यास को बुझाकर जनता को कुछ चैन की सांस और राहत मुहैया करने के लिये पहल करेगी.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७