मंगलवार, 23 मई 2017

कानूनन जीवित प्राणी बनती नदियां

कानूनन जीवित प्राणी बनती नदियां
मध्य प्रदेश में हाल ही में नर्मदा नदी को जीवित इकाई मानने का संकल्प लिया है। कल ही नर्मदा सेवा यात्रा का प्रधानमंत्री जी ने समापन किया है। इस एक सौ पचास दिन की यात्रा के दरमियान नर्मदा मात्र नदी के रूप में अपने अस्तित्व के साथ साथ एक आत्मीय अस्तित्व में खुद को बदल चुकी है। साहित्य में सुभद्रा कुमारी चौहान की रचना -  कदंब का पेंड और इसके अस्तित्व को सार्थक करती यह यात्रा हम सबके बीच रही। इस समूचे उपक्रम में नर्मदा के मूल चूल को परिवर्तन करने का जो जज्बा हमारे मुख्यमंत्री जी ने देखा है वह कितना साकार होता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। परन्तु यह तो इस पंच वर्षीय में हुआ ही कि नर्मदा को जीवित प्राणी का अस्तित्व मिल ही गया। जो इस सरकार के लिये उपलब्धि के रूप में अंकित हो जायेगा। शिवराज सिंह चौहान अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने बचपन के उन पलों को दर्शनशास्त्र से जॊडकर देखने और उसे साकार करने का काम किया है जिसका केंद्र नर्मदा नदी रही। इन डेढ सौ दिनों में नर्मदा का अस्तित्व उसकी अवधारणायें और उसकी आकांक्षाओं पर खूब चर्चायें विमर्श किये गये। बहुत से निर्णय लिये गये। बहुत से कदम उठे। जो एक विकास की बात करते नजर आये।
इसके पूर्व न्यूजीलैंड की संसद ने वहां की वांगानुई नदी को एक कानूनी व्यक्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की। उसके बाद उत्तराखंड ने उच्च न्यायालय ने गंगा यमुना को जीवित प्राणी मानने का कार्य किया। और कुछ हो चाहे ना हो परन्तु ये खबरें प्रकृति प्रेमियों और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिये हर्ष का पल होगा। यह विषय पर्यावरणप्रेमियों को सुकून देने का काम करेगा। इधर मध्य प्रदेश में नर्मदा के लिये यह प्रयास पर्यावरण की दृष्टि से सराहनीय कदम होगा। जिसके अंतर्गत इस सरकार ने लगभग पांच सौ चालीस करोड रुपयों का बजट इस नदी के उद्गम अमरकंटक से आलीराजपुर तक उत्थान के लिये रखा है। जिसमें स्पर्श करने वाले सोलह जिलों की सीमाओं को फलौद्द्यान घने जंगलों का विकास आदि लक्ष्य रखा गया है। विरोध के उफान के बाद भी यह यत्रा अपने चरम पर पहुंच चुकी है। परन्तु इसके बाद भी यह प्रश्न बाकी है कि जीवित प्राणी का दर्जा पाने वाली नदियां किस तरह एक नागरिक की तरह अपना अस्तित्व कायम करेंगीं। किस तरह और कौन उनके अस्तित्व को बचाने वाले पालनहार का दायित्व निर्वहन करेगा।
सवाल तो कई मन में उठते हैं जिनका समाधान सरकार और कानून को खोजना होगा जिसमें सबसे बडा सवाल यह है कि नदी के अधिकार और नदी के लिये हमारे कर्तव्य कया होंगें। नदी की अविरलता को बाधा पहुंचाने वालों की क्या सजा होगी। क्या बांधों का अस्तित्व इसकी वजह से प्रभावित होगा। क्यों की बांधों की वजह से नदियों की तीव्रता और आविरलता बाधित होती है।नदी के कचडे को अलग करने के लिये क्या गंगा विकास प्राधीकरण जैसे विभागों का गढन होगा। क्या नदियों के संवैधानिक कर्तव्य और उत्तर दायित्व भी होंगें। संवैधानिक रूप से देखें तो समझ में आयेगा कि गैर मनुष्य को जीवित इकाई के रूप में मान्यता मिलती है तो उसके लिये अभिभावक निशिच्त किये जाते हैं। क्योंकि उनके लिये यह स्थिति अवयस्क की होती है। ऐसे में सरकार क्या करेगी। वर्तमान में जल प्रदूषण अधिनियम जिसमें निवारण और नियंत्रण आता है १९७४ से हमारे देश में लागू है। पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम १९८६ से लागू है। धारा ४३०-४३५ तक में जल श्रोतों को खत्म करने , उन्हें हानि पहुंचाने वाले को कडे से कडे दंड का विधान है। किंतु रेत उत्खनन से लेकर, नदी के बहाव में बाधाएं उतपन्न करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। नर्मदा की ही बात करें तो राजनीतिज्ञों के भाई पट्टीदारों का पूरा समूह सक्रिय है जो रेत उत्खनन का लंबा कारोबार रात के अंधेरों में चला रहे हैं। नर्मदा का ही कई जिलों में अतिक्रमण करके प्रवाह बाधित कर दिया गया। उस समय क्या निर्णय न्यायालय द्वारा लिया जायेगा।
इतना बजट होना, उसका सही ढंग से उपयोग होना ताकि नर्मदा संरक्षित की जा सके, अमरकंटक और सतपुडा का यह अनुपम प्राकृतिक उपहार आगामी पीढी के सुरक्षित की जा सके। यह उद्देश्य अभी भी इस यात्रा के बाद अपना मुंह बाये खडे हुये हैं। क्योंकि जितना सकारात्मक सोचने वाले लोग हैं उससे कहीं ज्यादा दोहन करने वाले लोग इस जगह पर मौजूद है। तटों से संरक्षण से लेकर नदी के भयावह रूप को रोकने के लिये उपाय खोजना भी इसी सरकार का दायित्व होगा। ये एक सौ पचास दिन अगर नर्मदा के नाम को प्रचारित करने, इसके सहारे अपनी उपलब्धियों में इजाफा करके के लिये उपयोग किया गया। नर्मदा को जीवित प्राणी का दर्जा दिलाने की अप्रतिम मुहिम शुरू की गई है। तो अब आने वाले समय में सरकार को अपने नैतिक और प्रकृति के प्रति दायित्व के अंतर्गत यह करना होगा कि उपर्युक्त कानूनी और संवैधानिक सवालों के उत्तर खोजे। अपने बजट को नदियों के लाभ के लिये खर्च करे। नर्मदा के साथ साथ अन्य नदियां भी अपनी अंतिम सांस ले रही हैं। उनका संरक्षण भी अगले क्रम में होना चाहिये। क्योंकि मालवा के साथ साथ विंध्य और बुंदेलखंड भी इसी उम्मीद में चातक की तरह इंतजार में खडे हुये हैं। नर्मदा अगर अपने संघर्षरूपी अस्तित्व को इस यात्रा के परिणामों के द्वारा जीवित प्राणी बनने में अगर असफल होती है तो सबके मुंह के बोल यही होगें "शिवराज तेरी नर्मदा मैली ही रही"। परन्तु एक आश बांकी है कि नर्मदा के साथ अन्य नदियों का समय बदलने वाला है सबको जीवित प्राणी की तरह स्वतंत्रता मिलने वाली है। सुनने में जितना सुखद लगता है वास्तव में यह फैंटेसी में जीने की तरह ही महसूस होता है। अगर नदियों की अविरलता और प्रवाह बचेगा तभी वो जीवित रह पायेगीं।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७



शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मौत को गले लगाता, हमारा मजबूर अन्नदाता

मौत को गले लगाता, हमारा मजबूर अन्नदाता
हमारा देश भी अजीबो गरीब चलचित्र बन कर रह गया है। एक तरफ देश में चमकते कांक्रीट के महानगर खडे हो रहे हैं और दूसरी ओर जय जवान जय किसान की दुंदुभी बजायी जाती है। एक तरफ देश के विकास करने और विकास दर पर गर्व किया जाता है और दूसरी ओर देश के युवा और किसान दोनो अपनी स्थिति पर रो भी नहीं पाते। हमारा प्रशासन और सरकारें यह समझने को कतई तैयार नहीं हैं कि अगर जवान और किसान तबाह हुआ तो देश के चमकते महानगर भी बर्बाद हो जायेगी। और इस तबाही को कोई रोक नहीं सकेगा। राजधानी में पीएमओ तो किसानों के एक समूह को इस तरह नजरंदाज कर दिया है मानों वो देश से उसकी आत्मा निकालकर देने की मांग कर रहे हों। ऐसा नहीं है कि यह मामला मात्र तमिलनाडू का ही बस हैं। मध्य प्रदेश का ६० प्रतिशत जिसमे बुंदेलखंड, बघेलखंड,मालवा, का क्षेत्र पंजाब, तमिलनाडू, महाराष्ट्र जैसे ना जाने कितने राज्य और उनके किसानों की दुर्दशा इस  मुद्दे का गवाह रही है। हरित क्रांति के नाम पर कुछ दशक जितने सुकून दायक थे जिसमें कि गेहूं और चावल की खेती ने अच्छा उत्पादन दिया किंतु दो हजार दस के बाद तो किसानों पर मौसम सरकार और बैंक तीनों के एक साथ कहर ढाया हैं। इसके लिये कौन जिम्मेदार है यह जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस स्थिति से अपने देश के अन्नदाताओं को कैसे बाहर निकाला जाये
किसानों की खुद की सक्रियता में कमी होने के साथ सरकारों के द्वारा खराब मानसून के चलते बदहाली रोकने के लिये आवश्यक कदम ना उठाना भी इस जीवन संघर्ष का मुख्य कारण रहा। दिल्ली के जंतर मंतर में तमिल नाडु के किसान लगभग चालीस दिनों से विरोध प्रदर्शन की पराकाष्ठा को लांघ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी तो इस मामले में ऐसे उदासीन हो गये हैं जैसे मानवता की पीडा का उनके सामने कोई महत्व नहीं रहा। किसानों के द्वारा केंद्र से लोन की माफी और मुआवजे की मांग किसी भी कोण से नाजायज नहीं है।इसी का परिणाम रहा है कि देश के अन्य राज्यों में किसान मौन आत्महत्या का रास्ता अपनाया है। और तो और सूखे की मार से तो देश की ६०-७० फीसदी खेती नष्ट हो चुकी है। खाने को अन्न और पीने को पानी की कमी ने जीवन को त्रासद मोड पर लाकर खडा कर दिया है। राज्य सरकारें तो मौन धारण की ही हुई हैं किंतु केंद्र की तरफ से इस तरह की उदासीनता मानवीय तौर पर समझ के परे हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद तमिलनाडू सरकार के देरी से उठाये जाने वाले कदम की वजह से आत्महत्यायें बढ रही हैं। मध्य प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। अब देखना यह है कि क्या तमिलनाडू की तरह अन्य राज्य के किसानों को इसी तरह से कुछ करके सरकार और प्रशासन की आंख खुलवाना पडेगा या राहत के रास्ते पर सरकार चलकर अन्नदाताओं को कुछ लाभ प्रदान करेंगीं।
रिजर्व बैंक और उनके सहकारी ग्रामीण विकास बैंकों की  भूमिका इस दौरान ज्यादा बढ जाती हैं। मध्यम श्रेणी और निम्नश्रेणी किसानों के लिये योगी सरकार के द्वारा कर्ज माफी का निर्णय अन्य राज्यों के लिये एक सीख के रूप में है। मौसम की मार तो वैसे भी किसानों का जीना हराम किये हुये हैं किंतु प्रशासन और सरकार भी अपने अन्नदाताओं का ख्याल ना रखेगी तो इनका माई बाप कौन होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधे से अधिक दारोमदार खेतीकिसानी और उसके निर्यात के रूप में टिकी हुई है। अगर अन्नदाताओं की खैर ख्वाहिश ना ली जायेगी तो हम सब भूखों मरने के लिये भी विवश हो जायेंगें। आज के समय में किसानों फसल का जिस तरह मंडियों में न्यूनतम विक्रय मूल्य तय किया जा रहा वह बहुत ही चिंताजनक हैं। यह तो तय है कि रिजर्व बैंकर्स और इनकी विभिन्न साखाये भी सरकार की सहमति से किसानों के पक्ष में निर्णय लें तथा कर्ज माफी के लिये कदम उठायें तो भला हो सकता है। अति सक्रिय प्रधानमंत्री जी और उनके मुख्य सचिव के द्वारा पीएमओ के बाहर इस हृदय विदारक किसानों के विरोध का कोई प्रतिक्रिया ना देना और नजरंदाज करना वाकयै मानवीय दृष्टिकोण की धज्जियां उडाना है। किसानों की आत्म हत्या को रोकने की बजाय इस तरह का मौन उनकी मजबूरी को सरेबाजार नीलाम करने से भी बद्तर है। सुप्रीमकोर्ट के साथ अगर केंद्र सरकार साथ दे दे तो निश्चित ही राज्य सरकार तीव्रता से फैसला लेकर किसानों का भला करेगी। ऐसी उम्मीद तो जताई ही जा सकती है। अब तो किसानों के माईबापों को अपने मुखर होने का सबूत अन्नदाताओं को देना होगा।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

समय होत बलवान

समय होत बलवान
योगी आदित्यनाथ जी के मुख्यमंत्री बनने से अब सुनने और महसूस करने से समझ में आने लगा है कि राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मुद्दे को दोबारा हवा देने के राजनैतिक कयास लगाये जा रहे हैं। हालांकि मामला सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है। किंतु इस प्रकार के विषयों को राजनैतिक रंग प्रदान करना कहीं ना कहीं समाजिक समरसता के लिये प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं। लगभग अडसठ साल गुजरने को है किंतु इस राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विषय ने उत्तर प्रदेश को हर वक्त गर्म रखा है। नब्बे के दशक की देशव्यापी रथ यात्रा की शुरुआत ने भाजपा के लिये वोट बैंक का काम की। सन बान्नवे में बाबरी मस्जिद का ढहाना और न्यायमूर्ति लिब्रहान की अध्यक्षता में आयोग का गठन, सन दो हजार दो में ए,एस.आई की जांच,और दोहजार दस में हाई कोर्ट का फैसला जिसमें विवादित स्थान को तीन भाग में बांटने की बात कहीं। सन ग्यारह के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय को स्टे के फ्रीज प्वांइट में डाल दिया है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकस करते हुये यह शर्त रख दी की अगर दोनो पक्ष तैयार हों तो कोर्ट के बाहर कोर्ट मध्यस्थता करने के लिये तैयार है। परन्तु यह संभव ना हो सका। इस समय चक्र के फेर ने नौ बार सुलह की कोशिशें नाकाम हो चुकी है। माननीय बाजपेयी जी तक इन दोनोपक्षकारों को एक मंच में नहीं ला पाये।
अबकी बार मामला और तूल पकड कर राजनैतिक हो गया जब एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने दोनो पक्षों को सुलह के रास्ते में सरकार के सहयोग की अपील कर रही थी वहीं दूसरी ओर से सुब्रमण्यम स्वामी जी ने अपना नया राग अलाप दिया कि मस्जिद सरयू पार बनायी जाये। एक तरफ दो हजार अठारह में राज्य सभा में बहुमत की आश लिये कानून बनाये की बात करती है और शीर्ष न्यायालय अब भी सुलह की राह खोजती है। चेतन भगत से लेकर उत्तर प्रदेश में इस मामले में राम मंदिर बनाने के नारे ज्वलंत हो रहे हैं। राजनैतिक रंग देते हुये जिस तरह पोस्टरों में मुस्लिम संप्रदाय के मौलाना काजमी को स्थान देकर एक और राजनैतिक खेल खेला गया। वह वहां के माहौल के लिये नितांत आपत्ति जनक था। मौलाना साहब तो सरे आम खुद को इस मुद्दे से कोसों दूर कर रहे हैं। पोस्टर में उनकी तस्वीर के जरिये संप्रदाय को राम मंदिर के पक्ष में लाने की बात मात्र राजनैतिक शरारत बता रहे हैं।दोनो पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को खत लिखकर कुछ बातें लिखी जिसमें चार शर्तों में दोनों की सहमति है। पहली शर्त यह है कि उसी दो दशमलव सात एकड जमीन पर राम मंदिर और बाबरी मस्जिद बने।दूसरी शर्त सुलह की पहल के लिये केंद्र अपने नुमांइंदे भेजे। तीसरी शर्त सुब्रमण्यम स्वामी और हाजी  महबूब जैसे विवादित बयानवाजों को इस विषय से बहुत दूर रखा जाये।चौथी शर्त यह है कि अयोध्या में दोनो पक्षकार एक साथ बैठें।और कोर्ट के जरिये फैसला किया जाये। इस सुलह के लिये कांग्रेस भी समर्थन करती नज्र आती है। एक तरफ सुब्रमण्यम स्वामी अपने पूजा के अधिकार का हवाला देते हुये नये रंग देने का प्रयास करते हैं। तो दूसरी तरफ शत्रुधन सिन्हा अपनी ओअर ए एन आई को यह कहते हैं कि ऐसी भी क्या जल्दी है अभी सब कुछ आराम से चल रहा है।सुख शांति तो बनी हुई है। कहकर मामले को और कुछ समय के लिये कोर्ट की छांव में विश्राम करने देना चाहते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि देश में सर्वोत्तम पार्ट की रूप में भाजपा राम नाम जपते जपते पहुंच गई। उत्तर प्रदेश में भगवा मुख्य मंत्री जी अपनी सत्ता में है। भाजपा भी राममंदिर को वहीं बनाने की बात तो करती है किंतु न्यायपालिका के विरोध में यह काम कब शुरू होगा इस पर दस कोस पीछे कदम कर लेती है। क्या इस विषय का आउट आफ सुप्रीम कोर्ट कोई सुलह होने की गुंजाइस है। क्या वाकयै सरकार इस विषय को सुलझाना चाहती है। अगर राम मंदिर और बाबरी मस्जिद में से एक ही बनता है तो सबका साथ सबका विकास का जुमला क्या जुमला ही बनकर इतिहास में दर्ज हो जायेगा। इस मामले में राजनीति इतनी बलवान हो रही है। कि वो सब जानती है मामला पेचीदगी की हद को पार कर रहा है। कोर्ट तक इस मामले में मौन व्रत का पालन कर रहा है। तब भी मामले को और विषय की पेचीदगी को बिना समझे तूल दिया जा रहा है ताकि असांप्रदायिकता का माहौल बन सके। जो सरासर गलत है। कहते हैं कि कुछ मामले अगर शांति व्यवस्था को बनाये रखने हेतु समय पर छॊड देते है तो ही बेहतर है। क्योंकि नब्बे के दशक की भाजपा और अब की भाजपा में बहुत बडा अंतर वैचारिकी में आ चुका है। न्यायपालिका सरकार का हस्ताक्षेप मांग रही है। पक्षकार भी इस मुद्दे को शांत बनाये रखना चाहते हैं। इसके बावजूद में बडबोले बोल यह नहीं समझ रहे कि समय होत बलवान।

अनिल अयान,सतना

गुरुवार, 30 मार्च 2017

हर राज्य मौन, अब अगला कौन

हर राज्य मौन, अब अगला कौन
उत्तर प्रदेश में कुछ दिनों से एक संप्रदाय के लोग इसलिये चिंतित थे क्योंकि वर्तमान मुख्यमंत्री जी ने अवैध बूचडखानों को सील करने की घोषणा कर चुके हैं।कई बार इस मुद्दे को धार्मिक आधार बना कर उठाया गया।क्योंकि मुख्यमंत्री जी का दर्जा मीडिया में एक हिंदूवादी राजनैतिक व्यक्तित्व के रूप में हमेशा की तरह देखा जा रहा है। बूचडखानों के बंद होने की प्रक्रिया का होना और उससे जुडे लोगों की परेशानी एक तरफा सवाल खडा करती है। परन्तु इस सबसे हटकर अगर इसका दूसरा पक्ष देखा जाये तो कई सवालात अपने जवाब खोजने के लिये आतुर नजर आयेंगें। यह भी समझ में आयेगा कि कैसे यह मुद्दा मानव स्वास्थ्य के साथ भी गहरा ताल्लुक रखता है।इसके बाद हमें यह भी सोचना चाहिये होगा कि क्या यह काम हर राज्य को नहीं प्रारंभ करना होगा। जब से अवैध बूचडखानों के प्रति कार्यवाही की गई है तब से निश्चित ही सरकार को भी आर्थिक हानि हुई है।इस हानि की चिंता किये बिना भी सरकार क्यों इस पहल पर अडिग है। इसके पीछे कहीं ना कहीं राष्ट्रीय ग्रीन न्यायाधिकरण ने दो वर्ष लगभग पहले ही इस प्रकार के निर्णय लेने के लिये सरकारों निर्देशित किया था। क्योंकि अगर हम औसतन देखें तो समझ में आयेगा कि समाज में धर्म विशेष के परे भी एक बडा तबका मांसाहारी हो चुका है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इस प्रकार की स्थिति में इस बात की पुष्टि कौन करेगा कि इस तबके के द्वारा खाया जाने वाल मांस किसका है और कितना शुद्ध है।जब यूपी सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थ सिंह जी इस बात को मीडिया से कह रहे थे कि वैध बूचडखाने सुरक्षित हैं। अवैध बूचडखानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जानी सुनिश्चित हुई है। वैद्ध बूचडखानों के खिलाफ कार्यवाही करने वालों के खिलाफ भी कार्यवाही की जायेगी। उस समय ऐसा महसूस हुआ कि सरकार यह कह रही है कि बूचडखाने बंद करने की पहल यहां नहीं की गई बल्कि बूचडखानों को अवैध की श्रेणी से वैध बनाने की श्रेणी तक की मुहिम चलाई जा रही है।
अब ऐसा महसूस हो रहा है कि उत्तरप्रदेश में मांसाहार को वैध तरीके से अपनाने की पहल की जारही है। और मानव स्वास्थ्य के प्रति ग्रीन न्यायाधिकरण एन जी टी के कहे का देर से ही सही पालन तो कर रही है। यदि संबंधित कानून की बात की जाये तो इससे संबंधित कानून पचास के दशक से लागू है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस तरह के बूचडखानों को शहर की रिहायशी कालोनियों से दूर ले जाने की बात कह चुई है। आदेश जो २०१२ में पारित हुआ था उसके अनुसार राज्य सरकारों को समिति बनाकर बूचडखानों के लिये सुनिश्चित स्थान तय करना और उसे आधुनिकीकरण करना निर्धारित करना था ।यह भी ठंडे बस्ते में हर राज्य ने डाल रखा है। उत्तर प्रदेश में ५०० बूचडखानों में लगभग ३५० बूचडखाने वैध और बाकी अवैध है। बूचडखानों से सरकार को लाभ तो है ही इसीलिये तो केंद्र सरकार की कृषि और खाद प्रसंस्करण विकास प्राधीकरण एपीईडीए से इन्हें लाईसेंस देकर इनके व्यवसाय को बढावा दिया जाता रहा है। किंतु कई बूचडखाने के मालिक इस लाइसेंस के बिना ही मांस विक्रेता का काम करने लगे।सरकार का यह निर्णय इस कार्य को सही दिशा देने की पहल में लगी है। अब सरकार कहती है कि मांसाहार कराओ पर सही तरीके से तैयार किया गया ही मांस लोग सेवन करें। अनुच्छेद ४७ में भी जन स्वास्थ्य में सुधार संबंधी प्रावधानों को राज्यों के द्वारा शामिल करने की बात कही गई है।
यह तो तय है कि एक तरफ शाकाहार की बात की जा रही है। दूसरी तरफ अवैध बूचडखानों को बंद करके यह संदेश दिया जा रहा है अब मांसाहार सही ढंग से तैयार किये गये मांस से ही संभव हो पायेगा। तीसरी तरफ इसे धर्म के मुद्दे के तहत देखने के कयास लगाये जा रहे  हैं क्योंकि इस जगह पर काम करने वाले एक धर्म विशेष से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन जन स्वास्थ्य के नजरिये से देखें तो समझ में आयेगा कि सरकार यह फैसला हमारे मांसाहारी भाइयों के स्वास्थ से जुडा हुआ है। वैध बूचडखानों की संख्या को बढाकर उसकी आय को भी बढाने से जुडा हुआ है।यह सबके विकास से जुडा हुआ है।उत्तर प्रदेश ने जिस तरह एनजीटी के उस निर्णय को क्रियान्वित किया है जिसे अधिक्तर राज्यों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। यह पहल एक संदेश है कि अन्य राज्य भी अपनी मांसाहारी जनता को जन स्वास्थ्य हेतु अपने अपने राज्यों में ऐसे ही कदम उठायें।सबसे बडी बात यह भी है कि इस प्रकार के निर्णयों को राजनीति करने की एक चाल ना समझे तो जनता के स्वास्थ्य के साथ न्याय हो सकेगा।अब देखना यह है कि अगला कौन सा राज्य इस तरह का कदम उठाता है।
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

बुधवार, 15 मार्च 2017

पडोसी के घर कमल खिला रे।

पडोसी के घर कमल खिला रे।
वोटों की खेती करने का गुर प्रधानमंत्री जी से सीखने लायक है। वोटों की फसल को एक तरफा काटने वाले वाली भाजपा भारतीय राजनीति में एक व्यापक बदलाव लाने में सफलता हांसिल कर निश्चित ही बहुत प्रसन्न होगी। जिस तरह कष्ट के बाद भी भारत के मौद्रिक अनुशासन पर्व विमुद्रीकरण का अस्त्र उत्तर प्रदेश के लिये फायदे का सौदा रहा। यह विमुद्रीकरण अपने प्रभाव से भाजपा की शांति प्रक्रिया के चलते वोटों के विध्रुवीकरण को अंजाम दे दिया। पूरा का पूरा ध्रुव भाजपा ने अपने पक्ष में कर लिया। अन्य राज्यों के चुनावों और वोटों की संख्या से स्पष्ट हो जाता है। कि भारतीय राजनीति निश्चित ही एक नये मोड पर खडी हुई है। इस मोड में अन्य दल अपने विकास और पतन की बाट जोह रहे हैं। और वो इसी चिंता से ग्रसित हैं कि आखिरकार कमल चुनाव चिन्ह वाली पार्टी के सामने अन्य दल कैसे बौने बन गये हैं। या यह कहूं कि मोदी-घाट में हर जात पांत के लोगों का जमावडा लग ही गया। और चाणक्य के रूप में अमित शाह अपनी राजनैतिक गुरुता को शिद्ध कर दिया और उनके किंग मेकर के प्रयासों को सफलता मिली है। तो कोई बेमानी ना होगी।
भाजपा की जीत के पीछे जितना प्रयास भाजपा के प्रयास से  संभव हुई उससे कहीं ज्यादा अन्य दलों की आपसी वैचारिक नोंकझोक और गलत सिरे का प्रयोग करके आगें बढना रहा। सपा के कुनबे के अंदर विभीषण गिरी और जनता के द्वारा उनके शासन काल में दागदार व्यवस्था,लचर कानून व्यवस्था आदि प्रमुख कारण भी रहे। कांग्रेस का विकल्प  जब जनता के सामने आया जनता ने सपा को अपनी नजरों से ही गिरा दिया। वोट तंत्र में टिकट को लेकर रामलीला और प्रत्याशियों के परिवर्तन और आंतरिक कलह तथा बसपा सुप्रीमों मायावती का ट्रंप कार्ड जिसमें मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनावी जंग में उतारना सपा के लिये गर्त में गिराने की मुख्य वजह बन ही गई। परिवार के राजनैतिक प्रतिभागिता के बावजूद भी समाजवाद जैसे गर्त में धंस कर रह गया । उधर भाजपा ने तो इन कमियों के खिलाफ ही अपना मोर्चाखोला। काम बोलता है का जवाब उसने तो काम नहीं कारनामा बोलता है से शुरू किया। स्थानीय मुद्दों की चिंगारी से जनता के मन में सरकार के खिलाफ आग भडकाने का काम किया। बिहार की हार से भाजपा तो ठीक है अमित शाह और मोदी जी ने अच्छा खासा सबक लिया। भाजपा ने यहां तक काम के छोटे दलों अपना दल और सुलहदेव समाज की पार्टियों से काफी पहले गठबंधन करके उनके वोट बैंक भाजपा में मिला लिये। लोकल टच देने का फैसला चुनाव में भाजपा के कमल को खिलाने में खाद का काम किया। भाजपा ने गैर यादव और गैर दलित वोट बैंक को पूरी तरह अपने खाते में रखने का प्रयास किया और उसमें सफल भी रहा। देश का प्रधान मंत्री खुद राज्य में ताबडतोड रैलियां करके आक्रामकता का परिचय दिया। जिससे जातीय समीकरण के परिणाम को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। और तो और मीडिया ने इस बात को जग जाहिर कर दिया कि भाजपा भारत के अधिक्तर राज्यों प्रभावी राजनैतिक दल बन कर उभर रहा है।
२०१४ के लोकसभा चुनावों में भाजपा की ७१ सीट को उन्होने अपने खाते की तीन सौ प्लस के ऊपर ले जाकर कमल के तले मोदी- शाह युग का विकास कर दिया। उत्तर प्रदेश में संप्रदाय की लकीरों को अपना भाग्य नहीं बनने दिया साथ ही साथ ८१ प्रतिशत भाजपा सीटों ने भाजपा के इलेक्शन मैनेजमेंट सफल बना दिया। सारे कथानक जैसे भाजपा से शुरू होकर भाजपा में खत्म हो जाते हैं। अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश का मुख्य चेहरा कौन होता है। जिसका निदेशन मोदी जी के हाथों से होगा। राजनैतिक फसल काटने के बाद साथ में आगई खरपतवार के खतरों से भाजपा को बचाना जिसका मुख्य दायित्व होगा। हर संप्रदाय के लोगों की महत्वाकांक्षांओं को पूरा करना भी सरकार की चुनौतियां बन्कर सामने आयेगी। और अप्रत्यक्ष रूप से यह कहें तो हिंदुत्वसागर की हिलोरें अपनी तीव्रता को बढाने के लिये तीव्र अंगडाई लेंगी। बाबरी मस्जिद और राममंदिर के वैचारिक और धार्मिक मुद्दे भी अपने सवालॊं के जवाब इसी सरकार से चाहेंगें क्योंकि कहीं ना कहीं यह विषय और प्रवर्तन में इसी पार्टी से और मूल से जुडे हुये हैं। अब आने वाला समय अपने गर्भ में जिस यक्ष प्रश्न के उत्तर को खोजेगा वह है कि  किस प्रकार मोदी- शाह युग में समुदायों की अपेक्षायें, भाजपा और देश के राजनैतिक पक्ष प्रधानमंत्री जी कैसे सम्हालते हैं। जिसकी प्रस्तावना उत्तर प्रदेश से शुरू होगी। इस चुनाव के आचुके परिणाम का प्रभाव भाजपा शासित मध्य प्रदेश में देखने को अवश्य मिलेगा। क्योंकि अगले वर्ष में भाजपा शासित मध्य प्रदेश में चुनाव की दुदुंभी बजेगी। अब देखना यह है कि वर्तमान सरकार की स्थिति के चलते मध्य प्रदेश में भाजपा की परिस्थिति में यह चुनाव का परिणाम क्या प्रभाव डालता है। क्योंकि इसी के साथ साथ अन्य दलों के अगले केंद्र मध्य प्रदेश में भाजपा की सत्तारूढ स्थिति को बचाने हेतु कमल दल की चुनावी रणनीति तय होने का समय यह चुनाव ला चुका है।

अनिल अयान,सतना

गुरुवार, 2 मार्च 2017

सबके साधे "ना" सब सधे

सबके साधे "ना" सब सधे
जब वित्त मंत्री जी ने कुछ पंक्तियां बजट के दौरान पढी - पंख ही काफी नहीं आसमां के लिये।हौसला हम सा चाहिये ऊंची उडानों के लिये। रोक रखी थी नदी की धार तुमने कहीं। लेके आए हम ही कुदाली उन मुहानों के लिये। आखिरकार इस पंक्तियों के मायने में गौर करें तो समझ में आयेगा कि पिछले तेरह सालों से मध्य प्रदेश में भाजपा का ही शासन है और एक छत्र राज है तब से अब तक आखिरकार ये कौन है कि जो नदी की धार को रोक रखा है। और ये कुदाली किस मुहाने में चलाने की तैयारी की जा रही है। और यह जरूरत तेरह सालों के शासन के बाद भी क्यों? खैर इन सब सवालात के जवाब तो बजट प्रस्तुत करने वाले हमारे वयोवृद्ध वित्त मंत्री जी को ही पता होगा। किंतु प्रेस कांफ्रेंस के दौरान एक पत्रकार के पूंछने पर वित्त मंत्री जी का तंज कहकर यह बोलना" हां यह पालिटिकल बजट है... आप कहिये क्या कहना चाहते हैं।"किस खीझ को सामने लाती है। बजट सत्र के दौरान अपनी आर्थिक उपलब्धियों को सत्र २००३-०४ से तुलना करना भी समझ के परे रहा। यह सत्र काग्रेस के शासन काल का था।जिसमें दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे।उनके शासन काल में राज्य की परिस्थितियों की तुलना आज बारह साल के बाद करना भी समझ के परे था।इन सालों में  बजट आज आठ से दस गुना बढ चुका है किंतु आंकडों में अभी भी तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है और खुश हुआ जा रहा है। यह भी समझ के परे है। परन्तु इसके परे उनका कांफीडेंश घेरने वालों के लिये एक प्रश्न चिन्ह जरूर रहा ।
सरकार की तरफ से कर्मचारियों को सातवां वेतनमान देने की घोषणा की जो जनवरी से लागू हो रहा सेवा निवृति के बाद भी इसका लाभ कर्मचारियों को मिलने वाला है। पांच रुपये में दीनदयाल कैंटीन योजना के तहत खाना देने की घोषणा की गई। जिसकी राशि कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत जुटाई जायेगी। मेघावी बच्चों केलिये मुख्य मंत्री मेघावी विद्यार्थी योजना के तहत माध्यमिक शिक्षा मंडल के मेघावी विद्यार्थियों के लिये सरकार आर्थिक मदद मुहैया करायेंगी। मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से निकली नर्मदा नदी के संरक्षण के लिये आसपास के वन भूमि में वृक्षारोपण हेतु भी अच्छा खासा बजट दिया गया। ताकी नदी  का संरक्षण हो सके।यह सरकार की तरफ से पहला प्रयास किया गया।सो यह तो सराहनीय होना ही था। परन्तु इस बजट में विंध्य को जैसे अछूत मान लिया गया। भोपाल से खुशहाली चली तो परन्तु अपने गंतव्यों तक शायद ही पहुंच पाये जहां उसे पहुंचना चाहिये।लाडलियों पर भी सरकार की मेहरबानी भी बखूबी दिखी।परन्तु सोचने वाली बात यह है कि सरकार किसानों और सर्वहारा वर्ग की बातें खूब करती है किंतु इस बजट में टैक्स के संदर्भ में पूरी तरह की खामोशी छाई रही। और तो और किसानों, खेती किसानी करने वाले जमीन से जुझे अन्नदाताओं के लिये कोई खुशखबरी नहीं दिखी।एक जुलाई से लागू होने वाले जीएसटी पर भी कोई चर्चा नहीं की गई ना ही कोई प्रशिक्षण केद्र खोलने की बात इस संदर्भ में की गई।किसानों के लिये मुख्यमंत्री जी हर जगह यह घोषणा करना कि कृषि प्रधान मध्य प्रदेश के किसानोम को विशेष पैकेज दिया जायेगा।साथ ही सब्सिडी को लेकर इस साल के बजट में नये ऐलान होंगे।यह सब धरे के धरे रह गये।सिंचाई परियोजनाओं को शुरू करने के लिये भी कोई प्रारंभिक कदम सरकार की तरफ से नहीं उठाया गया। फसलों का समुचित भाव ना मिलना और बैंकों की कुर्की प्रविधियों पर भी सरकार का मौन कहीं ना कहीं अन्नदाताओं केलिये घातक जरूर शाबित हो रहा है।
खीझ करके वित्तमंत्री जी का प्रेस कांफ्रेंश में यह कहना कि "हां यह पालिटिकल बजट है।आप कहिये क्या कहना चाहते हैं।" कई मायनों में लुभावने बजट की जमीनी हकीकत और विकास के गहरे पैमानों के बीच बजट की स्थिति को स्पष्ट करती है।यह तो तय है कि इस बार आर्थिक ढांचा पूरी तरह से चुनावी बिगुल को मद्देनजर रखते हुए ही सरकार ने बुनी है। तेरह सालों से अधिक शासन के बाद विकास की धार को भी कुदाली के सहारे अगर मोडने की जरूरत आन पडी तो विकास की धार की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब देखना यह है कि इन योजनाओं की नदी की धार कुदाली किस ओर मोडती है। जहां आवश्यकता है वहां की ओर या फिर खाये अघाये महानुभावों की ओर यह विकास आर्थिक धारा का बहाव होता है। इस बजट ने जहां नौकरी पेशा शासकीय और अशासकीय कर्मचारियों को राहत की सांस लेने का मौका दिया वहीं दूसरी ओर अन्नदाताओं और जीएसटी तथा टैक्स देने वालों के मुंह में ताले जड दिये है।अंतत यही मुख्य बात है कि सबको साधने की कोशिश में सब नहीं सधता। कुछ ना कुछ छूट ही जाता है। यह बात और है मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भले ही इस छूटने को रूटीन राजनीति का हिस्सा मान लिया जाये।
अनिल अयान सतना
९४७९४११४०७

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

"प्रेम" खडा बाजार में खुद की मांगे खैर

चौदह फरवरी को हम सब जिस प्रेम की उपमाएं देते हैं। वो बाजरवाद से प्रेरित और पोषित है। फरवरी आते ही बासंती पवन इस प्रेम को जहां एक ओर प्रकृति से जोडने का काम करती हैं वहीं दूसरी ओर बाजार ने इस प्रेम को बाजार के चौराहे में खडा करके अपने फायदे के रास्ते खोजता है। यह सच है कि आज हम जितना पाश्चात संस्कृति की ओर अंधानुकरण करते हुए दौड रहे हैं उस दरमियां इस फरवरी का महत्व बाजार के लिये ज्यादा है। आज के इस युग में हर मानवीय रिश्ते के लिये बाजार ने एक दिवस निश्चित कर दिया है। बच्चे को ऐसी शिक्षा दी जा रही है कि वह अपने घर के गलियारे से लेकर स्कूल की क्लास रूप तक टीवी के सीरियल से लेकर सिनेमाघरों की फिल्मों तक आयातित मानवीय संबंधों का बाजारीकरण अपनी खुली आंखों से देख रहा है। आज के समय में परिवारों में जन्म दिन शादी की शालगिरह की तवज्जों इस लिये भी कम हुई क्योंकि इनका स्थान अब "डे" ने ले लिया है। आज अमुक डे हैं कल तमुक डे है। बच्चॊं से लेकर युवा तक इस रुपहले पर्दे के पीछे नेपथ्य में खडे ठहाके मारते बाजार को पहचानने में धोखा खा रहा है।
आज के समय में प्रेम की परिभाषा मात्र अफेयर्स के केद्र के इर्द गिर्द घूमती है। जो लोग इसका मर्म ना समझ पाये वो इसकी मार्केटिंग कर रहे है। जिन लोगों ने रहिमन धागा प्रेम का मत टोडो चटकाय, ढाई आखर प्रेम का पढे जो पंडित होय, प्रेम गली अति सांकरी आदि उक्तियों और दोहों के अर्थ को न समझा उनके हांथों में दिल का बाजार खडा है।आज के समय में तोह्फों का लेनदेन ही सर्वोपरि हैं। तोहफों की कीमत ने बाजार के पखवाडे को करोडों से ज्यादा की सीमा पार कर दिया है। आज का युवा मन बाजार की इस भागंभाग के साथ इतना व्यस्त हो गया है कि समय सापेक्ष मुद्रा और रिश्ते के बीच विभेद करना भूल चुका है। परवरिस में भी हमने हर चीज को अमूल्य की जगह मूल्यवान बना लिया है। हम हर रिश्ते और उसके हर आयाम को मूल्य से तौलने लगे हैं। मंदिरों में रखे गुलाब की कीमत उतनी नहीं है जितनी कि फरवरी के इस पखवाडे में बिकने वाले गुलाबों की किस्मों की तय होती हैं। आज के समय की मांग है कि हम हर रिश्ते को भावनाओं की दौलत से नहीं उपहारों की दौलत से मांपें। कौन सा व्यक्ति कितना मंहगा उपहार दे रहा है उसकी कीमत उपहारों की कीमत से करें। किसी ने अगर पत्र या फोन में दो प्रेम की बात कर ले तो उसकी कीमत इस लिये नहीं होती क्योंकि वो कोई मूल्यवान उपहार नहीं दिया.लोगों ने मलिक मोहम्मद जायसी,मीरा, उपेंद्र नाथ, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर,महादेवी आदि की रचनाओं और इनके मर्म को नहीं जाना किंतु,इनके लिखे हुए पर अभिनय करने वालो कॊ बखूबी पहचानते हैं। समय ने जिस वस्तु या विषय का मीडिया में विज्ञापन किया लोगों ने उसे खुले हांथों से स्वीकार किया।
प्रेम की अनुभूति किसको किससे कितनी है।इससे किसी का कोई वास्ता नहीं है।वास्ता है कि अमुक को तमुक से कितने गुलाब किस रंग के गुलाब और कितने मंहगे गुलाब मिले, या फिर अमुक ने तमुक को कितना मंहगा उपहार दिया। कितने मंहगे रेस्टोंरेंट में रात्रि का कैंडलनाइट डिनर कराया। यह सब प्रेम को परखने की श्रेणियां हैं। आज के समय में नॆटवर्किंग साइट्स ने बाजार का साठ प्रतिशत हिस्से को अपने प्रचार प्रसार से प्रभावित किया है। कोई भी दिवस हो कोई भी त्योहार हो किंतु बाजार की दिशा और दशा यह भी तय करने में माहिर साबित हुआ है। लोग सोनी महिवाल हीर रांझा को कितना जानते हैं भारतीयप्रेम कथाओं के इतिहास को कितना समझते हैं। इससे बाजार को कोई मतलब नहीं है। पुरातन काल से प्रेमी का प्रेमिका के लिये इतजार करना, पत्नी की जादू की झप्पी, मां का बेटे के गालॊं पर प्यार की चपत, पोती का दादी और नानी को प्यार से गले लगाना,और बहन का भाई की बांहों में सुकून पाना भी प्रेम की एक पराकाष्ठा हो समाज में रखता है।इसके लिये कोई दिन समय और घडी नहीं निश्चित की गई है। इसके लिये कोई दिन निर्धारित नहीं हुए। इसके लिये दिलों ने मूल्य निर्धारित नहीं किये। अंतर्मन की ललक ने जब अंगडाई ली तभी इन रिश्तों में प्रेम दिवस प्रणय दिवस मन जाता है। यही माहौल अगर चलता रहा तो यह तय है कि समाज में आने वाला वक्त बाजार की गिरफ्त में होगा। जिसके हांथ और दिमाग निर्णय लेंगें कि किस रिश्ते को कम पैदा करना है और कब स्वाहा करना है। हमें इस बाजारवाद के मनोवैज्ञानिक चक्र व्यूह से आगामी पीढी को बाहर निकालने के लिये प्रयास करने की आवश्यकता है।
अनिल अयान
९४७९४११४०७

शनिवार, 14 जनवरी 2017

"गांधी-मोदी-खादी"-एक नई मुनादी

"गांधी-मोदी-खादी"-एक नई मुनादी
स्वच्छ भारत के मोनो में एक चश्मा लगा देने से लोकप्रियता का ठिकाना नहीं था.तभी आपका खादी पहनकर फोटो खिंचाने की परंपरा की शुरुआत आखिरकार चरखे के पीछे सूत कातने की मुद्रा ने सबके मुंह बंद कर दिये.अचानक यह क्या हो गया हमारे प्रधानमंत्री जी को जिन्होने अभी अभी नोटबंदी का ट्रेलर दिया है.अब यह कौन सी नई मुनादी करने वाले हैं.हमारे प्रधानमंत्री जी तो वैसे भी एक जादूगर से कम नहीं हैं. कभी गांधी के विदेश में पुतले का अनावरण करते हैं.कभी रातो रात नोटों को बंद करने की घोषणा करते हैं.कभी ब्रिक्स सम्मेलन में सभी को खादी की जैकेट पहना देते हैं.कभी दस लाख का पाली सूट पहनकर अमेरिका के राष्ट्रपति की अगुवाई करते हैं.आप अपने राज्य की महिलाओं को चरखा बांट सकते हैं. आप यह सब कर सकते हैं क्योंकि आप हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं.आप गांधी जी के पैतृक राज्य से ताल्लुकात रखते हैं.आपका भी तो गांधी जी के साथ कुछ ना कुछ तो रिश्ता तो बनता ही है.जिसका पालन करने के लिये आप उत्सुक हैं.आप हम देश वासियों को इतने सरप्राइज देते आ रहे हैं कि अब तो आपका एक एक्सन हमारे अंदर के कोने कोने को हिला देता है.आपका चरके के साथ आना भी इसी अंदेशे को मन में उपजा ही देता है.कभी कभी लगता है कि आपके रंग मौसम की तरह बदल रहे हैं.आप जिस राजनैतिक पार्टी से संबंधित है उसमें गांधी को कांग्रेस से जोडकर देखा जाता है.गांधी की सोच कांग्रेस की सोच,गांधी के कपडे और उपयोग का सामान भी कांग्रेस का ही है.तो फिर आप इस तरह से कांग्रेसी सामान का उपयोग अचानक कैसे करने लगे यह समझ के परे था.जब स्व.गोडसे की गांधी वध क्यों पुस्तक फेरा तो समझ में आया कि कहीं ना कहीं विचारधारा का अंतर इतना ज्यादा गहरा क्यों हैं.
जब तुषार गांधी यह कहते हैं.आपके दिल में गोडसे और हाथ में चरखा है तो मन कहीं निराशा से भर जाता है.जब खादी ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष विनय सक्सेना कहते हैं कि हमने यह तस्वीर तब की प्रकाशित की थी जब प्रधानमंत्री जी ने महिलाओं को चरखा बांटा था.यह नियमित बदलाव है पहले भी हमने कई बार आयोग के कैलेडर में गांधी जी की तस्वीर को नहीं प्रकाशित किया.उस समय तो कोई पहाड नहीं टूटा.सब कुछ किया जा सकता है क्योंकि सरकार जब आपकी है तो हम मंत्रालय भी आपका है.किंतु कहीं ना कहीं कई सवाल मन को कचोटते हैं.चरखा वितरण के समय की यह तस्वीर क्या आपको विश्व पुरुष अर्थात गांधी जी की जगह पर पहुंचा सकती है.एक तरफ आपकी फंडिग जब अधिक्तर उन पूंजीपतियों को जाती है जिनका खादी से कोसों तक कोई संबंध नहीं है. जबकी दूसरी तरफ आपकी जुबां में गांधी और खादी, आपके तन में खादी, आपके व्यवहार में गांधीवादी सोच का प्रदर्शन है तो फिर आप गांधीवादी क्यों नहीं है.क्या आप मौके के अनुरूप समय सापेक्ष आवश्यकतानुसार गांधी की विचारधारा और उनके जीवन के तथ्यों का इस्तेमाल करके राजनीति को अपने पक्ष में रखना चाहते हैं.यह सच है कि नोट बंदी के बाद आप युवाओं के स्टेटस सिंबल बन चुके हैं.आपने खादी के मार्केट में तहलका मचा दिया है.किंतु आपके शासन काल में अधिक्तर हमारे पुराने सिंबल्स का संबल आपने खत्म कर दिया है.सूचना प्रसारण मंत्रालय के कैलेंडर में परिधान मंत्री शोभा बढा रहे हैं.
आपकी इस आदत से सबको ऐसा महसूस होने लगा है कि आप अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं.सक्सेना जी भले ही यह कहे कि आपके कार्यकाल में खादी आयोग की आय में चौतीस फीसदी का इजाफा हुआ है.आपकी वजह से उनका आयोग हस्ट पुष्ट हुआ है.इस लिये आयोग ने आपकी फोटो से जनता को आकर्षित करने का प्रयास किया है, परन्तुहम सबको पता है कि स्वतंत्रता के पश्चात खादी के विचारों को आपने मात्र कपडे के रूप में देखा है, कांग्रेस हो या भाजपा खादी मात्र गांधीवादी सोच के परे सिर्फ परिधान के रूप में उपयोग की गई.यह खादी भक्ति और गांधी भक्ति इतनी क्यों की जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है.नैतिक बल में आप हो ना हो किंतु गांधी की बराबरी नहीं कर सकते हैं.आपके गांधी के साथ भाईपट्टीदारी वाले,पैतृक राज्य वाले संबंध हो सकते हैं.किंतु आप जिस पार्टी से संबंध रखते हैं वो धुर गांधी और गांधीवाद के विरोधी रहे हैं.पर अचंभा इसलिये भी है.कि विरोध भाजपा को ज्यादा करना चाहिये कि आप गांधीवादी आचरण में ढल रहे हैं किंतु विरोध कांग्रेसी और गांधीवादी संगढन ज्यादा कर रहे हैं क्योंकि वो सब जानते हैं कि आप अपनी सत्ता की मजबूती के लिये गांधी के नाम काम और धाम का दोहन कर रहे हैं.हां यह तो हैं कि राजनीति में जब सब जायज है.तो यह कार्य आपका सम्मान के योग्य है ही.भले ही गलियारे में विरोधी कितना भी शोर मचायें.काश आप असली मायनों में गांधी के साथ भाई पट्टीदारी निभाएं और उन्हें दिल से दिमाग तक लोगों के अंतस में प्रवेश करने में मदद करें.वही आपकी सही मायनों में गांधी भक्ति होगी.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

रविवार, 1 जनवरी 2017

"नियमों की खुदाई" करते रेत माफिया

"नियमों की खुदाई" करते रेत माफिया
इसी रविवार को नमामि देवी नर्मदे सेवा यात्रा का प्रारंभ किया गया जो ११ मई तक चलने वाली है. इसके जरिये संस्कारधानी से यह मिशन आगामी आने वाले समय में विकास की राह प्रशस्त करेगा.नर्मदा को हरियाली चूनर पहनाने की यह पहल अनोखी और आश्चर्यचकित करने वाली है.क्योंकि इसके पीछे भी बहुत से ऐसे कारक हैं जो कहीं ना कहीं इस मिशन में बाधक सिद्ध होंगें.हमारे देश में वर्ष भर बहने वाली ऐसी अनेकानेक नदियां हैं. गंगा के लिये समूचा मंत्रालय इसी कार्य के लिये कार्यरत है.किंतु परिणाम बहुत सुधारात्मक ढांचा नहीं बना पाया.देश भर को छोडिये हमारे महाकौशल और विंध्य में नदियां अपने अस्तित्व को बचाने के लिये संघर्ष कर रहीं हैं. नदियों से जुडने वाली आस्थायें इनके घाटों को मनुष्यों की भीड से सामना करने के लिये मजबूर करती हैं.उज्जैन की स्थिति सिंहस्थ के बाद हम सबके सामने है.हम चाहकर भी नैसर्गिक सौंदर्य को बचा नहीं पा रहे हैं.आम जनता के लिये नियम बने के बने रह जाते हैं. जनता उन्हें मानती भी है. परन्तु नदियों से जुडा एक और व्यापार है जो वैध और अवैध रूप से फल फूल रहा है.सरकार के पास उसकी खातिर कोई ठोस रण्नीति नहीं है.या सरकार की नीतियों को ये माफिया नदी के रेत के साथ खोद रहे हैं.इन सबके पीछे कौन जिम्मेवार है.यह सोचने का विषय है.हम सब जानते हैं कि आज कांक्रीट के शहर खडे करने के लिये रेत के विभिन्न प्रकारों की शहर को बहुत जरूरत है.सरकार इस पर लगाम कैसे लगायेगी.दोनो एक प्रकार से एक दूसरे के पूरक है.अगर रेत के उत्खनन को रोका जाता है तो नदियों का विस्तार बढता है.और अगर इस उत्खनन को बढाया जाता है तो नदियों का प्राकॄतिक अस्तित्व खतरे में आ जाता है.रेत का अवैध धंधा और इससे जुडे माफिया गिरोहो के लिये जितने नियम कायदे बनाये गये हैं वो महज देखने के लिये ही समझ में आते हैं.उनकी पूर्ति मात्र खानापूर्ति बनकर रह गयी है.अब इस दरमियां यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि नर्मदा के बहाने जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु इस यात्रा को प्रारंभ किया जा रहा है उसके संबंध रेत माफियाओं के साथ चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करने की तरह ही संरचित हो रहे है.
अब मध्य प्रदेशसरकार को यह देखना होगा कि इस यात्रा का हस्र रामपथ यात्रा की तरह ना हो.क्योंकि अनिल दवे जी ने अपने राजनैतिक कैरियर के साथ साथ अपनी पुस्तक नर्मदा समग्र में लिखा है.कि नर्मदा को खतरा अपने ही रहनुमाओं से हैं.नर्मदा में खनिज संपदा के साथ साथ रेत का अथाह भंडार मौजूद हैं.जबलपुर से कटनी के बीच में इसका दोहन अधिकाधिक हो रहा है.इसकी प्रमुख वजह यह भी है कि सतपुडा और विध्यांचल पर्वत श्रेणियों से यह नदी रेत की अथाह मात्रा अपनी तली में समेटे हुये है.यही वजह है कि महाकौशल और विध्य में इस रेत के माफियाओं का सम्राज्य भारत के प्रमुख रेतमाफियाओं की सूची में टाप टेन में है.प्रशासन खुद अगर इन माफियाओं का संरक्षण करे तो फिर कैसे नर्मदा को नैसर्गिक सुंदरता प्रदान की जायेगी,.वर्तमान में तगाडियों और फावडों को किनारे करके अंधेरी रात में और सुबह के भोरंभोर में आधुनिक मशीनों के जरिये रेत के साथ नियमों की खुदाई भरपूर की जा रहीहै.इस बीच में माननीय मुख्यमंत्रीजी का यह कहना कि यह यात्रा अपने उद्देश्यों की पूर्ति करके रहेगी.इसका राजनैतिकीकरण नहीं होगा.बाला बच्चन जी का समर्थन और संकेतात्मक रूप से इस प्रकार के ब्रेकर्स के प्रति सरकार को सचेत करवाना भी इस सेवा यात्रा के लिये एक महत्वपूर्ण चुनौती बनकर उभरेगी.उद्देश्य तो बेहतर हैं किंतु इसकी पूर्ति के लिये चाहिये कि माफिया और उनके गुर्गों को ठिकाने लगाया जाये ताकि वो नियमों की खुदाई ना करके नदियों की नैसर्गिक सुंदरता हो बचाये. आज आवश्यकता है कि माननीय मुख्यमंत्री जी की इस यात्रा को सामाजिक और पर्यावरण सुधार के नजरिये से लिया जाये.
हमें यह ध्यान रखना होगा कि इस तारतम्य में अमरकंटक से नर्मदा के लिये चलाई जा रही यात्रा के अंतिम पडाव तक के नागरिकों को अपने स्तर पर कुछ ना कुछ पहल करना ही होगा.माननीय मुख्य मंत्री जी से हमारी यह अपेक्षा यही है कि उन्हें आपरेशन थियेटर में काम करने वाले सर्जन की तरह निर्दयी होना चाहिये ताकि रेत माफिया चाहे उनसे अगर  अप्रत्यक्ष रूप से तालुकात रखें या किसी विरोधी पार्टी से जुडाव रखे, दो ही स्थितियों समान सजा देने में उन्हें अपने कदम पीछे ना हटाना पडे .उनका यह प्रयास जितना सराहनीय है उतना ही कांटॊ भरा  है. बस यह मान लीजिये एक आग का दरिया है और दूब के जाना है.इसमें उनके सहयोगियों का सहयोग बहुत जरूरी है.साथ ही साथ उनसे जुडे प्रशासन का सहयोग भी इस यात्रा के उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करेगा.वास्तविकता तो तब सामने आयेगी जब रेत माफियाओं और प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट करने वाले वन माफियाओं का नदी के किनारों से कब्जा हटेगा.इस अभियान की सफलता भी तभी है जब यात्रा से एक जागरुकता फैले जिससे नर्मदा ही नहीं बल्कि अन्य जीवन प्रदान करने वाली नदियां माफियाओं के चंगुल से मुक्त हों और हरित धन धान्य से परिपूर्ण हो. नर्मदा की तरह सोन,केन,मंदाकिनी और अन्य प्रचुर जल वाली नदियों के लिये उसके पर्यावरण हेतु एक पहल की आवश्यकता जितना समाज से हैं उतना ही प्रशासन और सरकार से है.
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७  

अखिलेश अनुपस्थित, टिकट व्यवस्थित

अखिलेश अनुपस्थित, टिकट व्यवस्थित
बुधवार को मुलायम सिंह ने अंततः तीन सौ पच्चीस सीटों में उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर चुके हैं. अभी भी अठहत्तर प्रत्यासियों की सूची के जारी होने का इंतजार किया जा रहा है.अखिलेश का झांसी में उसी दिन प्रचारप्रसार करना और उनकी अनुपस्थिति मे टिकट वितरण की घोषणा करना.समाजवादी पार्टी के पुराने समाजवाद के नये रूप का संखनाद है.जिसमें इतना सब कुछ होने के बाद भी मुलायम सिंह ने खुद को केंद्र में बनाये रखा है.चुनाव होने को अभी कुछ महीने शेष हैं.किंतु सुप्रीमों का विश्वास उन उम्मीदवारों में अधिक दिखा है जिनका अपराध जगत से ज्यादा सरोकार रहा है.अतीक अंसारी और रामपाल यादव प्रमुखता के साथ शामिल कियेगये. इतना ही नहीं उन लोगों को भी सम्मानित स्थान मिला है.जिसको अखिलेश ने सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया था.हालां कि यह तो तय है कि जब अखिलेश विधान परिषद के सदस्य हैं जिसका कार्यकाल २०१८ तक है. तो उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति ज्यादा मायने एक दृष्टिकोण से नहीं रखती किंतु अगर हम और दृष्टिकोणों से देखें तो समझ में आयेगा कि अखिलेश सरकार का पांच साल और उसके बाद मुलायम सिंह जी का सत्ता मोह समाजवाद की नई अवधारणायें गढने में कामयाब हो रहाहै. दोनों में एक समानता यह है कि दोनों ने गठबंधन का विरोध किया और बहुमत के लिये एक मत हैं. किंतु सवाल यह है कि बहुमत किन उम्मीदवारों का होगा.क्या आपराधिक नेतृत्व का वर्चश्व होगा.क्या उस समाजवादी गुट का वर्चश्व होगा जिसका मतभेद अखिलेश सरकार से है.क्या अखिलेश का चेहरा अब समाजवादी पार्टी के लिये हानिकारक है.ये गूढ प्रश्न गर्भ में छिपे हुये हैं.
हमारे सतना से चुनाव प्रसार के लिये युवा प्रतिनिधियों का जाना और चुनाव प्रभारी के दायित्व को प्रापत करना यह साबित करता है कि मुलायम सरकार की तरफ झुकाव अधिक है.अखिलेश सरकार के वैचारिक विरोध का प्रचार प्रसार अन्य राज्यों के साथ मिल बैठकर बांटा जा रहा है.बहर हाल इस सूची का प्रभाव मायावती और भाजपा के उत्तरप्रदेशियों पर ज्यादा पडेगा.सभी दलों को यह पता है कि उत्तरप्रदेश का यह चुनाव हर दल के लिये वर्चश्व की लडाई है.इस राज्य में अपने दल की सत्ता हर राजनैतिक दल देख रहा है. किसी दल का वास्तविक बहुमत प्राप्त कर पाना आग के दरिया को डूबकर पार करने की तरह होगा.समाजवाद ने जिस तरह पिता और पुत्र के वैचारिक कलह को अपने अंदर पिरोया है वह राजनीति के लिये हानिकारक है.उपचुनावों के माध्यम से अखिलेश की वापसी.सूची में खुद अखिलेश का नाम ना होना.अपराधिक राजनैतिक लोगों को चुनाव में सम्मानित उम्मीदवारों की सूची में शामिल करके मुलामय सिंह ने समाजवादी पुराने रूप को नये लबादे में लपेटने का काम किया है.अखिलेश क्या अब पार्टी के नाम पर उन उम्मीदवारों के प्रचार में जायेंगें जिनसे उनका धुर विरोध रहा है.क्या वो अपने पिता के नक्शेकदम में चलने के लिये विवश होंगें मात्र पार्टी की सफलता के लिये. यह अंतर्दवंद जरूर इस चुनाव में नया मोड लायेगा.जिस तरह का रुख पिता ने पुत्र के विरोध में पार्टी के मंच के माध्यम से अपनाया है और उन लोगों का टिकट काट दिया है जो अखिलेश के खास हैं। वह यह संकेत तो दे रहा है.कि सत्ता अगर सपा की आती है तो निश्चित ही मुख्यमंत्री के चेहरे में बदलाव लहर जरूर दिखाई देगी.अब यह लहर पार्टी के लिये लाभदायक होगा या हानिकारक।
समाजवादी पारटी की पहले से ही यह नीति रही है कि वो पुराने चावलों पर ज्यादा यकींन करती रही है.जिनके पास से दल बल आने वाले कल में दिखाई देगा.और जीत की महक आयेगी.समाजवाद के नाम पर पुराने चावलों की टीम किस स्तर से यह चुनाव लडेगी यह आने वाला वक्त बतायेगा क्योंकि इस बार भाजपा का केंद्र में होना समाजवादी पार्टी के लिये नाकों चने चबवाने वाली स्थिति पैदा करेगा.अंतःकलह पार्टी की वैचारिक बुनियाद को वैसे भी हिला चुका है.वर्तमान के उन विधायकों का टोला जिनकों टिकट नहीं मिला है.वह किस ओर मुंह मारता है वह जरूर विदूषक की भूमिका निभायेगा.कुल मिलाकर विदूषक के रूप में उत्तर प्रदेश के अंदर हर उस पार्टी की भूमिका है, जिसका काम जनता को वैचारिक मोह से पाश में बांध सके।जो बांध ले जायेगा.वो वोट की गणित को अपने हवाले करने में कामयाब होगा.एक तरफ हर हर मोदी घर घर मोदी वाले भाजपाई हैं और दूसरी तरफ तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार वाली बहन जी है। इस बीच में ये पिता पुत्र एक मोड लाने के लिये आतुर दिखाई पड रहे हैं। दृश्य जरूर दिलचश्प होने वाला है,
अनिल अयान
सतना
९४७९४११४०७
ayaananil@gmail.com

"राजनैतिक चंदा" फायदे का धंधा

"राजनैतिक चंदा" फायदे का धंधा
हमारे देश में राजनीति के लाडले दल खूब मौज उडा रहे हैं.आजकर नोट बंदी के चलते "अज्ञात स्त्रोत" दलों का मालिश पुराण लिखने में व्यस्त हैं। भारत में इस दिनों जिस तरह राजनैतिक चंदे की रकम में इजाफा हुआ है.वह सरकार के लिये चिंता का विषय होना चाहिये.एक तरफ आम जन को नकेल कसने का दायित्व अगर सरकार निर्वहन कर रही है तो दूसरी तरफ अपनी ही विरादरी के साथ पट्टीदारी निभाने की रीति समझ के परे है।कहने को हर दल देश को पारदर्शी और निष्पक्ष सरकार देने का दावा करता है.किंतु सत्ता में आने के बाद उसकी भाई पट्टीदारी अन्यदलों के साथ ऐसे प्रारंभ होजाती है, जैसे चोर चोर मौसेरे भाई हो गए हों.दिल्ली में आप सरकार के द्वारा अपने वार्षिक चंदे का व्योरा अपनी वेबसाइट से हटाने का निर्णय कहीं ना कहीं चोर की दाडी में तिनके का संकेत हैं.ऐसा नहीं है इसमें सरकार के रूप में काबिज भारतीय जनता पार्टी दूध की धुली हुई है.आकडे बताते हैं. कि दो हजार तेरह से दोहजार सत्रह तक भाजपा के राजनैतिक चंदे में अन्य दलों की तुलना में तीन गुना ज्यादा बढोत्तरी हुई है. और एक सौ छप्पन प्रतिशत तक दलगत बढोत्तरी हुई हैऔर कांग्रेस भी एक सौ पैतीस प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है..मोदी सरकार ने दो हजार पंद्रह सोलह में इस चंदे की आवक को चौरासी प्रतिशत तक कम करने का संकेत दिया है.राजनैतिक चंदे का अज्ञात स्त्रोत वाकयै सरकार के लिये और भारत की अर्थव्यवस्था के लिये गले की हड्डी बन चुके हैं.वास्तविकता यह है कि एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ने राजनैतिक दलों को चंदा देने वाले चुनावी ट्रस्टों को आडे हाथों इस लिये लिया क्यों कि ये चुनावी ट्रस्ट राजनैतिक दलों और कंपनियों के बीच के संगढन के रूप में काम करने के साथ साथ दोहजार तेरह से आजतक लगभग पौने दो करोड चंदे के रूप में कंपनियों के द्वारा कमाकर नब्बे प्रतिशत राजनैतिक दलोंमें वितरित कर भी दिये.परन्तु चुनाव आयोग के पास इन ट्रस्टों की कोई साफ सुथरी रिपोर्ट नहीं है.पारदर्शिता के लिये बनाये गये ये ट्रस्ट बनाये तो गये थे लाभकारी परिणाम देने के लिये परन्तु ये राजनैतिक दलों के लाभ के अड्डे बन गये.
एडीआर अब इस बात पे अड गया कि ये ट्रस्ट मूल कंपनियों में बने,एक घटना जिसमें अमुक कंपनी ने दो हजार चौदह पंद्रह और सोलह के दरमियान एक सौ बत्तीस करोड चंदे में रेवडी बांट दी.और चुनाव आयोग के पूंछने में इस कंपनी का नाम कागजातों में ही बस दिखाई पडा।अब तो स्थितियां यह है कि नोट बंदी के बाद इस तरह के केश लाजमी से हो चुके हैं.कोई चाहकर भी फिराक लेने की नहीं सोचता क्योंकि भाजपा की स्थिति अन्य राजनैतिक दलों की तुलना में सूची में सबसे आगें है.कहने को चुनाव आयोग में अठारह सौ दल पंजीकृत हैं किंतु उसमें से लगभग पांच सौ दल तो आज तक चुनाव में प्रतिभागी तक नहीं खडा करे.सरकार क्यों नहीं इन दलों और इनकी आय के स्रोत को सूचना के अधिकार के तहत नहीं ला पा रही.यह समझ के परे हैं.चुनाव आयोग ने एक सिफारिश में चंदे की रकम को बीस हजार से करके दो हजार तक करने की अनुशंसा की जनप्रतिनिधि अधिनिय उन्नीस सौ इक्यावन को भी संसोधित करने की सिफारिश की.आयकर अधिनियम उन्नीस सौ एक्सठ की धारा तेरह ए के अनुरूप जिस छूट के लालच में ये अज्ञात स्त्रोत राजनैतिक चंदे का अप्रत्याशित लाभ उठा रहे हैं.वो देश को गर्त में ले जा रहा है और दलों को अर्श में ले जा रहा है.बीस हजार से कम के चंदे में स्त्रोत की जानकारी को ना बताने वाले नियामक का लाभ लेते हुये.एक मुस्त काले धन को कई काल्पनिक नामों के खातों में वितरित करके सफेद धन में बदल कर मजे कर रहे हैं.इनकी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं है.सांसदों ने जिस तरह चुनाव आयोग की सिफारिशों को नक्कारखाने में तूती की आवाज बनाकर अनसुना कर दिया.उसके चलते चाहिये कि अब आयोग ऐसे नाकारा दलों और जन प्रतिनिधियों की छटनी की प्रक्रिया शुरू करे.ताकि इनको भी आटे दाल का भाव समझ में तो आये.
क्या देश की आवाम को यह जानने का अधिकार या सूचना प्राप्त करने का अधिकार नहीं है कि जिन लायक दलोंपर विकास लोक कल्याण और प्रजातंत्र को मजबूत करने का दायित्व है.वो किन लक्ष्मी पुत्रों के अज्ञात चेहरों के दम पर एकाएक चंदा प्राप्त करते हैं.और जो सरकार जनता को ईमानदार और पारदर्शिता की नसीहत का पाठ मन की बात में पढाती नजर आती है.खुद को आरटीआई के दायरे में लाने में कतराती क्यों है और अन्य दलों के साथ भाई चारा निभाने में इतनी मसगूल क्यों है.सब दल जानते हैं कि अगर चुनाव आयोग इनका पंजीयन समाप्त कर दे तो इनको प्राप्त होने वाली आयकर छूट सुविधा समाप्त हो जायेगी.चुनाव आयुक्त नसीम जैदी कहते हैं कि डमी राजनैतिक दल और राष्ट्रीय दलों की क्षेत्रीय शाखाये.सरेआम काले धन को सफेद करने की जुगत भिडाये बैठीहै. देश के अधिकतर राजनैतिक दल दूसरे दलों की जेब टटोलने में जितनी तेजगी दिखाते हैं उतनी ही तेजगी से अपने खजाने को छिपाने की फिराक में होते हैं.मोदी सरकार से हम सबकी यह उम्मीद तो है.कि नोटबंदी की तरह दृढता दिखाकर जनप्रतिनिधिकानून के संसोधन का प्रस्ताव आवाम के हित में संसद में लाये और  सूचना के अधिकार के तरह आवाम को सुकून देने का काम करे।अज्ञात स्त्रोत की इस फैक्ट्री जिसमें काले धन के अनाज को सफेद आटे में बदलने का काम जारी है उसमें भी लगाम लगाकर देश की अर्थव्यव्स्था को सुदृण करने में कदम बढाये जब जनता को लाइन में लगाने में कोई गुरेज नहीं था तो अब अपने साथियों को लाइन में लगाने में देरी समझ के परे है।

अनिल अयान,सतना

रविवार, 4 दिसंबर 2016

"स्वर्ण-टकसाल" बने देवस्थानों की सोनाबंदी कब

"स्वर्ण-टकसाल" बने देवस्थानों की सोनाबंदी कब
देव स्थान हमारी आस्था के प्रतीक हैं हम अपनी आस्थानुरूप मंदिरों में भगवान से कुछ ना कुछ मनोकामना मांगने जाते हैं.हमारी आस्था इतनी प्रबल है कि हम अपने कार्यों और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये आस्थानुरूप धन धान्य देव स्थानों को दान के रूप में अर्पित करके चले आते हैं.कितने लोग इसका हिसाब कितना रखते है यह समझ के परे है.शायद कोई नहीं.अराध्य से मांगने की परंपरा में हम जाने अनजाने धन (चाहे वह सफेद हो या काला- अपरिभाषित ) या फिर आभूषण दान करते हैं त्योहारों में यह आस्था मंदिरों में बखूबी परवान चढते आप सबने देखा ही होगा.यहां पर प्रश्न इस बात का नहीं है कि हम इस तरह की दान दक्षिणा का विरोध कर रहे हैं.किंतु इस तरह का आराध्य को चढावा और उसकी देश हित में आर्थिक उपयोगिता देश हित में कितनी है?इस विषय पर कुछ पल के लिये तो विचार कर ही सकते हैं.इस समय जब सरकार नोटों के विमुद्रीकरण के बाद सोने के रखने की सीमा तय कर चुकी है.पुरुष और महिला का सोने के आधार पर वर्गीकरण किया जा चुका है. इन संदर्भों के मध्य सरकार को यह भी संज्ञान में लेना चाहिये कि देवस्थानों में भी दानपेटी और पात्रों में इसके अलावा ट्रस्टों को कितना सोना और हीरे-जवाहरात बिना किसी कागजात के पुजारियों को आस्था के नाम दान कर दिया जाता है.विशेषकर जनता तो ठीक है किंतु जनता से जनताजनार्दनों और उद्योगपतियों की आस्थाये कहीं ना कहीं अचानक जागृत अवस्था में आ जाना और इन देव स्थानों से टैक्स रिलैक्सेशन की उम्मीद लगा बैठना भी अन्य प्रकार की कमाई के क्या संकेत सरकार को नहीं देते हैं.मंदिरों के ट्रस्ट इसे देश के विकास में उपयोग करने से परहेज इस लिये करते हैं क्योंकि वह चढावा है.जनता की आस्था की आहुति हैं किंतु जहां मोदी जी डिजिटल मनी और कालेधन के पीछे हाथ धोकर पडे हैं. उस बीच यह विषय किनारा कर जाये यह शायद जनता की आस्था के साथ खिलवाड होगा.
हमारे देश में ऐसे बहुत से उत्तर और दक्षिण भारत में देव स्थान हैं जहां पर हर जाति धर्म के लोग अपनी आस्थावश जाकर चढावा चढाते हैं.किंतु इसका देश के विकास में कोई योगदान नहीं समझ में आता है.उदाहरण की बात करें तो पद्मनाभस्वामी मंदिर, व्यंकटेश मंदिर,अयप्पा मंदिर, साई बाबा मंदिर इस्कान मंदिर आदि बहुत से उदाहरण हैं जहां आस्थाओं से मिला सोना हीरा जवाहरात और आभूषण देवताओं और आराध्यों को स्पर्श कराकर  तिजोडियों  में कैद कर दिया जाता है.इनका कागजी रूप से कोई दस्तावेज अमूमन मंदिरों के पास नहीं होता है.वार्षिक रूप से ट्रस्टों का आय व्यय ही बस इनके पास दस्तावेजी सबूत होता है.दक्षिण भारत के अमूमन देवस्थान के प्रबंध ट्रस्टी इसकी ब्याज तक लेना पाप मानते हैं.किंतुट्रस्ट के लिये इसका उपयोग बखूबी किया जाता है.मंदिर और देवस्थाओं के विकास के लिये इस धन का उपयोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करना पुण्य माना जाता है,धनवान लोग इसके लिये जमीन धन दान करते हैं.वह पापपुण्य की सीमा से परे होता है.सिर्फ तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ऐसा अपवाद है जहां का स्वर्ण चढावे को बाइस कैरेट के सोने के सिक्कों मेंबदल कर पूरे देश में वितरण किया जाता है. किंतु अधिक्तर देवस्थान ट्रस्ट इससे परहेज करते हैं.हिंदुस्तानी सोने के सबसे बडे आयातकों में स्थान रखते हैं.दोहजार पंद्रह सोलह  में नौ सौ टन सोना आयात किया गया.तथा एक सौ पचहत्तर टन सोने की तस्करी भी की गई.विश्व में सोने के भंडारक के रूप में भारत ग्यारवें स्थान पर काबिज है.तीन हजार टन से भी अधिक सोना भारत के विभिन्न स्थानों में स्थित देवस्थानों के पास तिजोडियों में जमा है.जिसका भारत की अर्थव्यवस्था को स्पर्श तक करने का अधिकार धर्माधिकारियों ने नहीं दिया.भारत की जमीन में फल फूल रहे ये सब आस्था के देवस्थान भारत के लिये जितना धार्मिक महत्व रखते हैं.आर्थिक महत्वहीन शाबित हो रहे हैं.आयात नीति को कहीं का कहीं कम करने की बजाय ये देव स्थान निर्यात नीति को भी रोक कर ये देव स्थान बैठे हुए हैं.
जब सरकार वर्तमान में सक्रिय मुद्रा में सोने को लाने के फिराक में हैं तो अब हम सबको यह अपेक्षा सरकार से हो रही है कि सोनाबंदी की अगली कडी देवस्थानों के नाम पर बंद पडे स्वर्ण टकसाल देश की आर्थिक व्यवस्था के लिये खोल दिये जाये.दान और चैरिटी की श्रेणी में देवस्थानों और ट्रस्टों को भी लाया जाये,मेरे ये विचार किसी की आस्था को ठेस पहुंचाने के लिये नहीं बल्कि आस्था के बहाने दान दक्षिणा को को प्रायोगिक रूप से मानव निर्माण और उत्थान के पावन उद्देश्य की पूर्ति हेतु राष्ट्र के विकास में शामिल करने की पहल करना मात्र है.जो शासन की और धर्माधिकारियों की आपसी सामन्जस्य के बिना कदापि संभव नहीं.यह भी संभव है कि मेरे विचारों से देवस्थान ट्रस्ट कदापि समान्जस्य ना बिठा पाये.किंतु अब समय आ गया है. कि देव स्थान के मानव संसाधन को भी भक्तों के मानव निर्माण और राष्ट्र के धनधान्य निरूपण के माध्यम से विकास कदम में सहयोग करें.आस्था के चिंतन में बदलाव लाकर सोलिड मनी को लिक्विड मनी में बदलने की.जो सरकार के अलावा कोई नहीं कर सकता.जब सरकार आम जन से सोने की आवश्यकता और भंडारण की सीमा की उम्मीद कर सकती है और कानून बना सकती है.तो फिर देव स्थानों के रूप में स्वर्ण टकसालों की धरोहर को भी इस सापेक्ष खडा कर देश की आर्थिक नीति अर्थात स्वर्ण नीति को लागू करे. वित्त मंत्रालय इसमें मध्यस्थ का काम करे.जनता की दान दक्षिणा -देवस्थान ट्रस्ट की आमदनी -राष्ट्र अर्थव्यवस्था आपस में अंतर्संबंधित हो तो जनता और सरकार दोनों की आस्था देव स्थानों के प्रति ज्यादा प्रबल होगी. तिरुमला तिरुपति देवस्थानम जैसे ही अन्य देव स्थान ट्रस्टों को भी प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है.
अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

एक और "अनुशासन पर्व"

एक और "अनुशासन पर्व"
नोटों के विमुद्रीकरण का प्रभाव कम हुआ ही नहीं कि सरकार के औचक फैसले कहीं ना कहीं पर नागरिकों को आश्चर्य में डाल रहीं है.विनोवा भावे आज अगर होती तो निश्चित ही इस लहर को एक और अनुशासन पर्व का नाम जरूर देती.विमुद्रीकरण से ना उबर पाने वाली जनता और बैंक अब इस बात का हिसाब लगायेंगें कि किस लाकर में कितना सोना भरा हुआ है.पुस्तैनी से लेकर अपनी गाढी कमाई से खरीदा गया सोना भी अब सरकार को काले धन की बदबू फेंकता नजर आने लगा.वैसे सरकार ने जो सोना रखने लिमिट तय की है वह कहीं ना कहीं आम जन पर मार कम पडने वाली है.परन्तु शादी और अन्य उत्सवों में आभूषणों के लिये खर्च किये जाने वाले सोने की दर परिवारों के लिये गले का फांस बनने वाली है.यह तो सच है कि सोना और चांदी हर घर में कुछ ना कुछ पुस्तैनी रूप से एक पीढी से दूसरी पीढी में स्थानांतरित होती हैं किंतु इसका पूरी हिसाब सरकार को दे पाना यथा संभव बहुत कठिन होगा.अब सवाल यह उठता है कि सोने के साथ साथ चांदी और प्लेटिनम और हीरे को क्यों किनारे कर दिया गया. क्या काला धन सिर्फ सोने के साथ ही बदला जा सकता.कहीं ना कहीं इनके साथ तटस्थ फैसला नहीं.कभी कभी तो लगता है.की हीरा भी एक माध्यम है जहां काला धन चमक के सामने सरकार को नहीं दिखाई दे रहा है.सोने के सामने अधिक्तर हीरे जवाहरात की भी जांच होनी चाहिये ताकि धन्ना सेठों की तिजोडियों की भी जांच होनी चाहिये.भगवान को दान दिये जाने वाले आभूषण और हीरे जवाहरात पर सरकार क्यों मौन हो जाती है.यह कैसा अनुशासन पर्व है.जिसमें सोने को अनुशासन में लाकर अन्य रत्नों और जवाहरातों को इसके बाहर कर दिया गया.
इंदिरा जी की एमर्जेंसी समय और अब का  आर्थिक एमर्जेंसी कहीं ना कहीं पर कई अर्थों में समता रखती हैं.इस अनुशासन में आम जन के साथ साथ राजनेता भी फरमान के दायरे  में आते जान पडते हैं.जबकी दायरे से वास्तविक रूप से बाहर हैं,मीसाबंदी का यह अनुशासन पर्व जेल भरो आंदोलनों से काफी दूर है.इसमें अर्थ को मूल मानकर सरकार काले धन की जुगत भिडा रही है.किंतु आज तक विदेशों का कालाधन हमारी नजर में नहीं आ पाया.क्या जन धन में कुछ रुपये की रेवडी बांट देने से यह विषय कहीं दब जाता है,क्या आम जनता की परेशानियों की माला बढने वाली है.यह तो आने वाला वक्त बतायेगा.किंतु सरकार के नियमों में हो रहे बदलाव,व्यवसाय को कैशलेस करने की कवायद कहां तक व्यवसाइयों और आम जनता के पक्ष में गई.इस बात को कोई नहीं समझ पाया है.सब सरकार को अपने पक्ष में मान कर सुखद भविष्य की आशा के साथ अपने दुखद वर्तमान को झेलने के लिये तैयार बैठे हैं,उपचुनाव के नतीजे इसके सबूत हैं.किंतु कैश लेस करने की कवायद में इससे जुडे उद्योग फले फूले हैं.किंतु आज भी एक महीने होने को हैं.किंतु बैंक के अधिक्ततर कर्मचारी जनता की विमुद्रीकरण सेवा में व्यस्त हैं.आम जनता आज भी लेश कैश के लिये एटीएम की राह तक रही है.अनुशासन की ऐसी कदमताल जल्दबाजी का परिणाम तो है ही.रही बात सोने की खपत को टैक्स की जंजीरों में कैद करने तो सोने के अलावा भी बहुत सी धातुए और रत्न हैं जिनका उपयोग काले धन को सफेदकरने के लिये हथियार के रूप में हो रहा है.उसे भी इस दायरे में आना चाहिये.जमीन भी कुछ इसी तरह का हथियार है.इनके साथ साथ विदेशों में छिपा काला धन कब जनता के सामने आयेगा.इसका इंतजार है.यही आर्थिक अनुशासन जनता के मन को धैर्य प्रदान कर रहा है.हमारा वर्तमान तो यही कह रहा है.कि चाहे जितना कैशलेस अर्थव्यवस्था की धुन छेडी जाये किंतु भारत की अधिक्तर जनसंख्या कैश के सहारे ही जीवन यापन कर रही है.काला धन कैश लेस अर्थव्यवस्था में आम जनता को ना उलझाये और काले धन के स्रोत को देश में घर वापसी करें यही सरकार का ध्येय होना चाहिये.

अनिल अयान,सतना९४७९४११४०७

सोमवार, 21 नवंबर 2016

कभी "मुन्नी-शीला" कभी "सोनम" और अगली बार हमारी बेटी

कभी "मुन्नी-शीला" कभी "सोनम" और अगली बार हमारी बेटी
यह अप्रत्याशित मुद्दा ही था कि इस बार "सोनम" के कथानक को बाजार में नोट के ऊपर रखकर काफी उछाला गया.जब से नोटों का विमुद्रीकरण हुआ तब से इस नाम को इतनी लोकप्रियता मिली की कि हमारे समाज में रहने वाली इस नाम की औरतें, बहने, बेटियां,भाभियां,सालियां खुद बखुद लोगों की जुबां में आने लग गई.परिवार में मजाक करने वाले रिश्तों के बीच में रोजाना ही मजाक बन गया.पहले एक हजार की नोट,फिर पांच सौ और उसके बाद यह प्रक्रिया लगातार हर नोटों में यह लिख कर कि "सोनम गुप्ता बेवफा हैं" रातों रात कांट्रोवर्सी में आगई.सवाल यह खडा हुआ कि मीडिया ने यह मुद्दा इतना क्यों फैलाया.देश की सभी नेटवर्किंग साइट्स में यह मुद्दा काफी उछाल में आया. इसकी जड कहां से शुरू हुई यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की बस अपने अपने प्रोफाइल में साझा करना शुरू कर दिया. इस कथानक के जरिये जिस वैचारिक महामारी का फैलाव हुआ वह कहीं ना कहीं प्लेग से भी ज्यादा भयावह है.प्लेग का एक बार तो इलाज हो सकता है किंतु इस प्रकार की सस्ती लोकप्रियता को पाने के लिये देखा गया उत्साह सोनम के हर रिश्ते से जुडे लोगों को समाज में शर्म आने लगी.बिना दूरगामी परिणाम सोचे इस तरह की हरकत समाज में जिस झूठे ग्लोबलाइजेशन की हवा बह रही है वह किस दिशा में जा रही है यह सोचने का विषय है.चरित्र और सम्मान के नाम पर यह एक गहरी चोंट है जो मनो वैज्ञानिक रूप से एक बीमार व्यक्ति की आंतरिक व्यथा को समाज के सामने सिर्फ मजे लेने के बहाने फैला दिया गया। बिना यह सोचे कि असहज भाव का उस नाम की स्त्री पर क्या प्रभाव पडेगा।
बालीवुड में स्त्रियों के नामों को लेकर शुरू हुए अश्लील गानों की धुन पर नाचने वाले युवा अगर "मुन्नी बदनाम हुई  डार्लिंग तेरे लिये." और "शीला की जवानी" हमारी फीचर फिलमों के एक अंधकारमय पक्ष को उजागर करने में सफल रहे। तो दूसरी तरफ "सोनम गुप्ता" का विषय हमारे समाज में हाईटेक युवा दिल दिमाग और जिस्म की आंतरिक आग को शांत करने का केंद्र बिंदु बन जाता है.इन मामलों को हमारा समाज संज्ञान में नहीं लेता.हर घर ,हर कालोनी,हर कस्बे में इस नाम को रखने में पैरेंट्स हजार बार सोचेंगें कि हमारे घर की इज्जत के साथ भी वैचारिक बलात्कार हो सकता है.और अगला नाम क्या होगा यह कोई नहीं जानता, बार बार यह कहना कि अरे हो गया लोग जो कह रहे हैं कहने दो हमें कोई फर्क नहीं पडता.बेटियां सब जानती हैं. साहब सच्ची बात तो यह है कि हर सोनम गुप्ता का पिता भाई और पति कुछ पल के लिये झेप जाता होगा,यदि इस तरह के मुद्दों में यह नाम बार बार उसके सामने सुर्खी बनकर आता होगा. जब कोई यह कहता है कोई बात नहीं "इट्स ओके" तो यह मान कर चलिये कि उसका सब कुछ ओके नहीं है.यह एक मात्र घटना नहीं है.यदि हम इस घटना पर मौन हैं तो यह तो तय है कि अगला नंबर हमारे घर के बहन बेटी और मां का लगने वाला है. इस प्रकार की प्रसिद्धि किसी काम की नहीं है.इस मुद्दे में महिला समूह,उनसे जुडे हुए संस्थाये जिस चुप्पी को साधे बैठी हुई हैं वो हृदय विदारक है.यह किसी वैचारिक अत्याचार कम नहीं है.कभी कभी तो मै यह सोचता हूं कि सोनम गुप्ता तो इस मुद्दे में क्या सोचती होगी.कि अपने ही घर में अपने ही समाज में हमें नोटों में एक प्रेस नोट बनाकर छॊड दिया गया.हमने किसी से प्यार किया या नहीं किया हमारी प्राइवेसी को सार्वजनिक कर दिया गया. उसके बावजूद भी हमारे आसपास के भाई पट्टीदार और हमारी सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध संस्थायें भी इस लिये मौन हो गई क्योंकि हम से उन्हें कोई फेम नहीं मिलने वाला था. कोई लोकप्रियता नहीं मिलेगी. हमें सोशल मीडिया में सोसाइटी से उठा कर मजाक और घिनौने आनंद का हिस्सा बना लिया गया.एक खिलौने की तरह हमें खेलकर हमारी धज्जी धज्जी करके हाथ का मैल "रुपया पैसा" बनाकर सडक में फैंक दिया गया. वो भूल गये कि जिन्होने यह हरकत की कि आज तो सोनम गुप्ता है कल कोई और इसी तरह वैचारिक बलात्कार का हिस्सा बनेगी.और हमारा समाज हाथ में हाथ धरे अपनी बारी का इंतजार करता रहेगा.एक रात में मुझे मिस वर्ल्ड या सेलीब्रेटी बना दिया गया।मतलब यह कि मुझे अपनी अंदरूनी आग को भडकाने के बहाने पेट्रोल के रूप में उपयोग किया गया.लोगों की इस प्रवृति को रोकने की बजाय लोगों ने खूब उछाला.आखिर कब तक मेरा इस तरह जीना दूभर होता रहेगा.मै इस बात से आत्म हत्या भी कर सकती थी.किंतु इस लिये कदम रुक गये कि मेरे पिता का उसके बाद क्या होगा जब लोग कहेंगें कि इसी की बेटी असली सोनम गुप्ता रही होगी.इस लिये जब इसका जवाब मेरे पास भी नहीं इस लिये मै सिर्फ यही कह देती हूं कि लोगों का यही काम है वो कहते रहते हैं. लेकिन मै यह जरूर भगवान से प्रार्थना करूंगी कि दोषी को सोनम गुप्ता का पिता भाई और पति जरूर बनाये.इस जनम या अगले जनम इससे मुझे ज्यादा फर्क नहीं पडता, बालीवुड से शुरू हुई यह प्रथा कहीं ना कहीं आज सोशलमीडिया की नाक बनकर कटने के लिये सामने खडी है.
दुराचार का यह रूप बलात्कार के दैहिक रूप, ऐसिड अटैक,और यौन शोषण से ज्यादा दुष्कर है. पहले इस दंश की पीडा,फिर न्याय के गुहार के लिये पीडा और संघर्ष,और अंततः क्लेश के वजह से आत्महत्याकरने के बाद माता पिता के दिल में गिरने वाली चट्टान,एक बार विचार करके देखिये कितना दर्द है इस दर्दनाक सोशल मीडिया की करतूत पर,नोट में लिखकर इस किरदार इस नाम को भले ही अप्रत्याशित शेयर मिला हो,मीडिया को अप्रत्याशित टीआरपी टेलीवीजन रेटिंग प्वाइंट मिली हो. परन्तुयह ठीक उसी तरह लिखा गया जिस तरह की कोई हर दीवार में यह लिख दे "आप अपने मां- बहन- बेटी" के बलात्कारी है.और समाज आपको मुंह दिखाने लायक ना छॊडे.प्यार में किसी को छॊड देने को बेवफा कहना पुराने जमाने की बातें हो गई पर उस समय पर भी यह लिखा गया कि "जरूर कोई मजबूरियां रही होगी तेरी सनम, वरना यूं ही तू बेवफा नहीं होती",.आज इसके मायने जिस्मानी रिश्तों की दहलीज के दायरे में आगये हैं. महिला संगठन,एनजीओ,सुधार ग्रह और संस्थाये,इस प्रकार के मामलों में अगर चुप्पी साधे बैठी हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम सब मौन साध लें मौन ही अंतिम स्वीकृति होती है.हमारी जिम्मेवारी बनती हैं कि ऐसे यूजर्स को ब्लाक करने या उसका एकाउंट बंद करने की पहल करनी चाहिये.हमारा यह कदम समाज की चुप्पी टोडने की एक पहल तो हो ही सकता है. क्योंकि हमारे समाज में हमारे  परिवार में स्त्री हर रिश्तें में हमसे गहरा संबंध रखती है.इस लिये ऐसे भ्रामक और नीचता वाले प्रचार प्रसार को अपने मजबूत निर्णयों के माध्यम से बंद करे.ताकि उपर्युक्त नाम जैसे और किसी बहन बेटी और अन्य रिस्तों की धज्जी ना उडाई जाये सरे राह सरे चौराहे और सरे सोशल बाजार में.हमारे घर की इज्जत घर की ही नहीं हमारे समाज की भी मर्यादा है.सोशलमीडिया के बाजार में यह नीलाम हो यह तो किसी भी अभिभावक को गंवारा नहीं होना चाहिये.क्योंकि वह भी कभी किसी सोनम का पिता भाई और पति तो बनेगा ही.

अनिल अयान,सतना

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

नमक से नमकहरामी

नमक से नमकहरामी
देखते ही देखते नमक का नमकीनपन छिनने लगा.एक ही रात में नमक २०० रुपये से ३०० रुपये किलो क्या बिका सभी लोग बोरियों में नमक रखकर सुकून की नींद सोने की तैयारी करने लगे स्वतंत्रता पूर्व एक बार महात्मा गांधी ने नमक के कर को समाप्त करने के लिये अंग्रेजी हुकूमत से लडने हेतु डांडी यात्रा की और देश को नमक के नमकीन स्वाद को और बढाया था.पर यहा तो नमक से ही तथाकथित लोग नमकहरामी करने के लिये उतारू हो गए. कभी कभी तो मुंशी प्रेमचंद्र के द्वारा लिखित कहानी नमक का दरोगा की याद आ जाती है.वैसे तो वो बेचारा अंततः पंडित अलोपी दीन के साथ होने को मजबूर हो जाता है.किंतु यहां तो ऐसे कथानकों की फौज खडी नजर आई जो कालाबाजारी और जमाखोरी के जरिये नमकहरामी करने की जुगत में लगे हुए थे.चाहकर भी जनता इनके चक्रव्यूह से बाहर ना आसकी।भ्रम का ऐसा मायाजाल इन्होने फैलाया कि लोग नमक के लिये भी तरसने को मोहताज हो गये.दिल्ली उत्तर प्रदेश और बिहार सहित उत्तर भारत के लगभग छ राज्यों में जिस तरह की नमक के नाम पर लोगों के घावों में नमक की नमकीन सतह लगाई गई वो चर्चा का विषय बन गया था. मीडिया ने भी इस नमक को अपनी पानी दारी से धुल ना सकी,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो नमकीन राजनीति करके यह भी बता दिया कि इसमे कहीं ना कहीं तथाकथित भाजपा और उनके समर्थकों का हांथ है ताकि नोटफ्लू और नोट बंदी के प्रभाव से ध्यान हटाया जा सके।
लोग जिस तरह जमा धन को निकालने के लिये पसीना बहा रहे हैं। उसी तरह लोग नमक खरीदने के लिये किराने की दुकानों में घूमते नजर आये.पर इस पर यकीन कर पाना कैसे संभव हैं जब भारत दुनिया में नमक उत्पादन और विक्रय में टाप पांच देशॊं की सूची में अपना स्थान बनाये हुये हैं.साथ ही साथ उसके उत्पादन का  वार्षिक टर्न ओवर ३ हजार करोड टन से ज्यादा है.अब देखने वाली बात यह है कि क्यों इस तरह की भ्रमयुक्त बातें जनता के पास तक पहुंचाई गई.क्या मीडिया इसमें योगदान नहीं दे रहा है.क्या राजनेता और बडे व्यवसाई पंडित अलोपीदीन का सम्राज्य दोबारा खडा हो रहा है. प्रेमचंद की कथा इस देश की वास्तविक स्थिति को घेरने के लिये दोबारा आतुर नजर आई.कुल मिलाकर इस तरह की घटनायें देश में कालाबाजारी और जमाखोरी की आवोहवा को बढाने का काम करती हैं.चाहकर भी कोई आम जनता को सुकून से जीने नहीं देना चाहता है.नमक के बहाने जनता के साथ गुस्ताखी करने की जहमत उठाकर एक और मुद्दे को गर्म तवें में परोसा जा रहा है.अब तो जनता जिस तरह परेशान है वह आशंकाओं के चक्रव्यूह में फंस कर कुछ भी कदम उठा सकती है.परन्तु बडी नोट को रद्दी में बदलने से पूर्व जनता लाइन में खडे होकर सरकार के निर्णय को सही भी ठहरा सकती है.किंतु सफेद नमक के काले रूप को कैसे बर्दास्त करे.जनता के लिये इस समय जो आर्थिक आपातकालीन स्थितियां बनी हैं उस बीच  काला बाजारी और और जमाखोरी को रोकने वाले नियामक और उनसे संबंधित नियम कानून ऐसे सोते हुए क्यों नजर आ रहे हैं जिसकी नाक के नीचे नमक से नमक हलाली घट गई.क्या नमक के दरोगे कहानी की तरह प्रशासन भी अलोपी दीन जैसे किरदारों की जागीर बनकर रह गया है.क्या यह शीतकालीन सत्र के समय उठने वाले सदन के भीतर के तूफान की आशंका है.इन सब प्रश्नों के जवाब खोजना ही होगा।
नमक तो एक मात्र सामान है.यदि राजनीति इसी तरह हावी रही तो आर्थिक के साथ साथ गृहस्त जरूरतों का आपातकाल ना शुरू हो जाये.नमक शक्कर,तेल आदि मूल भूत रसोई के सामानों को सामान्य रूप से पूर्ति बनाये रखना ही इसका मुख्य रास्ता है.उपभोक्ता और रिटेल मार्केटिंग से जुडे नियामकों को इसमें नजर रखने की आवश्यकता है ताकि इस प्रकार की स्थिति ना पैदा हो.भले ही हमारे पडोसी राज्य में चुनाव है तो इस प्रकार की स्थितियों से हमें रूबरू होने की आदत हमें डाल लेना चाहिये किंतु यदि हमारे राज्य में चुनाव की स्थिति में ऐसे दर्शन देखने को मिलेंगें तो कैसा महसूस होगा.अर्थ में अपना अर्थ खोजती आम जनता फिलहाल तो अपने अर्थ को सही ठिकाने लगाकर रोजाना रोजमर्रा की जरूरतों को सुलझाने में जुटी है.इसलिये संवैधानिक पद और समाज की चेतना ही इस तरह की अफवाहों और आशंकाओं का निवारण करा सकती है.हमारी चेतना ही हमें यह समझने के लिये समय देगी कि हमारे आसपास क्या हो रहा है और हमें उससे कैसे निपटना है.इसलिये नमक की कालाबाजारी और जमाखोरी को हम सब मिलकर शासन की मददसे छुटकारा पासकते हैं.हमारे बीच में बहुत से कथानक अलोपीदीन मौजूद हैं उनको खोजकर बेपर्दा करने की बस देर हैं.और नमक से नमकहरामी को रोकने की पहल करने जरूरत है।
अनिल् अयान
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