शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

मध्यान भोजन निगलते जहरीले अजगर.



सरकारी स्कूल कई मायनों मे हमेशा बदनाम रहे है इसमे से दो प्रमुख वजहों मे पहली ,खराब परीक्षा परिणाम का रोना और दूसरा मध्यान भोजन मे अनियमितता का रोना. पहली अव्यवस्था का सिर्फ़ मई से जून तक ही रोना रहता है. परन्तु मध्यान भोजन का केश तो हर रोज ही समाचार पत्रों की शुर्खियों मे बना रहता है.और यही इसकी नियति है. अब क्या किया जाये. जिस घटिया भोजन को ये नन्हे मुन्हे बच्चे पचा नही पाते वह भोजन किस तरह इस स्व सहायता समूहों की और शिक्षा विभाग की पेट की आग बुझाता है. यह समझ के परे है. क्या इन्हे अपच नहीं होता  है. क्या इनको हाजमोला की गोलियों की आवश्यकता नहीं पडती है. ना जाने किस मिट्टी से बने है ये जहरीले अजगर. मध्यान भोजन का विचार मेरी समझ के परे है. इसका क्या योगदान है बच्चों को स्कूल  मे लाने हेतु आकर्शित करने मे. बच्चे खाना खाने की लालच मे स्कूल पढने आयेगे.और पूरे दिन भर पढ कर जायेगे. ऐसा सम्भव नहीं है. इस तरह के उपाय सिर्फ़ गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रहे लोगो के लिये कारगर हो सकते है परन्तु उससे ऊपर यह अप्रभावी हो जाते है. और जो बच्चे इसका लाभ लेने आते है उनमे से शतप्रतिशत मे थोडा कम सिर्फ़ मध्यान समय मे भोजन ग्रहण करने ही विद्यालय आते है. फ़िर अपने घरवालों के साथ काम मे वापिस चले जाते है.यही तो रोना है इस प्रणाली का जिसके चलते. पढाई लिखाई के नाम पर कितने करोडों का बजट पानी मे बहा दिया जाता है और परिणाम सिर्र शून्य ही आता है. जिस कक्षा तक मध्यान भोजन की योजना लागू है वहां परिणाम बनाया जाता है ताकि किसी की वेतन इंक्रीमेंट ना रुके.ये भी सच है कि इस तरह की योजनाओं का परिणाम यह होता है कि बच्चों के कंधों मे बैग की बजाय सिर्फ़ हाथों मे थाली गिलास और कटोरी होती है. जब मै सोहावल ले शिक्षा महाविद्यालय मे अपनी सेवायें दे रहा था तब मैने महसूस किया कि महाविद्यालय के पीछे बने एक शासकीय प्राथमिक विद्यालय की स्थिति यही थी वहां बच्चे सिर्फ़ और सिर्फ़ भोजन ग्रहण करने ही आते थे.और शिक्षिकाय़ॆं भी सिर्फ़ भोजन वितरण करवाने ही आती थी. खाना बनाने वाली सिर्फ़ ११ बजे से ३बजे तक अपनी सेवाये दिया करती थी. लगभग ये हाल सभी इस तरह के विद्यालयों का है. और इसमे बदलाव की गुंजायिस बिल्कुल भी नहीं है.
   मध्यान भोजन ने सिर्फ़ छात्र संख्या मे बढोत्तरी की है बस ना परीक्षा परिणामो मे बढोत्तरी हुयी और ना ही पढाई के स्तर मे ये तो सिर्फ़ गर्त मे ही हर वर्ष गये  है. और सरकारी योजनाये सिर्फ़ मुंह बनाकर सभी पालकों को. शिक्षा को और इस व्यव्स्था को सरे आम उल्लू बनाये जा रही है. इस योजना का सुपरिणाम जो भी रहा हो, जितना बेहतर रहा हो, परन्तु दुष्परिणाम यह रहा की बच्चो को आहार की पौष्टिकता से दूर कर दिया गया, स्कूल मे फ़ालतू के अन्य समूहों का दखल बढ गया. शिक्षकों को वैसे भी पढाने की फ़ुरसत नहीं थी अब तो एक और बहाना मिल गया. अब बच्चों को और आजाद कर दिया गया कि जाओ और खाओ पियो ऐश करो. ऐसी स्थिति मे जब बच्चे की बुनियाद ही खाने पीने और खेलने की नींव के ऊपर बनेगी तो यह तो तय है की बडी कक्षाओं मे वो शिर्फ़ रट्टू तोता की तरह हो जायेगे. यह भी सच है कि मध्यान भोजन की योजना सिर्फ़ इसलिये बनायी गयी की यदि बच्चों को स्कूल मे ही पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जायेगा तो सभी बच्चे एक समान रूप से भोजन ग्रहण करेगे और समय की भी बचत होगी. परन्तु यह योजना धरी की धरी रह गयी. अब तो भोजन मे कीडे मकोडे और अन्य जीव जन्तु मिलने लगे है. दाल से दाल और सब्जी से सब्जी गायब होने लगी है उसी तरह इस व्यवस्था के अजगरो के अन्दर का ईमान गायब होने लगा है. ये सब कभी नहीं सोचते है कि सरकार जिस बात की तन्ख्वाह इन सबको दे रही है कम से कम उस काम को तो सही ढंग से करें उसमे भी कोताही बरतने का जो जुनून इन सब तथाकथित आला अफ़सरों और स्वसहायता समूहों के द्वारा मध्यान भोजन तक को अपने जहर से जहरीला बनाने का काम बखूबी अंजाम तक पहुचाया जा रहा है वह योजनाओं मे झाडू लगाने और पूरे समाज मे आने वाली पीढी को बेवकूफ़ बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है. इस योजना मे जो भी बजट खर्च करने के  लिये आता है वो सिर्फ़ कुछ प्रतिशत ही खर्च होता है. बाकी तो सब इस अजगरों की पेट की आग बुझाने के लिये भी कम पड जाता है. राशि आवंटन से लेकर अनाज आवंटन तक, फ़िर अनाज को कच्चे से पकाने तक मे सिर्फ़ और सिर्फ़ निगलने की प्रक्रिया होती है और इसी तरह ये शतरंज का खेल शह और मात के साथ हर साल चलता रहता है. राजधानी से स्कूल तक यह योजना भी अपना रूप स्वरूप बदल लेती है.या ये कहूं कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मुखौटे लगा लेती है, तो गलत नहीं होगा. इन सब परिस्थितियों के चलते यदि सरकार यही मध्यान भोजन का अनाज सिर्फ़ उन बच्चों को दे जो पूरे दिन उपस्थित होते है और सीधे अनाज ही मुहैया कराये तो इस तरह के कारनामों मे कुछ तो लगाम लगेगी. नही तो वह दिन दूर नही होगा जब डसने वाले सांप जो आज भोजन निगल रहे है वो आने वाले कल मे बच्चों को ही निगल जायेगे.

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

कौन जंगलों का माई-बाप, जनता या आप.


 कौन जंगलों का माई-बाप, जनता या आप.
सतना के आसपास तराई से लेकर हर दिशा मे जंगलों का इफ़रात समूह है. और इस पूरी संपदा को फ़िलहाल वन विभाग और वन मंत्रालय के आधीन सुरक्षित रखने का प्रावधान है. आसपास विभिन्न प्रकार के इमारती लकडियों के हरेभरे पेड पौधे मौजूद है.सरकार के द्वारा हरियाली महोत्सव और वन महोत्सव जैसे कई ऐसे कार्यक्रम है जिनके सहारे बहुत सा धन मिट्टी मे मिला दिया जाता है. और आम जनता को यह खेल समझ  मे नहीं आता है. सरकार के पास बहुत से ऐसे रास्ते है जिनके सहारे वह यह प्रयास करती है कि हर जिला हरा भरा बने उसका रखरखाव हो. पर.ऐसा होता नही है फ़ंड पास होता है और प्राप्त जानकारी के अनुसार उसका वितरण भी कर दिया जाता है. पौधे भी रोप दिये जाते है. रखरखाव के नाम पे सिर्फ़ खानापूर्ति होती है और सारा का सारा पैसा हजम कर लिया जाता है
. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर हर स्तर पर वन कटाई पर रोक लगाने के लिये कई नियम और कानून बनते है और राम भरोसे इसका पालन भी होता है. वन माफ़िया के द्वारा लगभग लाखो से करोडों रुपये का वन उपज और बहुमूल्य इमारती लकडियां वन विभाग की ढिलाई और लचर व्यव्स्था के चलते हजम कर लिया जाता है और तथाकथित ईमानदारी  का लबादा ओढे अधिकारियों के खाते मे उसका कुछ प्रतिशत पहुंचा दिया जाता है. वन अपराध की श्रेणी मे आने वाले इस तरह के अपराधों की ना कोई सुनवाई होती है और ना कोई सजा मुर्करर होती है. यह हाल सतना ही नहीं बल्कि पन्ना शहर के अधिकारियों और उनके विभाग का भी है. कहने के लिये जब कभी जोरदार धडपकड होती है तो विभाग के द्वारा जांच कमेटी बिठा दी जाती है. और कुछ दिनों के बाद वो फ़ाइल कूडेदान मे दिखाई पडती है. यहां पर तो जंगली जानवरॊं को भी नहीं बख्सा जाता है तस्करी होने से कोई नही रोक पाता क्योंकि.  विभीषण के चलते  लंका कैसे सुरक्षित है,  ऐसी स्वार्थपरक नीतियों के चलते बंजर जमीन बढती जारही है और वन का परिक्षेत्र उतना ही कम होता जारहा है. रेंजर से लेकर सारे सुरक्षा अधिकारी खबर मिलने के बाद भी टस से मस नहीं होते है. कितना अफ़सोस होता है यह देख कर की जिस बात की शपथ और कसम सारे कर्मचारी अपनी ट्रेनिंग पूरी होने पे खाते है पोस्ट पाते ही उसे पूरी तरह से भुला बैठते है. कुछ ऐसी वन चौकियां देखी गयी है  जिसमे यदि कोई यदि यह शिकायत करने जाता है कि रात मे फ़लाने इलाके मे वन कटाई हो रही है तब यह मान के चलो की रात भर उसे तो हवालात की हवा खानी ही पडेगी भले ही पूरा का पूरा जंगल साफ़ हो जाये.
   ये सब शायद इस बात से अनजान होते है कि इस तरह की मक्कारी से समाज, पर्यावरण और आस पास का कितना नुकसान हो रहा है. लेकिन इस तरह के वन अपराधियों को इससे कोइ फ़र्क नहीं पडता कि पर्यावरण या समाज का क्या होगा उन्हे तो सिर्फ़ अपनी जेबें भरने और सरकारी माल हजम करने से मतलब है. चाहे उसकी कीमत पूरे शहर और राज्य को चुकाना पडे. इसके चलते पूरे वातावरण मे उच्च तापमान. मौसम की अनियमितता, भारी बारिस या सूखा जैसी स्थितियां पैदा हो जाती है. और सभी इसका कुप्रभाव भोगते है. मिट्टी की उत्पादन शक्ति और कटाव भी प्रभावित होती है जिसका प्रभाव किसी न किसी तरह खेती किसानी मे पडता है. और वन संपदा एक बार नष्ट हो जाने पर कई साल उसे दोबारा बनाने मे लग जाते है. जिस जंगली जानवरों की वन विभाग की देख रेख मे तस्करी को अन्जाम दिया जाता है उसकी वापसी तो संभव होता नहीं है पर इस तरह से उनकी प्रजाति का स्तर जरूर प्रभावित होता है. पर इस सबसे वन विभाग के उन भ्रष्ट अफ़सरों को क्या जिनके घर मे कुछ दिनों के अंदर ही चार पहिया गाडियां खडी हो जाती है. जिनके बैंक बैलेंस उनकी आमदनी से कई गुना अधिक मात्र कुछ विनिमयों से हो जाता है. उनकी स्वार्थ की रोटियां पूरी तरह से गैर कानूनी रूप से विकास करती है.
  पर सवाल यह है की बडी मेहनत से तैयार किये जाने वाले इन जंगलों का माई बाप कौन है . जब रक्षक ही भक्षकों के साथ मिल कर अपनी जागीर लुटाने के लिये तैयार बैठा हो. तो और किसी को क्या इल्जाम दिया जाये. बहुत सी संक्षण संस्थाओं की मानीटरिंग तेज करने की जरूरत है. नियमों को और ज्यादा कडे और  प्रायोगिक बनाने की जरूरत है वर्ना.. वो दिन दूर नही कि जलज अभियान और पंचज अभियान सिर्फ़ किताबॊं मे पढेंगे और वन और वन्य प्राणियों के बारे मे सिर्फ़ दादी और नानी की कहानियों मे जिक्र हुआ करेगा, क्योंकी आज इनका माई बाप कोई बचा ही नहीं है और जिसे जिम्मेवारी सौपी गयी है वो सरकार की योजनाऒं को ठेंगा दिखा कर सरकार को ही बस नहीं सभी को बेवकूफ़ बना रहा है. और सब खीस निपोर कर ड्रामा के सामने बैठे हुये दर्शक और श्रोता के रूप मे अपना काम कर रहे है. लेकिन कोई इस बात को समझने के लिये तैयार है ही नहीं की उनकी तालियां अपने ही पर्यावरण के जनाजे मे बज रहीं है.











शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

मंत्री आये , विकास लाये.


कब तक सहें:- मंत्रीआये , विकास लाये.

इस बार मेरे शहर का विकास काफ़ी तेजी से हो रहा है. ना जाने क्यो. शायद फ़िर किसी केंद्रीय मंत्री या राज्य के मुख्य मंत्री जी के आने का अवसर नजदीक आ रहा है. तभी प्रशासनिक अमले को पर लग गये है. दिन रात युद्ध स्तर से काम चल रहा है. सब धुआंधार स्पीड से भाग रहे है. मुझे तो इस बात की खुशी है कि चलो किसी बहाने ही सही इस बूढे शहर को फ़िर से जवानी का जामा पहनाया जारहा है. उसके लिये ठेकेदार, इंजीनियर और अन्य कमाऊखोर अफ़सर चाहे जितना माल हजम करे . क्या फ़र्क पडता है. सब उनकी आदतों मे शुमार है. और माल जितना सरकारी है उतना ही जनता का है. कौन सा उनके बाप का है. और फ़्री का माल खाने और फ़्री की दारू पीने से किसी को कभी परहेज नहीं होता है दोस्तो.
  चौराहों का सौंदर्यीकरण, सडकों को चमाचम करना, डिवाइडर की मरम्मत, और जल्दी जल्दी पौधों का प्लान्टेशन... और भी बहुत कुछ जैसे लाइट्स को सही करना, मेन हाई वे को अपडेट करना बहुत से काम बहुत ही तेजी से लगातार इस शहर मे दिख रहे है. नगर पालिका निगम के नीचे से ऊपर तक के आलाअधिकारियों के पैरो मे तो जैसे पहिये लग गये हो. इतनी तेजी से ट्रैफ़िक को डिस्टर्ब करके ऐसे सरकारी काम होते तो मैने बचपन से आज तक और आज से पचपन तक नहीं देख पाउंगा शायद. काश इसी स्पीड से न्यायालय यदि न्याय करने लगे. और पुलिस गुनहगारों को पकडने लगे तो कसम से कितना अच्छा हो. लेकिन फ़िर यह सोच कर रह जाता हूं और अपने मन को समझा लेता हूं कि शायद वहां किसी मंत्री या मुख्यमंत्री ,या अन्य उच्चस्तरीय मंत्री का कोई डर नही होता होगा. या फ़िर इनको कोई भजता नहीं होगा.
  विकास और साफ़सफ़ाई का वैसे भी राजनीति से बहुत गहरा नाता तथाकथित रूप से रहा है ऐसा मैने राजनीतिशास्त्र की किताब मे पढा था. हां पर देखने को सिर्फ़ चुनाव के पहले या कुछ महीने बाद तक ही मिलता है. यही तो वोट बैंक का बही खाता है जो आम जनता के समझ के परे है.पर गाहे बगाहे यदि ऐसे ही विकास और साफ़ सफ़ाई का अभियान चलता रहताहै तो लगता है कि कुम्भ्कर्ण कभी कभी जाग तो जाता है हाल चाल लेने के लिये. वरना ना कभी केशेस की सफ़ाई होती है. ना न्याय जगत मे साफ़ सफ़ाई होती है. ना भ्रष्टाचार की साफ़ सफ़ाई होती है. पूरा शहर इतने कम सालो मे बूढा दिखने लगा पर सरकार , न प्रशासन , ना अन्य किसी ने जिम्मेदारी निभाई. जिस तरह विकास कार्य  चल रहा है. तो सोचता हूं कि काश  ओवर ब्रिज का काम, बाई पास का काम. और पुराने बाई पास की मरम्मत , हाई वे का फ़ोर लेने का काम इसी स्पीड से काम हो. जो काम हो चुका है उसकी देख रेख हो. पार्कस का रख रखाव जारी ्रहे. ट्रैफ़िक सही सलामत पहुंचे. जाम की स्थिति ना बने. कोई दुर्घटना ना हो. अस्पतालों की स्थिति मे सुधार हो पुस्तकालयों के बुढापे को दूर किया जा सके तो शायद मंत्रियो की आवक भी आमजन के लिये लाभ प्रद होगी. समस्यायें तो बहुत सी होती है. पर क्या कहा जाये. कभी मैने एक शेर लिखा था
 ज़ख्म जब भी उसको दिखाये गये.
खार मरहम की तरह लगाये गये.
ये स्थिति आज भी समाज मे बनी हुयी है. आज भी जब कोई जागरुकता का परिचय देकर समस्याओं के समाधान के लिये शासन के पास, नगर निगम के पास , या न्यायालय मे न्याय के लिये जाता है. तो ये मानिये कि समाधान हो या ना हो न्याय मिले या ना मिले . लेकिन जागरुकता को वो भुला ही बैठता है. जूते और चप्पल घिस जाते है. और समाज सुधार के नाम पे सरकारी बाबू और चपरासी यहां तक की अधिकारी उनके जेब की साफ़ सफ़ाई जरूर कर देते है. जैसे वो अपने घर का काम कराने आया हो. या किसी बडे कर्ज के लिये गोहारी लगा रहा हो. फ़िर तो वो मन ही मन गालियां देकर सिर्फ़ यह मौन निश्चय कर लेता है, कि अपना विकास करो. देश और शहर गया ऐसी की तैसी कराने. उसके लिये चांदी के जूते वाले पावरफ़ुल ये नेता नपाडी है ना. जिनके लिये  सरकारी बाबू और चपरासी यहां तक की अधिकारी अपनी जेबें साफ़ करने के लिये तैयार बैठे रहते है. नहीं तो चांदी के जूते तो है हीं. ऐसी स्थिति मे मुझे तो लगता है. कि  पिछ्ले पैरा मे बताई बीमारियों से निजात पाने के लिये और अपने शहर को मरणासन्न स्थिति से बचाने के लिये या तो चुनाव कराना पडेगा या फ़िर किसी मंत्री -संत्री को सतना बुलाना पडेगा, तभी तो सतना इंदौर और भोपाल की तरह बन पायेगा, भाई अब क्या किया जाये इससे बडे विकास के सपने क्या देखे. अब दिल्ली, जैसे और बडे महानगर बनाने के ख्वाब अपने ५० साल होने के बाद देखना सही रहेगा. क्या है सपने जब टूटते है तो बहुत दुख होता है. चाहे वो अपनी जिंदगी से संबंधित हो या समाज से संबंधित हो. इसी लिये सबसे बढिया किसी बडे मंत्री को बुलाओ  नहीं तो चुनाव कराओ, और विकास कराओ. शहर का मेकब कराओ, और अपने सपने पूरे कराओ. आज कल का यही दस्तूर है. फ़िर खुशियां मनाओ.क्योंकि
खेत पर पानी बरसता है हमारे देश मे.
खेत पानी को तरसता है हमारे देश मे.
यहां पर नेताओं और मंत्रियों को छोड्कर
अब खुशी से कौन हंसता है हमारे देश मे.




गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

समीक्षा: योद्धा सन्यासी विवेकानंद: बसंत पोतदार


समीक्षा: योद्धा सन्यासी विवेकानंद: बसंत पोतदार
स्वामी विवेकानंद: मनुष्य व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व का अजेय योद्धा.
  सन्यासी योद्धा श्री बसन्त पोतदार द्वारा स्वामी विवेकानंद पे आधारित मराठी उपन्यास है. और इसी को आधार मान कर यह अनुवाद  गंगाधर परांजपे ने एक पुस्तकाकार के रूप मे योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद हमारे सामने प्रस्तुत की है. पुस्तक का भावों का केंद्र बिंदु सन्यासी योद्धा नामक मराठी उपन्यास है इस हेतु श्री बसंत पोतदार जी और भाषागत शिल्प के लिये  गंगाधर परांजपे जी की कलम बधाई के पात्र है.पूरा अनुवाद संग्रह २१६ पेजों मे  और पांच खण्डों मे  विभक्त है. अन्त मे प्रकाशित १५ पेजों मे संचयित चारुगात्र विवेकानंद इस अनुवाद उपन्यास का उपसंहार है जिसके बिना पूरे उपन्यास का अनुवाद अधूरा है.
   प्रथम खण्ड परमहंस- एक परिचय है द्वितीय खण्ड अस्सी प्रतिशत भक्त ठग होते है शीर्षक से अनुवादित है.तीसरा खण्ड धर्मसम्मेलन मे प्रवेश नहीं नामक शीर्षक से अनुवादित है. चौथे खण्ड मे यदि तुम्हारी मां का अपमान किया तो नामक शीर्षक से अनुवादित है. और अन्तिम खण्ड मे विदेश यात्रा के पूर्व शीर्षक से अनुवादक ने अपनी बात कही है.
प्रथम खण्ड मे संत रामक्रष्ण परमहंस के जीवन का सम्पूर्ण वर्णन किया है.इस भाग के जरिये गंगाधर जी ने परमहंस जी का नरेन्द्र से मिलन और उनके जीवन मे माता की संज्ञा  मिली माँ काली के चमत्कारों का जिक्र है.इसमे माँ काली से साक्षत्कार , श्री राम की साधना, रामक्रष्ण का विवाह, भैरवी से मुलाकात, तोतापुरी से मुलाकात, गोविन्दराय से मुलाकात,शंभूचरण से मुलाकात का जिक्र है. नरेंद्र से उनके गुरु की लगातार ३ मुलाकातों का जिक्र है. और अंततः परमहंस के जीवन का त्याग १५-१६ अगस्त १८८६ के आस पास की घटनाऒं का वर्णन है.
द्वितीय खण्ड मे भक्तो की मनो दशा को पाठकों के सामने रखा गया है. जिसमे लेखक और अनुवादक ने परमहंस जी के सम्पूर्ण जीवन काल की घटनाओं को एक खण्ड मे रखकर भक्ति और ढकोसला के भेद की तुलनात्मक बातों को पाठकों के सामने रखा गया है.सन १८९३ के पहले की, विवेकानंद के जीवन की क्रमिक घटनाऒं का मार्मिक और रोचक वर्णन किया गया है.इस खण्ड मे स्वामी विवेकानंद के भारत से विदेश जाने और और वहां के पूर्व उनके संघर्ष को दर्शाया गया है. जब वो राजस्थान मे गये तो उन्हे किस तरह विविदिशानंद का नाम प्राप्त हुआ इसका भी वर्णन पाठकों के सामने आता है. राजस्थान के बाद गुजरात कि यात्रा का वर्णन किया गया है. इसी तरह महाराष्ट्र ,पूना, गोवा, कन्याकुमारी, हैदराबाद,और यहा से अमेरिका के लिये प्रस्थान करने के लिये सारी वैचारिक और समाजिक जमीन का जिक्र बखूबी बेबाकी से किया गया है.
  तीसरे खण्ड मे धर्मसभाओं मे स्वामी विवेकानंद का प्रवेश और उनके विचारों का वर्णन किया गया है.यहा पर १८९३ के बाद की स्वामी विवेकानंद के विदेश मे निर्मित हुयी प्रतिष्ठा और वैचारिक जमीन के निर्माण की कहानी है, इसमे अमेरिका मे हुये सन१८९४ की फ़रवरी मे विरोधियों के द्वारा निर्मित विरोधो का तट्स्थ वर्णन है. इस खण्ड मे  इंग्लैड के किये गये स्वामी विवेकानंद के कार्यों का जिक्र है. और अंततः पुनः अमेरिका और इंग्लैड की यात्रा और वहां पर स्वामी विवेकानंद के समाज सुधार और मानवनिर्माण की शिक्षा का प्रचार प्रसार करने का लेखक और अनुवादक ने सीधे सपाट वर्णन किया है.
  चौथे खण्ड मे स्वामी विवेकानंद ने किस तरह फ़्रांस, रोम,अदन, कोलम्बो, और फ़िर कोलकाता तक पहुचे इससे सम्बंधित घटनाओं का वर्णन है. इसी खण्ड मे विवेकानंद के द्वारा रामक्रष्ण परमहंस मिशन की स्थापना के बारे मे विस्त्रित वर्णन है.इसी चरण मे  स्वामी विवेकानंद की भगिनी निवेदिता से मुलाकात और उनके जीवन मे निवेदिता का प्रवेश, उनके मिशन मे योगदान का वर्णन है, रामक्रष्ण मठ मे हुये विवादो अर्थात गुरुबंधुओं से स्वामी विवेकानंद के विवादो का वर्णन है.जो कुछ दिनो के बाद शांत होगया, इसी चरण मे बीमार स्वामी विवेकानंद का विदेश यात्रा के पूरव की घटनाओं का वर्णन है.
 अंततः अंतिम चरण मे.२० जून १८९९ से शुरू हुयी विदेश यात्रा जिसमे भारत से लंदन और फ़िर इस्तंबूल जाने का वर्णन है.यहां पर उनकी मुलाकात का जिक्र है जिसमे उनकी मुलाकात कु, मैक्लाड या जो से हुयी जो उनके विचारों की मुरीद थी. वापस भारत आकर  ट्रस्ट की स्थापना, बंगाल की यात्रा.४ जुलाई १९०२ को उनके स्वर्गवासी होने तक की हर घटना का बारीकी से वर्णन किया गया है.
अन्तिम कुछ पेजों मे परिशिष्ट के रूप मे स्वामी विवेकानंद के विभिन्न रूपों का ,व्यक्तित्व कॆ विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है. जिसमे ब्रह्मचारी, पट्टशिष्य, सिद्धि विरोधी, विज्ञान निष्ठ, दलितों के मसीहा, मांसाहारी होने, हाजिरजवाबी होने, से सम्बंधित विभिन्न घटनाओं का, पत्रो के माध्यम से लोगो के विचारों का संग्रह है. यही स्वामी विवेकानंद के सांगोपांग जीवन की लोगो के द्वारा की समीक्षा है.
 सम्पूर्ण अनुवाद पर यदि बात करें तो यह कहने मे कोई संकोच नहीं है कि पूरी पुस्तक स्वामी विवेकानंद शताब्दी वर्ष मे उनके व्यक्तित्व के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से पाठक मंच मे भेजी गयी है. गंगाधर परांजपे जी ने अपनी अनुवाद्कीय मे खुद स्वीकार किया है कि  भावपक्ष के नजरिये से इस पूरे उपन्यास मे सिर्फ़ बसन्त पोतदार की बाओ का बिना कोइ फ़ेर बदल किये वर्णन किया गया है. इस पुस्तक का उद्देश्य विवेकानंद के बहुआअयामी जीवन के बारे मे और उससे जुडे विभिन्न आयामो को पाठको के सामने उजागर करना है.साथ ही यह बताना है कि अनासक्त होकर कर्म मे सतत संलग्न होने का नाम विवेकानंद है. पूरी पुस्तक का केन्द्रबिंदु परमहंस और विवेकानंद है. विवेकानंद की जीवनचर्या के साथ वैचारिक सोच को धर्म,समाज, सभ्यता, जाति वर्णव्यवस्था, शिक्षा, मानव चरित्र निर्माण, विज्ञान और तर्क के क्षेत्र मे पाठको के सामने रखना है. इस अनुवाद मे जस्टिस पलोक बसु का अमूल्य योगदान है. जो स्वामी विवेकानंद के विचारों के मुरीद थे.अंतत: पूरी रचना को पढने के बाद यह आकलन कर सकता हूं कि स्वामी विवेकानंद कोमनुष्य के व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व के अजेययोद्धा के रूप  मे  पाठकों के सामने लाना  ही इस पुस्तक का उद्देश्य है.साथ ही मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण की शिक्षा  ही जीवन की सबसे बडी दीक्षा है. जो स्वामी विवेका नंद का मूलमंत्र है.और इस रचना के कालजयी होने का प्रमुख सूत्र है.पूरी रचना को पाठकों के सामने लाने का प्रमुख उद्देश्य पाठकों के सामने स्वामी विवेकानंद के उदीयमान विचारो को पुनुरुत्थान हेतु सामने लाना है.
अनिल अयान.
सतना म.प्र.
संपादक -शब्द शिल्पी,सतना,
सम्पर्क:९४०६७८१०४०,९४०६७८१०७०

नागा संत: कुछ कही कुछ अनकही


नागा संत: कुछ कही कुछ अनकही.
 कुम्भ का पर्व शुरू होते ही साधू संतो की आवक शुरू हो जाती है. सबसी जमात है इनकी हमारे यहां भारत मे. सबसे प्रसिद्ध समूह नागा साधुओं का समूह को हम सब जूना अखाडा के नाम से जानते है. जूना अखाडा या ये कहे नागा साधुओं का अपना देश, ये विशेष प्रकार के संत ,संतों की श्रेणी से कहीं उपर और ज्यादा हठी  स्वभाव के होते हैं. लेकिन शायद कोई जानता हो कि ये इतने हठी क्यों होते है. जीवन का सबसे बडा और कडा तप इनके जीवन की हर घडी मे गुजरता है.मै इस समय आप सभी पाठकों के सामने इसी संदर्भ मे कुछ बात-चीत करूंगा. महन्त, संत, महापुरुष, और अवधूत,ये सभी ब्रह्म्चर्य की अलग अलग बढते क्रम की श्रेणियां है.
  नागा सन्त सिर्फ़ संत ही नही अवधूत होते हैं. जिनके, सोलह नहीं सत्रह संस्कार होते है, इनके जीवन की हर घटना रोचकता और रोमांच से भरपूर होती है. जब आम इन्शान अपने जीवन को ब्रह्म्चर्य की तपस्या मे लगाने के लिये संकल्पित होता है तो उसे सभी परिवार जनों से रिस्ता तोडना पडता है.नागा अवधूत बनने का मतलब यह नही होता कि सिर्फ़ वस्त्र ही त्यागना पडता है.  वस्त्र तो सिर्फ़ एक बहाना है ,अपने को इस मायाजाल से अलग करने के लिये.
परिवार को छोड कर ये ब्रह्मचारी अपने जीवन की मुख्य धारा से कट जाता है.
और भक्ति की धारा से जुड जाता है. नागा बनने के लिये पहले ब्रह्मचारी का जीवन कई सालों व्यतीत करना पडता है. उसके बाद उसे किसी आश्रम मे जाकर अपने जीवन मे गेरुए रंग के वस्त्रो को धारण करके पूर्णरूपेण एक साधू के रूप मे परिवर्तित हो जाना पडता है. जूना अखाडे के पुराने बाबाओं के समूह के सामने नागा बनने आये इन
साधुओं का मेल मिलाप होता है. हम यह भी कह सकते है कि प्रथम मिलन होता है.
जानकारियों का आदान प्रदान होता है.
 परिचय के इस दौर के बाद नागा बनने हेतु इन संतो के वास्तविक ब्रह्मचर्य का स्तर जांचा जाता है. इसके लिये कुछ महीनों से कई साल तक लग जाते है.इसके बाद जूना अखाडे के संत नागा बनने वाले संत के भाई- पट्टीदारो, परिवारो और सगे- संबंधियों के बारे मे पूरा पता लगाते है. वो भी उस संत के बिना संग्यान मे दिये. जब जूना अखाडे के प्रमुख लोगो को लग जाता है कि यह साधू नागा बनने के योग्य है तब उसे महापुरुष बनने हेतु किसी एकांत जगह पर किसी एक मुद्रा मे बिना किसी वस्त्र के खडे रहना पडता है. उस पर सबकी नजर होती है. यह काल कितना लम्बा होता है या होगा इस बात का निर्णय जूना अखाडे वाले करते है. इस तपस्या के बाद. कुम्भ आने तक इन्हे वरिष्ठ नागा बाबा के साथ रखा जाता है. कुम्भ के काल मे इन संतो को अपने जीवित अवस्थ मे अपना श्राध और पिण्डदान करना पडता है. यहा से यह मान लिया जाता है कि अब इस साधू का पूरे संसार से कोई ताल्लुकात नहीं है. यह सभी के लिये स्वर्गवासी हो गया है. इस समय ये अपने सारे वस्त्र त्याग कर सत्रहवां सस्कार करते है, अपने बाल बनवाते है और अपनी तेरहवी और बरषी मे शामिल होते है. और जैन मुनियों के समान निर्वस्त्र हो जाते है. यहां से इन साधुओं का नया जीवन तय होता है.
इसके बाद इनके शरीर मे जूना अखाडे का चिह्न लगाया जाता है और विधिपूर्वक ये जूना अखाडॆ के सदस्य बनाये जाते है.
  नागा बाबाओं का इंतिहान इसी जगह पर खत्म नहीं होता, बल्कि यहां से और कडा हो जाता है. या यह कह सकते है कि अभी तक सिर्फ़ प्रवेश परीछा थी अब तो पूरी पढाई इन्हे करना है.यहां से शुरू होता है हठ योग का जीवन ,या ये कहें कि साधू के जीवन का सबसे कठिन समय का पहला चरण जिसमे सभी नागा बाबाओ के सामने नग्न शरीर मे ये शाबित करना होता है की शरीर ने ब्रह्मचर्य को शोषित कर लिया है. वासना पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. क्योकि यदि वासना शरीर मे बची रह गयी तो अगले चरण मे उतना ही ज्यादा कठिनता से गुजरेगी. कई महीनो के कठिन तप के बाद सोना आग मे तप कर निखर आता है. कुछ समय के बाद ब्रह्मचर्य का असली इंतिहान होता है. जिसमे  लिंग भंग की प्रक्रिया होती है. यह इनके जीवन का सबसे पीडा का वक्त होता है. इस प्रकिया मे लिंग की उस नस को निष्क्रिय किया जाता है जो वासना का सम्प्रेषण शरीर मे करती है. जीवन की महानतम और शारीरिक पीडा के बाद अवधूत अब नागा बाबा के स्वरूप को धारण कर चुका होता है. यहां से इसकी १०८ संगम की डुबकियां उपयोगी होने का वक्त उपस्थित होता है. अब ये भगवान शिव के सच्चे भक्त बन जाते है. अब हर प्रकार का नशा और ब्रह्मचारी जीवन इनके लिये उपयोगी होता है. इनकी सेना मे इनका स्वागत किया जाता है. जश्न होता है. उत्सव की तरह इनका सेना मे स्वागत होता है.
   नागा बाबा का यह रूप इतने तप के बाद निखरकर लोगों के सामने आता है. सेना मे पौराणिक समय के समान हाथी, घोडे, और अन्य प्रकार के जीव जन्तु होते है. साथ ही सभी प्रकार के अस्त्र और शस्त्र होते है. ये नागा बाबा जब ,जहां से गुजरते है. उस जगह के लोगो के लिये कौतूहल का विषय बन जाते है. हठ योग के बाद ये इतने ज्यादा हठी और क्रोधी, साथ साथ जिद्दी हो जाते है. कि सबसे पहले इन्ही का सुना जाता है. इन्ही का सम्मान किया जाता है. हर तरफ़ इन्ही की तूती बोलती है. तभी तो  ना गलत ये सहते है और ना ही जुबान से बोलते है. नागा बाबाओं का मानना है की भगवान शिव का अंश इनके अंदर होता है. और यदि ये गलत का साथ देते है तो इनको नर्क भोगना पडेगा. नागाओं का यह भी मानना है कि इन सब ने यह रास्ता सिर्फ़ अपना जीवन सही मार्ग मे चलने के लिये चुना है. ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही देखने को मिल सकता है जहां की परम्परायें इतनी मजबूत है.और इतिहास इतना पौराणिक है जो स्तुत्य और प्रण्म्य है.
अनिल अयान.सतना.

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

बौद्धिक आजादी के लिये घिघियाते लोग

कब तक सहें
बौद्धिक आजादी के लिये घिघियाते लोग
 हमारी भारतीय सभ्यता के उपर हुये प्रायोगिक हमलों के बाद इस वक्त तीन केश फ़िर से मीडिया के बुद्धू बक्से मे दिखाया जा रहा है उसमे से एक है आशीश नन्दी का बयान, सलमान रुश्दी का कोलकाता आने पर ममता बनर्जी के द्वारा रोक लगा देना और कमल हासन की फ़िल्म विश्वरूपम पर प्रतिबन्ध की पेशकश.सलमान रुश्दी और आशीश बौद्धिक वर्ग से  सम्बन्ध रखते है. और कमल हासन फ़िल्म जगत के जाने माने अदाकार और फ़िल्म निर्देशक है. दोनो परिस्थितियो को देख्नने पर पता चलता है कि बौद्धिक आतन्कवाद  का ज्यादा ही प्रचार प्रसार किया जा रहा है.बौद्धिक आजादी के लिये ये तीनो नाजायज ही सरकार के  सामने घुटने टेक रहे है. इन पूरे तथ्यो से दो बाते सामने आती है.रुश्दी  और नन्दी की लेखन प्रक्रिया  एक लबादे को हटाने की  कोशिश करती है जिसे आज सभ्यता का अतिवादी चोला कहा जा सकता है. इसके अन्दर कई तथाकथित नामी गिरामी लोग अपने को सभ्यता का पालनहार समझते है.लोकतान्त्रिक देश की वास्तविकता यह है कि ज्यादा अपने मन का राग बजाने से सबके तन के निचले सिरे मे खुजली शुरू हो जाती है.यहा पर समन्वय स्थापित करके ही अपना काम निकाला जा सकता है या निकालने की परम्परा है,ज्यादा कट्टर हो जाने पर अपनी जान से हाथ धोने की तरह हो जाता है.इस देश मे राजनीति का ऐसा ही रवैया है.क्या कर सकते है आप.रुश्दी का देश की कोलकाता नगरी मे  रोका जाना इसी सभ्यता का जीता जागता उदाहरण है.और रही गन्दे साहित्य के प्रराचर होने की और इसके विरोध की पैरवी करने वाले टी.एम.सी. सान्सद साहेब के बयानो की. तो इस देश का कोई ऐसा कोना नही है जिस जगह पर इस साहित्य का कारोबार फल फूल नही रहा है. और वो क्या देश का कोई कानून इसका बाल भी हिला नही सका. कितनी शर्म की बात है.वो खुद बस स्टेन्ड, रैल्वे स्टेशन ,के बुक स्टाल्स मे इस बीमारी को रोकने मे असमर्थ है.
    विश्व रूपम  के मामले की कहानी थोडा अलग परन्तु इसी तरीके से मुद्दे को बनाने और आग लगाने की कहानी है. इसमे कमल हासन जितने गुनह्गार है उससे कई गुना सेन्सर बोर्ड के वो मेम्बर विरोध के अधिकारी है जो इस फ़िल्म को ओ.के. का प्रमाण पत्र दिये है.प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का काम है वो फ़िल्म व्यापार से जुडे है. वो तो अपना काम करेगे ही, पर सेन्सर बोर्ड के मेम्बर क्या इस फ़िल्म मे भी अन्डर द टेबल अपना काम करने मे लगे हुये थे.अब यदि इस फ़िल्म को ओ.के. का प्रमाण पत्र दिया गया तो फ़िर हासन साहब का मीडिया के सामने आना जायज है. क्योकी वो तो अपनी बनायी फ़िल्म बाजार मे बेन्चेगे ही. सेन्सर बोर्ड को चाहिये था कि वो आपत्तिजनक सीन्स को हटाने का आदेश देता जिस वजह से मुस्लिम धर्म के अनुयाइयो को ह्र्दयाघात लगा है.यह भी सच है की किसी फ़िल्म का उद्देश्य ये नही होना चाहिये कि किसी धर्म को आहत किया जाये.परन्तु. आज के उसी टॆलीवीजन मे फ़िल्म्स के अन्दर. अश्लीलता .सरे आम आइट्म गाने और अन्य तरीको से पेश कर मानव को सिर्फ़ नर और मादा के रूप मे समाज के सामने पेश किया जाता है. उस वक्त क्यो समाज और धर्म के पन्डे अपनी जुबान क्यो नही खोलते. हमारे धर्म मे आन्च आयी तो हम गोहारी मारने लगे. और अन्य धर्मो की बारी आने पर मूक दर्शक बन गये.
  आशीश नन्दी साहेब  तो ज्यादा ही कबीराना अन्दाज भारत जैसे कट्टर लोकतान्त्रिक देश मे  बेबाकी से प्रस्तुत कर दिया है.सम्वैधानिक कैटेगरी की जनरल के अलावा सभी करप्ट. मतलब जिस डाल मे विराजमान हुये उसी को काटने मे तुल गये. और फ़िर ये कह रहे है कि. कबीरा खडा बाजार मे सबकी मांगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर.  उन्हे शायद यह  नही पता कि यह भारत है यहां पर कबीर जैसे युगवादी सन्त को, जो किसी जाति पाति, धर्म और पन्थ को नही मानता था,उसके मरने के बाद उसी के अनुयाइयों ने कबीर पंथ का आराधक बनाकर उसके विचारों के साथ सरे बाजार बलात्कार कर दिया.तो आप किस खेत की मूली है. साहेब यहा का आईना भी प्रतिबिम्ब व्यक्ति को देख कर दिखाता है. क्योकि उसे भी अपनी जान प्यारी है. आज के राजनैतिक माहौल मे किसने कहा था कि गुस्साये और पगलाये तथाकथित सूरज को आईना दिखाने के लिये.अब भोगिये सजा और जिल्लत.
   तीनों के विचार प्रगतिशीलता का प्रचार प्रसार करना है.परन्तु एक सिदधान्त है कि हमारी आजादी हमारे लिये तब तक नुकसान दायक नही है. जब तक कि  उस नुकसान से अपने स्वार्थ की रोटियां सेकने वाले लोग मौजूद ना हो. पर यहां तो पूरी सेना मौजूद है. खैर
आज के समय मे बौदधिक आजादी अपने ही घर मे कारावास भोगने के लिये विवश है. क्योकि बौदधिक आतंकवाद रोकने वाले ही इसे विलायती बाबू बनाकर जनता की आंखो मे धूल झोंक रहे है. और यही वोट बैंकिंग का बेस्ट मैनेजमेट है.

रविवार, 27 जनवरी 2013

किसी की बपौती नहीं है कांग्रेस l



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9406781040

शनिवार, 19 जनवरी 2013

कस्बों के बडे स्कूल: कुकुरमुत्ता संस्कृति के फूल


कब तक सहें;======
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कस्बों के बडे स्कूल: कुकुरमुत्ता संस्कृति के फूल
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इस वक्त इंग्लिश मीडियम और सी.बी.एस.ई. पैटर्न के स्कूलों के खुलने की क्रांति सी आ गई हैं। ऐसा लगता है कि हरी, नीली, पीली, सफेद क्रांति के बाद अब स्कूल क्रांति सी आ गई है। मोहल्ले-मोहल्ले में कुछ कमरे किराये से लेकर स्कूल की मान्यता ले ली जाती है और भगवान भरोसे शिक्षा का बंटाधार किया जाता है वही 10वीं, बारहवीं पास शिक्षक, 500 से 1500 की तनख्वाह, समय को पास करने का साधन बन कर रह जाते है यह स्कूल। कस्बों में छोटे स्तर से शुरू हुए कुल स्कूल जो नामी गिरामी बडे स्कूल की परंपरा तक पहुॅचने की असफल कोशिश करने में पूरा सत्रा गुजार देते है वहाॅ की माली हालत यह होती है कि शिक्षकों का अकाल हमेशा पडा रहता है। ऐसे स्कूलों का प्रबंधक या तो व्यवसायी होता है या किसी सरकारी स्कूल का भ्रष्टाचारी शिक्षक होते है जो अन्य साधनों को छिपाने के लिए स्कूल खोलकर ज्ञान बांटने का जरिया अपना लेते है। ऐसे विद्यालयों की स्थिति यह होती है कि अप्रैल और जुलाई में अच्छा खासा विज्ञापन होता शिक्षकों की आवश्यकता का और फिर उनकी भर्तियाॅ होती हैं भर्तियों की एक प्रक्रिया साक्षात्कार में सिर्फ मोलभाव होता है तनख्वाह का। कोई मूलभूत सुविधाएॅ नहीं होती है न सुविधायुक्त भवन न खेल का मैदान, न लैब, न सही ढंग से परीक्षाएॅ। सिर्फ खानापूर्ति होती है। सरासर शिक्षा के साथ बलात्कार किया जाता है और बलात्कार करने वाले वही शिक्षक और उन पर आदेश झाडने वाले उनके तथाकथित विद्वान प्रबंधक। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की आवश्यकता कम और शिक्षक जैसे या शिक्षक किस्म के लोगों की आवश्यकता होती है। अधिक से अधिक अभिभावकों को इस बात के लिए आकर्षित किया जाता है कि उनके बच्चें का विकास सर्वागीण स्तर पर होगा और विद्यालय तो नाम मात्रा के है। हमारा विद्यालय ही प्रतिष्ठित संस्थान है जब बच्चों का प्रवेश हो जाता है तब पैरेंट्स का गला विद्यालय के हाथों में फंस जाता है। न कोई कुछ कर सकता है सिर्फ उधर से मांगे डायरी में नोटिस के रूप में होती है और इधर से उसे पूरा ही करना होता है वरना परिणाम यह होता है कि बच्चे को सरेआम कक्षा में जलील किया जाता है ऐसेम्बली मंे लंबे समय तक खडा रखा जाता है। पैरेन्ट्स मजबूर होता है अपने बच्चे के भविष्य को अच्छा बनाने के लिए अपना पेट काट-काट कर स्कूल की फरमाइसें पूरी करता है। कभी यदि कोई पैरेन्ट्स अपने बच्चे का एडमीशन दूसरे बडे शहर की स्कूलों में करने की बात करता है तो फिर प्रबंधन उनके सामने वादों का ताजमहल खडा कर देते हैं। कस्बों में बडे स्कूलों की यह स्थिति होती है कि वहाॅ पर हाई और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की छात्रा संख्या में लगातार कमी आती जा रही है। पार्टटाइम शिक्षकों को टेम्प्रेरी पीरियड में बुलाकर कोर्स पूरा कराने की कवायद होती है। पीरियड वाइज पढाने के वादे के साथ विदाई दी जाती है। ग्यारहवीं और बारहवीं में कस्बों के बडे विद्यालय अधिकतर कामर्स और आर्ट की कक्षाओं का संचालन करते है ताकि लैब आदि में पूंजी न लगाना पडे या फिर यदि मैथ और साइंस की कक्षाएॅ लगाते है तो उन्हें कुछ दिनांें के लिए अन्य जगह लैब में भेज दिया जाता है। कहने को बडे विद्यालय बडे होने का आडम्बर करते रहते है और बच्चे का समय उनके पैरन्ट् स की जेब ढीली करते है। कुछ कस्बों में विद्यालयों को पैसों के दम में आसानी से मान्यता मिल जाती है और वो अपने प्रचार प्रसार के लिए शहर के या बाहरी टीचर्स को अपने यहाॅ बुलवाते है। एक साल के प्रोवीजन पीरियड के समय पर इन टीचर्स के नेम, फेम और एक्सपीरियंस का इतना प्रचार प्रसार किया जाता है कि पैरेन्ट्स इनके जाल में फंसकर अपने बच्चों का एडमीशन करवा दें। इन शिक्षकांे को या तो कम वेतन देकर अधिक वेतन में हस्ताक्षर कराया जाता है ताकि मान्यता बनी रहे या फि र उन्हें इतना ज्यादा मनावैज्ञानिक दवाब दिया जाता है सितंबर से जनवरी के बीच ताकि वो बीच सत्रा में छोडकर चले जाए। इसका परिणाम यह होता है कि मैनेजमेन्ट बाईज्जत अपना बचाव कर लेता है उसका पेमेंट बच जाता है और इसी बचे पैमेंट से वो 1200 - 1500 के बेरोजगार युवाओं को फ्रेशर के रूप में खानापूर्ति कर लेते है। फीस के नाम पर बच्चों के पैरेन्ट्स को सेमेस्टर फीस के नये सिस्टम के अनुसार पूरा महीना होने से पहले परीक्षाओं के पहले पैरेन्ट्स के ऊपर दवाब बनाया जाता है कि वो पूरी फीस जमा करें नहीं तो बच्चे को परीक्षा में नहीं बैठाया जाएगा फिर मजबूरन पैरेन्ट्स अपनी जमापंूजी से फीस जमा करने की कवायद शुरू कर देता है।
इस तरह की स्थिति में न शिक्षा विभाग की नियमित जाॅच आयोग है न जाॅच कमेटी जो इन गैरसरकारी कुकुरमुत्तों के समान खुल रहे विद्यालयों की नाक पर नकेल कस सकें और इनकों सिस्टम में ला सके। ये विद्यालय चाहे बुक सेलर हो चाहे किताबों की दुकान सभी से अपना स्वार्थ साधने का दम रखते है। आज जरूरत है इस प्रकार के छोटे-मोटे विद्यालयों में अनुशासन गाइड लाइन और सिस्टम तैयार करने की इनकी मानिटरिंग करने की ताकि ये बच्चों और उनके पैरेन्ट्स के साथ खिलवाड करने से बाज आ सकें वरना वो इसी तरह शिक्षा नीतियों को ठेंगा दिखाते रहेंगे।
- अनिल अयान, सतना
9406781040

शनिवार, 12 जनवरी 2013

किस बात का युद्व विराम


किस बात का युद्व विराम
एक तरफ शांति के प्रयासों का दिखावा और दूसरी तरफ आतंकी कोहराम यह सूत्रा तो हमारे पडोसी मुल्क पाकिस्तान को पहले से रहा है। 65 और 71 का युद्व चस्मदीक गवाह रहा है कि यदि समक्ष युद्व हुआ है तो पाक को हार का सामना करना ही पड रहा है। इसमें पाक का ज्यादा दोष नहीं है। पाक को अमेरिका की तरह दुश्मन नहीं मिला वरना ईराक और ओसामा की तरह इनका भूगोल भी मिट गया होता। वो ज्यादा ही साफ-साफ परिणाम होता है परंतु हम लोकतांत्रिक और समतावादी देश के निवासी है। हमने गांधी की गांधीगिरी की शिक्षा ली है जितने हमले पाक ने नापाक इरादों से हमारे देश में किया और हमने उदारवादिता का परिचय देकर मित्राता के नाम पर वीर सपूतों, सैनिकों की कुर्बानियों को सिर्फ समीक्षात्मक निर्णय के अंजाम पर लाकर खत्म कर दिया यह सब सिर्फ पंचवर्षीय सत्ता और उसके मोह का परिणाम है।
युद्वविराम का मानवीय अर्च भुला देने वाले पाकिस्तानी आतंकी संगठनों और उनके उन जेहादियों को शायद यह नहीं पता कि जेहाद का कार्य किसी के जिस्म के टुकडे करना नहीं सिखाता। युद्व विराम में किस तरह से जेहाद में खलल पड रही थी। घुसपैठ के नाम से युद्व विराम को पाकिस्तान को सरेआम ये आतंकी संगठन चूना लगा रहे है। 12 बार नालायकी करने का परिणाम और सजा भारत जैसे उपमहाद्वीप ने सिर्फ इतना कहकर दे दिया कि उच्चायुक्त को तलब किया गया है। उचित निर्णय लिये जायेंगे। वह अब भी आपके ओंठ मौन क्यो है प्रधानमंत्राी जी, रक्षामंत्राी जी की जुबान में क्यों ताला लग गया और विदेश मंत्राी को तो जैसे पैरालाइसिस सा हो गया। इस पूरे घटनाचक्र मंे कोई धर्म, कोई देश या कोई सभ्यता दोषी नहीं है बल्कि पाकिस्तान की जमीन में पल रहे वो आतंकी संगठन और आतंकवादी दोषी है जिस पर पाकिस्तान समय पर नकेल नहीं लगाया और वो ज्यादा भारत के साथ-साथ पाक की भी तेरही करने में उतारू हो गया है। यह बात पाक के उच्चाधिकारियों से भी छिपी नहीं है कि उसके यहाॅ इस्लामाबाद और कराची में हुए आतंकी हमले उन्हींेे के नाजायज तरीके से पैदा किये आतंकी संगठनों और उनके सपोलों की घिनौनी करतूत है जो अपनी ही थाली में छेद करने से भी बाज नहीं आ रहे है।
वास्तविकता तो यह है कि जिन्ना साहब की मेहरबानी है जो पाकिस्ताचन का अस्तित्व आया और भारत का विभाजन शर्तो के आधार पर हुआ और उसी के बाद से पाक, अफगान और बांग्लादेश जैसे पडोसी मुल्को का अस्तित्व सामने आया जिसमें से पाकिस्तान लगातार विरोधी रवैये के चलते कई बार युद्व में मुॅह की खाया पर बाज नहीं आया लेकिन अभी हुए बर्बरतापूर्ण तरीके से कृत्य वाकयै यह साबित कर दिया कि पाक आतंकी संगठन और आतंकवादी सिर्फ जेहाद और मुस्लिम धर्म को सरे आम, सरे राह नीलाम कर रहे है, गहराई पर जाने में यह समझ में आया कि आतंकी संगठन बिगडैल भाग है मुस्मिल समुदाय का जो धर्म को अपने स्वार्थो के लिए गलत ढंग से उपयोग कर रहा है। इस बात का एहसास पाकिस्तान को हो रहा है कि कई दशकों के पूर्व उसने जो बबूल का पौधा बोया था उसी के कांटे उसे चुभ रहे है। यह भी सच है कि पाकिस्तान के बगल में यदि भारत की जगह में यदि अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश होता तो तय था कि ईराक की तरह कब्र में पाक भी आराम कर रहा होता लेेकिन होता वही है तो ऊपर वाला चाहता है।
लेकिन बर्बरतापूर्ण इस रवैये से पूरे देश में आक्रोश फैला हुआ है इतना ज्यादा किसी ने भी विरोध नहीं किया, क्यो नहीं किया, इसमें देश की संवेदनाएॅ नहीं तार-तार हुई, क्या इसमें कोई भाई, कोई पति, कोई पिता नहीं आहत हुआ, किसी माॅ, किसी बहन, किसी पत्नी ,किसी बेटी ,की उम्मीदें नहीं धराशायी हुई। सच है हम सब इसे दुर्घटना मान कर चुपचाप मौन धारण किये है। सब कुछ खत्म तो उन दो परिवारों का हुआ जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया। मुझे लगता है यदि हमारी सरकार प्रैक्टिकल होकर तुरंत उत्तर देना सीख लें तो यह मजाक दुश्मन देश के द्वारा हर बार न किया जाएगा। सरकार इस प्रकार की परिस्थितियों में हमेशा एक ही जवाब देती है कि हम ठोस कदम उठा रहे है मेरी यह समझ में नहीं आता कि हमारी केन्द्र सरकार के कदम कितने ज्यादा मजबूत और ठोस कदम है कि उठते-उठते शत्राु द्वारा आक्रमण भी कर देता है और हम भीख मांगते रह जाते है। अजीब सत्ता है और सत्ता के ये पण्डे है वो न पाकिस्तानी धतकरमों को रोक सकी और न ही पाकिस्तानी संगठनों को जो धर्म की छीछालेदर करने से कभी बाज नहीं आती है।
मुझे एक था टाइगर फिल्म का अंतिम सीन याद आता है जिसमें कथाकार की कथावस्तु को भारत और पाकिस्तान दोनों को माननी चाहिए जिसमें सलमान खान और कैटरीना अंतिम सीन में एक साथ विदेश में घर बसा लेते है और सलमान कहता है कि मुझे इस बात की खुशी हुई है कि आज तो भारत की राॅ और पाकिस्तान की आई.एस.आई. हमें ढंूढने के लिए एक साथ काम कर रही है वरना ये दोनों खूफिया एजेंसी सिर्फ आपस में ही लडती रहती है। आज भी आई.एस.आई. और राॅ के कुछ ईमानदार अधिकारियों को सलमान और कैटरीना की बजाय आतंकवाद, आतंकी संगठनों और मुस्लिम धर्म के दगाबाज अफसरों को ढंूढने के लिए एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है इस पर दोनों सरकारों को संजीदगी से विचार करना चाहिए तभी यह प्राॅक्सीवार का ड्रामा रूक सकता है वरना एक युद्व विराम होगा और उधर से दूसरी तरफ घुसपैठियों का कोहराम होगा। यह भी सच है कि सेना सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक आदेश का इंतजार कर रही है वरना पाकिस्तान क्या कई पाकिस्तान इस तरह की हरकतों के बाद एक पहर से दूसरा पहर न देख पाय और विश्व का मानचित्रा हर पहर बदलना पडे। यदि इतने हमलों के बाद भी हम चुप है तब यह तो तय है कि भारत की संसद के सत्ताधारी जनप्रतिनिधियों का पुरषत्व खत्म हो चुका। कोई दुश्मन भले ही कथित रूप से वह हमारा भाई हो, यदि सरेआम वीर सपूतों का सिर कलम कर दे तो भी हम खामोश रहें तो यह कायरता ही होगी। जिस दिन इस बर्बरतापूणर््ा घटना को मैंने देखा उस दिन मेरे अंदर के कवि ने सिर्फ इतना कहा कि -
तुम संसद में बैठ देशभक्ति जान नहीं सकते
ये ऐसे नालायक है तुमसे मान नहीं सकते
सेना यदि औकात दिखा दे बिना किन्ही आदेशों के
तब भूगोल नहीं दिखेगा विश्व में ऐसे देशों के
देश नहीं चला करता है ऐसे नालायक पंडों से
शांति नहीं स्थापित होती समतावादी झंडो से
सेना तो तैयार खडी है पाकिस्तान मिटाने
 एक पल में जाकर के कब्रिस्तान बनाने को
सच कहता हूॅ सेना को यदि कुछ घंटे मिल जाए
तो छद्म युद्व करने वाले देशों के मुॅह सिल जाए।

- अनिल अयान, सतना

शनिवार, 5 जनवरी 2013

क्यों पडी परती, संविदा शिक्षकों की भर्ती


क्यों पडी परती, संविदा शिक्षकों की भर्ती
एक साल गुजर गये पर उन सभी की, जो संविदा शिक्षकों की परीक्षा पास करके बैठे है, इंतजार की घडियाॅ अभी तक खत्म नहीं हुई वहीं दूसरी ओर उत्तरप्रदेश में दिसम्बर के पहले सप्ताह में जारी शिक्षको की भर्ती विज्ञप्ति के अनुसार नियुक्तियाॅ जनवरी अंत तक तय हो चुकी है। हमारे राज्य में मुख्यमंत्राी महोदय लगातार लोगों को अपने वादों के लड्डू खिला रहे है और भविष्यगत चुनावो ंके लिए मजबूत बुनियाद तैयार कर रहे है दूसरी तरफ वो सारे परीक्षार्थी जो संविदा शिक्षको की परीक्षा पास करके नौकरी लगने और बेरोजगारी का दाग हटने की बाट जोह रहे है। उनके सपनों में जरूर जंग लगता नजर आ रहा है अब तो यह स्थिति है कि कब बाबा मरेंगे और कब बैल बिकेंगे। संविदा भर्ती से जुडी राजनीतिक नीतियाॅ कहीं न कहीं वोटों की राजनीति के रूप में सामने आने लगी है और इसमें कोई संदेह नहीं बचा कि इस बार की सरकार भी हमारे वर्तमान मुख्यमंत्राी शिवराज सिंह चैहान जी की ही होगी पर उन लोगों का क्या जो सरकारी नौकरी के जलवों के सपनों में गुम है न ही चैन। कब तक भर्ती होगी हर तरफ यही चर्चा का विषय है। सभी की जुबान में 2500, 3500, 4500 से बढी हुई संविदा वेतन 5000, 7000 और 9000 पाने की चर्चाए है और बैंक के खाते भी इंतजार की घडियाॅ गिन रहे है। दिग्विजय सिंह की चलाई गई नीति जो अध्यापक संवर्ग से शिक्षाकर्मियों और फिर शिक्षाकर्मियों से संविदा शिक्षकों तक का सफर तय कर यहाॅ तक पहुॅची है। वह शिक्षकों के साथ वास्तविक न्याय तो नहीं पर वर्तमान में जहाॅ सब सरकारी मुलाजिम बनने के सपने देखते है उनके लिए भागे भूत की लंगोटी ही सही वाली स्थिति है। यदि सरकारी शिक्षक की पोस्ट न मिली तो संविदा में क्या बुरी है इसी बहाने भविष्य सुरक्षित हो जाता है। यही वजह रही है कि व्यापम की चांदी इसी तरह की परीक्षाओं को पूर्व कराने में हो जाती है इफरात धन की कमाई और कम व्यय। संविदा शिक्षकों की स्थित उ0प्र0 की शिक्षा मित्रा वाली योजना की तरह कार्य कर रही है। अब शिवराज सिंह जी को सोचना चाहिए कि उनके राज्य से अलग हुए तेरह वर्ष पूर्व छ0ग0 के मुख्यमंत्राी रमन सिंह ने जो शिक्षकांे का उद्धार किया उस वर्तमान तरह कुछ नया होना चाहिए तभी उनकी वोट बैंकिग की मार्केटिंग लगातार बढेगी शिक्षकों के वोट तो पूरे मान कर चले। शायद इस वजह से यह भर्तियाॅ चुनाव आचार संहिता के पूर्व से होना प्रारंभ हो जानी चाहिए तभी 12 महीनों का इंतजार एक सफल दो मुॅहे परिणामों तक पहुॅॅचेगा। पहला शिक्षकों का उद्धार और दूसरा यह कारनामा शिवराज सिंह चैहान साहब के खाते मंे जाना होगा। सरकारी स्कूलों में पढाई के नाम डंका बजता है प्लान बनते है, ट्रेनिंग के लिए फंड तय किये जाते है और अंततः खानापूर्ति करके रेवडी बांट दी जाती है। काश यू0पी0 का एक भी फंड म0प्र0 अपना ले तो वह छ0ग0 को भी पीछे छोड देगा पर राजनीति और शिक्षा जगत में जो लोग चिंता करते है वो अर्श में होते है और जो चिंतन करते है वो फर्श में होते है। शिक्षा के विभाग में बी0ई0ओ0 से डी0ई0ओ0 कोई अपना ज्ञान अपडेट नहीं करते है जो नौकरी लगने से पहले ज्ञानार्जन किया था वही अब तक है उन्हें मुद्रा कमाने से और स्वयं का विकास करने से फुरसत नहीं। सरकारी स्कूल के शिक्षकों के बीच यही मुद्दे चर्चे में होते है कि तनख्याह कब मिलेगी, भत्ते कब बढेंगे। नई भर्तियाॅ कब होगी और अंततः अपने समान कार्य समान वेतन के लिए जगदोजहद की चिंता रहती है। संविदा शिक्षकों की भर्ती के लिए तैयार किये जाने वाले पेपर में ऐसे प्रश्न पूछ जाने लगे कि उसकी परीक्षा देने वो सारे लडके अपना भाग्य आजमाने में लग गए जो पी0एस0सी0, आई0ए0एस0 और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग्य आजमा रहे थे। उनका मानना है कि इसी बहाने अपना ज्ञान आजमाने का मौका मिल जाता हैं कुछ भी भर्तियों में देरी वाकयै पुनः मुख्यमंत्राी बनने के लिए शिवराज सिंह जी के साथ युधिष्ठिर का सतत साथी साबित होगी। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है लेकिन आज भी परीक्षा पास किये हुए परीक्षार्थी बाट जोह रहे है काउंसलिंग की ज्वाइनिंग की और खुशी में मिठाई बांटने की, न जाने कब उनकी इस ब्रम्हइच्छा को तथास्तु का वरदान मिलोगा। मेरा तो मानना है यदि मुख्यमंत्राी जी ये शिक्षाकर्मियों की भर्ती की बजाय शिक्षा संवर्ग की भर्ती करें तो शिक्षकों के पूर्व में खोये हुए सम्मान को वापस दिलाने में सार्थक कदम होगा। आखिरकार कब तक आने वाली पीढी को हम ठेके के शिक्षकों के हाथों से ज्ञानार्जन करायेंगे। यदि ऐसा हुआ तो यह भी तय है कि शिक्षकों की समस्याओं और बच्चो के गिरते हुए परीक्षा परिणामों से मध्यप्रदेश को निजात मिल जायेगी तथा म0प्र0 का शिक्षा स्तर सी0बी0एस0ई0 और आई0सी0एस0ई0 के स्तर तक पहुॅच जायेगा।
- अनिल अयान, सतना

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

सब ठीक नहीं है प्रधानमंत्राी जी

कब तक सहें-
सब ठीक नहीं है प्रधानमंत्राी जी 
दिल्ली ने देश की धो दी प्रधानमंत्राी जी, जब आप कहते है सब ठीक है न तब शायद मजबूरी में कहना पड रहा है कि सब ठीक नहीं है प्रधानमंत्राी जी। दिल्ली के आम इंसानों में जिन युवाओं और महिलाओं का प्रतिनिधित्व उस लडकी को मिला जो इस वक्त सिंगापुर में अपनी जिंदगी और मौत से लड कर हार गई। जब गृहमंत्राी को प्रेस काफ्रेंस करने पर यह लगने लगे कि वह देश के सामने बोल रहे हैं जब युवा शक्ति के प्रदर्शन को माओवादियों से तुलना की जाने लगे तो समझ में प्रधानमंत्राी जी को भी आना चाहिए कि सब ठीक नहीं है। इस बार यह विरोध किसी अन्ना या किसी रामदेव के पास से किये गये उद्घोष के बाद नहीं तैयार हुआ बल्कि पुरूषवादी सत्ता के महाधीशों के विरोध में इसलिए प्रारंभ हुआ कि एक गुनाह करने वालों के लिए सरकार मूर्खतापूर्ण बयानबाजी कर रही है। कभी डी.आई.जी. महिला, एस.डी.एम. के कार्यविधि में राजनैतिक प्रश्न उठाते है। यदि इन राजनैतिक नुमाइंदो के घर की बेटी के साथ कुछ ऐसा कृत्य हुआ होता तब मैं देखता कि ये सब कितना मौन व्रत धारण करते है पर आम जन का कोई पालन हार नहीं है तभी तो राष्ट्रपति के सुपुत्रा सांसद कुछ अच्छा कह नहीं पाये तो प्रदर्शनकारियों की रातों का जायजा डिस्को और बार में लेने पहुॅचते है वहीं दूसरी तरफ अपने भाई की करतूत और बयानबाजी का विरोध राष्ट्रपति जी की सुपुत्राी करती है क्या राजनीत है साहब आम जन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है पर प्रधानमंत्राी और राष्ट्रपति के घर मंे पले हुए कुत्तों को सुरक्षा के लिए गार्ड नियुक्त किये जाते है। देश के रक्षा प्रमुख की जेड सुरक्षा की चिंता देश को नहीं है। देश की युवतियों की सुरक्षा के लिए यदि आम इंसान आवाज उठाता है तो वाटर कैनन, सेना और आंसू गैस के गोले छोडे जाते है। यदि जनता का प्रतिनिधि चैपट हो जाए तो जनता के विद्रोह को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाता है उसके बाद भी प्रधानमंत्राी आप कैमरामैन से पूछते है कि सब ठीक है ना। वाह क्या यही होता लोकतंत्रा। भारत लघु महाद्वीप आज भी दिल्ली के कारनामों के चलते पानी-पानी हो गया। मैं पूछता है कि कौन वापस करेगा दिल्ली का पानी इतनी पानीदारी देश के किसी भी राजनेता के पास नहीं बची। भारत की न्यायपालिका का एक सूत्रा है जिसमें यह कहा गया है कि हजारो बेगुनाह छूट जाय पर एक गुनहगार नहीं बचना चाहिए फिर क्यों भारत के गृहमंत्राी जी यह कहते है कि भारत में न्याय तुरंत फुरंत नहीं मिलता। क्या सत्ता और सत्ता के खेल यही है। मेरे समझ में एक बात और नहीं आती कि दिल्ली के कांग्रेसी चमचों के द्वारा कहे जाने वाले सोनिया गांधी के सुपुत्रा, युवा चेतना के रखवाले और यूथ सिम्बल राहुल गांधी क्या इस कडकती ठंड ठंडक के शिकार हो गये हैं। प्रधानमंत्राी जी आप भी देख रहे है कि भारत देश में दिल्ली से उठा आक्रोश हैदराबाद और जयपुर में भी फ ैल रहा है। न्यूटन के तीसरा नियम में न्यूटन ने कहा था कि हर क्रिया के विरोध में प्रतिक्रिया होती है पर जो रवैया महिलाओं ने और युवाओं ने दिखाया है वह न्यूटन के इस बात को गलत साबित करता हुआ नजर आता है। प्रधानमंत्राी जी आपकी केन्द्र और राज्य सरकार इस दुर्दांत घटना में भी राजनैतिक रोटिया सेंकने में लगी हुई है। सरकार के द्वारा अपनाये गये अराजक रवैये को देखकर मन तो गालियाॅ देने का करता है परंतु अपने संस्कारों को खोकर आपके स्तर तक तो मंै नहीं पहुॅच सकता। एक पुलिस वाले की मौत के लिए भी आपकी सरकार ने भी उन युवाओं को ही दोषी माना जिनको किसी ने बरगलाया नहीं बल्कि वह स्वयं की प्रेरणा से अपने समाज की स्त्राी सुरक्षा के लिए घर से निकलकर सडकों में उतरे थे। इतना ही सब होने के बाद आपको क्या लगता है क्या हमारे मुल्क में हमारी बिटिया और बहनें सुरक्षित है। आपके बयान की यदि सही तरह से जाॅच नहीं हुई और उसे मीडिया ने प्रसारित कर दिया तब आपने निजी चैनलों के लोगों को एक शब्द भी नहीं कहा बल्कि अपने पावर का पावर दिखाकर दूरदर्शन के इंजीनियरों और कैमरामैनों के खिलाफ संस्पेशन आर्डर जारी करवा दिया। आप यह क्यों भूल जाते है कि भारत में जब सरकार सत्रा राजकीय कार्य भारतीय समय पर होता है न्याय भारतीय समय के अनुरूप मिलता है तो वो सब बेचारे इसी भारत के निवासी थे और इसी परंपरा का निर्वहन कर रहे थे इस घटना को लेकर दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार इतनी बौखला गई कि किसी को यह समझ में नहीं आया कि लोगों से क्या बातें कही जाय। राष्ट्रपति साहब तो ज्यादा चिंता दिखाई पडे अब जब दामिनी की मौत हो गई है तब सारे नेताओं की चिर निंद्रा टूटी और वे सब झूठी संवेदनाएॅ टी.वी. चैनलों के सामने व्यक्त करके इस बात की अपील करते हुए नजर आ रहे है कि कृपया सभी प्रदर्शनकारी शांति व्यवस्था बनाये रखें। क्या आप देश के उन युवाओ को मूर्ख समझ रखे है। अंततः प्रधानमंत्राी जी एक ही निवेदन करना चाहता हूॅ कि आपके शासनकाल में कुछ भी ठीक नहीं है और इस बात को आपको स्वीकार करना चाहिए। यदि घटना सउदी अरब के देशों में हुई होती तो इस बात को कहने में कोई संकोच नहीं होता है कि गुनहगार की रूह भी दोबारा इस गुनाह को करने से कोसो दूर भागती पर हम भारत के निवासी है और प्रधानमंत्राी जी भारत मंे सब कुछ ठीक नहीं है।
- अनिल अयान
9406781040

रविवार, 16 दिसंबर 2012

ओलम्पिक से भारत हुआ बेदखल ,टूटा खिलाडियों का मनोबल ....

कब तक सहें -
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ओलम्पिक से भारत हुआ बेदखल ,टूटा खिलाडियों का मनोबल ....
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भारत में जब से कामनवेल्थ गैम्स हुए भारत के राजनीतिज्ञकों के घर की चांदी हो गई। कई मालामाल हो गये, कई घोटालेबाज हो गये, कईयों के ऊपर केस चलने लगे, कई जाॅच के घेरे में आकर अपने आप को जनता की नजरों में गिरा लिये और उस समय राजनीतिज्ञ और अधिक खुश हुए हांेगे जब भारती ओलम्पिक संघ को विश्व ओलम्पिक संगठन से इसलिए बेदखल कर दिया गया क्योकि संगठन के चुनाव में ज्यादा ही राजनीतिक पार्टियों का दखल बढने लगा था इसका प्रमुख कारण राजनीतिक पार्टियों के धन्ना सेठों के मध्य लाभांश के लालची रवैयें की बढोतरी थी।
राजनीतिज्ञों ने दखल दिया और उधर भारत ओलम्पिक संघ से बेदखल हुआ। अब सब हाथ में हाथ रखकर बैठे हुए ओलम्पिक गैम से भारत की निकासी की तेरहवीं और बरसी का शोेक मनाते नजर आ रहे है। क्रिकेट का जुनून इतना अधिक बढ गया है कि क्रिकेट के माहौल को देखते हुए बाॅलीवुड ने कई फिल्में बनाकर करोडो कमा लिये। प्रायोजकों के द्वारा फर्श से अर्श तक का सफर तय कर लिया गया और खिलाडी विज्ञापन के चकाचैंध में आकर खेल की गुणवत्ता की ऐसी की तैसी करने में परहेज नहीं किया। कई खिलाडी मैच फिक्सिंग, डोपिंग टेस्ट में अपने को सबसे आगे रखकर पूरे देश की इज्जत पूरे विश्व के सामने निलाम कर दी और पूरे देश को उनकी करतूतों से शर्मशार होना पडा। क्रिकेट के चलते अधिकतर खेल उपेक्षित होते चले गये। उनको लाभ और सुविधाएॅ बहुत दूर की बात बल्कि उनके साथ जातीयता बढने लगी। अन्य खेलों में भारतीय हुनर को आगे बढने का एक सहारा ऐशियन, कामनवैल्थ और ओलम्पिक ही था। जहाॅ पर भारतीय खिलाडियों को अलग-अलग विधाओं में अपना जौहर दिखाने को मिलता पर उपर वाले की दया और इन राजनीतिज्ञकांे की दुआ के चलते यह भी संभव नहीं हो पायेगा। थोडा बहुत गोल्ड, ब्रांज और सिल्वर मैडल के द्वारा भारत थोडा बहुत विश्व में अपना स्थान सुनिश्चित कर पाया था। वह भी इस परिणाम के चलते खत्म हो गया। आखिरकार कब राजीतिक देश का अहित करने से बाज नहीं आएंगे। मुझे लगता है कि राजनीतिक प्रतिनिधियों का दखल ओलम्पिक कमेटियों में नहीं वरन क्रिकेट, हाॅकी की चयन कमेटियों में भी बढता चला जा रहा है। इसका तात्कालिक उदाहरण भारतीय खिलाडियों का क्रिकेट के दौरे और उनके प्रदर्शन में आई औसतन गिरावट हैं। हम अपने स्वार्थो के चलते यह भूल जाते है कि खिलाडी कोई रोबोट नहीं है जिसे हमने चार्ज किया और उसे अपने पैसा कमाने के होड में लगा दिया। न उसकी सेहत की ध्यान दी और न ही उनके परफार्मेंंस की चिंता की। इसके चलते इंग्लैण्ड दौरे में क्रिकेटरों की जो थू-थू हुई है वह मीडिया ने हम सबके सामने बहुत विस्तार से रखा हैं भारत क्रिकेट के लिए पागल है इसमें कोईं संदेह नहीं है। भारतीय खिलाडी भी हर बार आशाओं में खरे उतरे। यह उनके लिए संभव नहीं हो सका। हमारी मीडिया की सबसे बडी कमी है कि चैनल सबको सिर मे चढा लेते है और इसके चलते खिलाडियों में ओवरकाफिडेन्स पनपने लगता है और यदि खिलाडी फ्लाप हुआ तो उसकी मिट्टी पलीद करने में यह मीडिया पीछे नहीं हटती। यह पब्लिक है दोस्तो इसे सिर्फ अपने हीरो से जीत की उम्मीद रहती है और यदि उम्मीद टूटती है तो वह सिर्फ बौखलना ही जानते है। यही हाल हाॅकी और ओलम्पिक गैम के अन्य विधाओं का भी होता है पर क्या किया जाय लगातार आशंकाओं के बावजूद वहीं हुआ जिसका डर था। आखिरकार वह मौके जिसमेें भारतीय एथिलीटों, टेनिस स्टार, मुक्केबाजों, कुश्ती पहलवानों, तीरदांजो, हाॅकी खिलाडिया और अन्य विधाओं में खिलाडी अपने जौहर दिखाते वह भी उनसे बहुत ही बेशर्मीपूर्वक छीन लिया गया। अब बेचारे यह खिलाडी उस गलती का परिणाम भुगतेंगें जो उन्होंने किया ही नहीं है। अपने घरेलू खेलों में भाग लेने बस से उनका पूरा विकास कैसे हो सकता है वो विश्व स्तर के खिलाडी कैसे बनेंगे। विश्व स्तर का खिलाडी बनने के लिए विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में अपना स्थान सुरक्षित कर भारत का गर्व बढाने की आवश्यकता है। खेल का सीधा सा नियम रहा है जो जिस कार्य के लिए चुना गया है वह उस स्थान पर अपना पावर दिखाये। यदि डाॅक्टर अपना पावर न्यायालय में दिखायेगा तो कैसे काम चलेगा। बस इसी तरह बंटाधार होता रहेगा। इसी तरह खिलाडी अपने कांधे में अपने हुनर की अर्थी लेकर घूमते नजर आयेंगे। आज के समय पर चाहिए कि चयनकर्ताओं केा अपनी जिम्मेवारी तटस्थ होकर निर्वहन करें ताकि उम्दा खिलाडी निकलकर सामने आये और भारत का नाम रोशन करें। ओलम्पिक ही नहीं बल्कि अन्य खेल के संघों को अपने नियम, कायदों मंे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि उसमें खिलाडी, उनके कोच और भूतपूर्व खिलाडियों को चयन समिति में स्थान मिलें न कि राजनीतिज्ञों को। वरना अभी तो ओलम्पिक में ही भारत बेदखल हुआ वह दिन दूर नहीं है कि जब आई.सी.सी. के संगठन से बी.सी.सी.आई. को भी बेदखल होना पडेगा क्योकि राजनीतिज्ञ इसी तरह खेल संगठनोें के बाप बनने की कोशिश करते रहेंगे और खेल संगठनों को सर्वनाश करने में तुले रहेंगे। अंततः खेल को सर्वोपरि बनाने के लिए खिलाडियों का संगठन हो जो खिलाडियों के विकास की बात सोचे खेल को खेल रहने दें दंगल का मैदान न बनायें।
- अनिल अयान , सतना

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

जब शिक्षकों ने दिखाया दम, हम नहीं किसी से कम

जब शिक्षकों ने दिखाया दम, हम नहीं किसी से कम
अध्यापक से शिक्षाकर्मी और फिर संविदा शिक्षक तक के सफर में गुरू के चेहरे का इतना परिवर्तन हो चुका है कि अब मास्टर साहब को मास्टर की संज्ञा दे दी गई। कुछ दिनों पूर्व इस बात को जानकर थोडा खुशी हुई कि शिक्षक कुछ तो जागृत हुए कुछ समय अंतराल में हडताल, मुख्यमंत्राी से मिलना जुलना और फिर कोई परिणाम आ न पाना। इसलिए स्कूटर रैली निकालकर कम से कम शासन को यह तो बताया कि शिक्षकांे की माली हालत क्या हो चुकी उसी काम को करने के लिए सरकार किसी को 20,000 से 40,000 रू0 मासिक वेतन देती है और किसी को कर्मी बनाकर कुछ समय के लिए 5000 से 10000रू0 में निपटा देती है। बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं को जब कोई अच्छा जाॅब नहीं मिलता तो वह मास्टरी कर लेता है उसकी स्थिति मरता क्या न करता जैसी स्थिति हो जाती है। राधाकृष्णन जी की संज्ञा और गोविंद के समतुल्य इन शिक्षकों का स्थान कितने नीचे इस सरकार ने गिरा दिया है यह सरकार भी नहीं समझ पायी है।
शिक्षक से शिक्षाकर्मियों तक का सफर तो दिग्विजय सरकार ने शुरू किया था जैसे की सफाई कर्मियों की स्थिति थी। फिर शुरू हुआ संविदा शिक्षकों का दौर जिसकी स्थिति और गुड गोबर हो गई। आज के सरकारी स्कूलांे की स्थिति यह है कि मास्टर रोज समय में स्कूल पहुॅचता नहीं है यदि पहुॅच गया तो समय पर बच्चों को पढाता नहीं है। वरिष्ठ शिक्षक इसलिए नहीं पढाता है क्योकि उसका विकास तो 40,000रू0 का वेतन बढा रहा है। बच्चों का विकास भाड में जाए। संविदा शिक्षक इसलिए नहीं पढाता है कि वो अपनी पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं के चलते इतना चिंतित रहता है कि पढाने का मन ही नहीं करता। कही यदि कभी पढाने का मन किया भी तो प्राचार्य के आदेश और विभागीय काम की घुडदौड जारी हो जाती है। शिवराज सरकार ने शिक्षा के स्तर को बढाने के लिए शिक्षकों का वेतनमान बढाया तो धन्यवाद की पात्रा है। पर यह भी सच है कि आज उतने वेतन से एक सप्ताह का घर नहीं चलता है। एक महीना घर चलाना सिर्फ बीरबल की खिचडी के तरह ही हाल होगा। आजकल शिक्षकों की स्थिति डेली वेजेज मजदूर से भी बदतर है और बदतर करने वाले हमारे जनप्रतिनिधि और हमारी सरकार। शिक्षक दिवस का ढकोसला मुझे बिल्कुल नहीं भाता। शिक्षक अपना सम्मान करवाने के लिए अधिकारियों की चमचागिरी कर आवेदन पत्रा दें। मैं ये पूछता हूॅ कि वो कमेटी क्या काम करती वो प्राचार्यो और अभिभावकों के मत से शिक्षकों के बारे में जानकारी एकत्रा कर चुनाव करे कि वह पात्राता रखता है कि नहीं। पर नहीं यदि ऐसा हुआ तो सरकारी रेवडी बांटने में लगाम नहीं लग पाएगी। इसलिए शिक्षक दिवस में सरकार सरकारी दामादों को स्वागत करके सम्मानित करती है और सभी शिक्षकों को इस बात का गर्व होता है कि वो डाॅ. राधाकृष्णन के वंशज है उन्हें कितना सम्मान दिया जाता है। यदि शिक्षकों ने समान वेतन समान सुविधाओं की बात की तो वो दोषी हो गया। एक नगर निगम का स्वीपर इन शिक्षकों से अधिक पेमेंट पाता है और घूस जो मिलती है उसकी कोई गिनती नहीं। पोलियों डाॅप पिलाना हो, जनगणना करना हो, सर्वे करना हो या धूप लू में बगारी करना हो सब बिन बुनियाद के अशिक्षकीय कार्यो के लिए सिर्फ शिक्षा के ही सरकार को नजर आता है। क्या और विभाग वाले विशिष्ट लोक से आये है क्या उनकी जिम्मेवारी कुछ नहीं है।
मैं पूछता हूॅ कि जब सरकारी शिक्षक से यदि साल भर पढवाया नहीं जाएगा सिर्फ उपर्युक्त कार्यो की तरह बेगारी करवाया जाएगा तो माॅ सरस्वती की कृपा क्या इतनी ज्यादा इफरात है कि सरकारी स्कूल के बेबस लाचार बच्चों पर मुफ्त में बरसेगा जी नहीं दोस्तो। यदि सरकार को शिक्षकों से उनके हुनर का उपयोग करवाना है तो उन्हें बुनियादी सुविधा उपलब्ध करानी होगी। उनसे सिर्फ पढवाने का कार्य लेना होगा। अन्य जिम्मेवारियों के लिए अन्य विभाग के कुर्सी तोडते कर्मचारी है ना। उनका उपयोग समय-समय पर करना चाहिए।
शिक्षकों का पूरा समूह एक जुट होकर जिस तरह अपनी शक्ति प्रदर्शन किया है वो भी अनुशासित होकर वह पूरे राज्य के संविदा शिक्षक को करना चाहिए। गरम रवैया ही उन्हें उनकी मंजिल तक पहुॅचा सकता है। एक तरफ जब प्रशासन यह कहता पाया गया कि इन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी तब मुझे लगा कि अपनी आवाज जब बहरों को सुनाने के लिए शक्ति प्रदर्शन करना कहाॅ गलत है वो भी सभी अनुशासन में रहते हुए। यदि इतनी ज्यादा चिंता है तो समान वेतन समान सुविधाएॅ समान कार्य और जिम्मेवारी का सूत्रा अपनाकर इस समस्या को ही खत्म कर दिया जाए। खुद राई का पहाड और तिल का ताड बना लिया और दूसरे पर अंगुलिया उठाई जाने लगी। एक काम के लिए अलग-अलग वेतन माना, अलग-अलग सेवा शर्ते, यह तो दोगलापन हुआ शिक्षक हमारे देश का भविष्य निर्मित कर रहे है और देश की सरकार को चाहिए कि शिक्षक को एक राजपत्रित अधिकारी के बराबर मापदण्ड दें, सेवा शुल्क और सुविधाएॅ प्रदान करना चाहिए तभी उनका वास्तिविक सम्मान उन्हंे प्राप्त होगा अन्यथा अन्य लोगों की तरह शिक्षकों को भी अपनी शक्ति प्रदर्शन करने की आदत पड गई तो स्कूल में बच्चो को कौन पढाएगा और परीक्षा परिणामोें का क्या हाल होगा जनाब इसका जो देश को नुकसान होगा उसके लिए कौन जिम्मेवार होगा इसलिए समस्या को बढाने की बजाय समस्या की जड को खत्म करना चाहिए। शिक्षक का सम्मान हम सब का सम्मान है। इसलिए शिक्षको का हक भी एक समान होना चाहिए। अंत में
झील में पानी बरसता है हमारे देश में
खेत पानी को तरसता है हमारे देश में
यहाॅ नेताओं और बेईमानों के सिवाय
अब खुशी से कौन हंसता है हमारे देश में
- अनिल अयान
मो. 9406781040

शनिवार, 24 नवंबर 2012

प्राॅक्सी वार का एक बुत धराशायी, अब होगी अफजल गुरू की विदाई

प्राॅक्सी वार का एक बुत धराशायी, अब होगी अफजल गुरू की विदाई
बरसी नजदीक ही थी कि एक अचानक खबर फेसबुक में देखा की आज कसाब को फांसी मुझे लगा कि फेक पोस्ट है पर दोपहर तक जब टी0वी0 चैनलो से ब्रेकिंग न्यूज सुना तब जाकर यकीन आया। यह वाकयै श्रद्वांजली थी। एक परोक्ष युद्व का बुत धरासायी हुआ कई लोगों, कई देशो को झटका लगा कि भारत के संविधान में ये करिश्मा कैसे हो गया। कसाब को पकडे जाने के बाद जिस तरह 4-5 साल तक उसकी खातिरदारी की गई वह भारत और भारतवासियों के लिए चिंता का विषय था। भारतीय लोकतंत्रा और भातीय न्यायपालिका के लिए यह सरकारी दामाद की सेवा करने की जगदोजहद जारी थी।
कसाब और अफजल गुरू इतना ज्यादा प्रसिद्व हो गए थे कि वीर रस के कवियों से लेकर राजनैतिक समीक्षाकार भारत पाक संबंधों पर लंबे-लंबे आर्टिकल लिखनें लगे और संसद हमले में शहीद हुए परिवारों को सच्ची सहानुभूति भारत के संविधान और भारत के कानून के द्वारा इस अवसर पर दी गई।
इतने वर्षो से भारत की धर्मनिरपेक्ष उदारता का परिणाम था कि कसाब को सारे मौके दिए गए अपनी बेगुनाही को साबित करने का वकील प्रदान किए गए उसका पूरा ख्याल रखा गया लेकिन मामला भारत के शहीद परिवारों की दुआओं की तरफ झुकता रहा। इस प्रक्रिया का गोपनीय रहना वाकयै एक गोरिल्ला युद्व की तकनीक का आधुनिक पर्याय था। पूरा काम इतनी सफाई और नैतिक ढंग से हुआ कि जल्लाद तक को कानोकान खबर नहीं हुई। पाकिस्तान, भारत पाक युद्व के बाद से ही परोक्ष युद्व को तेज करने के लिए आतंकी हमले की साजिश करता रहा है जो लगातार अक्षरधाम मंदिर हमलों से मुम्बई बम विस्फोटों और भारत के सर्वोच्चतम संविधान के रखवाले लोकतंत्रा के केन्द्र बिंदु संसद में हमला करवाकर यह सिद्व कर दिया कि आतंकवादी प्राॅक्सीवार करते हुए परोक्ष रूप से भारत के हृदय में भी आक्रमण करने में परहेज नहीं करेेंगे पर भारत ने जितने भी सैनिकों के इंतजाम अपने सुरक्षा के नाम किये उनकी शहादतों को कसाब और अफजल गुरू जैसे आतंकी बुतों का जिंदा रहना शर्मिदिगीं का कारण बन रहा था। भारत का संविधान अपने पुराने पाकिस्तान के साथ रिश्तों की दुहाई देकर मुॅह में पट्टी बांधे हुए उदासीन बना हुआ था। कभी आगरा वार्ता कभी स्लामाबाद यात्रा कभी जसवंत सिंह का जिन्ना के ऊपर किताब लिखना कभी आडवानी का पाकिस्तान को सेगुलर कहना कभी कांग्रेस की तरफ से पाकिस्तान पर टिप्पणी करके विवादित बने रहना ये सब पाकिस्तान के साथ जितने संबंध मजबूत किये उतना ही आतंकवादियो ने उधर से एहसास दिला दिया कि जन्मजात दुश्मन पाकिस्तान कभी दोस्त नही हो सकता। लंबी जद्दोजहद के बाद प्रणव दा के द्वारा जीवनदान की अर्जी खारिज करने से लेकर कसाब की फांसी और फिर आतंकी संगठनों को खिसयानी बिल्ला खंभा नोचे वाले कहावत को चरितार्थ करने की प्रक्रिया यह साबित कर दी कि भारत को जो कार्य संसद हमले की दुर्घटना के बाद कर लेना चाहिए जैसे की अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड हमले के बाद किया था, वह इस कार्य में देरी करके अनावश्यक अपने नागरिकों की नजरों में इतने सालों तक चढा रहा।
यह सच है कि कसाब प्राॅक्सीवार या परोक्ष युद्व का एक बुत था जो लश्करे तोयबा के द्वारा तैयार किया गया था उसके 25 वर्ष के जीवन में यह जेहाद का मिशन अंजाम तक उसे पहुॅचा दिया। अफजल गुरू के द्वारा तैयार किया गया यह बुत आतंकवादी संगठनों को हीरो कब बन गया वह खुद कसाब को भी नहीं पता था। तभी तो उसकी मौत की खबर सुनते ही लश्कर ने ऐसी गुहारी मारी कि जैसे उसको पूरे चैराहे में सभी के सामने बलात्किृत कर दिया गया हो। अभी तक जो हुआ वह तो एक अच्छे निर्णय का परिणाम था परंतु अब भारत को चाहिए कि मुस्लिम देशों में भारत के उच्चायोगों और भारत की आत्मसुरक्षा को सख्ती से ज्यादा मजबूत कर देना चाहिए ताकि कोई दुष्कर परिणाम न भोगना पडे। इस घटना से भारत में रह रहे सच्चे मुसलमानों की भी पहचान हो गई वे इसलिए खुश थे क्योकि आतंकी हमलों में आतंकियो ने जब बेगुनाहो को मौत के घाट उतारा तब उन्हांेने यह बिल्कुल नहीं देखा कि मरने वाला किस धर्म का है। इसी वजह से आज वो सभी मुसलमान जश्न मना रहे है। हमारे खुशियाॅ मनाने का अवसर है लेकिन हमें इस बात का भी चिंतन करना चाहिए कि इस बुत के सहारे इसके कारीगरों को भी अंजाम तक पहुॅचाया जाय और उस कारखाने को भी नष्ट किया जाय जिसमें अफजल गुरू जैसे कारीगर दिन रात एक करके कसाब जैसे बुतों का निर्माण करने में लगे हुए है और जेहाद का राग अलाप रहे है। भारत को अपने इस अच्छे काम की कडी को जारी रखना चाहिए और एक बात ध्यान देनी चाहिए कि पाकिस्तानी विदेश मंत्राी चाहे जितना भारत के साथ मधुर रिश्तों की बडाई करती रहे पर कसाब की मृत्यु के बाद उनका भारत दौरा निरस्त कर देना अच्छे परिणामों की रोक संकेत नहीं करता, वह किस ओर संकेत करता है वह हम सब जानते है। भारत के उच्च सत्ताधिकारी, जनप्रतिनिधियों और न्यायपालिका को चाहिए कि अब सीधे अफजल गुरू की विदाई के लिए आरती का थाल सजा लें ताकि किसी आतंकी संगठन के हौसले को सिर उठाने तक का मौका न मिल पाय तभी शहीदों को यह एक और बेदाम श्रद्वांजली होगी।
इस तरह शहीदों को मैं सदा देता हूॅ वतन परस्ती के शोलो को हवा देता हूॅ
शहीदी परिवारों को दुआ देता हूॅ और आतंक के खुदा को बद्दुआ देता हूॅ।
- अनिल अयान
सम्पादक, शब्द शिल्पी
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शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

अतिक्रमण हटाने का धतकरम कही नरम कहीं गरम

अतिक्रमण हटाने का धतकरम कही नरम कहीं गरम
जब भी कोई नेता नपाडी या किसी सत्ताधारी की शहर में आवक होती है तो हमारा प्रशासन तथा उसके ठेकेदार इतने ज्यादा जागरूक हो जाते है कि उन्हंे सिर्फ और सिर्फ सडक के किनारे के वो सामान्य व्यवसायी दिखते है जो नाम के व्यवसायी है परंतु काम सिर्फ रोटी, कपडा और मकान के लिए रोज जगदो जहद करते है। इसी बहाने इस बात का सत्यापन हो जाता है। मुख्यमंत्राी से सामान्य मंत्राी या राष्ट्रपति से राज्यपाल इनकी आवक शहर को सुंदरता और गरीब दुकानदारों को कई महीने तक न बोलने वाला एक हरा घाव दे जाती है। लोगों के पेट में लात मारकर शहर को साफ सुथरा बनाना और साफ सुथरा सतना अपना के नारे लगाने वाले तथाकथित साफ स्वच्छ मण्डियो की व्यवस्था तो नहीं करा पाते। वोट पाने के लिए गोटियाॅ फिट करने के साथ-साथ उन बेबस लाचार दुकानवालों, ठेलेवालों, गुमटीवालों और अन्य इसी तरह के कुछ दुकानदारों से नाजायज वसूली करने का गुणधर्म इन नालायक कर्मचारियों का होता है। समय आने पर यह दुलत्ती मानकर उन सभी कमजोर व्यवसायियों का गला रेतने में भी पीछे नहीं हटते। समस्या यह नहीं है कि समाधान तक शहर पहुॅचता नहीं है बल्कि समस्या यह है कि समस्या को अपना घर बनाने वाले आला अफसर समाधान को खोजने की कोशिश ही नहीं करते उन्हें सिर्फ अपनी जंेबें भरने के साथ ऊपर अच्छे आंकडे दिखाना और कुछ समय के बाद नियम कानून भूल जाना जैसी दो कोडी की हरकतें करने से फुर्सत नहीं है।
जिसके पैर की ऐडियाॅ नहीं फटती है वह दूसरे का दर्द जान ही नहीं सकता है। यह सच है कि ए0सी0 के हवा खाने वाले घूस से दाल रोटी की व्यवस्था करने वाले और दलालों के मुफ्त दिये हुए पेट्रोल और डीजल की गाडियों के मालिक ये तथाकथित सफेदपोशी ईमानदार आला अफसर जब अतिक्रमण के नाम पर सरकार का समय और विभाग का धन उडाने के लिए निकलते है तो इन चश्मे से सिर्फ और सिर्फ रोड के पास रखी गुमटियों सब्जी और अन्य सामान के ठेले और गरीब तबके के वो दुकानदार ही दिखते है जो इन दबंगईयों स्टाइल में किये गये अतिक्रमणविरोधी दस्ते के डर से इनके मुॅह निकली धनराशि इनके जेबों में भरने की मजबूरी से बेबस है वरना इन उडनदस्तों के पर अब तक इतने मजबूत ही नहीं हुए कि सडक के किनारे बने हुए माॅल मल्टीपलेक्स, आटोमोबाइल्स, जनप्रतिनिधियों के होटल, रेस्टाॅरेंट और तथाकथित नामी गिरामी काला धन रखने वालों के बियर बारों का नाजायज अतिक्रमण हटा सकें क्योकि वहाॅ पर इनकी फाइलें इनका आदेश और इनके सारे नियम कानून मात्रा एक फोन की घंटी बजने के बाद घुटने टेक देते है तब मेरा सवाल इन लोगों से होता है कि कहाॅ चला जाता है इनका नियम, कानून, इनका साफ स्वच्छ सतना रखने का उद्देश्य और सरकार के बहुमुखी विकास के चिट्ठे और अंततः इनकांे अपने कदम पीछे ही लेने पडते है। मैं अतिक्रमण हटाने का विरोध नहीं करता पर इस कार्य में न्यायसंगत और तटस्थ होकर ईमानदारी से अपना कत्र्तव्य निर्वहन करने का समर्थन जरूर करता हूॅ ताकि इसका लाभ लोगों को प्रशासन को और पूरे देश को प्राप्त हो। अभी तक मैंने जितने बार देखा है कि जनप्रतिनिधियों, विभिन्न पार्टियों के नेताओं और पावरफुल उद्योगपतियों ने इस व्यवस्था को लचर बना दिया है। इसके सामने प्रभावी अफसर या तो आते नहीं है और यदि आते है तो उनका जल्द से जल्द तबादला करा दिया जाता है। यदि प्रशासन चाहे तो जो लोग अपने छोटे मोटे व्यवसाय और रोजी रोटी कमाने के लिए काम पर दिन रात एक करते है उनके लिए नगर निगम के द्वारा परमानेंट व्यवस्था करवा दी जानी चाहिए जिससे अतिक्रमण का झंझट खत्म हो जाय। आज के समय पर जिला प्रशासन अपनी तरफ से प्रयास तो बहुत करते है पर उसके रख रखाव करने में उसको पसीने छूट जाते है क्योकि नियमित रूप से कार्य करना तो दूर उसका रख रखाव करने में जितने व्यवधान उसे झेलने पडते है वह हमारे सामने है। प्रशासन के द्वारा बहुत सारे कार्य तो धत करम के रूप में पूरे समाज में दिखाई पडता है क्योकि प्रशासन के कुछ लोगों की रोजी रोटी के साथ बलात्कार और नियम कानूनो का दुरूपयोग करने से एक कदम भी पीछे नहीं हटते। आज के समय पर सामान्यतः उच्च पद पर वहीं बैठा है जो नेताओं की चमचागिरी करने में सबसे आगे है और प्रशासन की आंखो में धूल झोंकने में भी शर्म नहीं आती हो। आज के समय पर अधिकारी अतिक्रमण हटवाते है पर अतिक्रमणकारियों से पैसे इसलिए लिये जाते है ताकि उन्हें अतिक्रमण किया जा सके और अधिकारियों के हाथ में फंसी सोने की अंडा देने वाली ये मुर्गियाॅ हमेशा जिंदा रहीं आये अन्यथा नरम गरम व्यवहार वाले इस प्रकार के अतिक्रमणविरोधी दस्तों का हाल क्या होता है यह सब हम रोजाना समाचार पत्रों एवं टी0वी0चैनलों में देखते है। इन गतिविधियों से एक बात निकलकर सामने आती है इस प्रकार के कार्य चांदी कंे जूतों से पिटे हुए लोगांे की मजबूरी है और रूपयों के हाथो से बिके हुए लोगांे की मजबूरी है क्योकि दस्ते में शामिल हर एक व्यक्ति लक्ष्मी पुत्रों के लक्ष्मी के हाथो नीलाम हो चुके होते है और बिन पेंदी के लोटे की तरह व्यवहार करते नजर आते है। यही इनकी नियत ही है और गरीब व्यवसाइयों की रोजी रोटी के लिए उनकी नियत एक विधान है।
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अनिल अयान
संपादक शब्द शिल्पी
सतना मो. 9406781040



सोमवार, 12 नवंबर 2012

महंगे हुए सपने अब नहीं है अपने

महंगे हुए सपने अब नहीं है अपने
बुजुर्गो ने कहा था कि हमेशा खुले आॅखों से सपने देखों तभी वो पूरे होते है वरना नींद के सपनों का कोई औचित्य नहीं है। परंतु आज के समय है। लोग कितने सपने देखते है। परंतु महंगाई एक डायन की तरह उनके पीछे, पडकर सपनों को तोडने लगती है। क्या जमाना आ गया है साहब आज के समय पर सपनों की उॅचाई इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि सपनों को देखने के लिए सरकारी की मेहरबानी। जीॅ हाॅ ये कोई फेंटेसी की बात नहीं है। यह वास्तविकता है यदि आपको यकीन न हो तो उन लोगों से पूंछिये जिनकी रोज की रात उस सोच में बरबाद होती है कि अगली रात भूखे पेट सोना पडेगा या निवाला नसीब होगा कि नहीं। उसका सपना तो सिर्फ रोटी कपडा और मकान का इंतजाम कर पाना की नहीं होता है।
तथ्यों के अनुरूप यह भी सच है कि इन दो वर्षो में महंगाई इतनी अधिक बढी है कि पिछले वर्षो की महंगाई को भी इस पर यकीन नहीं था। अर्थशास्त्राी अपने हाथों में हाथ धरे बैठे रह गए परंतु महंगाई और मुद्रा स्फीति की दर को रोकने में अक्षम रहे। महंगाई का सबसे ज्यादा प्रभाव आम जन पर पडा है। खास की श्रेणी में आने वाले धन्ना सेठ तो आज भी उसी तरह जीवन जी रहे है किस तरह पहले जिया करते थे। महंगाई के चलते सरकार भी अपनी तटीया सीमा में पहुॅच गई। सरकार के दो प्रतिनिधि डाॅ. मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य रहा होगा जब वो प्रधानमंत्राी होने के बारे में विचार कर रहे थे वरना वो अर्थशास्त्राी के रूप में ज्यादा नामवर हुए। यह सच है कि महंगाई आज के समय की देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक मुद्दा बनी हुई है।
एक तरफ हमारा देश विकास करने के लिए विकसित देशों की श्रेणी में खुद को लाने के लिए तत्पर है और वहीं दूसरी तरफ महंगाई त्रोता युग की सुराा की तरह अपना मुख फेलाती ही जा रही है। महंगाई का असर यंू हुआ है कि गल्ला खरीदने से लेकर उसे खाने योग्य बनाने में और पकाकर खाने की प्रविधि में इतनी ज्यादा चिंता होती है कि लोग खाना खाने की तृष्णा को भूल जाते है। आज के समय पर देखे गए सपने तो बहुत दूर की बात है यदि वो अपनी आयु पूरी कर लें तो शायद ऊपर वाले की मेहरबानी ही होगी। आज के समय पर आम से संसद में बैठा हुआ हर व्यक्ति महंगाई का ही राग अलाप रहा है। कोई महंगाई के नाम पर वोट का बैंक बना रहा है? कोई महंगाई के चलते चैथा मोर्चा खोल रहा कोई महंगाई पर बयानबाजी करके कैमरे के सामने आना चाहता है बस यह कहे कि महंगाई कभी एन0डी0ए0 और कभी यू0पी0ए0 के घर में बिन पेंदी के लोटे की तरह लुढक रही है। महंगाई की मार 2011-12 में कुछ ऐसी पडी कि सरसो के खाने के तेल और पेट्रोल में कोई अंतर नहीं रह गया। आज के समय में समय के साथ महंगाई भी हाईटेक नेताओं के हाथ की कठपुतली हो गई है जो चाहे जब चाहे आम इंसान की कमर तुडवाने के लिए इसका प्रयोग कर सकता है सिर्फ उसके पास पावर और लालबत्ती हो। आजकल रूपये का दाम खुद कम हो गया तो रूपय देकर समान का दाम बढ गया। अर्थशास्त्रा के सारे नियम कानून भारतीय मुद्रा को सम्मानजनक स्ािान दिलाने में असमर्थ साबित हो रहा है। नौकरी पेशेवालों की तो और मुसीबत है उनकी तनख्वाह सिर्फ महंगाई की भूख प्यास को पूरा करने में ही खप जाती है। बचत करना तो सिर्फ सपना हो गया है। लोगों के अमीर बनने के सपने में जंग लगने लगी है। आयात और निर्यात के बीच बनती खाई कही न कहीं महंगाई के लिए उत्तरदायी है। आयात शुल्क में बढोत्तरी और अनावश्यक लोगों को सब्सिडी कहीं न कही पर सरकार के लिए महंगी साबित हो रही है। अर्थजगत के सुप्रसिद्व अखबार द एकोनाॅमिकल टाइम्स को देखते हुए एक संपादकीय में साफ-साफ लिखा गया कि भोपाल की अधिकता और उत्पादित माल के निर्यात में कमी भारत को कंगाल बनाने में मदद कर रही है और यदि यही हाल रहा तो भारत इस सरकार की अगली दो पंचवर्षीय पूरे होने तक घोषित हो जाएगा और उस समय पर अर्थशास्त्रा कुछ भी नहीं कर पाएगा। न ही भारत को दिवालिया होने से बचा पाएगा। यह सच है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार भविष्यगत सपने देखता है और उसे पूरे करने के लिए दिन रात एक करता है परंतु भरत की स्थिति यह की भारत में रहने वाला ही व्यक्ति कर्ज में डूबा है। भारत में रहने वाला गरीब और अधिक गरीब हुआ है और भारत का अमीर और अधिक अमीर हुआ। कई अमीरों की अमीरी का कोई सिर पैर तथा बुनियाद नहीं है। उनके स्विस बैंको में स्थित खाते अपने सुख चैन के लिए दिन गिन रहे है। शिक्षा से लेकर दीक्षा तक सब महंगी हो गई है। आप कब तक यह कहते रहेंगे कि हमे अपने से मतलब है देश से कोई मतलब नहीं वो जनप्रतिनिधि जाने देश चलाना प्रधानमंत्राी को ठेका है और राज्य चलाना मुख्यमंत्राी का ठेका है। हमने तो उन्हें चुनकर विधानसभा और संसद में भेज दिया बाकी उनकी जिम्मेबारी वो जाने।
यह सच है कि जिस देश के भौतिक संसाधनों का उपयोग मानव संसाधनों के द्वारा नहीं किया जाता वह देश अपनी कंगाली का पहला कदम रख चुका होता है। एक तरफ यदि महंगाई यह चिल्लाती हुई हमें डकार जाने के लिए आतुर हो रही है कि मोहि कहा विश्राम। तो हम सब को इस बात पर आपसी सामंज्य बिठाकर उसका सामना करना चाहिए। महंगाई यदि सुरक्षा की तरह मुॅह फेला रही है तो हमें हनुमान की तरह हार न मानते हुए सामना करके विजयी होना पडेगा या तो हम बदल जाए या जमाने को बदल दें। हम बदलेंगे तो सपने अपने होगे और यदि जमाना बदलेगा तो सपने सुहाने होंगे तो अब से महंगाई की कहिये तोहिं यहाॅ विश्राम।
अनिल अयान
संपादक शब्द शिल्पी
सतना मो. 9406781040

बुजुर्गो ने कहा था कि हमेशा खुले आॅखों से सपने देखों तभी वो पूरे होते है वरना नींद के सपनों का कोई औचित्य नहीं है। परंतु आज के समय है। लोग कितने सपने देखते है। परंतु महंगाई एक डायन की तरह उनके पीछे, पडकर सपनों को तोडने लगती है। क्या जमाना आ गया है साहब आज के समय पर सपनों की उॅचाई इतनी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि सपनों को देखने के लिए सरकारी की मेहरबानी। जीॅ हाॅ ये कोई फेंटेसी की बात नहीं है। यह वास्तविकता है यदि आपको यकीन न हो तो उन लोगों से पूंछिये जिनकी रोज की रात उस सोच में बरबाद होती है कि अगली रात भूखे पेट सोना पडेगा या निवाला नसीब होगा कि नहीं। उसका सपना तो सिर्फ रोटी कपडा और मकान का इंतजाम कर पाना की नहीं होता है।
तथ्यों के अनुरूप यह भी सच है कि इन दो वर्षो में महंगाई इतनी अधिक बढी है कि पिछले वर्षो की महंगाई को भी इस पर यकीन नहीं था। अर्थशास्त्राी अपने हाथों में हाथ धरे बैठे रह गए परंतु महंगाई और मुद्रा स्फीति की दर को रोकने में अक्षम रहे। महंगाई का सबसे ज्यादा प्रभाव आम जन पर पडा है। खास की श्रेणी में आने वाले धन्ना सेठ तो आज भी उसी तरह जीवन जी रहे है किस तरह पहले जिया करते थे। महंगाई के चलते सरकार भी अपनी तटीया सीमा में पहुॅच गई। सरकार के दो प्रतिनिधि डाॅ. मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य रहा होगा जब वो प्रधानमंत्राी होने के बारे में विचार कर रहे थे वरना वो अर्थशास्त्राी के रूप में ज्यादा नामवर हुए। यह सच है कि महंगाई आज के समय की देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक मुद्दा बनी हुई है।
एक तरफ हमारा देश विकास करने के लिए विकसित देशों की श्रेणी में खुद को लाने के लिए तत्पर है और वहीं दूसरी तरफ महंगाई त्रोता युग की सुराा की तरह अपना मुख फेलाती ही जा रही है। महंगाई का असर यंू हुआ है कि गल्ला खरीदने से लेकर उसे खाने योग्य बनाने में और पकाकर खाने की प्रविधि में इतनी ज्यादा चिंता होती है कि लोग खाना खाने की तृष्णा को भूल जाते है। आज के समय पर देखे गए सपने तो बहुत दूर की बात है यदि वो अपनी आयु पूरी कर लें तो शायद ऊपर वाले की मेहरबानी ही होगी। आज के समय पर आम से संसद में बैठा हुआ हर व्यक्ति महंगाई का ही राग अलाप रहा है। कोई महंगाई के नाम पर वोट का बैंक बना रहा है? कोई महंगाई के चलते चैथा मोर्चा खोल रहा कोई महंगाई पर बयानबाजी करके कैमरे के सामने आना चाहता है बस यह कहे कि महंगाई कभी एन0डी0ए0 और कभी यू0पी0ए0 के घर में बिन पेंदी के लोटे की तरह लुढक रही है। महंगाई की मार 2011-12 में कुछ ऐसी पडी कि सरसो के खाने के तेल और पेट्रोल में कोई अंतर नहीं रह गया। आज के समय में समय के साथ महंगाई भी हाईटेक नेताओं के हाथ की कठपुतली हो गई है जो चाहे जब चाहे आम इंसान की कमर तुडवाने के लिए इसका प्रयोग कर सकता है सिर्फ उसके पास पावर और लालबत्ती हो। आजकल रूपये का दाम खुद कम हो गया तो रूपय देकर समान का दाम बढ गया। अर्थशास्त्रा के सारे नियम कानून भारतीय मुद्रा को सम्मानजनक स्ािान दिलाने में असमर्थ साबित हो रहा है। नौकरी पेशेवालों की तो और मुसीबत है उनकी तनख्वाह सिर्फ महंगाई की भूख प्यास को पूरा करने में ही खप जाती है। बचत करना तो सिर्फ सपना हो गया है। लोगों के अमीर बनने के सपने में जंग लगने लगी है। आयात और निर्यात के बीच बनती खाई कही न कहीं महंगाई के लिए उत्तरदायी है। आयात शुल्क में बढोत्तरी और अनावश्यक लोगों को सब्सिडी कहीं न कही पर सरकार के लिए महंगी साबित हो रही है। अर्थजगत के सुप्रसिद्व अखबार द एकोनाॅमिकल टाइम्स को देखते हुए एक संपादकीय में साफ-साफ लिखा गया कि भोपाल की अधिकता और उत्पादित माल के निर्यात में कमी भारत को कंगाल बनाने में मदद कर रही है और यदि यही हाल रहा तो भारत इस सरकार की अगली दो पंचवर्षीय पूरे होने तक घोषित हो जाएगा और उस समय पर अर्थशास्त्रा कुछ भी नहीं कर पाएगा। न ही भारत को दिवालिया होने से बचा पाएगा। यह सच है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार भविष्यगत सपने देखता है और उसे पूरे करने के लिए दिन रात एक करता है परंतु भरत की स्थिति यह की भारत में रहने वाला ही व्यक्ति कर्ज में डूबा है। भारत में रहने वाला गरीब और अधिक गरीब हुआ है और भारत का अमीर और अधिक अमीर हुआ। कई अमीरों की अमीरी का कोई सिर पैर तथा बुनियाद नहीं है। उनके स्विस बैंको में स्थित खाते अपने सुख चैन के लिए दिन गिन रहे है। शिक्षा से लेकर दीक्षा तक सब महंगी हो गई है। आप कब तक यह कहते रहेंगे कि हमे अपने से मतलब है देश से कोई मतलब नहीं वो जनप्रतिनिधि जाने देश चलाना प्रधानमंत्राी को ठेका है और राज्य चलाना मुख्यमंत्राी का ठेका है। हमने तो उन्हें चुनकर विधानसभा और संसद में भेज दिया बाकी उनकी जिम्मेबारी वो जाने।
यह सच है कि जिस देश के भौतिक संसाधनों का उपयोग मानव संसाधनों के द्वारा नहीं किया जाता वह देश अपनी कंगाली का पहला कदम रख चुका होता है। एक तरफ यदि महंगाई यह चिल्लाती हुई हमें डकार जाने के लिए आतुर हो रही है कि मोहि कहा विश्राम। तो हम सब को इस बात पर आपसी सामंज्य बिठाकर उसका सामना करना चाहिए। महंगाई यदि सुरक्षा की तरह मुॅह फेला रही है तो हमें हनुमान की तरह हार न मानते हुए सामना करके विजयी होना पडेगा या तो हम बदल जाए या जमाने को बदल दें। हम बदलेंगे तो सपने अपने होगे और यदि जमाना बदलेगा तो सपने सुहाने होंगे तो अब से महंगाई की कहिये तोहिं यहाॅ विश्राम।
अनिल अयान
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