शनिवार, 27 अप्रैल 2013

कैन्डिल मार्च या सैन्डिल मार्च


  कैन्डिल मार्च या सैन्डिल मार्च
दामनी के बाद तो देश मे हैवानियत जैसे अपने मुँह को और बडा करने मे लगी हुयी है और इन्सानियत तो जैसे दुम दबाकर भारत के किसी कोने मे विश्राम करने लगी है. बलात्कार करना जैसे आज के समय में वीरता का काम बनता जा रहा है कोई भी किसी भी वक्त यह कृत्य करके अपने को गौरवान्वित और पुरुषार्थ की जीत का जश्न मनाता नजर आता है. कभी कभी तो यह लगता है कि संस्कार और विरासत तो कहीं खो सी गयी है.सभ्यता तो बिल्कुल अंतिम साँसें गिन रही है,. सिर्फ बची कुची जो इज्जत इन्सानियत के पास शेष है वो भी लोग बलात्कृत करके इन्शानों से छीनने में लगे हुये है. दिल्ली जैसे महानगरों में तो लडकी कोई खेलने वाली गुडिया बनकर रह गयी है. जिसमे कोई उमर की आवश्यकता नहीं है जो चाहे खरीदे , छीने खेले और कचडॆ में फेक दे. नियम और कानून की धज्जियाँ उडाते ये इन्सानो के भेष में छिपे दरिंदे वास्तविक रूप से अपनी मानसिक विकृति का शिकार मासूम  लडकियो को बनाते है, इनके लिये लडकियाँ किसी की माँ ,बहन ,बेटी,और परिवार का और भी कोई रिस्ता नहीं सिर्फ भोगने वाली मादा मानते है. जिसका उपयोग और उपभोग करके सिर्फ भोगवादी भूख और प्यास मिटाने का प्रबंध किया जा सके. जानवरों से भी बदतर इनका यह कृत्य यह शाबित कर देता है कि मानसिक सोच की पगडंडियाँ कितनी संकरी हो चुकी है. की अब उनकी चौडी होनी की संभावना बहुत कम है.
       जिस प्रकार दक्षिण अफ़्रीका की राजधानी केपटाउन है उसी तरह भारत की राजधानी दिल्ली अब रेपटाउन बनती जा रही है. और दिल्ली सरकार पुलिस और प्रशासन सब अपने घर की बेटियों यह सांस्कृतिक कार्यक्रम होने का जैसे इन्तजार करते बैठे हुये है. दिल्ली क्या भारत का ऐसा कोई कोना नहीं है जहाँ यह कष्टकारी घटना ना घटती हो. मुझे तो लगता है कि प्रशासन पुलिस और सरकार क्या कर सकती है जब हम में ही चारित्रिक कमजोरी है और नैतिक पतन है. आज के समय देश वाकयै विकासशीलता का पालन कर रहा है. नैतिक विकास बहुत कम और अनैतिक विकास बहुत तेजी से हुआ है.आज के समय में पोर्नोग्राफी जहाँ युवाओं के मोबाइल्स की शान बने हुये है. जहाँ देश मे सन्नी लियोन और अन्य आइटम हीरोइन्स अपने जिस्म का प्रदर्शन करने मे गौरवान्वित महसूस करने लगी हो,. वहाँ पर रेप कैसे रुक सकते है. सामान्यतः मनोविज्ञान का मनोविज्ञान भी चकित है कि भारत के लोगो को क्या हो गया है. एक केस समाप्त होता नहीं है कि दूसरा अंजाम तक पहुँच जाता है. सरकार की सिरदर्दी भी कम नहीं हो पाती है.सबसे बडी बात कि इस तरह की घटनाओं में लोग कैंडिल मार्च करके शांति प्रदर्शन करने में जुट जाते है. थोडा बहुत शोक मनाते है और फिर अपने काम लग जाते है. जैसे कुछ हुआ हि नहीं है. सब सामान्य रूप से चलने लगता है. और सब लोग दुहायी देते है कि सरकार कुछ कर नहीं कर रही है. .अरे रेप करे आपके समाज का और आप हाथ मे हाथ धरे बैठे रहे ... फिर सरकार ,पुलिस और प्रशासन को दोष देते रहे. हम सब जानते है कि कानून हमारा इतना लचीला और सुस्त है कि अपराधियों को सजा देने में कई साल लग जाते है. न्याय तो कोर्ट के दरवाजे के सामने कुम्भकर्ण की नींद लेता नजर आता है. फरियादी और फरियादी का परिवार  अपने फरियादी होने पर दिन रात सोचते सोचते मर जाता है पर न्याय नहीं मिल पाता है. यही सब चलते रेप करने वाले दरिंदे खुले आम घूमते है एक के बाद एक अनगिनत रेप करते है पर हमारा कानून उदारवादी रवैये के चलते सिर झुका लेता है. देश की महिलाये , और अन्य जागरुक लोग दिन रात धरना प्रदर्शन करके सरकार से न्याय की गोहार लगाते है. सरकार पुलिस बल का प्रयोग करके लाठी चार्ज करती है.
      आज के समय पर जरूरत है की अपने मसले खुद निपटाओ. कब तक.....आखिरकार कब तक इस तरह महिलाये जिसे देवियों का स्थान दिया जाता है उन्हे लाठियाँ खाना पडेगा. वो खुद चाहें तो इस मसले को. बलात्कारियों को और अपने अपराधियों को ऐसी सजा दें की सब लोग देखे . क्या जरूरत है कोर्ट में जाकर अपना समय और रुपया बरबाद करने की. कैंडिल मार्च की जगह यदि इन बलात्कारियों के साथ सैंडिल मार्च किया जाये तो  हमारे देश की महिलाये और बेटियाँ इतनी है कि बलात्कारी सैंडिल खाते खाते बेमौत मर जायेगा.  क्योकीं दिल्ली में बैठी शीला दीक्षित जी तो कुछ करने से रहीं और सरकार सिर्फ बयानबाजी से बाज नहीं आती है. तो महिलाओं को यह काम अपने हाथों से करना होगा. इसके लिये देश की महिलाओं को एक जुट होकर सहयोग करके बलात्कारियों को सजा देना होगा, वरना अभी तो देश की राजधानी रेप टाउन बनी है आने वाले समय में पूरे राज्यों के हर शहर रेपटाउन बन जायेंगें.

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

संविधान का बदलते विधान में बाबा साहबह


संविधान का बदलते विधान में बाबा साहब
पिछले ही सप्ताह अम्बेडकर जयन्ती का आयोजन किया गया. कई जगह पर अनगिनत आयोजन किये गये. ऐसा लगा कि आज ही देश की बहुत सी पार्टियाँ, संगठन और सामाजिक संस्थायें अपने अपने तरीके से आयोजन किये और समाचार पत्रो की सुर्खियाँ बने. हमारे देश की परम्परा हो गयी है कि किसी भी महापुरुष की जयन्ती हो या किसी भी बडे साहित्यकार का जन्मदिवस , वह भी टोलों और गुटो के हवाले हो गयी है. बापू किसी राजनैतिक संगढन की विरासत बन गये. कोई जयप्रकाश के नाम पर ऐश कर रहे है. कोई लोहिया को अपने घर की बपौती समझ कर उसके नाम पर देश को अपने अगुलियों में नचाने की कवायद कर रहे है. और यही हाल अपने संविधान का विधान लिख्नने वाले बाबा साहेब का.कभी पढा था की बाबा साहेब दबे कुचले और आम सर्वहारा वर्ग के साथ थे. उन्होने समाजिक परिवर्तन के लिये सर्वहारा वर्ग के लिये लडते रहे.समाजिक वर्ग संरचना के विरोध में आम जन की आवाज बनते रहे. और आजाद भारत के संविधान की रचना करने का कार्य अपनी समिति के साथ मिल कर किया और. संविधान के जनक बन गये. पूरा देश आज उनके लिये कृतज्ञ है.
आजादी के बाद जैसे जैसे देश तरक्की करता गया,उसमे और भी बदलाव द्रुत गति से होते गये. देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था भी राजनेताओं के हवाले होती चली गयी.संविधान का विधान लिख्नने वाले बाबा साहेब की मेहनत को लोग भूलते चले गये और अपने स्वार्थ और राजनैतिक रोटियों को सेकने के लिये संविधान की सिगडी मे परिवर्तबन होता रहा और हर एक वर्ष ही अम्बेडकर जयन्ती मे सभी दलों के राज नेता यह कह्ते नजर आये कि आज भी भारत बाबा साहेब के संविधान मे अपना विकास कर रहा है. मेरे यह नही समझ मे आता है कि आज बाबा साहेब का संविधान रह कहां गया. इतने बार संसोधन होने के बाद तो बाबा साहेब की रूह भी सोचती होगी कि कहाँ से मैने भारत को चलाने के लिये संविधान बनाने के लिये दिन रात एक कर दिया और आज भारतवासी उसी के नाम की धज्जियाँ उडाने में लगे हुये है. आज देश मे हर दल का कदवार नेता और मंत्री दावे के साथ यह कहते नजर आते है कि हम बाबा साहेब का इतना आदर और सम्मान करते है कि आज भी उन्ही के बनाये संविधान मे चल रहे है. पर अफसोस की बात की बाबा साहेब की आत्मा को तो उसी दिन ही ठेस पहुँच गई थी जिस दिन संविधान में संसोधन होना शुरू हो गया था. आज जिस बात का राग अलापा जा रहा है वह पूरी तरह से बेबुनियाद है. बाबा साहब का संविधान आम सर्वहारा वर्ग के लिये और अमी्री गरीबी की खाई पाटने वाला था. और परिणाम भी जल्द भारत को देने वाला था. परन्तु जो भी सत्ता मे गया वह संविधान मे संसोधन मे उतारू हो गया. और अब दावा करना उनके राष्ट्र प्रेम को गालियाँ देने की तरह ही है.
  सबसे बडी बात बाबा साहब की १२३ वी जयन्ती मनाने वाला भारतवर्ष और उसके राज नेता जिस तरह की ईमानदारी बाबा साहेब के जीवित रहने के दौरान दिखा रहे थे मरने के बाद उनके अनुयायी उनके विरोध मे हो गये. अपने अपने गुट बना लिये और समय के साथ पाले बदल लिये. जहाँ पर बाबा साहेब के चरण पखारने वाले लोग,उनकी पूजा करने वाले लोग, उनके गुणगान करने से नहीं थकते थे. वो समय बदल जाने के साथ साथ अब उन्ही के नाम पर ऐश और कैश करते नजर आते है. आज बाबा साहब को निश्वार्थ भाव से याद करने वाला व्यक्ति कम मिलेगा और उनकी वसीहत के नाम पर अपनी जागीर बनाने वाले लोग गिनती से भी बढ कर है. बैर हाल वाकया कुछ भी हो परन्तु बाबा साहब के कार्यों को यूँ हवा में उडाने की प्रवृति छोड कर प्रचार प्रसार करने की आवश्यकता है. और संविधान के विधान को सम्हालने की आवश्यकता और भी ज्यादा है.

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

अतिथि विद्वान,पडे उतान....


अतिथि विद्वान,पडे उतान....
स्कूल शिक्षा मे जो हाल संविदा शिक्षकों का सरकार ने कर रखा है वही हाल महाविद्यालयीन शिक्षा मे अतिथि विद्वानों का उच्च शिक्षा मे उच्च शिक्षा विभाग ने कर रखा है. बस जहाँ अंतर सिर्फ इतना है कि संविदा शिक्षको के वेतन मान का अन्य परमानेंट शिक्षकों की तुलना मे अनुपात ५००० और २५००० का है और अतिथि विद्वानो के विषय मे यह अनुपात ८०००-१०००० और ५००००-८०००० का अंतर है. कुल मिलाकर देखा जाये तो इनकी जीवन चर्या को गर्त में मिलाने का काम सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने बखूबी किया है. ये तथाकथित रूप से विद्वान का पद तो पाजाते है पर वेतन मान और अपनी विद्वता का पारितोषित पाने के लिये खून के आँसू बहाने पडते है. साल के दस महीने इनके जलवे  महाविद्यालय मे होते है और फिर काम निकल जाने के बाद इनको दूध मे पडी मक्खी की तरह निकाल कर फेक दिया जाता है. तब इनकी सेवा, शिक्षा , ज्ञान और अनुभव की बारा की ढेर हो जाती है. और सिर्फ यही कहा जाता है की यह नियुक्ति तो जनभागीदारी समिति के तहत सिर्फ पीरियड के तहत हुई थी. हम सब नियम कानून से बंधे हुये है.अतिथि विद्वान योग्यता में प्राध्यापकों की तुलना में कहीं भी कम नहीं होते है. वो नेट, पी.एच.डी. एम.फिल, सभी उच्च योग्यताओं से परिपूर्ण होते है. और ज्ञान में तो कभी कभी ६० वर्ष पूर्ण करने वाले प्राध्यापको से एक कदम आंगे ही होते है. क्योकी के वो अध्ययन में किसी से कम नहीं और अपने को समय समय में अपडेट करते रहते है. पर प्राध्यापक तो इन सबसे परहेज इस लिये है कि ना उनके पास इतना समय है और ना ही उनको जरूरत जब सरकार उन्हे ५००००-८०००० रुपये दे रही है तो पढना भी सिर्फ समय की बरबादी नजर आती है और कालेज के विद्यार्थी तो पढने आते कहाँ है. वो तो डिग्री लेने और राजनीति करने शासकीय महाविद्यालय में आते है.
          सरकार जहाँ एक तरफ प्राध्यापकों की नियुक्ति करने में असमर्थ है या ये कहे कि इतनी भी अब औकात नहीं रह गई की वो सहायक प्राध्यापक की सीधी भर्ती करके सभी महाविद्यालयों मे नियुक्ति करे ताकी यह स्थिति आये ही नहीं, सरकार के पास बैकलाग पदों की नियुक्ति करने का समय ,बजट और योजनायें है पर सामान्य भरती की कोई योजना नहीं है यह कहाँ का न्याय है. और दूसरी तरफ हर जगह महाविद्यालय लगातार कुकुरमुत्तों की तरह खुलते चले जारहे है. तो फिर छात्रो के पठन पाठन के हित के लिये अतिथि विद्वानों की नियुक्ति एक सामान्य प्राध्यापक की तरह क्यों नहीं की जाती है. कई जगह तो ऐसी है जिसमें प्राचार्य को छोड कर सारा स्टाफ अतिथि विद्वानों का है. पूरे सत्र मेहनत करने में ये कभी पीछे नहीं रहते है. वेतन मान में इनकों पीछे क्यों छोड दिया जाता है, सरकार इनके साथ इस तरह का सौतेला व्यवहार करती है जैसे सरकारी प्राध्यापक सरकार की जायज औलाद हो और ये नाजायज. इनका पूरा कार्य एक प्राध्यापक की तुलना में कहीं भी कम नहीं आँका जा सकता है, बल्कि कई मायनों में कामचोरी और पढने पढाने की चोरी के मामले में प्राध्यापक इन अतिथि विद्वानों से कई कदम आंगे होते है.
  कभी कभी तो ऐसा नहीं लगता है कि शासन की नजरों में जैसे ना इनका परिवार है. ना इन्हे. कोई जरूरत होती है. ये बिल्कुल फकीर है......आखिर क्या हो रहा है इस उच्च शिक्षा विभाग को क्यों इतना भेदभाव है. काम मे समान और वेतनमान में अलग अलग. आज जरूरत है कि उच्च शिक्षा विभाग  या तो लोक सेवा आयोग के तहत या तो परमानेंट नियुक्ति करे, या फिर इन अतिथि विद्वानों की योग्यता और अनुभव के आधार पर इनकी नियुक्ति के प्राध्यापक के रूप में करे तभी इनका भविष्य कुछ हद तक उज्ज्वल होगा. अन्यथा, आज तो ये पूरी तरह से उतान पडे हुये है. ना कोई माई बाप है ना कोई योजना इनका भविष्य बना रही है. और ना महाविद्यालय का कोई सहयोग.साल भर मे ९ महीने काम करने के बाद बाकी ३ महीने इनके कैसे परिवार चलते होंगे. कैसे इनका गुजारा होता होगा. और इनके परिवार का विकास कैसे होगा यह सोच कर चिंता होने लगती है. पर हमारा प्रशासन की कान में जूं तक नहीं रेगती, उसे इनके काम से सरोकार होता है परन्तु इनके जीवन इनके परिवार और इनके भविष्य से कोई सरोकार क्यों नहीं होता. यदि यही चलता रहा तो तय है कि आने वाले वक्त मे अतिथि विद्वान प्राइवेट विद्यालय और महा विद्यालय मे पढा लेगा पर सरकारी अतिथि विद्वान बनना नहीं पसंद करेगा, क्योंकि यदि मेजबान बेशर्म हो जाये तो अतिथि ना बनने में ही बडप्पन होगा.
अनिल अयान सतना.

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

मरीज हलाल डाक्टर खुशहाल


मरीज हलाल डाक्टर खुशहाल
बीमारियाँ बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारी जिंदगी मे आती है. और कब तक इनका ठिकाना रहेगा यह तो बीमार होने वाला व्यक्ति भी नहीं जानता है.बीमारी ,बीमार और अस्पताल का संबंध बिल्कुल लंगोटिये यार की तरह रहा है. जब भी बीमारी हमारी जिंदगी में आती है तो मजबूरी मे हमें अस्पताल रूपी यमलोक जाना ही पडता है. और यह स्थिति से सभी रूबरू होते है.आम आदमी को उस वक्त अपने आम तबके के होने का आभास हो जाता है जब वो गल्ती से सरकारी अस्पताल पहुँच जाये. जहाँ बीमारी चार दिन मे सही होने वाली होगी वहाँ चार सप्ताह में भी सही नहीं होती है. सरकारी अस्पताल यानी आपकी स्थिति एक जानवर से भी बदतर होती है यहाँ के लोग है भगवान और आप इंसान. इसके बीच का गैप इतना ज्यादा होता है कि आप चाह कर भी यहाँ के स्टाफ से मानवीयता की उम्मीद नहीं कर सकते है.
          सरकारी अस्पताल का हाल यूँ होता है कि मरीज डाक्टर की दवा खाकर ही मरते है. और डाक्टर बहुत ही सफाई से यह कह देता है कि भगवान के आँगे भला किसी की कैसे चल सकती है. सब कहने की बाते है. सरकारी अस्पताल का रवैया देख कर तो यह लगता है कि इस तरह की इमारते हमारे समाज मे सिर्फ मरीज से रुपया चूसने के लिये ही बनायी जाती है जिसमे एक वार्ड ब्वाय से लेकर एक अधिकारी तक सिर्फ मरीज और उसके परिवार वालों की चरसी उकेलने से बाज नहीं आते है. सिलसिला तब शुरु होता है जब उसे ओपीडी में घंटो खडे होकर सिर्फ दिखाने के लिये पर्ची कटवाने का इंतजार करना पडता है. फिर डाँक्टर साहब का इंतजार , उनके पास इतना समय कहाँ कि वो आम जन की बान को सुन सकें वो तो नर्सिंग होम्स और प्राइवेट प्रैक्टिस मे काफी व्यस्त रहते है. अब मरीज चाहे तो डाक्टर के घर जाकर या क्लीनिक जाकर अपना इलाज कराये वरना इलाज करवाने के लिये सूरज के डूबने तक का इंतजार करे,,,, मरीज और उसके परिवार वाले इस तरह की स्थिति देख कर झोलाछाप डाक्टर्स का सहारा लेने के लिये मजबूर है क्योंकि ना उनके पास उतना पैसा है और ना वक्त की डाक्टर साहब के नखडों को बरदास्त कर पाये. सरकारी अस्पताल की एक और खासियत होती है यहाँ पर कोई काम मुफ्त में नहीं होता है. हाँ मुफ्त रूप का जामा पहना दिया जाता है. मानवीयता तो यहाँ पर शर्म से पानी पानी नजर आती है. यहा पर भर्ती होने वाले मरीज तब ही यहाँ से जाते है जब वो जान जाते है कि अब मरने की स्थिति आगई है या फिर मरीज अब इन डाक्टर्स के बस का नहीं है.
यहाँ पर किसी मरीज को तभी सूचना दी जाती है जब वो पूरी तरह से टूट चुका होता है और दवाएँ मर्ज को सही कर पाने  मे असमर्थ हो जाते है. पूरी तरह से चूतिया बनाने का खेल चलता है अधिक्तर सरकारी अस्पतालों मे. यहाँ पर आम दवाएँ जो मरीजो को मुफ्त मे दी जानी चाहिये... या बुजुर्गों के इलाज की दवायें.. या गर्भवती महिलाओं के लिये योजनाये.... सभी सिर्फ नाम मात्र की है... इसके लिये भी यहाँ के कर्मचारियों के द्वारा मरीजों को परेशान कर लिया जाता है.और इतना परेशान किया जाता है कि दोबारा वो सरकारी योजनाओं के लाभ की बात सपनें में भी नहीं सोचते है.यहाँ का कोई भी कर्मचारी सही समय पर नहीं होता है. सबसे मिलने के लिये इंतजार और लंबा इंतजार करना ही पडता है, यहाँ के डाँक्टर्स को ना कभी रोक लगाई जाती है कि वो प्राइवेट प्रैक्टिस को इतना बढावा क्यों देते है नर्सिंग होम की कमाई के लिये क्यों मरीजों को परेशान करते है. मानवरूप मे इस तरह के भगवान और उनके चेलों से प्रेम की भाषा तो कोसों दूर नजर आती है.एक बात और जो देखने को मिलती है की इस लोगों को स्वागत सत्कार का मौका सिर्फ मेडिकल कम्पनियों के प्रतिनिधि खूब देते है. और उन्ही की सेवा सत्कार का परिणाम होता है कि डाक्टर्स को हर वर्ष मेडिकल कम्पनियों की तरफ से उनका दिया टारगेट पूरा करने के लिये फारेन टूर और अन्य सुविधाये और सेवाये भी बेरोकटोक दी जाती है. इस तरह की अप्रत्यक्ष रूप से दीजाने वाली सुविधा शुल्क का कोई माई बाप नहीं है. ना कोई इन पर लगाम लगाने के लिये आगे आता है.सरकार तो इस तरह के रिवाजों पे कोई भी प्रतिक्रिया नही देती है.
          अजीब है स्वास्थ्य विभाग और उसकी योजनाएँ,,,, भोपाल से समय समय में घोषणाएँ होती है पर मरीजों तक पहुँचना सिर्फ एक स्वपन ही होती है.ऐसा नहीं है कि सरकारी अस्पतालों के ऊपर आलाकमान नहीं है पर उनका निरीक्षण सिर्फ दिखावटी होता है, पहले से अस्पताल को पता होता है जिसके चलते वो अधिकारियों की भरपूर सेवाखुसामद करते है जिससे कमियाँ अपने आप छिप जाती है... निरीक्षण के दिन तो ऐसा लगता हैकि इससे अच्छा अस्पताल तो पूरे देश मे नहीं है.इस तरह के रवैये के चलते स्वास्थ विभाग चाहकर भी परदे के पीछे की तस्वीर नहीं देख पाता है.पूरी तस्वीर सिर्फ देखकर सोचने वाली होती है.देखने मे सब सामान्य सा दिखता है पर महसूस करने पर क्षोभ भी होता है और पीडा भी होती है. यही इस जहाँ की रीत है यदि अस्पतालों को जन सामान्य के लिये हित कर बनाना है तो पहले इन्हे नैतिक शिक्षा का पाठ पढने की आवश्यकता है. और फिर सी.एम.ओ. सी.एम.एच ओ. और हर व्यक्ति जो इस सेवा कार्य से जुडा हुआ है उनके स्वनुशासन की बहुत जरूरत वरना चाहे सरकार सिर के  बल भी खडी हो जाये चाहे स्वास्थ्य मंत्री दिन रात एक कर दे पर इनकी कालगुजारी से जनता और सर्वहारा वर्ग को नही बचाया जा सकता है इसी तरह आपरेशन्स मे औजार छूटते रहेंगे. गलत पतों पर शव प्रेषित किये जायेंगे. इसी तरह पब्लिक डाक्टर्स को सरे आम पीटेगी. क्योकी जनता इस तरह की मजाकबाजी कब तक इनके द्वारा बर्दास्त करती रहेगी.
अनिल अयान.सतना

बीमारियाँ बिन बुलाये मेहमान की तरह हमारी जिंदगी मे आती है. और कब तक इनका ठिकाना रहेगा यह तो बीमार होने वाला व्यक्ति भी नहीं जानता है.बीमारी ,बीमार और अस्पताल का संबंध बिल्कुल लंगोटिये यार की तरह रहा है. जब भी बीमारी हमारी जिंदगी में आती है तो मजबूरी मे हमें अस्पताल रूपी यमलोक जाना ही पडता है. और यह स्थिति से सभी रूबरू होते है.आम आदमी को उस वक्त अपने आम तबके के होने का आभास हो जाता है जब वो गल्ती से सरकारी अस्पताल पहुँच जाये. जहाँ बीमारी चार दिन मे सही होने वाली होगी वहाँ चार सप्ताह में भी सही नहीं होती है. सरकारी अस्पताल यानी आपकी स्थिति एक जानवर से भी बदतर होती है यहाँ के लोग है भगवान और आप इंसान. इसके बीच का गैप इतना ज्यादा होता है कि आप चाह कर भी यहाँ के स्टाफ से मानवीयता की उम्मीद नहीं कर सकते है.
          सरकारी अस्पताल का हाल यूँ होता है कि मरीज डाक्टर की दवा खाकर ही मरते है. और डाक्टर बहुत ही सफाई से यह कह देता है कि भगवान के आँगे भला किसी की कैसे चल सकती है. सब कहने की बाते है. सरकारी अस्पताल का रवैया देख कर तो यह लगता है कि इस तरह की इमारते हमारे समाज मे सिर्फ मरीज से रुपया चूसने के लिये ही बनायी जाती है जिसमे एक वार्ड ब्वाय से लेकर एक अधिकारी तक सिर्फ मरीज और उसके परिवार वालों की चरसी उकेलने से बाज नहीं आते है. सिलसिला तब शुरु होता है जब उसे ओपीडी में घंटो खडे होकर सिर्फ दिखाने के लिये पर्ची कटवाने का इंतजार करना पडता है. फिर डाँक्टर साहब का इंतजार , उनके पास इतना समय कहाँ कि वो आम जन की बान को सुन सकें वो तो नर्सिंग होम्स और प्राइवेट प्रैक्टिस मे काफी व्यस्त रहते है. अब मरीज चाहे तो डाक्टर के घर जाकर या क्लीनिक जाकर अपना इलाज कराये वरना इलाज करवाने के लिये सूरज के डूबने तक का इंतजार करे,,,, मरीज और उसके परिवार वाले इस तरह की स्थिति देख कर झोलाछाप डाक्टर्स का सहारा लेने के लिये मजबूर है क्योंकि ना उनके पास उतना पैसा है और ना वक्त की डाक्टर साहब के नखडों को बरदास्त कर पाये. सरकारी अस्पताल की एक और खासियत होती है यहाँ पर कोई काम मुफ्त में नहीं होता है. हाँ मुफ्त रूप का जामा पहना दिया जाता है. मानवीयता तो यहाँ पर शर्म से पानी पानी नजर आती है. यहा पर भर्ती होने वाले मरीज तब ही यहाँ से जाते है जब वो जान जाते है कि अब मरने की स्थिति आगई है या फिर मरीज अब इन डाक्टर्स के बस का नहीं है.
यहाँ पर किसी मरीज को तभी सूचना दी जाती है जब वो पूरी तरह से टूट चुका होता है और दवाएँ मर्ज को सही कर पाने  मे असमर्थ हो जाते है. पूरी तरह से चूतिया बनाने का खेल चलता है अधिक्तर सरकारी अस्पतालों मे. यहाँ पर आम दवाएँ जो मरीजो को मुफ्त मे दी जानी चाहिये... या बुजुर्गों के इलाज की दवायें.. या गर्भवती महिलाओं के लिये योजनाये.... सभी सिर्फ नाम मात्र की है... इसके लिये भी यहाँ के कर्मचारियों के द्वारा मरीजों को परेशान कर लिया जाता है.और इतना परेशान किया जाता है कि दोबारा वो सरकारी योजनाओं के लाभ की बात सपनें में भी नहीं सोचते है.यहाँ का कोई भी कर्मचारी सही समय पर नहीं होता है. सबसे मिलने के लिये इंतजार और लंबा इंतजार करना ही पडता है, यहाँ के डाँक्टर्स को ना कभी रोक लगाई जाती है कि वो प्राइवेट प्रैक्टिस को इतना बढावा क्यों देते है नर्सिंग होम की कमाई के लिये क्यों मरीजों को परेशान करते है. मानवरूप मे इस तरह के भगवान और उनके चेलों से प्रेम की भाषा तो कोसों दूर नजर आती है.एक बात और जो देखने को मिलती है की इस लोगों को स्वागत सत्कार का मौका सिर्फ मेडिकल कम्पनियों के प्रतिनिधि खूब देते है. और उन्ही की सेवा सत्कार का परिणाम होता है कि डाक्टर्स को हर वर्ष मेडिकल कम्पनियों की तरफ से उनका दिया टारगेट पूरा करने के लिये फारेन टूर और अन्य सुविधाये और सेवाये भी बेरोकटोक दी जाती है. इस तरह की अप्रत्यक्ष रूप से दीजाने वाली सुविधा शुल्क का कोई माई बाप नहीं है. ना कोई इन पर लगाम लगाने के लिये आगे आता है.सरकार तो इस तरह के रिवाजों पे कोई भी प्रतिक्रिया नही देती है.
          अजीब है स्वास्थ्य विभाग और उसकी योजनाएँ,,,, भोपाल से समय समय में घोषणाएँ होती है पर मरीजों तक पहुँचना सिर्फ एक स्वपन ही होती है.ऐसा नहीं है कि सरकारी अस्पतालों के ऊपर आलाकमान नहीं है पर उनका निरीक्षण सिर्फ दिखावटी होता है, पहले से अस्पताल को पता होता है जिसके चलते वो अधिकारियों की भरपूर सेवाखुसामद करते है जिससे कमियाँ अपने आप छिप जाती है... निरीक्षण के दिन तो ऐसा लगता हैकि इससे अच्छा अस्पताल तो पूरे देश मे नहीं है.इस तरह के रवैये के चलते स्वास्थ विभाग चाहकर भी परदे के पीछे की तस्वीर नहीं देख पाता है.पूरी तस्वीर सिर्फ देखकर सोचने वाली होती है.देखने मे सब सामान्य सा दिखता है पर महसूस करने पर क्षोभ भी होता है और पीडा भी होती है. यही इस जहाँ की रीत है यदि अस्पतालों को जन सामान्य के लिये हित कर बनाना है तो पहले इन्हे नैतिक शिक्षा का पाठ पढने की आवश्यकता है. और फिर सी.एम.ओ. सी.एम.एच ओ. और हर व्यक्ति जो इस सेवा कार्य से जुडा हुआ है उनके स्वनुशासन की बहुत जरूरत वरना चाहे सरकार सिर के  बल भी खडी हो जाये चाहे स्वास्थ्य मंत्री दिन रात एक कर दे पर इनकी कालगुजारी से जनता और सर्वहारा वर्ग को नही बचाया जा सकता है इसी तरह आपरेशन्स मे औजार छूटते रहेंगे. गलत पतों पर शव प्रेषित किये जायेंगे. इसी तरह पब्लिक डाक्टर्स को सरे आम पीटेगी. क्योकी जनता इस तरह की मजाकबाजी कब तक इनके द्वारा बर्दास्त करती रहेगी.
अनिल अयान.सतना

शनिवार, 30 मार्च 2013

आखिरकार कौन है संजय दत्त

आखिरकार कौन है संजय दत्त
पिछले एक सप्ताह से मीडिया ने एक नई लहर पूरे देश मे चला दी है २० वर्ष पूर्व किये गये अपराध मे मिली सजा से बचने के लिये संजय दत्त की माफी के लिये मुहिम छिडी हुई है..कोई अपने वोट ई मेल से कर रहा है कोई एस एम एस से वोटिंग कर रहा है. इतने दिनों की इस वैचारिक कुरुक्षेत्र को देखने के बाद मुझे यह महसूस होता है कि आखिरकार यह संजय दत्त है कौन. क्या पहचान है इस शक्स की. एक भारतीय, एक अभिनेता, मुन्नाभाई, संजू भैया, या फिर आतंकवादियो से गठजोड करने वाला काफिर,भारत देश की जनता संजय दत्त को किसी भी रूप मे देख रही हो. पर जनप्रतिनिधि उनके नाम परव वोट की राजनीति करने मे तुली हुयी है.. पूरे घटना क्रम को देखने के बाद मुझे तो ये लगा की अब बालीवुड का पावर सुप्रीम कोर्ट के पावर से कहीं ज्यादा पावरफुल है. देश को भी ना जाने क्या होता जा रहा है कि एक अभिनेता के लिये देश की जनता चाटुकार नेताओ के बहकावे और जस्टिस काटजू के बयानबाजी में आकर सुप्रीम कोर्ट के न्याय के विरोध मे जाकर माफीनामा तैयार करवाने मे अधी दौड दौड रही है. यही है न्यायपालिका का सम्मान,. और यही है लोकतांत्रिक देश मे संविधान की इज्जत, संविधान भी अपने इस स्थिति पे गोहारी मारता होगा, बाबा साहब ये कभी न सोचे रहे होगें की उनके स्वर्गवासी होने के बाद उनके देशवासी संविधान को आम और खास के बंटवारे मे शामिल हो जायेगी.
यदि राष्ट्रपति और राज्यपाल को इस प्रकार सजा माफी का अधिकार है तो उन्हे भी एक बार जनता से भी राय जानना चाहिये कि वो इस तरह के अपराधियों के बारे में क्या सोचती है. ये नही कि जन प्रतिनिधि अपराधियों के साथ हो जाये थो पूरी जनता की सहमति है. मेरे यह समझ मे नहीं आती कि यदि जनप्रतिनिधि यदि अपना पेट भर लेता है तो इसका मतलब ये समझ ले की जनता का भी पेट भर गया. ऐसा कभी नहीं होता है. आखिरकार कांग्रेस और अन्य दल के प्रतिनिधि, जस्टिस काटजू अपने बयानबाजी से यही बहुत बारीकी से जनता के गला रेतने का काम अंजाम दे रहे है.सुनील दत्त और नरगिस ने कभी नहीं सोचे होंगे कि उनके बेटे का इस तरह देश के खिलाफ व्यवहारिक रवैया रहेगा. जया बच्चन ने जिस तरह का संजय दत्त का पक्ष लेरही थी जैसे कि पहली बार किसी परिवार रखने वाले व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने सजा का आदेश दिया है. जैसे आम अपराधियों के बाल बच्चे होते ही नही है, कोई परिवार नही होता है. वाह जया जी. अमीरजादो के ऊपर आयी तो आप गोहारी मारने लगी. आम जनता पे मौन क्यो धारण कर लेती है. पहले के समय मे अभिनेता वाकये बहुत सालीन और संयमित होते थे. उनकी रियल और रील लाइफ मे अन्तर निकाल पाना मुस्किल था और आज के समय में अभिताब बच्चन से सैफ और सलमान से होते हुये संजय दत्त तक सभी की रील लाइफ उनकी रियल लाइफ से बहुत ज्यादा अलग होती है. इनके अपराध सिद्ध हो भी जाये तो इनके चेहरे मे एक सिकन तक नहीं दिखायी देती है. अजीब जलवा है बालीवुड का जिसे देखो वो किसी तरह की कोई भी हरकत करे लेकिन उसे राज्यपाल और राष्ट्र्पति से माफी दिलवाने के लिये पूरे देश के बुद्धिजीवी वर्ग मुहिम छेड देते है और सर्वहारा के लिये न्याय दिलाने के लिये ये सब अपने अपने बिल के अंदर घुस जाते है.क्या आज भारत की स्थिति ये हो चुकी है कि न्यायपालिका का कद बालीवुड के सामने बौना आँका जाये. मनोरंजन ,शासन और न्याय पर सवार होकर जीवन जीने लगा है. मानवीय संवेदना हर अपराध , हर अपराधी को बचाती रहेगी तो न्यायपालिका के न्याय का इसी तरह होलिका दहन होता रहेगा.बात संजय दत्त की ही सिर्फ़ नही बल्कि सभी सिने सितारो केउपर लागू होती है आखिरकार संजय दत्त को इस अवदान के तहत लोग उनकी सजा माफी की अपील कर रहे है. वो सिर्फ एक अभिनेता है सुप्रीम कोर्ट के सामने चाहे अभिनेता हो नेता हो या फिर आम जन हो सब बराबरी का दर्जा रखना चाहिये.क्यों संविधान मे इस तरह के कारनामों के लिये माफी का आप्सन दिया गया. जिस समय वो छोटा राजन को प्रमोट कर रहे थे उस वक्त वो बच्चे नही थे. आज जिस तरह अराजकता फैली हुई है देश मे उससे यह साफ जाहिर होता है कि सिने अभिनेता और कांग्रेसी राजनीतिज्ञ सुनील दत्त का कांग्रेसी अस्तित्व के चलते संजय दत्त का पक्ष ले रहे है. यदि ऐसा ही चलता रहेगा तो आने वाले समय में इसी तरह रील लाइफ वाले लोग अंडर वर्ड से हाथ मिलाते रहेगे और देश को कंगाल बनाते रहेंगे. इसी तरह माफी के लिये अर्जियां भेजी जायेगी और रिहाई दिलवाने के लिये दिन रात एक करते रहेंगे. इसी तरह राज महलों के निवासी सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते रहेंगे. और न्याय पालिया की अरथी मे लोग राम नाम सत्य चिल्लाते रहेगे. न्याय की दुधारी तलवार गरीब को आम गलती के लिये सर कलम करेगी और पावर वालो को गुनाह के लिये भी बाइज्ज्त रिहा करेगी. हम सब बालीवुड के सिने अभिनेताओ और अभिनेत्रियों की पूजा अर्चना करते नजर आयेगे. भले ही वो देश को विदेशियों के हाथों बेंचने मे तुले हों....आखिरकार हम उदारवादी व्यक्तित्व के धनी भारतवासी जो ठहरे.

आखिरकार कौन है संजय दत्त

आखिरकार कौन है संजय दत्त
पिछले एक सप्ताह से मीडिया ने एक नई लहर पूरे देश मे चला दी है २० वर्ष पूर्व किये गये अपराध मे मिली सजा से बचने के लिये संजय दत्त की माफी के लिये मुहिम छिडी हुई है..कोई अपने वोट ई मेल से कर रहा है कोई एस एम एस से वोटिंग कर रहा है. इतने दिनों की इस वैचारिक कुरुक्षेत्र को देखने के बाद मुझे यह महसूस होता है कि आखिरकार यह संजय दत्त है कौन. क्या पहचान है इस शक्स की. एक भारतीय, एक अभिनेता, मुन्नाभाई, संजू भैया, या फिर आतंकवादियो से गठजोड करने वाला काफिर,भारत देश की जनता संजय दत्त को किसी भी रूप मे देख रही हो. पर जनप्रतिनिधि उनके नाम परव वोट की राजनीति करने मे तुली हुयी है.. पूरे घटना क्रम को देखने के बाद मुझे तो ये लगा की अब बालीवुड का पावर सुप्रीम कोर्ट के पावर से कहीं ज्यादा पावरफुल है. देश को भी ना जाने क्या होता जा रहा है कि एक अभिनेता के लिये देश की जनता चाटुकार नेताओ के बहकावे और जस्टिस काटजू के बयानबाजी में आकर सुप्रीम कोर्ट के न्याय के विरोध मे जाकर माफीनामा तैयार करवाने मे अधी दौड दौड रही है. यही है न्यायपालिका का सम्मान,. और यही है लोकतांत्रिक देश मे संविधान की इज्जत, संविधान भी अपने इस स्थिति पे गोहारी मारता होगा, बाबा साहब ये कभी न सोचे रहे होगें की उनके स्वर्गवासी होने के बाद उनके देशवासी संविधान को आम और खास के बंटवारे मे शामिल हो जायेगी.
यदि राष्ट्रपति और राज्यपाल को इस प्रकार सजा माफी का अधिकार है तो उन्हे भी एक बार जनता से भी राय जानना चाहिये कि वो इस तरह के अपराधियों के बारे में क्या सोचती है. ये नही कि जन प्रतिनिधि अपराधियों के साथ हो जाये थो पूरी जनता की सहमति है. मेरे यह समझ मे नहीं आती कि यदि जनप्रतिनिधि यदि अपना पेट भर लेता है तो इसका मतलब ये समझ ले की जनता का भी पेट भर गया. ऐसा कभी नहीं होता है. आखिरकार कांग्रेस और अन्य दल के प्रतिनिधि, जस्टिस काटजू अपने बयानबाजी से यही बहुत बारीकी से जनता के गला रेतने का काम अंजाम दे रहे है.सुनील दत्त और नरगिस ने कभी नहीं सोचे होंगे कि उनके बेटे का इस तरह देश के खिलाफ व्यवहारिक रवैया रहेगा. जया बच्चन ने जिस तरह का संजय दत्त का पक्ष लेरही थी जैसे कि पहली बार किसी परिवार रखने वाले व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने सजा का आदेश दिया है. जैसे आम अपराधियों के बाल बच्चे होते ही नही है, कोई परिवार नही होता है. वाह जया जी. अमीरजादो के ऊपर आयी तो आप गोहारी मारने लगी. आम जनता पे मौन क्यो धारण कर लेती है. पहले के समय मे अभिनेता वाकये बहुत सालीन और संयमित होते थे. उनकी रियल और रील लाइफ मे अन्तर निकाल पाना मुस्किल था और आज के समय में अभिताब बच्चन से सैफ और सलमान से होते हुये संजय दत्त तक सभी की रील लाइफ उनकी रियल लाइफ से बहुत ज्यादा अलग होती है. इनके अपराध सिद्ध हो भी जाये तो इनके चेहरे मे एक सिकन तक नहीं दिखायी देती है. अजीब जलवा है बालीवुड का जिसे देखो वो किसी तरह की कोई भी हरकत करे लेकिन उसे राज्यपाल और राष्ट्र्पति से माफी दिलवाने के लिये पूरे देश के बुद्धिजीवी वर्ग मुहिम छेड देते है और सर्वहारा के लिये न्याय दिलाने के लिये ये सब अपने अपने बिल के अंदर घुस जाते है.क्या आज भारत की स्थिति ये हो चुकी है कि न्यायपालिका का कद बालीवुड के सामने बौना आँका जाये. मनोरंजन ,शासन और न्याय पर सवार होकर जीवन जीने लगा है. मानवीय संवेदना हर अपराध , हर अपराधी को बचाती रहेगी तो न्यायपालिका के न्याय का इसी तरह होलिका दहन होता रहेगा.बात संजय दत्त की ही सिर्फ़ नही बल्कि सभी सिने सितारो केउपर लागू होती है आखिरकार संजय दत्त को इस अवदान के तहत लोग उनकी सजा माफी की अपील कर रहे है. वो सिर्फ एक अभिनेता है सुप्रीम कोर्ट के सामने चाहे अभिनेता हो नेता हो या फिर आम जन हो सब बराबरी का दर्जा रखना चाहिये.क्यों संविधान मे इस तरह के कारनामों के लिये माफी का आप्सन दिया गया. जिस समय वो छोटा राजन को प्रमोट कर रहे थे उस वक्त वो बच्चे नही थे. आज जिस तरह अराजकता फैली हुई है देश मे उससे यह साफ जाहिर होता है कि सिने अभिनेता और कांग्रेसी राजनीतिज्ञ सुनील दत्त का कांग्रेसी अस्तित्व के चलते संजय दत्त का पक्ष ले रहे है. यदि ऐसा ही चलता रहेगा तो आने वाले समय में इसी तरह रील लाइफ वाले लोग अंडर वर्ड से हाथ मिलाते रहेगे और देश को कंगाल बनाते रहेंगे. इसी तरह माफी के लिये अर्जियां भेजी जायेगी और रिहाई दिलवाने के लिये दिन रात एक करते रहेंगे. इसी तरह राज महलों के निवासी सुप्रीम कोर्ट को चुनौती देते रहेंगे. और न्याय पालिया की अरथी मे लोग राम नाम सत्य चिल्लाते रहेगे. न्याय की दुधारी तलवार गरीब को आम गलती के लिये सर कलम करेगी और पावर वालो को गुनाह के लिये भी बाइज्ज्त रिहा करेगी. हम सब बालीवुड के सिने अभिनेताओ और अभिनेत्रियों की पूजा अर्चना करते नजर आयेगे. भले ही वो देश को विदेशियों के हाथों बेंचने मे तुले हों....आखिरकार हम उदारवादी व्यक्तित्व के धनी भारतवासी जो ठहरे.

रविवार, 24 मार्च 2013

होली के आधुनिक धतकरम


 होली के आधुनिक धतकरम
रंगों का त्योहार होली,,, सभी लोगो को दीवाली और होली का बेसब्री से इंतजार होता है. पहले के समय में होली का अपना अंदाज हुआ करता था. अरे मै तो बताना ही भूल गया फागुन और फगुआ की धूम तन और मन को हर्ष और उल्लास के सागर में गोते लगाने के लिये मजबूर कर देती थी.पहले के समय में गावों का वो हरियाली भरा माहौल और परिवार के सभी लोगों का होली की छुट्टी में घर आकर  कई दिनों तक होली के रंग मे सराबोर हो जाना, अपना अलग ही मजा हुआ करता था. जैसे होली सिर्फ़ रंग खेलना ही नहीं बल्कि खुशियों के रंग मे सभी को रंगने की कला होती थी. देवर भाभी की वो उमंग और अंगडाई देखते ही बनती थी. और जीजा साली के बीच की नोंक झोक और फिर रंग गुलाल की आमद पूरे परिवार को रंगा रंग कर देती थी. धुरेणी का हाल तो ये होता था की जो इस दिन घर से बाहर होली मना लेता था वो कई दिनो तक सिर्फ़ बाहर इस लिये नही निकलता था क्योंकी वो उस लायक बचता ही नहीं था. और इस तरह महिलाओं की स्थिति तो घर के बाहर निकलने लायक ही नहीं बचा करती थी. क्योकी घर के अंदर की होली यादों की होली बन जाया करती थी. इस तरह होली का त्योहार यादों मे समाहित हो जाया करता था, होलिका दहन का रात्रि पहर में होना और पूरे मोहल्ले और टोले के बच्चों,युवाओं, और बूढे बुजुर्गो का उत्साह देखने को बनता था. होली के नशे में वाकये सालीनता से नशा भी किया जाता था. होरियारों की टोलियों का गली गली मोहल्ले मोहल्ले मे जाकर फाग सुनाना और नास्ता पानी करना यह सब आम बात हुआ करती थी. पर जैसे जैसे समय ने करवट बदला यह त्योहार अपनी वास्तविकता को खोता चला गया.
समय के साथ होली के मायने बदल गये. रंगों के मायने बदल गये. रिस्तों के मायने बदल गये. गाँवो का अस्तित्व खोता चला गया. देवर भाभी दूर होते चले गये. जीजा ने साली को आधी घरवाली मान लिया. परिवार टूटते चले गये.हाईटेक युग में एक साथ मिलने बैठने की फुरसत नहीं रही. देश महगाई की दौड में ऐसे दौडा की रंगो और गुलालों की जगह खतरनाक रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा. पानी की समस्या ने होली खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया. लोगो के बीच जाति धर्म और पंथ को लेकर मतभेद मनभेद में बदलते चले गये. मानवीयता अमानवीयता मे बदलने लगी." होली खेले रघुवीरा, की धुन इस सब में गायब होगई. अमीरी और गरीबी के बीच की खाँई इतनी ज्यादा गहरी होगई की यदि हमारे पास में कोई गरीब रह रहा है तो हम उसके घर होली की मुबारकबाद देने नहीं जा सकते है. क्योकी हमारा स्तर कहीं उसके यहाँ जाने से गिर ना जाये. हम खील बतासे गुझियाँ सलोनी मिठाई खुरमी पेट भर खाये और फिर कचडे में भी फेक दिये. जरूरत समझे तो जानवरों को खिला दिये पर अपने आस पास गरीब लोगो के यहाँ लगुआ और बरेदियों की संज्ञा दिये जाने वाले आम सर्वहारा वर्ग का स्वागत करने से परहेज करने लगे. यही है आज की होली का धतकरम जो हर एक वर्ग का आदमी करता चला आया है. और यही हमारी विसंगति भी है. आज के समय पर होली की शुभकामनायें इंटरनेट और नेटवर्किंग साइट्स के युजर्स शब्दो, चित्रो और हाई टेक ईमेलस के द्वारा देने लगे है. ना किसी के पास इतना वक्त है कि वो एक दूसरे के पास जाये और मिलेजुले आज सब विकास की दौड के धावक है जिसे परिवार गाँव विरासत और रिस्तों से कोई मतलब नहीं है सब एक टेबल पर उपलब्ध है यही आधुनिक होली के धतकरम है.
 होली के इस धतकरम को किये बिना हम कुछ कर भी नहीं सकते है. क्योंकी आज की इस एहसान फरामोस दुनिया में चलने के लिये  और चलाने के लिये आपको त्योहार भी भ्रष्टाचार के रंग और टेक्नालाजी के गुलाल से मिल कर मनाना होगा जहाँ आदमियत की होली जलानी ही पडती है तभी आपकी, हमारी, और सब की होली सार्थक होगी. हम तो उस तरह की बचपन मे होली मनाया करते थे. आज तो सब झूँठा सा प्रतीत होता है. त्योहार के दिन ही नही लगता की आज होली का त्योहार है आज तो कैलेन्डर और एस.एम.एस बताते है कि भैया जगो होली आगयी है, वरना किसी को इतनी फुरसत ही नहीं है की होली को उसी धूम धडाके और मजे से मनाये कि आने वाले कई दिनो तक रंग और कई सालों तक यादें ना जाये..... चलिये अब चलता हूँ बहुत सालों के बाद कई दोस्त और भाभी आयी है मेरे साथ होली खेलने ,,, कल तक साली आने वाली है पर वो आधी घर वाली नही है इस बात की खुशी है.... उम्मीद करता हूँ आपके घर में ऐसी आवक जल्द होगी. तब तक के लिये होली मुबारक हो दोस्तो.
 होली मनायें प्रेम के चंदन अबीर से.
शुभकामनायें दे खुशी के अश्रु नीर से.
लोगो के रिस्तों मे यकीन हो गहरा
मुस्कान ,गुझियाँ और मीठी खीर से.
सच्चा गुलाल है सदा रिस्तो के बीच में
आँसू हमारे भी गिरे दूजे की पीर से.
अनिल अयान. सतना.

रविवार, 17 मार्च 2013

बेबुनियादी मुद्दों का पीछा करती व्यवस्था

बेबुनियादी मुद्दों का पीछा करती व्यवस्था
आज के समय मे ना जाने इस व्यवस्था को क्या हो गया है कि सब बेबुनियादी मुद्दों के पीछे ही ये भाग रही है. उन मुद्दों मे वो सारे विषय आते है जिनका विकास से कोई ताल्लुकात नहीं है. पहले के समय में यह काम कुछ साम्प्रदायिक संगठन किया करतेथे . पर आज के समय पर यह कार्य व्यवस्था और सरकार कर रही है. आजादी के पहले से यह सिलसिला चला आ रहा है कि आम जनता को कभी एमरजेंसी के नाम से. कभी जातिगत मुद्दों के नाम से , कभी धर्म के नाम से कभी जाति और वोट के नाम से बरगलाया जाता रहा है. जब भी आतंकवाद का मुद्दा भारत के सामने आया ,दिल्ली मे बैठी कोई भी सरकार हो अपना वोट बैंक सम्हालने के लिये हमेशा दोगला चेहरा दिखाया है.इसी समय देखिये. अवैध बाग्लादेशियों की घुसपैठ ,, अफ़जल गुरू की फ़ाँसी के पूर्व और पश्चात का घटनाक्रम कहीं ना कहीं जनता को झगझोडने वाला रहा है. फ़िर आया पाकिस्तानी हुक्मरानों का भारत दौरा और उसके बाद का आतंकी हमला. और अब सेक्स संबंध के उमर को लेकर बवाल और तमाशा. मेरे यह नहीं समझ मे आता है सरकार जितने भी काम करती है क्या उससे व्यव्स्था सुधरी है. जी नहीं सिर्फ़ व्यवस्था में टूटन उत्पन्न हुयी .पूरी व्यवस्था ही इस तरह से फ़र्जी मुद्दों में लोगों ओ पंजे मे लेने मे लगी हुयी है .सच यह है इस पूरे गेम मे सह प्रकार से सहयोग करने वाले सरकारी और गैर सरकारी तंत्र शामिल है जो व्यवस्था को गर्त मे लेजाने के लिये जुडे हुये है. पहले प्रधान मंत्री जी को लगता था की परिस्थितियाँ देश के विकास के लिये अनुकूल थी. दामिनी रेप केस .... उसके बाद हो रहे लगातार इस तरह के अपराधों की बढोत्तरी के चलते अब उम्र कम करके इस तरह के अपराधों में लगाम कसना चाहतें है. जो सरासर गलत होगा और इस तरह से भारतीय संस्कृति के विरोधी रवैये के धनी होते जा रहे है. वो और उनकी सरकार शायद यह नहीं जानती है कि इस तरह के अपराध उमर पर जितने आधारित होते है उससे कहीं ज्यादा हमारी मानसिकता की विकृति भाव से होती है. और उमर कम करके सरकार और व्यवस्था इस प्रकार के मानसिक विकृतिपूर्ण कार्य को बढावा दे रहे है. उमर चाहे १६ करे या १४ क्या फ़र्क पडता है. इस तरह के अपराधों को छूट देने का काम हमारी न्याय व्यवस्था और कार्यपालिका कर रही है. जहाँ पर इस तरह के अपराधों के लिये जल्द न्याय और कडी सजा का प्रावधान होना चाहियें उसकी बजाय सेक्स की उमर कम करके शर्म और लिहाज दोनो को हमारी आने वाली पीढी को सौपने की तैयारी कर रही है हमारी केन्द्र सरकार. ये भी हम नजरंदाज कैसे कर सकते है की सरकार का नजरिया धीरे धीरे इटली , अमेरिका, और अन्य विदेशी संस्कृति वाले पाश्चात देशों की संस्कृति के हवाले हो गया है. जिसमे कानून १३ साल के बाद ओपेन सेक्स की भी छूट देदेगी. और इसमे साथ देने वाले सभी दल साथ इसलिये देगें ताकि वोट और पद लोलुपता की माया से सब वशी भूत हो चुके है. तब तो फ़िर विवाह जैसे बंधनों की भी आवश्यकता महसूस नहीं होगी इस समाज में. और सरे आम लीव इन रेलेशनशिप का कान्सेप्ट आजाएगा. और यही तो सरकार भी चाहती है. मेरे यह समझ मे नहीं आरहा है कि बलात्कारियों को सजा सम्बंधित कानून बनाने की बजाय ,, आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों ,, पडोसी देशो के साथ सम्बंधों की समीक्षा करने के बजाय बेबुनियादी मुद्दों मे अपना सिर खपा रही है यह व्यवस्था और और इसको सम्हालने वाली सरकार.
वैसे ज्यादातर नेता कौन से दूध के धुले हुये है. ये सब आसमान से गिरने के बाद खजूर मे लटके हुये खुश हो लेते है. दर असर यह पूरी व्यवस्था ही आज भी फ़र्जी मुद्दों पर टिकी हुयी है ना किसी को गरीबी की फ़िक्र है ना बेरोजगारी की. ना किसानो की आत्महत्याओ का भय और ना आतंकी हमलों की समीक्षा करने की फ़ुरसत. इस देश का सबसे बडा सच यह है कि आज हमारे जन प्रतिनिधियों में इतन दम है ही नहीं की वो बुनियादी मुद्दे और विकास के मुद्दो को उठा सकें वो इसकी आवश्यकता है समझते ही नहीं है. मुझे तो लगता है की जब फ़र्जी मुद्दो से ये सब देश चला रहे है और काम चल रहा है तो फ़िर कौन मुसीबत मे पडे, है...ना,, सब अपनी धुन रमाये है और देश को बेबुनियादी मुद्दों के पीछे पीछे व्यवस्था को फ़िराकर खुश हो रहे है. यह भी सच है कि इस तरह के मुद्दे यदि अरब देशों मे उठा होता तो अरब सीरत के मुताबिक मुद्दे उठाने वालों के सर कलम कर दिये जाते, और उनकी उमर जरूर खत्म हो जाती .

बेबुनियादी मुद्दों का पीछा करती व्यवस्था

बेबुनियादी मुद्दों का पीछा करती व्यवस्था
आज के समय मे ना जाने इस व्यवस्था को क्या हो गया है कि सब बेबुनियादी मुद्दों के पीछे ही ये भाग रही है. उन मुद्दों मे वो सारे विषय आते है जिनका विकास से कोई ताल्लुकात नहीं है. पहले के समय में यह काम कुछ साम्प्रदायिक संगठन किया करतेथे . पर आज के समय पर यह कार्य व्यवस्था और सरकार कर रही है. आजादी के पहले से यह सिलसिला चला आ रहा है कि आम जनता को कभी एमरजेंसी के नाम से. कभी जातिगत मुद्दों के नाम से , कभी धर्म के नाम से कभी जाति और वोट के नाम से बरगलाया जाता रहा है. जब भी आतंकवाद का मुद्दा भारत के सामने आया ,दिल्ली मे बैठी कोई भी सरकार हो अपना वोट बैंक सम्हालने के लिये हमेशा दोगला चेहरा दिखाया है.इसी समय देखिये. अवैध बाग्लादेशियों की घुसपैठ ,, अफ़जल गुरू की फ़ाँसी के पूर्व और पश्चात का घटनाक्रम कहीं ना कहीं जनता को झगझोडने वाला रहा है. फ़िर आया पाकिस्तानी हुक्मरानों का भारत दौरा और उसके बाद का आतंकी हमला. और अब सेक्स संबंध के उमर को लेकर बवाल और तमाशा. मेरे यह नहीं समझ मे आता है सरकार जितने भी काम करती है क्या उससे व्यव्स्था सुधरी है. जी नहीं सिर्फ़ व्यवस्था में टूटन उत्पन्न हुयी .पूरी व्यवस्था ही इस तरह से फ़र्जी मुद्दों में लोगों ओ पंजे मे लेने मे लगी हुयी है .सच यह है इस पूरे गेम मे सह प्रकार से सहयोग करने वाले सरकारी और गैर सरकारी तंत्र शामिल है जो व्यवस्था को गर्त मे लेजाने के लिये जुडे हुये है. पहले प्रधान मंत्री जी को लगता था की परिस्थितियाँ देश के विकास के लिये अनुकूल थी. दामिनी रेप केस .... उसके बाद हो रहे लगातार इस तरह के अपराधों की बढोत्तरी के चलते अब उम्र कम करके इस तरह के अपराधों में लगाम कसना चाहतें है. जो सरासर गलत होगा और इस तरह से भारतीय संस्कृति के विरोधी रवैये के धनी होते जा रहे है. वो और उनकी सरकार शायद यह नहीं जानती है कि इस तरह के अपराध उमर पर जितने आधारित होते है उससे कहीं ज्यादा हमारी मानसिकता की विकृति भाव से होती है. और उमर कम करके सरकार और व्यवस्था इस प्रकार के मानसिक विकृतिपूर्ण कार्य को बढावा दे रहे है. उमर चाहे १६ करे या १४ क्या फ़र्क पडता है. इस तरह के अपराधों को छूट देने का काम हमारी न्याय व्यवस्था और कार्यपालिका कर रही है. जहाँ पर इस तरह के अपराधों के लिये जल्द न्याय और कडी सजा का प्रावधान होना चाहियें उसकी बजाय सेक्स की उमर कम करके शर्म और लिहाज दोनो को हमारी आने वाली पीढी को सौपने की तैयारी कर रही है हमारी केन्द्र सरकार. ये भी हम नजरंदाज कैसे कर सकते है की सरकार का नजरिया धीरे धीरे इटली , अमेरिका, और अन्य विदेशी संस्कृति वाले पाश्चात देशों की संस्कृति के हवाले हो गया है. जिसमे कानून १३ साल के बाद ओपेन सेक्स की भी छूट देदेगी. और इसमे साथ देने वाले सभी दल साथ इसलिये देगें ताकि वोट और पद लोलुपता की माया से सब वशी भूत हो चुके है. तब तो फ़िर विवाह जैसे बंधनों की भी आवश्यकता महसूस नहीं होगी इस समाज में. और सरे आम लीव इन रेलेशनशिप का कान्सेप्ट आजाएगा. और यही तो सरकार भी चाहती है. मेरे यह समझ मे नहीं आरहा है कि बलात्कारियों को सजा सम्बंधित कानून बनाने की बजाय ,, आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों ,, पडोसी देशो के साथ सम्बंधों की समीक्षा करने के बजाय बेबुनियादी मुद्दों मे अपना सिर खपा रही है यह व्यवस्था और और इसको सम्हालने वाली सरकार.
वैसे ज्यादातर नेता कौन से दूध के धुले हुये है. ये सब आसमान से गिरने के बाद खजूर मे लटके हुये खुश हो लेते है. दर असर यह पूरी व्यवस्था ही आज भी फ़र्जी मुद्दों पर टिकी हुयी है ना किसी को गरीबी की फ़िक्र है ना बेरोजगारी की. ना किसानो की आत्महत्याओ का भय और ना आतंकी हमलों की समीक्षा करने की फ़ुरसत. इस देश का सबसे बडा सच यह है कि आज हमारे जन प्रतिनिधियों में इतन दम है ही नहीं की वो बुनियादी मुद्दे और विकास के मुद्दो को उठा सकें वो इसकी आवश्यकता है समझते ही नहीं है. मुझे तो लगता है की जब फ़र्जी मुद्दो से ये सब देश चला रहे है और काम चल रहा है तो फ़िर कौन मुसीबत मे पडे, है...ना,, सब अपनी धुन रमाये है और देश को बेबुनियादी मुद्दों के पीछे पीछे व्यवस्था को फ़िराकर खुश हो रहे है. यह भी सच है कि इस तरह के मुद्दे यदि अरब देशों मे उठा होता तो अरब सीरत के मुताबिक मुद्दे उठाने वालों के सर कलम कर दिये जाते, और उनकी उमर जरूर खत्म हो जाती .

गुरुवार, 7 मार्च 2013

पब्लिक की जेब मे डाँका डालते पब्लिक स्कूल


पब्लिक की जेब मे डाँका डालते पब्लिक स्कूल
कान्वेंट और पब्लिक स्कूल की आँधी से आज अपना ही नहीं बल्कि देश के शत प्रतिशत शहर चपेट मे है. और इसका नुकसान पैरेंट्स की जेब को भोगना पडता है. यही इस तरह के स्कूल्स  की सबसे बडी खासियत है. नाम बडे और दर्शन छोटे वाली स्थिति होती है ऐसे स्कूल्स की. देखने के लिये अच्छा खासा इन्फ़्रास्ट्रेक्चर होता है. और इस तरह के कारखाने सिर्फ़ बच्चों के भविष्य को देखने का ख्याल बस ही नहीं करते है बल्कि नोट छापने के सबसे बडे अड्डे बन चुके है.पब्लिक स्कूल और कान्वेंट स्कूल का मूल विचार डे बोर्डिंग सिस्टम पे बनाया गया था. विकसित देशो से आया यह विचार जब भारत के बडे महा नगरों मे आया तो बडे तबके के लोगो को बहुत फ़ायदा हुआ. उसकी वजह यह थी की दम्पति नौकरी पेशे से जुडे होने की वजह से दिनभर  के लिये बच्चों के स्कूल मे छोड सकते थे. और वापिसी  मे लेकर आने मे उन्हे भी सुविधा होती थी.
 पर समय बदलने के साथ सब बदल गया. ये पब्लिक स्कूल का रूप रंग और ढंग भी बदल गया. जैसे शिक्षा का व्यावसायीकरण हुआ  इन स्कूल्स का आचरण भी पूरी तरह से व्यावसायिक हो गया. अब बच्चों का सर्वांगींण विकास का लक्ष्य सिर्फ़ पब्लिक को दिखाने के लिये होता है और पीछे से मैनेजमेंट के पैरेंट्स की जेब खाली करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिये नये नये प्लान बना कर स्कूल मे उपयोग किये जाते है.आज के समय मे पब्लिक प्रेम की बजाय इन स्कूल्स का पैसा प्रेम ज्यादा दिखने लगा है. ये बच्चो से फ़ीस के अलावा अनेकानेक प्रकार के अन्य रास्तों से डोनेशन और रकम पूरे साल उगाही करने की कोशिशों मे सफ़ल रहते. नयी शिक्षा नीति के तहत जिस तरह से समान शिक्षा के अधिकार को तवज्जो दी गयी वह यहां पर अंतिम सांसे गिनता नजर आता है एडमीशन की स्थिति यह है कि अधिक्तर काम लाटरी सिस्टम के आधीन है अब लाटरी ही निर्णय लेती है की किसका प्रवेश होगा और कौन पैरेंट्स अपने बच्चे के साथ गेट के बाहर का रास्ता देखेगा. साल भर जिस स्कूल डेवलेपमेंट फ़ीस की वसूली की जाती है वह कितना स्कूल के विकास मे काम आती है इसका कोई हिसाब नहीं होता है और ना ही किसी को ये अधिकार होता है कि यह मैनेजमेंट से पूँछ सके.
   इस तरह के स्कूल मे बच्चों को रिफ़्रेंस बुक्स के नाम से सरासर उल्लू बनाया जाता है. इस बहाने सत्र के पहले ही उनके पास मुख्य किताबो के प्रश्नो के उत्तर होते है और विशय के शिक्षकों का काम पूरे साल आसान होजाता है इससे बच्चे रट्टू के साथ साथ कम से कम पढ कर अधिक से अधिक प्रतिशत प्राप्त करने के आदी हो जाते है. १९८६ मे लागू हुयी शिक्षा नीति और  शिक्षा के अधिकार नियम २००९ की धज्जियाँ उडाते ये पब्लिक स्कूल पब्लिक ही नही वरन सरकार को भी अच्छा खासा चूना लगा रहे है. इस प्रकार के पढने वाले स्कूल मे एक कक्षा के कई सेक्शन होते है और अलग अलग सेक्शन  मे अलग अलग ग्रेड के बच्चे रखे जाते है जिससे यदि काम्प्टीशन बढता है तो दूसरी ओर कुंठा भी पनपती है. इन स्कूल्स मे फ़ीस के नाम से बवंडर पैदा करना. बिना किसी पूर्व सूचना के फ़ीस मे मनमानी बढोत्तरी करना इनका धंधा हो गया है. म.प्र सरकार ने लगभग ७२००० सीट्स प्राइवेट स्कूल्स मे वंचितो के लिये सुरक्षित रखा है पर इसका कितना लाभ इस बच्चों को  मिल रहा है यह कोई नहीं जानता है. शो पीस बन चुके इन स्कूल्स मे बहुत से काम धंधे सिर्फ़ कमीशन के लिये किये जाते है, जैसे ड्रेसेस, किताबें और कापियाँ, स्टेशनरी आदि मे अच्छा खासा मुनाफ़ा स्कूल्स और अच्छा खासा नुकसान पैरेंट्स को होता है. हर एक दो सालो मे इन सब का चेंज हो जाना और नये नये नियम कानून कहीं ना कहीं सभी परिवारों को भारी पडते नजर आते है. कई पब्लिक स्कूल्स का ये हाल है कि एडमीशन के समय ही एक बांड भरवा लिया जाता हैजिसमे यह स्पष्ट कर दिया जाता है कि स्कूल मैनेजमॆंट के निर्णयों के खिलाफ़ कोई पैरेंट्स नहीं जा सकता है यदि ऐसा होता है तो उसी दिन बिना किसी सूचना के उसके बच्चे का एडमीशन निरस्त कर दिया जायेगा और इसके खिलाफ़ कोई किसी तरह की आपत्ति नहीं करेगा. आज के समय मे बडे बडे उद्योगपति और राजनैतिक नेता और जनप्रतिनिधि मनी ट्रांसफ़ार्मेशन के लिये और अपनी काली कमाई को शोसल सर्विस के लबादे मे फ़िट करने के लिये पब्लिक स्कूल खोलने की रेस  मे सबसे आंगे है. और इसी वजह से इन स्कूल्स की बंटाधारी की प्रक्रिया उतनी ही तेज हो गयी है.आज जरूरत है कि पब्लिक स्कूल के लिये पब्लिक के जागरुक होने की. तभी कुछ हो सकता है वर्ना पब्लिक अपनी जेब मे डाँका डलवाने के लिये तैयार भी हो जाये, क्योकी सरकार और समाज सब कहीं ना कहीं मजबूरी मे चूडियां पहने बैठे हुये है.

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

ऐ कुंभ तेरा आभार


ऐ कुंभ तेरा आभार
उत्तर प्रदेश सरकार का एक ऐसा नगर जिसे प्रयाग के नाम से सब लोग जानते है. कहते है हर बारह वर्षो मे कुम्भ का धार्मिक आयोजन जरूर होता है इस भारत वर्ष मे और वह धरा कई वर्षो तक के लिये पावन हो जाती है. इस साल प्रयाग जरूर तर गया होगा इस धार्मिक आयोजन के पूर्ण होने पर.कभी कभी मै यह सोचता हूं की यदि इस साल कुंभ नहीं होता तो इस देश के भविष्य का क्या होता,इस पर्व ने कई चीजों, कई व्यव्स्थाओं की कलई खोल दी है और कई राजनैतिक मुद्दो मे फ़िर से जान फ़ूक दी है
 क्या संयोग बना है एक तो धार्मिक कुम्भ, दूसरा चुनावी मौसम का आगमन, तीसरा हादसों से बेफ़िक्र सरकार का बडबोलापन
सब ऐसे जाल का निर्माण किया है वक्त ने की धर्म राजनीति और सत्ता सब एक साथ संगम डुबकी लगाती मुझे नजर आई. और फ़िर शुरू हुया मीडिया मे इसी बहाने ब्रेकिंग न्यूज का केंद्र बनाने की होड जिसको देखो वही पत्रकारों के सामने और कैमरा मैन के सामने अपनी फ़ोटो खिंचवा कर लोगो को दिखाने के लिये जूझे मरे दिखायी पड रहे थे.
 इस पूरे पर्व मे मैने एक बात जाना की कुम्भ मे आस्था सभी वर्गो के हिन्दुओं की थी और अटूट थी. पर उ.प्र. सरकार का इंतजाम सभी के लिये नहीं था. तभी तो रेल्वे दुर्घटना का एक बचकाना हादसा हमारी नजरो के सामने से आज भी भुलाये नहीं भूलता है. इस हादसे मे भले ही उ.प्र. सरकार अपना पल्ला झाड कर पूरा दोष रेल्वे जोन के सिर मढ दे. मेरी नजरोंमें दोषी दोनो है. एक राज्य की जिम्मेवारी है की वो पुराने आंकडों से और अपने अनुभवो से ऐसी तैयारियां करे की आने वाले भक्त जनों और आम नागरिकों को कोई परेशानी ना होती. रेल मंत्रालय और इलाहावाद रेलवे के सभी आला अधिकारियों को चाहिये था की उनकी हर व्यवस्था युद्ध स्तर की होती.लेकिन सिर्फ़ अफ़सोस दिखाने के अलावा दोनो के पास कोई साधन नहीं दिखा इस पर्व के दौरान. अगला एक और अनुभव जो इस कुंभ के दौरान देखने को मिला वह यह था कि सारे प्रशासनिक अधिकारी. प्रभाव वाले नेता नपाडियों के साथ साथ सारे मंत्री संत्री तंत्री का जब काफ़िला निकलता देखा गया तो ऐसा लगा की सरकारी सारी व्यवस्थाओ का केन्द्र बिंदु यही है. फ़िर सारे नियमों को शिथिल करते हुये सारे नियम कानूनो को ताक मे रख कर स्नान कराया गया. और स्नान को शाही बनाने के लिये कोई कसर नहीं छोडी गयी. इनके सामने तो सारे बाबा , साधू संतों के अखाडे फ़ेल नजर आये.और संतो साधुओं को तो अपने दर्शन देने के लिये अपने को सुरक्षा व्यवस्थाओ से वैसे भी दूर रहना चाहिये था उन्हे किस बात का डर था. ताकि अधिक से अधिक  लोग उनके दर्शन करके अपने जीवन को धन्य बना सके. इसी अगला मुदा भी कुछ ऐसा ही नजर आया.
अगला मुद्दा जो महसूस हुआ वह यह था की सुरक्षा व्यवस्था का मुद्दा , जिसको देखो कमांडो और सुरक्षा गार्डो की टीम टाम व्यव्स्था के साथ सभी उच्च वर्गो के प्रतिनिधि, जनता के प्रतिनिधि, और धर्म के प्रतिनिधि नजर आये. अब सवाल यह उठता है की इतनी सुरक्षा व्यवस्था वो भी व्यक्तिगत रूप से प्रयाग ले जाकर दिखाने का दिखावा किस काम का था. क्या अब जन प्रतिनिधियों को श्रद्धालुओ से जनता से और भक्त जनो से असुरक्षा महसूस होने लगी है और यही हाल क्या धर्म के प्रतिनिधियो साधुओ और संतो का था. या फ़िर सरकार की व्यवस्थाओ को ठेंगा दिखाने की होड चल रही थी इन सबके बीच. यहं पर आम लोगो के लिये ना सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे. ना सेवा दलो के कर्मचारी थे. और ना ही सरकार के सशक्त नियामक तंत्र थे, सारा माजरा सारी व्यवस्थाये. सिर्फ़ और सिर्फ़ धन वैभव वाले राज तंत्र के लोगो प्रतिनिधियो के लिये ,जिनसे कोइ स्वार्थ सिद्ध हो सकता था, की गयी थी. आम श्रद्धालू सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्शन ,डुबकियां, अपने गुरू महराजॊ के आशीर्वाद , अव्यवस्थाओ, कडकती ठंड, रेल और यातायात की भीडतंत्र. के मूक दर्शक के रूप मे इस पर्व को मनाया और गाहे बगाहे इस जन्म को पावन और पवित्र करके संतुष्ट हो गया. इसी बहाने पूरा का पूरा कुंभ पर्व केंद्रित नजर आया कई नामी गिरामी बाबाओं संतो के अखाडो के शाही स्नान के बहाने उनके धन वैभव के प्रदर्शन पे, राजनैतिक प्रतिनिधियों के आरोपो और प्रत्यारोपो के बीच धर्म संसद के अवसर पर मीडिया के द्वारा बनायी गयी ब्रेकिग न्यूजेज पे, और पल्ला झाडती और जिम्मेदारियो से बचाव करती उ.प्र, सरकार और अन्य व्यवस्थाओं की टीम के बहाने बाजी और बयानबाजी पे. और हां करोडो आम श्रद्धालुओ की तार तार होती आस्थाओ.सरकारी व्यवस्थाओ पर उठते और  टूटते यकीन पे. इस तरह इस वर्ष के कुम्भ को बहुत कुछ जाना पहचाना और बहुत कुछ अनजाना घटना क्रम दिखाने के लिये आभार...कोटिशः आभार.

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

मध्यान भोजन निगलते जहरीले अजगर.



सरकारी स्कूल कई मायनों मे हमेशा बदनाम रहे है इसमे से दो प्रमुख वजहों मे पहली ,खराब परीक्षा परिणाम का रोना और दूसरा मध्यान भोजन मे अनियमितता का रोना. पहली अव्यवस्था का सिर्फ़ मई से जून तक ही रोना रहता है. परन्तु मध्यान भोजन का केश तो हर रोज ही समाचार पत्रों की शुर्खियों मे बना रहता है.और यही इसकी नियति है. अब क्या किया जाये. जिस घटिया भोजन को ये नन्हे मुन्हे बच्चे पचा नही पाते वह भोजन किस तरह इस स्व सहायता समूहों की और शिक्षा विभाग की पेट की आग बुझाता है. यह समझ के परे है. क्या इन्हे अपच नहीं होता  है. क्या इनको हाजमोला की गोलियों की आवश्यकता नहीं पडती है. ना जाने किस मिट्टी से बने है ये जहरीले अजगर. मध्यान भोजन का विचार मेरी समझ के परे है. इसका क्या योगदान है बच्चों को स्कूल  मे लाने हेतु आकर्शित करने मे. बच्चे खाना खाने की लालच मे स्कूल पढने आयेगे.और पूरे दिन भर पढ कर जायेगे. ऐसा सम्भव नहीं है. इस तरह के उपाय सिर्फ़ गरीबी रेखा के नीचे बसर कर रहे लोगो के लिये कारगर हो सकते है परन्तु उससे ऊपर यह अप्रभावी हो जाते है. और जो बच्चे इसका लाभ लेने आते है उनमे से शतप्रतिशत मे थोडा कम सिर्फ़ मध्यान समय मे भोजन ग्रहण करने ही विद्यालय आते है. फ़िर अपने घरवालों के साथ काम मे वापिस चले जाते है.यही तो रोना है इस प्रणाली का जिसके चलते. पढाई लिखाई के नाम पर कितने करोडों का बजट पानी मे बहा दिया जाता है और परिणाम सिर्र शून्य ही आता है. जिस कक्षा तक मध्यान भोजन की योजना लागू है वहां परिणाम बनाया जाता है ताकि किसी की वेतन इंक्रीमेंट ना रुके.ये भी सच है कि इस तरह की योजनाओं का परिणाम यह होता है कि बच्चों के कंधों मे बैग की बजाय सिर्फ़ हाथों मे थाली गिलास और कटोरी होती है. जब मै सोहावल ले शिक्षा महाविद्यालय मे अपनी सेवायें दे रहा था तब मैने महसूस किया कि महाविद्यालय के पीछे बने एक शासकीय प्राथमिक विद्यालय की स्थिति यही थी वहां बच्चे सिर्फ़ और सिर्फ़ भोजन ग्रहण करने ही आते थे.और शिक्षिकाय़ॆं भी सिर्फ़ भोजन वितरण करवाने ही आती थी. खाना बनाने वाली सिर्फ़ ११ बजे से ३बजे तक अपनी सेवाये दिया करती थी. लगभग ये हाल सभी इस तरह के विद्यालयों का है. और इसमे बदलाव की गुंजायिस बिल्कुल भी नहीं है.
   मध्यान भोजन ने सिर्फ़ छात्र संख्या मे बढोत्तरी की है बस ना परीक्षा परिणामो मे बढोत्तरी हुयी और ना ही पढाई के स्तर मे ये तो सिर्फ़ गर्त मे ही हर वर्ष गये  है. और सरकारी योजनाये सिर्फ़ मुंह बनाकर सभी पालकों को. शिक्षा को और इस व्यव्स्था को सरे आम उल्लू बनाये जा रही है. इस योजना का सुपरिणाम जो भी रहा हो, जितना बेहतर रहा हो, परन्तु दुष्परिणाम यह रहा की बच्चो को आहार की पौष्टिकता से दूर कर दिया गया, स्कूल मे फ़ालतू के अन्य समूहों का दखल बढ गया. शिक्षकों को वैसे भी पढाने की फ़ुरसत नहीं थी अब तो एक और बहाना मिल गया. अब बच्चों को और आजाद कर दिया गया कि जाओ और खाओ पियो ऐश करो. ऐसी स्थिति मे जब बच्चे की बुनियाद ही खाने पीने और खेलने की नींव के ऊपर बनेगी तो यह तो तय है की बडी कक्षाओं मे वो शिर्फ़ रट्टू तोता की तरह हो जायेगे. यह भी सच है कि मध्यान भोजन की योजना सिर्फ़ इसलिये बनायी गयी की यदि बच्चों को स्कूल मे ही पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जायेगा तो सभी बच्चे एक समान रूप से भोजन ग्रहण करेगे और समय की भी बचत होगी. परन्तु यह योजना धरी की धरी रह गयी. अब तो भोजन मे कीडे मकोडे और अन्य जीव जन्तु मिलने लगे है. दाल से दाल और सब्जी से सब्जी गायब होने लगी है उसी तरह इस व्यवस्था के अजगरो के अन्दर का ईमान गायब होने लगा है. ये सब कभी नहीं सोचते है कि सरकार जिस बात की तन्ख्वाह इन सबको दे रही है कम से कम उस काम को तो सही ढंग से करें उसमे भी कोताही बरतने का जो जुनून इन सब तथाकथित आला अफ़सरों और स्वसहायता समूहों के द्वारा मध्यान भोजन तक को अपने जहर से जहरीला बनाने का काम बखूबी अंजाम तक पहुचाया जा रहा है वह योजनाओं मे झाडू लगाने और पूरे समाज मे आने वाली पीढी को बेवकूफ़ बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है. इस योजना मे जो भी बजट खर्च करने के  लिये आता है वो सिर्फ़ कुछ प्रतिशत ही खर्च होता है. बाकी तो सब इस अजगरों की पेट की आग बुझाने के लिये भी कम पड जाता है. राशि आवंटन से लेकर अनाज आवंटन तक, फ़िर अनाज को कच्चे से पकाने तक मे सिर्फ़ और सिर्फ़ निगलने की प्रक्रिया होती है और इसी तरह ये शतरंज का खेल शह और मात के साथ हर साल चलता रहता है. राजधानी से स्कूल तक यह योजना भी अपना रूप स्वरूप बदल लेती है.या ये कहूं कि सिर्फ़ और सिर्फ़ मुखौटे लगा लेती है, तो गलत नहीं होगा. इन सब परिस्थितियों के चलते यदि सरकार यही मध्यान भोजन का अनाज सिर्फ़ उन बच्चों को दे जो पूरे दिन उपस्थित होते है और सीधे अनाज ही मुहैया कराये तो इस तरह के कारनामों मे कुछ तो लगाम लगेगी. नही तो वह दिन दूर नही होगा जब डसने वाले सांप जो आज भोजन निगल रहे है वो आने वाले कल मे बच्चों को ही निगल जायेगे.

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

कौन जंगलों का माई-बाप, जनता या आप.


 कौन जंगलों का माई-बाप, जनता या आप.
सतना के आसपास तराई से लेकर हर दिशा मे जंगलों का इफ़रात समूह है. और इस पूरी संपदा को फ़िलहाल वन विभाग और वन मंत्रालय के आधीन सुरक्षित रखने का प्रावधान है. आसपास विभिन्न प्रकार के इमारती लकडियों के हरेभरे पेड पौधे मौजूद है.सरकार के द्वारा हरियाली महोत्सव और वन महोत्सव जैसे कई ऐसे कार्यक्रम है जिनके सहारे बहुत सा धन मिट्टी मे मिला दिया जाता है. और आम जनता को यह खेल समझ  मे नहीं आता है. सरकार के पास बहुत से ऐसे रास्ते है जिनके सहारे वह यह प्रयास करती है कि हर जिला हरा भरा बने उसका रखरखाव हो. पर.ऐसा होता नही है फ़ंड पास होता है और प्राप्त जानकारी के अनुसार उसका वितरण भी कर दिया जाता है. पौधे भी रोप दिये जाते है. रखरखाव के नाम पे सिर्फ़ खानापूर्ति होती है और सारा का सारा पैसा हजम कर लिया जाता है
. सर्वोच्च न्यायालय से लेकर हर स्तर पर वन कटाई पर रोक लगाने के लिये कई नियम और कानून बनते है और राम भरोसे इसका पालन भी होता है. वन माफ़िया के द्वारा लगभग लाखो से करोडों रुपये का वन उपज और बहुमूल्य इमारती लकडियां वन विभाग की ढिलाई और लचर व्यव्स्था के चलते हजम कर लिया जाता है और तथाकथित ईमानदारी  का लबादा ओढे अधिकारियों के खाते मे उसका कुछ प्रतिशत पहुंचा दिया जाता है. वन अपराध की श्रेणी मे आने वाले इस तरह के अपराधों की ना कोई सुनवाई होती है और ना कोई सजा मुर्करर होती है. यह हाल सतना ही नहीं बल्कि पन्ना शहर के अधिकारियों और उनके विभाग का भी है. कहने के लिये जब कभी जोरदार धडपकड होती है तो विभाग के द्वारा जांच कमेटी बिठा दी जाती है. और कुछ दिनों के बाद वो फ़ाइल कूडेदान मे दिखाई पडती है. यहां पर तो जंगली जानवरॊं को भी नहीं बख्सा जाता है तस्करी होने से कोई नही रोक पाता क्योंकि.  विभीषण के चलते  लंका कैसे सुरक्षित है,  ऐसी स्वार्थपरक नीतियों के चलते बंजर जमीन बढती जारही है और वन का परिक्षेत्र उतना ही कम होता जारहा है. रेंजर से लेकर सारे सुरक्षा अधिकारी खबर मिलने के बाद भी टस से मस नहीं होते है. कितना अफ़सोस होता है यह देख कर की जिस बात की शपथ और कसम सारे कर्मचारी अपनी ट्रेनिंग पूरी होने पे खाते है पोस्ट पाते ही उसे पूरी तरह से भुला बैठते है. कुछ ऐसी वन चौकियां देखी गयी है  जिसमे यदि कोई यदि यह शिकायत करने जाता है कि रात मे फ़लाने इलाके मे वन कटाई हो रही है तब यह मान के चलो की रात भर उसे तो हवालात की हवा खानी ही पडेगी भले ही पूरा का पूरा जंगल साफ़ हो जाये.
   ये सब शायद इस बात से अनजान होते है कि इस तरह की मक्कारी से समाज, पर्यावरण और आस पास का कितना नुकसान हो रहा है. लेकिन इस तरह के वन अपराधियों को इससे कोइ फ़र्क नहीं पडता कि पर्यावरण या समाज का क्या होगा उन्हे तो सिर्फ़ अपनी जेबें भरने और सरकारी माल हजम करने से मतलब है. चाहे उसकी कीमत पूरे शहर और राज्य को चुकाना पडे. इसके चलते पूरे वातावरण मे उच्च तापमान. मौसम की अनियमितता, भारी बारिस या सूखा जैसी स्थितियां पैदा हो जाती है. और सभी इसका कुप्रभाव भोगते है. मिट्टी की उत्पादन शक्ति और कटाव भी प्रभावित होती है जिसका प्रभाव किसी न किसी तरह खेती किसानी मे पडता है. और वन संपदा एक बार नष्ट हो जाने पर कई साल उसे दोबारा बनाने मे लग जाते है. जिस जंगली जानवरों की वन विभाग की देख रेख मे तस्करी को अन्जाम दिया जाता है उसकी वापसी तो संभव होता नहीं है पर इस तरह से उनकी प्रजाति का स्तर जरूर प्रभावित होता है. पर इस सबसे वन विभाग के उन भ्रष्ट अफ़सरों को क्या जिनके घर मे कुछ दिनों के अंदर ही चार पहिया गाडियां खडी हो जाती है. जिनके बैंक बैलेंस उनकी आमदनी से कई गुना अधिक मात्र कुछ विनिमयों से हो जाता है. उनकी स्वार्थ की रोटियां पूरी तरह से गैर कानूनी रूप से विकास करती है.
  पर सवाल यह है की बडी मेहनत से तैयार किये जाने वाले इन जंगलों का माई बाप कौन है . जब रक्षक ही भक्षकों के साथ मिल कर अपनी जागीर लुटाने के लिये तैयार बैठा हो. तो और किसी को क्या इल्जाम दिया जाये. बहुत सी संक्षण संस्थाओं की मानीटरिंग तेज करने की जरूरत है. नियमों को और ज्यादा कडे और  प्रायोगिक बनाने की जरूरत है वर्ना.. वो दिन दूर नही कि जलज अभियान और पंचज अभियान सिर्फ़ किताबॊं मे पढेंगे और वन और वन्य प्राणियों के बारे मे सिर्फ़ दादी और नानी की कहानियों मे जिक्र हुआ करेगा, क्योंकी आज इनका माई बाप कोई बचा ही नहीं है और जिसे जिम्मेवारी सौपी गयी है वो सरकार की योजनाऒं को ठेंगा दिखा कर सरकार को ही बस नहीं सभी को बेवकूफ़ बना रहा है. और सब खीस निपोर कर ड्रामा के सामने बैठे हुये दर्शक और श्रोता के रूप मे अपना काम कर रहे है. लेकिन कोई इस बात को समझने के लिये तैयार है ही नहीं की उनकी तालियां अपने ही पर्यावरण के जनाजे मे बज रहीं है.











शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

मंत्री आये , विकास लाये.


कब तक सहें:- मंत्रीआये , विकास लाये.

इस बार मेरे शहर का विकास काफ़ी तेजी से हो रहा है. ना जाने क्यो. शायद फ़िर किसी केंद्रीय मंत्री या राज्य के मुख्य मंत्री जी के आने का अवसर नजदीक आ रहा है. तभी प्रशासनिक अमले को पर लग गये है. दिन रात युद्ध स्तर से काम चल रहा है. सब धुआंधार स्पीड से भाग रहे है. मुझे तो इस बात की खुशी है कि चलो किसी बहाने ही सही इस बूढे शहर को फ़िर से जवानी का जामा पहनाया जारहा है. उसके लिये ठेकेदार, इंजीनियर और अन्य कमाऊखोर अफ़सर चाहे जितना माल हजम करे . क्या फ़र्क पडता है. सब उनकी आदतों मे शुमार है. और माल जितना सरकारी है उतना ही जनता का है. कौन सा उनके बाप का है. और फ़्री का माल खाने और फ़्री की दारू पीने से किसी को कभी परहेज नहीं होता है दोस्तो.
  चौराहों का सौंदर्यीकरण, सडकों को चमाचम करना, डिवाइडर की मरम्मत, और जल्दी जल्दी पौधों का प्लान्टेशन... और भी बहुत कुछ जैसे लाइट्स को सही करना, मेन हाई वे को अपडेट करना बहुत से काम बहुत ही तेजी से लगातार इस शहर मे दिख रहे है. नगर पालिका निगम के नीचे से ऊपर तक के आलाअधिकारियों के पैरो मे तो जैसे पहिये लग गये हो. इतनी तेजी से ट्रैफ़िक को डिस्टर्ब करके ऐसे सरकारी काम होते तो मैने बचपन से आज तक और आज से पचपन तक नहीं देख पाउंगा शायद. काश इसी स्पीड से न्यायालय यदि न्याय करने लगे. और पुलिस गुनहगारों को पकडने लगे तो कसम से कितना अच्छा हो. लेकिन फ़िर यह सोच कर रह जाता हूं और अपने मन को समझा लेता हूं कि शायद वहां किसी मंत्री या मुख्यमंत्री ,या अन्य उच्चस्तरीय मंत्री का कोई डर नही होता होगा. या फ़िर इनको कोई भजता नहीं होगा.
  विकास और साफ़सफ़ाई का वैसे भी राजनीति से बहुत गहरा नाता तथाकथित रूप से रहा है ऐसा मैने राजनीतिशास्त्र की किताब मे पढा था. हां पर देखने को सिर्फ़ चुनाव के पहले या कुछ महीने बाद तक ही मिलता है. यही तो वोट बैंक का बही खाता है जो आम जनता के समझ के परे है.पर गाहे बगाहे यदि ऐसे ही विकास और साफ़ सफ़ाई का अभियान चलता रहताहै तो लगता है कि कुम्भ्कर्ण कभी कभी जाग तो जाता है हाल चाल लेने के लिये. वरना ना कभी केशेस की सफ़ाई होती है. ना न्याय जगत मे साफ़ सफ़ाई होती है. ना भ्रष्टाचार की साफ़ सफ़ाई होती है. पूरा शहर इतने कम सालो मे बूढा दिखने लगा पर सरकार , न प्रशासन , ना अन्य किसी ने जिम्मेदारी निभाई. जिस तरह विकास कार्य  चल रहा है. तो सोचता हूं कि काश  ओवर ब्रिज का काम, बाई पास का काम. और पुराने बाई पास की मरम्मत , हाई वे का फ़ोर लेने का काम इसी स्पीड से काम हो. जो काम हो चुका है उसकी देख रेख हो. पार्कस का रख रखाव जारी ्रहे. ट्रैफ़िक सही सलामत पहुंचे. जाम की स्थिति ना बने. कोई दुर्घटना ना हो. अस्पतालों की स्थिति मे सुधार हो पुस्तकालयों के बुढापे को दूर किया जा सके तो शायद मंत्रियो की आवक भी आमजन के लिये लाभ प्रद होगी. समस्यायें तो बहुत सी होती है. पर क्या कहा जाये. कभी मैने एक शेर लिखा था
 ज़ख्म जब भी उसको दिखाये गये.
खार मरहम की तरह लगाये गये.
ये स्थिति आज भी समाज मे बनी हुयी है. आज भी जब कोई जागरुकता का परिचय देकर समस्याओं के समाधान के लिये शासन के पास, नगर निगम के पास , या न्यायालय मे न्याय के लिये जाता है. तो ये मानिये कि समाधान हो या ना हो न्याय मिले या ना मिले . लेकिन जागरुकता को वो भुला ही बैठता है. जूते और चप्पल घिस जाते है. और समाज सुधार के नाम पे सरकारी बाबू और चपरासी यहां तक की अधिकारी उनके जेब की साफ़ सफ़ाई जरूर कर देते है. जैसे वो अपने घर का काम कराने आया हो. या किसी बडे कर्ज के लिये गोहारी लगा रहा हो. फ़िर तो वो मन ही मन गालियां देकर सिर्फ़ यह मौन निश्चय कर लेता है, कि अपना विकास करो. देश और शहर गया ऐसी की तैसी कराने. उसके लिये चांदी के जूते वाले पावरफ़ुल ये नेता नपाडी है ना. जिनके लिये  सरकारी बाबू और चपरासी यहां तक की अधिकारी अपनी जेबें साफ़ करने के लिये तैयार बैठे रहते है. नहीं तो चांदी के जूते तो है हीं. ऐसी स्थिति मे मुझे तो लगता है. कि  पिछ्ले पैरा मे बताई बीमारियों से निजात पाने के लिये और अपने शहर को मरणासन्न स्थिति से बचाने के लिये या तो चुनाव कराना पडेगा या फ़िर किसी मंत्री -संत्री को सतना बुलाना पडेगा, तभी तो सतना इंदौर और भोपाल की तरह बन पायेगा, भाई अब क्या किया जाये इससे बडे विकास के सपने क्या देखे. अब दिल्ली, जैसे और बडे महानगर बनाने के ख्वाब अपने ५० साल होने के बाद देखना सही रहेगा. क्या है सपने जब टूटते है तो बहुत दुख होता है. चाहे वो अपनी जिंदगी से संबंधित हो या समाज से संबंधित हो. इसी लिये सबसे बढिया किसी बडे मंत्री को बुलाओ  नहीं तो चुनाव कराओ, और विकास कराओ. शहर का मेकब कराओ, और अपने सपने पूरे कराओ. आज कल का यही दस्तूर है. फ़िर खुशियां मनाओ.क्योंकि
खेत पर पानी बरसता है हमारे देश मे.
खेत पानी को तरसता है हमारे देश मे.
यहां पर नेताओं और मंत्रियों को छोड्कर
अब खुशी से कौन हंसता है हमारे देश मे.




गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

समीक्षा: योद्धा सन्यासी विवेकानंद: बसंत पोतदार


समीक्षा: योद्धा सन्यासी विवेकानंद: बसंत पोतदार
स्वामी विवेकानंद: मनुष्य व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व का अजेय योद्धा.
  सन्यासी योद्धा श्री बसन्त पोतदार द्वारा स्वामी विवेकानंद पे आधारित मराठी उपन्यास है. और इसी को आधार मान कर यह अनुवाद  गंगाधर परांजपे ने एक पुस्तकाकार के रूप मे योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद हमारे सामने प्रस्तुत की है. पुस्तक का भावों का केंद्र बिंदु सन्यासी योद्धा नामक मराठी उपन्यास है इस हेतु श्री बसंत पोतदार जी और भाषागत शिल्प के लिये  गंगाधर परांजपे जी की कलम बधाई के पात्र है.पूरा अनुवाद संग्रह २१६ पेजों मे  और पांच खण्डों मे  विभक्त है. अन्त मे प्रकाशित १५ पेजों मे संचयित चारुगात्र विवेकानंद इस अनुवाद उपन्यास का उपसंहार है जिसके बिना पूरे उपन्यास का अनुवाद अधूरा है.
   प्रथम खण्ड परमहंस- एक परिचय है द्वितीय खण्ड अस्सी प्रतिशत भक्त ठग होते है शीर्षक से अनुवादित है.तीसरा खण्ड धर्मसम्मेलन मे प्रवेश नहीं नामक शीर्षक से अनुवादित है. चौथे खण्ड मे यदि तुम्हारी मां का अपमान किया तो नामक शीर्षक से अनुवादित है. और अन्तिम खण्ड मे विदेश यात्रा के पूर्व शीर्षक से अनुवादक ने अपनी बात कही है.
प्रथम खण्ड मे संत रामक्रष्ण परमहंस के जीवन का सम्पूर्ण वर्णन किया है.इस भाग के जरिये गंगाधर जी ने परमहंस जी का नरेन्द्र से मिलन और उनके जीवन मे माता की संज्ञा  मिली माँ काली के चमत्कारों का जिक्र है.इसमे माँ काली से साक्षत्कार , श्री राम की साधना, रामक्रष्ण का विवाह, भैरवी से मुलाकात, तोतापुरी से मुलाकात, गोविन्दराय से मुलाकात,शंभूचरण से मुलाकात का जिक्र है. नरेंद्र से उनके गुरु की लगातार ३ मुलाकातों का जिक्र है. और अंततः परमहंस के जीवन का त्याग १५-१६ अगस्त १८८६ के आस पास की घटनाऒं का वर्णन है.
द्वितीय खण्ड मे भक्तो की मनो दशा को पाठकों के सामने रखा गया है. जिसमे लेखक और अनुवादक ने परमहंस जी के सम्पूर्ण जीवन काल की घटनाओं को एक खण्ड मे रखकर भक्ति और ढकोसला के भेद की तुलनात्मक बातों को पाठकों के सामने रखा गया है.सन १८९३ के पहले की, विवेकानंद के जीवन की क्रमिक घटनाऒं का मार्मिक और रोचक वर्णन किया गया है.इस खण्ड मे स्वामी विवेकानंद के भारत से विदेश जाने और और वहां के पूर्व उनके संघर्ष को दर्शाया गया है. जब वो राजस्थान मे गये तो उन्हे किस तरह विविदिशानंद का नाम प्राप्त हुआ इसका भी वर्णन पाठकों के सामने आता है. राजस्थान के बाद गुजरात कि यात्रा का वर्णन किया गया है. इसी तरह महाराष्ट्र ,पूना, गोवा, कन्याकुमारी, हैदराबाद,और यहा से अमेरिका के लिये प्रस्थान करने के लिये सारी वैचारिक और समाजिक जमीन का जिक्र बखूबी बेबाकी से किया गया है.
  तीसरे खण्ड मे धर्मसभाओं मे स्वामी विवेकानंद का प्रवेश और उनके विचारों का वर्णन किया गया है.यहा पर १८९३ के बाद की स्वामी विवेकानंद के विदेश मे निर्मित हुयी प्रतिष्ठा और वैचारिक जमीन के निर्माण की कहानी है, इसमे अमेरिका मे हुये सन१८९४ की फ़रवरी मे विरोधियों के द्वारा निर्मित विरोधो का तट्स्थ वर्णन है. इस खण्ड मे  इंग्लैड के किये गये स्वामी विवेकानंद के कार्यों का जिक्र है. और अंततः पुनः अमेरिका और इंग्लैड की यात्रा और वहां पर स्वामी विवेकानंद के समाज सुधार और मानवनिर्माण की शिक्षा का प्रचार प्रसार करने का लेखक और अनुवादक ने सीधे सपाट वर्णन किया है.
  चौथे खण्ड मे स्वामी विवेकानंद ने किस तरह फ़्रांस, रोम,अदन, कोलम्बो, और फ़िर कोलकाता तक पहुचे इससे सम्बंधित घटनाओं का वर्णन है. इसी खण्ड मे विवेकानंद के द्वारा रामक्रष्ण परमहंस मिशन की स्थापना के बारे मे विस्त्रित वर्णन है.इसी चरण मे  स्वामी विवेकानंद की भगिनी निवेदिता से मुलाकात और उनके जीवन मे निवेदिता का प्रवेश, उनके मिशन मे योगदान का वर्णन है, रामक्रष्ण मठ मे हुये विवादो अर्थात गुरुबंधुओं से स्वामी विवेकानंद के विवादो का वर्णन है.जो कुछ दिनो के बाद शांत होगया, इसी चरण मे बीमार स्वामी विवेकानंद का विदेश यात्रा के पूरव की घटनाओं का वर्णन है.
 अंततः अंतिम चरण मे.२० जून १८९९ से शुरू हुयी विदेश यात्रा जिसमे भारत से लंदन और फ़िर इस्तंबूल जाने का वर्णन है.यहां पर उनकी मुलाकात का जिक्र है जिसमे उनकी मुलाकात कु, मैक्लाड या जो से हुयी जो उनके विचारों की मुरीद थी. वापस भारत आकर  ट्रस्ट की स्थापना, बंगाल की यात्रा.४ जुलाई १९०२ को उनके स्वर्गवासी होने तक की हर घटना का बारीकी से वर्णन किया गया है.
अन्तिम कुछ पेजों मे परिशिष्ट के रूप मे स्वामी विवेकानंद के विभिन्न रूपों का ,व्यक्तित्व कॆ विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया गया है. जिसमे ब्रह्मचारी, पट्टशिष्य, सिद्धि विरोधी, विज्ञान निष्ठ, दलितों के मसीहा, मांसाहारी होने, हाजिरजवाबी होने, से सम्बंधित विभिन्न घटनाओं का, पत्रो के माध्यम से लोगो के विचारों का संग्रह है. यही स्वामी विवेकानंद के सांगोपांग जीवन की लोगो के द्वारा की समीक्षा है.
 सम्पूर्ण अनुवाद पर यदि बात करें तो यह कहने मे कोई संकोच नहीं है कि पूरी पुस्तक स्वामी विवेकानंद शताब्दी वर्ष मे उनके व्यक्तित्व के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से पाठक मंच मे भेजी गयी है. गंगाधर परांजपे जी ने अपनी अनुवाद्कीय मे खुद स्वीकार किया है कि  भावपक्ष के नजरिये से इस पूरे उपन्यास मे सिर्फ़ बसन्त पोतदार की बाओ का बिना कोइ फ़ेर बदल किये वर्णन किया गया है. इस पुस्तक का उद्देश्य विवेकानंद के बहुआअयामी जीवन के बारे मे और उससे जुडे विभिन्न आयामो को पाठको के सामने उजागर करना है.साथ ही यह बताना है कि अनासक्त होकर कर्म मे सतत संलग्न होने का नाम विवेकानंद है. पूरी पुस्तक का केन्द्रबिंदु परमहंस और विवेकानंद है. विवेकानंद की जीवनचर्या के साथ वैचारिक सोच को धर्म,समाज, सभ्यता, जाति वर्णव्यवस्था, शिक्षा, मानव चरित्र निर्माण, विज्ञान और तर्क के क्षेत्र मे पाठको के सामने रखना है. इस अनुवाद मे जस्टिस पलोक बसु का अमूल्य योगदान है. जो स्वामी विवेकानंद के विचारों के मुरीद थे.अंतत: पूरी रचना को पढने के बाद यह आकलन कर सकता हूं कि स्वामी विवेकानंद कोमनुष्य के व्यक्त्तिव निर्माण और विश्व बंधुत्व के अजेययोद्धा के रूप  मे  पाठकों के सामने लाना  ही इस पुस्तक का उद्देश्य है.साथ ही मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण की शिक्षा  ही जीवन की सबसे बडी दीक्षा है. जो स्वामी विवेका नंद का मूलमंत्र है.और इस रचना के कालजयी होने का प्रमुख सूत्र है.पूरी रचना को पाठकों के सामने लाने का प्रमुख उद्देश्य पाठकों के सामने स्वामी विवेकानंद के उदीयमान विचारो को पुनुरुत्थान हेतु सामने लाना है.
अनिल अयान.
सतना म.प्र.
संपादक -शब्द शिल्पी,सतना,
सम्पर्क:९४०६७८१०४०,९४०६७८१०७०

नागा संत: कुछ कही कुछ अनकही


नागा संत: कुछ कही कुछ अनकही.
 कुम्भ का पर्व शुरू होते ही साधू संतो की आवक शुरू हो जाती है. सबसी जमात है इनकी हमारे यहां भारत मे. सबसे प्रसिद्ध समूह नागा साधुओं का समूह को हम सब जूना अखाडा के नाम से जानते है. जूना अखाडा या ये कहे नागा साधुओं का अपना देश, ये विशेष प्रकार के संत ,संतों की श्रेणी से कहीं उपर और ज्यादा हठी  स्वभाव के होते हैं. लेकिन शायद कोई जानता हो कि ये इतने हठी क्यों होते है. जीवन का सबसे बडा और कडा तप इनके जीवन की हर घडी मे गुजरता है.मै इस समय आप सभी पाठकों के सामने इसी संदर्भ मे कुछ बात-चीत करूंगा. महन्त, संत, महापुरुष, और अवधूत,ये सभी ब्रह्म्चर्य की अलग अलग बढते क्रम की श्रेणियां है.
  नागा सन्त सिर्फ़ संत ही नही अवधूत होते हैं. जिनके, सोलह नहीं सत्रह संस्कार होते है, इनके जीवन की हर घटना रोचकता और रोमांच से भरपूर होती है. जब आम इन्शान अपने जीवन को ब्रह्म्चर्य की तपस्या मे लगाने के लिये संकल्पित होता है तो उसे सभी परिवार जनों से रिस्ता तोडना पडता है.नागा अवधूत बनने का मतलब यह नही होता कि सिर्फ़ वस्त्र ही त्यागना पडता है.  वस्त्र तो सिर्फ़ एक बहाना है ,अपने को इस मायाजाल से अलग करने के लिये.
परिवार को छोड कर ये ब्रह्मचारी अपने जीवन की मुख्य धारा से कट जाता है.
और भक्ति की धारा से जुड जाता है. नागा बनने के लिये पहले ब्रह्मचारी का जीवन कई सालों व्यतीत करना पडता है. उसके बाद उसे किसी आश्रम मे जाकर अपने जीवन मे गेरुए रंग के वस्त्रो को धारण करके पूर्णरूपेण एक साधू के रूप मे परिवर्तित हो जाना पडता है. जूना अखाडे के पुराने बाबाओं के समूह के सामने नागा बनने आये इन
साधुओं का मेल मिलाप होता है. हम यह भी कह सकते है कि प्रथम मिलन होता है.
जानकारियों का आदान प्रदान होता है.
 परिचय के इस दौर के बाद नागा बनने हेतु इन संतो के वास्तविक ब्रह्मचर्य का स्तर जांचा जाता है. इसके लिये कुछ महीनों से कई साल तक लग जाते है.इसके बाद जूना अखाडे के संत नागा बनने वाले संत के भाई- पट्टीदारो, परिवारो और सगे- संबंधियों के बारे मे पूरा पता लगाते है. वो भी उस संत के बिना संग्यान मे दिये. जब जूना अखाडे के प्रमुख लोगो को लग जाता है कि यह साधू नागा बनने के योग्य है तब उसे महापुरुष बनने हेतु किसी एकांत जगह पर किसी एक मुद्रा मे बिना किसी वस्त्र के खडे रहना पडता है. उस पर सबकी नजर होती है. यह काल कितना लम्बा होता है या होगा इस बात का निर्णय जूना अखाडे वाले करते है. इस तपस्या के बाद. कुम्भ आने तक इन्हे वरिष्ठ नागा बाबा के साथ रखा जाता है. कुम्भ के काल मे इन संतो को अपने जीवित अवस्थ मे अपना श्राध और पिण्डदान करना पडता है. यहा से यह मान लिया जाता है कि अब इस साधू का पूरे संसार से कोई ताल्लुकात नहीं है. यह सभी के लिये स्वर्गवासी हो गया है. इस समय ये अपने सारे वस्त्र त्याग कर सत्रहवां सस्कार करते है, अपने बाल बनवाते है और अपनी तेरहवी और बरषी मे शामिल होते है. और जैन मुनियों के समान निर्वस्त्र हो जाते है. यहां से इन साधुओं का नया जीवन तय होता है.
इसके बाद इनके शरीर मे जूना अखाडे का चिह्न लगाया जाता है और विधिपूर्वक ये जूना अखाडॆ के सदस्य बनाये जाते है.
  नागा बाबाओं का इंतिहान इसी जगह पर खत्म नहीं होता, बल्कि यहां से और कडा हो जाता है. या यह कह सकते है कि अभी तक सिर्फ़ प्रवेश परीछा थी अब तो पूरी पढाई इन्हे करना है.यहां से शुरू होता है हठ योग का जीवन ,या ये कहें कि साधू के जीवन का सबसे कठिन समय का पहला चरण जिसमे सभी नागा बाबाओ के सामने नग्न शरीर मे ये शाबित करना होता है की शरीर ने ब्रह्मचर्य को शोषित कर लिया है. वासना पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. क्योकि यदि वासना शरीर मे बची रह गयी तो अगले चरण मे उतना ही ज्यादा कठिनता से गुजरेगी. कई महीनो के कठिन तप के बाद सोना आग मे तप कर निखर आता है. कुछ समय के बाद ब्रह्मचर्य का असली इंतिहान होता है. जिसमे  लिंग भंग की प्रक्रिया होती है. यह इनके जीवन का सबसे पीडा का वक्त होता है. इस प्रकिया मे लिंग की उस नस को निष्क्रिय किया जाता है जो वासना का सम्प्रेषण शरीर मे करती है. जीवन की महानतम और शारीरिक पीडा के बाद अवधूत अब नागा बाबा के स्वरूप को धारण कर चुका होता है. यहां से इसकी १०८ संगम की डुबकियां उपयोगी होने का वक्त उपस्थित होता है. अब ये भगवान शिव के सच्चे भक्त बन जाते है. अब हर प्रकार का नशा और ब्रह्मचारी जीवन इनके लिये उपयोगी होता है. इनकी सेना मे इनका स्वागत किया जाता है. जश्न होता है. उत्सव की तरह इनका सेना मे स्वागत होता है.
   नागा बाबा का यह रूप इतने तप के बाद निखरकर लोगों के सामने आता है. सेना मे पौराणिक समय के समान हाथी, घोडे, और अन्य प्रकार के जीव जन्तु होते है. साथ ही सभी प्रकार के अस्त्र और शस्त्र होते है. ये नागा बाबा जब ,जहां से गुजरते है. उस जगह के लोगो के लिये कौतूहल का विषय बन जाते है. हठ योग के बाद ये इतने ज्यादा हठी और क्रोधी, साथ साथ जिद्दी हो जाते है. कि सबसे पहले इन्ही का सुना जाता है. इन्ही का सम्मान किया जाता है. हर तरफ़ इन्ही की तूती बोलती है. तभी तो  ना गलत ये सहते है और ना ही जुबान से बोलते है. नागा बाबाओं का मानना है की भगवान शिव का अंश इनके अंदर होता है. और यदि ये गलत का साथ देते है तो इनको नर्क भोगना पडेगा. नागाओं का यह भी मानना है कि इन सब ने यह रास्ता सिर्फ़ अपना जीवन सही मार्ग मे चलने के लिये चुना है. ऐसा सिर्फ़ भारत मे ही देखने को मिल सकता है जहां की परम्परायें इतनी मजबूत है.और इतिहास इतना पौराणिक है जो स्तुत्य और प्रण्म्य है.
अनिल अयान.सतना.

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

बौद्धिक आजादी के लिये घिघियाते लोग

कब तक सहें
बौद्धिक आजादी के लिये घिघियाते लोग
 हमारी भारतीय सभ्यता के उपर हुये प्रायोगिक हमलों के बाद इस वक्त तीन केश फ़िर से मीडिया के बुद्धू बक्से मे दिखाया जा रहा है उसमे से एक है आशीश नन्दी का बयान, सलमान रुश्दी का कोलकाता आने पर ममता बनर्जी के द्वारा रोक लगा देना और कमल हासन की फ़िल्म विश्वरूपम पर प्रतिबन्ध की पेशकश.सलमान रुश्दी और आशीश बौद्धिक वर्ग से  सम्बन्ध रखते है. और कमल हासन फ़िल्म जगत के जाने माने अदाकार और फ़िल्म निर्देशक है. दोनो परिस्थितियो को देख्नने पर पता चलता है कि बौद्धिक आतन्कवाद  का ज्यादा ही प्रचार प्रसार किया जा रहा है.बौद्धिक आजादी के लिये ये तीनो नाजायज ही सरकार के  सामने घुटने टेक रहे है. इन पूरे तथ्यो से दो बाते सामने आती है.रुश्दी  और नन्दी की लेखन प्रक्रिया  एक लबादे को हटाने की  कोशिश करती है जिसे आज सभ्यता का अतिवादी चोला कहा जा सकता है. इसके अन्दर कई तथाकथित नामी गिरामी लोग अपने को सभ्यता का पालनहार समझते है.लोकतान्त्रिक देश की वास्तविकता यह है कि ज्यादा अपने मन का राग बजाने से सबके तन के निचले सिरे मे खुजली शुरू हो जाती है.यहा पर समन्वय स्थापित करके ही अपना काम निकाला जा सकता है या निकालने की परम्परा है,ज्यादा कट्टर हो जाने पर अपनी जान से हाथ धोने की तरह हो जाता है.इस देश मे राजनीति का ऐसा ही रवैया है.क्या कर सकते है आप.रुश्दी का देश की कोलकाता नगरी मे  रोका जाना इसी सभ्यता का जीता जागता उदाहरण है.और रही गन्दे साहित्य के प्रराचर होने की और इसके विरोध की पैरवी करने वाले टी.एम.सी. सान्सद साहेब के बयानो की. तो इस देश का कोई ऐसा कोना नही है जिस जगह पर इस साहित्य का कारोबार फल फूल नही रहा है. और वो क्या देश का कोई कानून इसका बाल भी हिला नही सका. कितनी शर्म की बात है.वो खुद बस स्टेन्ड, रैल्वे स्टेशन ,के बुक स्टाल्स मे इस बीमारी को रोकने मे असमर्थ है.
    विश्व रूपम  के मामले की कहानी थोडा अलग परन्तु इसी तरीके से मुद्दे को बनाने और आग लगाने की कहानी है. इसमे कमल हासन जितने गुनह्गार है उससे कई गुना सेन्सर बोर्ड के वो मेम्बर विरोध के अधिकारी है जो इस फ़िल्म को ओ.के. का प्रमाण पत्र दिये है.प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का काम है वो फ़िल्म व्यापार से जुडे है. वो तो अपना काम करेगे ही, पर सेन्सर बोर्ड के मेम्बर क्या इस फ़िल्म मे भी अन्डर द टेबल अपना काम करने मे लगे हुये थे.अब यदि इस फ़िल्म को ओ.के. का प्रमाण पत्र दिया गया तो फ़िर हासन साहब का मीडिया के सामने आना जायज है. क्योकी वो तो अपनी बनायी फ़िल्म बाजार मे बेन्चेगे ही. सेन्सर बोर्ड को चाहिये था कि वो आपत्तिजनक सीन्स को हटाने का आदेश देता जिस वजह से मुस्लिम धर्म के अनुयाइयो को ह्र्दयाघात लगा है.यह भी सच है की किसी फ़िल्म का उद्देश्य ये नही होना चाहिये कि किसी धर्म को आहत किया जाये.परन्तु. आज के उसी टॆलीवीजन मे फ़िल्म्स के अन्दर. अश्लीलता .सरे आम आइट्म गाने और अन्य तरीको से पेश कर मानव को सिर्फ़ नर और मादा के रूप मे समाज के सामने पेश किया जाता है. उस वक्त क्यो समाज और धर्म के पन्डे अपनी जुबान क्यो नही खोलते. हमारे धर्म मे आन्च आयी तो हम गोहारी मारने लगे. और अन्य धर्मो की बारी आने पर मूक दर्शक बन गये.
  आशीश नन्दी साहेब  तो ज्यादा ही कबीराना अन्दाज भारत जैसे कट्टर लोकतान्त्रिक देश मे  बेबाकी से प्रस्तुत कर दिया है.सम्वैधानिक कैटेगरी की जनरल के अलावा सभी करप्ट. मतलब जिस डाल मे विराजमान हुये उसी को काटने मे तुल गये. और फ़िर ये कह रहे है कि. कबीरा खडा बाजार मे सबकी मांगे खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर.  उन्हे शायद यह  नही पता कि यह भारत है यहां पर कबीर जैसे युगवादी सन्त को, जो किसी जाति पाति, धर्म और पन्थ को नही मानता था,उसके मरने के बाद उसी के अनुयाइयों ने कबीर पंथ का आराधक बनाकर उसके विचारों के साथ सरे बाजार बलात्कार कर दिया.तो आप किस खेत की मूली है. साहेब यहा का आईना भी प्रतिबिम्ब व्यक्ति को देख कर दिखाता है. क्योकि उसे भी अपनी जान प्यारी है. आज के राजनैतिक माहौल मे किसने कहा था कि गुस्साये और पगलाये तथाकथित सूरज को आईना दिखाने के लिये.अब भोगिये सजा और जिल्लत.
   तीनों के विचार प्रगतिशीलता का प्रचार प्रसार करना है.परन्तु एक सिदधान्त है कि हमारी आजादी हमारे लिये तब तक नुकसान दायक नही है. जब तक कि  उस नुकसान से अपने स्वार्थ की रोटियां सेकने वाले लोग मौजूद ना हो. पर यहां तो पूरी सेना मौजूद है. खैर
आज के समय मे बौदधिक आजादी अपने ही घर मे कारावास भोगने के लिये विवश है. क्योकि बौदधिक आतंकवाद रोकने वाले ही इसे विलायती बाबू बनाकर जनता की आंखो मे धूल झोंक रहे है. और यही वोट बैंकिंग का बेस्ट मैनेजमेट है.

रविवार, 27 जनवरी 2013

किसी की बपौती नहीं है कांग्रेस l



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