शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

कुर्सियाँ वही रहीं सवारियाँ बदल गईं

कुर्सियाँ वही रहीं सवारियाँ बदल गईं

देश के हृदय प्रदेश में विगत दिनों समाप्त हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, सारे कयास जो लगाए गए थे वो अब साकार भी हो गए और निराकार होकर कई उम्मीदवारों के मन में विद्यमान भी हैं। यह पहला अवसर है कि मध्य प्रदेश की विधान सभा में गठबंधन से सरकार बनने जा रही हैं, इसके चलते गठबंधन के लिए कांग्रेसी दल के महानुभाव अपने विधायकों की गुणा गणित बिठाने में लगे हुए हैं। इन सबके बीच राजनीति में एक कहावत हमेंशा सभी सरकारों ने साकार किया कि इस सरकार की कुर्सी में कोई भी बैठे वो अपने हिसाब से चाहे जितना वायदे करता रहा हो किंतु कुर्सियों का दोष माना जाता है, जो भी मुख्यमंत्री बनता है वो इसी कुर्सी के पावों के जंजाल में फंस ही जाता है, अब देखना यह है कि आगामी सरकार की रणनीति इस कहावत के साथ कितना न्याय कर पाती है। इस चुनाव में जीतने वाले भाजपा के वो उम्मीदवार जरूर दुखी होंगें जिनके मन में मंत्री पद की ललक लालसा विद्यमान थी, कांग्रेस के वो उम्मीदवार और ज्यादा दुखी होंगे जिनकी हार सुनिश्चित हुई तो हुई किंतु सरकार कांग्रेस गठबंधन की बनने वाली है। कुछ भी अब आने वाला वक्त बताएगा कि आने वाले पाँच साल गुजरे हुए पंद्रह सालों पर भारी पड़ते हैं या फिर उसके भी पीछे भ्रष्टाचार के मामले में और पिछले पंद्रह सालों को पुनः दुहराते हैं। क्योंकि राजनीति में चाहे कोई जितना सुधार की बात कर ले वो अपने संगठन से परे जाकर काम नहीं कर सकता, मध्य प्रदेश की जो स्थिति शिवराज सरकार के पंद्रह साल के पहले दिग्विजय सरकार के थे वो नासूर जनता को बखूबी पता है।
इस चुनाव में  जिस प्रकार की परिस्थितियाँ राज्य में थी वो भाजपा के लिए घर का भेदी लंका ढ़ाए वाली थी, ऐसी स्थितियों के लिए राज्य सरकार खुद दोषी मानी जा सकती है, केंद्र में राज्य सरकार की राजनैतिक पार्टी होने की वजह से यह दोष कुछ ज्यादा ही हो सकता है। विचार मंथन जारी हो चुका है हाईकमान खुद जानता है कि पार्टी की हार के पीछे जनता का परिवर्तत उतना जिम्मेवार नहीं है जितना कि भितरघातियों का विद्रोह प्रदर्शन और अप्रत्यक्ष विरोधी पार्टी को समर्थन देना, उनका प्रचारप्रसार करना शामिल रहा, पार्टी का मानव धर्म, धर्म राज में  और राजधर्म जातिधर्म के गुणा भाग में लिप्त हो चुके थे, समय के साथ साथ अंतिम पंच वर्षीय में सरकार मन की बात और दिल की बात करने में व्यस्त हो चुकी थी, जनता के विश्वास को कुचलने का कई बार आरोप ग्रहण करने वाली सरकार ने जनता को एससी एसटी, हिंदू मुसलमान, क्रिस्चन, अगड़ा पिछड़ा, के साथ साथ आने वाले समय में आरक्षण को खुद की बुनियादी नींव तक बताने में मंच से परहेज ना किया, व्यापम घोटाला हो, पेड़ न्यूज का मामला हो, नेताओं के बिगड़े बोल हों, जीएसटी में विशंगतियाँ हों, राम मंदिर को राजनैतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करना हो, विभिन्न जातियों के महापंचायत का आयोजन हो, कांग्रेस के ऊपर कींचड़ उछालना हो, घोषणाओं का अंबार खड़ा करने से लेकर उन्हें भूलने की बीमारी हो, सड़क से लेकर पानी तक का हाहाकार हो,नोटबंदी हो, या फिर बेरोजगारों को पकोड़ा तलने और चाय बेचने का सुझाव देने की बात हो, कमर टोड़ती मँहगाई, कहीं ना कहीं मतदाताओं को रिझाने की बजाय दूरियाँ बनाने के लिए मुख्य कारण बनती रही। सरकार का औद्योगिक संस्थानों और उद्योग पतियों के प्रति रूझान, बैंक घोटाले, केंद्र का न्यायपालिका और कार्य पालिका मेंअनावश्यक दखल सभी इसमें घी की तरह काम करते रहे।
इन सबके बीच अगर पिछले पांच सालों के पूर्व के दस सालों की बात की जाए तो शिवराज सरकार को जनता पसंद करती रही, उनकी विभिन्न घोषणाओं, कन्याओं की परवरिश से लेकर उनकी शिक्षा और रोजगार के लिए सरकार की योजनाएँ कहीं ना कहीं काबिले तारीफ काम था, बाबूलाल गौर के समय से लेकर मध्य प्रदेश की तस्वीर जितनी तीव्रता से बदली गई थी वो भी देखने लायक थी, दिग्विजय सरकार की दी गई सौगातों को शिवराज सरकार के प्राथमिक दस सालों में आम जनताको बरी कर दिया, बिजली समस्या, रोड़ से लेकर गांवों को जोड़ने की पहल करना, विभिन्न योजनाओं के द्वारा युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करना, इंदौर, भोपाल, और उज्जैन की तस्वीर को मध्य प्रदेश का व्यवसाय केंद्र बनाना भी इस सरकार की उपलब्धियाँ थी, शिक्षा विभाग से लेकर स्वास्थ्य विभाग, सेवा विभागों से लेकर कार्यपालिका तक इस सरकार के कामों से संतुष्ट नजर आई थी, किंतु पाँच साल जो गुजरे वो इस सरकार की साख को खत्म करने के लिए काफी थे, मोदी सरकार के दिग्गज नेताओं की ताबड़तोड़ रैलियों के बीच उपचुनावों में भी इस सरकार ने अपने किए से सीख नहीं पाई, मोदी लहर से लेकर शिवराज और अमित शाह की बातों के पुलिंदे के सामने जनता ने हंस की तरह सच को खोजने परखने की पहल शुरूकर दी। इधर विरोधी दल में कांग्रेस, आप और अन्य पार्टीयों की जागरुकता ने शिवराज सरकार की जड़ों को खोदना शुरू कर दिया, पूरे देश को हिंदुत्व के रंग में रंगने की ललक ने अन्य राज्यों की अपेक्षा इस राज्य को शिवराज सरकार ने थोपने वाली रणनीति नहीं अपनाई, सरकार के साथ साथ भाजपा के अंदर के गुपचुप विद्रोह, कार्यकर्ताओं के बीच असंतुष्टि, और आलाकमान का सही उम्मीदवार का चयन ना कर पाना भी पार्टी की हार का प्रमुख कारण बनी।
कांग्रेस की जीत का प्रमुख कारण भाजपा के अहंकारी भाषणों में राहुल की हास्यास्पद उपस्थिति का होना रहा, राज्य में प्रारंभिक हार के बाद विगत पंद्रह सालों में मे राहुल गाँधी युवाओं को एकत्र करने और युवाकांग्रेस को मजबूत करने का काम किया, इधर चुनावों में भाजपा के दिग्गज नेताओं के बीच फिसलती जुबान में राहुल को केंद्र में रखकर की गई बयान बाजी ने खुद राहुल को बिना किसी ज्यादा प्रयास के जनता के बीच में लोकप्रिय कर दिया, जैसे कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के साथ कुछ ऐसा हुआ माना जा सकता है, मतदाताओं में विशेषकर डाक मतपंत्रों, पिक पोलिंग बूथ में स्त्रीप्रधान प्रतिनिधित्व ने कांग्रेस में दिलचस्पी दिखाना, और भाजपा के राज से सत्ता परिवर्तन करना कहीं ना कहीं एक सोद्देश्य चुनावी सफलता का कारण बना विगत महीनों में माई के लालों में की विरोधी रैली में जिस तरह से विभिन्न दल के लोगों और भाजपा के सवर्ण कुल के राजनीतिज्ञों ने अपना विरोध दिखाया उसके चलते कांग्रेस के विकसित वोटरों के प्रतिशत को बढ़ने का फलने और फूलने का भरपूर मौका मिला। काम करवाने से लेकर लोगों के बीच में लोकप्रियता को देखा जाए तो भाजपा का मोहभंग एक तरफ हो रहा था और दूसरी तरफ कोई रास्ता ना दिखाई देने की वजह से कांग्रेस के पंजे को आजमाने का रास्ता जनता जो ज्यादा उपयुक्त महसूस हुआ, इन सबके बीच यह भी तय था कि इस कांटे की टक्कर के बीच अगर भाजपा कुछ ना करती अपने विरोधियों को अपने पक्ष में कर लेती, सवर्णॊं के लिए कुछ विशेष घोषणाएँ कर देती, या फिर जनमानस में समानता के लिए कुछ बयानबाजी कर देती हो भी वह सरकार बनाने के लिए बहुमत प्राप्त कर लेती।
बारह दिसंबर को राज्य में नई सुबह ने सरकार की कुर्सियों के लिए कांग्रेस की सत्ता राजघर वापसी की भोर लेकर आई, शिवराज जी के बयान से उनकी मायूसी साफ झलक रही थी, आने वाली सरकार से जनता ही नहीं पढ़े लिखे युवाओं, राज्य की बेटियों और बहनों, कर्मचारियों किसानों, बैंकरों, स्वरोजगार करने वाले लघुउद्योग के मालिकों, और आने वाली पीढ़ी के नौनिहालों की काफी उम्मीदें हैं, अच्छी अर्थव्य्वस्था हो, सड़क से लेकर पानी, हवा, पेट्रोल से लेकर रसोई गैस, युवाओं की नौकरियों से लेकर बेरोजगारों का रोजगार, स्त्रियों की सुरक्षा से लेकर उनकी जीवशैली में सुधार, कर्मचारियों की स्थिति को और बेहतर बनाने आशा, किसानों की स्थिति में सुधार और उनके कर्ज की माफी पर तुरंत निर्णय लेना और सबसे बड़ी बात घोषणा पत्र को वचन पत्र बताने वाले राहुल गाँधी जी के मार्गदर्शन आने वाले मुख्यमंत्री जी शासन में सुशासन की उम्मीद को जगाने की आशा शामिल है, वचन पत्र की पूर्ति की अवधि के बिना भी अगर वचन निभाने का कार्य आगामी कांग्रेसी सरकार करेगी तो जनमानस उसे सिर आखों में बिठाएगी, अन्यथा अगर छल कपट, धोखेबाजी, वचन को राजनीति का औजार मानकर पूर्व कांग्रेस की दिग्विजय सरकार की पंद्रह वर्षीय कार्यप्रणाली अपनाएगी तो हर राजनैतिक पार्टी जानती है आने वाले पाँच सालों के बाद भाजपा हो या कांग्रेस एक दिन तो जनता के दरबार में दान माँगने आना ही पड़ता है, वर्तमान माहौल में जनता पुरानी कांग्रेसी जमाने की अच्छाइयों के साथ कुछ नया सवेरा देखने के लिए तैयार है। आगामी सरकार को भी इस बात को स्वीकार करना होगा कि शिवराज सरकार की कमियों को दूरकरते हुए अपने कामों के माध्यम से जनता के बीच स्थान बनाए ताकि आगामी पाँच वर्ष के बाद उसे विज्ञापनों में पिछली सरकार की कमियाँ गिनाने की जरूरत ना पड़े,इसी के साथ आगामी कांग्रेस सरकार के शासनकाल को मै क्या हर युवा किसान और महिलाएँ देखने जीने और महसूस करने के लिए अगवानी करने और अवलोकन करने के लिए तैयार हैं।  

अनिल अयान
सतना

९४७९४११४०७

जातिगत आरक्षण के कोल्हू में पेरी जाती जनता

जातिगत आरक्षण के कोल्हू में पेरी जाती जनता

आरक्षण, आरक्षित वर्ग, आरक्षित नेता, आरक्षित पद, आरक्षित लाभ आदि आदि ना जाने कितने तमगे हैं जो हमारे देश में विभिन्न प्रकार के वोटरों को प्रदान किए जाते हैं। ये सुविधा संविधान के निर्माताओं के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ सालों के लिए प्रदान की गई थी और देखिए कि आज सत्तर दशक होने के बाद भी यह कोढ़ देश में अपना आधिपत्य जमाये हुए है। कोढ़ इसलिए क्योंकि यह आरक्षण जातिगत आधार पर देश के नागरिकों को सरकारों के द्वारा परोसा जाने लगा। पंचवर्षीय योजनाएँ बदली किंतु इस सुविधा को असुविधा बनाने की जुगत और मजबूत करने की कोशिश करती गई।समय के साथ इस आरक्षण की जड़ें और गहरी होती चली गई, जातियाँ,समुदाय और धर्म कमजोर से मजबूत और धनी होते चले गए किंतु आरक्षण की सुविधाभोगी बनने में  उन्हें गर्व महसूस होने लगा। आर्थिक रूप से कई गुना मजबूत लोग भी आरक्षण के तवे में सेंकी गई रोटियों को निगलने के लिए सिर झुकाए तैयार खड़े नजर आए। सरकारों ने आरक्षण को चुनावी दुधारी औजार की तरह इस्तेमाल करने की आदत डाल ली। समय गुजरने के साथ साथ इस तलवार से जातिगत समीकरण भी साधा जाने लगा और दूसरी तरफ आरक्षित जातियों और वर्गों का वोटों की गणित को भी अपने पक्ष मे रखने का रवैया अख्तियार किया जाने लगा। आरक्षण को विगत कई सालों से स्टॆटस सिंबल बनाकर राजनीति में राजनैतिक पार्टियों ने इस्तेमाल किया। कौन सी पार्टी किन जातियों को आरक्षण प्रदान करेगी वो ही उन जातियों के लिए गॉड फादर की तरह बनती चली गई। आरक्षण की आग को बुझाने की बजाय जो इस सत्ता में आया वो इसे और हवा दिया, उसमें कपूर और घी डाला गया, मिट्टी का तेल और पेट्रोल डाल कर समाजिक सौहार्द को खत्म करने की साजिश भी रचने में परदे के पीछे से पूरी तरह से सहयोग करती रही।
आरक्षण का उद्देश्य’ जो संविधान में निश्चित किया गया, उसके परे वर्तमान में आरक्षण का प्रभाव समाज में दिख रहा है, किसी भी बच्चे के पैदा होने के पहले से आरक्षण लागू हो जाता है, उसके पैदा होने, उसकी परवरिस, उसकी शिक्षा, उसकी नौकरी, उसकी शादी ब्याह, उसके बाल बच्चों के पोषण,जीवन यापन और मरने के बाद आगामी पीढियों तक के लिए आरक्षण लागू हो जाता है, आरक्षण के अलावा दी जाने वाली योजनाओं के लाभ सब आरक्षित वर्ग के लिए ही बने हुए हैं, आर्थिक आधार पर कमजोर तबका चाहे वो किसी भी वर्ग जाति धर्म का हो वो इस आरक्षण से कोसों दूर है, पढ़ाई, नौकरी, प्रमोशन, और सेवानिवृति को लेकर तक आरक्षण की गाड़ी मौजूद है। सरकारों के रवैये ने कार्यपालिका में क्रीम और डिशीजन मेंकिंग पोस्ट तक के लिए आरक्षण को ढ़ाल बनाया हुआ है। आने वाली नश्लों को बर्बाद करने का पूरा जिम्मा आरक्षण से आगे आने वाले अधिकारियों ने ले रखा है जिनके पास पहुँच तो है किंतु उस क्षेत्र का अनुभव बहुत कम है। जितनी भी सरकारे हैं वो आरक्षित वर्गों के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश करती हैं, यह देखा जाता है कि विधायिका के किसी स्तर के चुनाव में आरक्षित जातियों के उम्मीदवारों की दावेदारी और आर्थिक स्तर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की तुलना में अधिक होता है, अब तो आरक्षण को खत्म करना दिवास्वप्न की तरह है। वो दिवास्वप्न जो कभी पूरा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आरक्षण यदि खत्म तो राजनीति और सत्ता अपाहिज की तरह निस्तोनाबूत हो जाएगी। राजनैतिक पार्टीयाँ निहत्थी हो जाएगी। आरक्षण की आग ने कितने ही तबको की बस्तियाँ नष्ट कर दी हैं, इसके चलते कितने ही विभागों के अधिकारियों के जेबों का वजन हमेशा बढ़ता रहता है।
जातिगत आरक्षण को खत्म करना ही हमारे समाजिक हित में है और समाजिक ढ़ाचे को मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है, आर्थिक सर्वे के आधार पर हर जातियों के लिए गरीबी रेखा निश्चित होनी चाहिए, न्यूनतम वेतन और मासिक वेतनमान के हिसाब से आरक्षण देश को विकास के पथ में अग्रसर करेगा, इस तरह के आरक्षण में रोटी कपड़ा और मकान , बेहतर जीवन शैली जीने के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग और अन्य अल्प संख्यकों की वो जनता लाभान्वित होगी जिनको हकीकत में सरकार की मदद की आवश्यकता है। जिनको जीवन यापन करने  के लिए सरकार के अभिभावकत्व की महती जरूरत आज भी है। जब सरकारों की घोषणाएं सुनने में आती हैं कि हम आरक्षण खत्म नहीं कर सकते हैं, तो लगता है आप ही आरक्षण खत्म कर सकते हो, और जातिगत आरक्षण को आर्थिक आरक्षण नीतियों में परिवर्तित करना है। आरक्षण का स्वरूप बदलना है, जब आप योजना आयोग को नीति आयोग का लबादा पहना सकते हो तो फिर आरक्षण को सही तरीके से सही जगह क्यों नही लागू किया जा सकता है। चुनावों के समय में, सत्ता पक्ष का विधानसभा चुनावों में अनारक्षितों को माई के लालों के रूप देकर जातिगत आरक्षण की हुंकार भरना और उन्हें खुली चुनौतियाँ देना ही सत्ता पक्ष को मंहगा पड़ा और पहले भी मंहगा पड़ा था। लोकसभा चुनावों की नजदीकियों को भांप करके केंद्र सरकार का पुन जातिगत आरक्षण की मीठी गोली चूसवाने की योजना अनारक्षित वर्ग बखूबी जानता है। कुछ महीनों में सरकार कुंभकर्णी नींद से जाग रही है, सरकार के चार साल और छः महीने जातिगत आरक्षण की गुणाभाग और जोड़ घटाने में निकाल दिए गए।
इस आरक्षण को असंवैधानिक रूप से देखा जा रहा है, किन जातियों के आरक्षण को कम करके सरकार दस प्रतिशत आरक्षण की बात कर रही है, और इस कानून के बनने में जटिलताओं का अनुभव, विपक्ष की युक्तियँ, उनकी सरकार में आरक्षित वर्ग का विरोध, कैसे सध पाएगा। यह सब अभी सरकार के द्वारा सरकार को अगली पंचवर्षीय में काबिज करने और घोषणा को पूरी करने की राजनैतिक नीति है। मुझे लगता है कि अगर सरकार हर राज्य में आर्थिक ढ़ांचे के हिसाब से आरक्षण का प्रावधान निश्चित करे और जनता को प्रदान करे तो जातिगत नीतियाँ की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके लिए सरकार और विपक्ष को साथ चलकर देश की जनता की आर्थिकी और देश के आर्थिक ढ़ा़चे को मजबूत करने हेतु सामन्जस्य बिठाकर निर्णय लेना होगा। इस हेतु कार्य पालिका न्याय पालिका और विधायिका के साथ साथ आर्र्थिक जनगणना का इस हेतु इस्तेमाल करना,आयकर विभाग के द्वारा सही जानकारियाँ प्राप्तकरके आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए आरक्षण नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन की आवश्यकता है। इस हेतु सरकार के द्वारा हर जगह उपयोग किए जाने वाले आधारकार्ड के माध्यम से भी काफी मदद मिल सकती है। कुछ मिलाकर सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि अगर सरकार यह घोषणाओं को अपने लाभ के हिसाब सेकरने की बजाय, पूरी तरह से तैयारी करके क्रियान्वयन करने की घॊशणा करे तो देश की जनता का उत्थान भी होगा, जनता का सरकार को समर्थन भी होगा, और अनावश्यक जातिगत गुणाभाग से निजात भी मिलेगी।

अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

अब "प्रेम" हाट बिकाय

अब "प्रेम" हाट बिकाय

वेलेनटाइन डे का विश्व में इतना ज्यादा क्रेज बढ़ चुका है कि संत वेलेनटाइन को भी जिंदा जी इतना भान न रहा होगा कि उनके सत्कर्म उन्हें प्रेम और प्रणय के संत के रूप में जानने हेतु विश्व प्रसिद्ध कर देंगें। वेलेनटाइन संत के नाम को बाजार वाद ने इतना ज्यादा कैश किया कि यह एक दिन मनाने के पूर्व से पूरे पखवाड़े और सप्ताह भर प्रणय प्रेम की मादक सुगंध बाजार से लेकर जवां दिलों की नाकों में खुशबू देने लगती है। इस माहौल में यह डर जरूर बना होता है कि मादक सुगंध लेने वाली नाक कहीं कटते कटते न रह जाए। इस तरह के बाजारवादी प्रेम की पराकाष्ठा में जब युवाओं को परवान चढ़ते देखता हूँ तो मुझे उनकी तथाकथित समझदारी पर पुछल्लेदार हंसी आजाती है। समय ने प्रेम को कितना बदल दिया है।यह बदलाव इतना ज्यादा टेक्नालाजी और हाईटेक  हो गया है कि स्कूल कालेजों से लेकर आफिसों तक प्रेमरोग के मरीज अपने प्रेम प्रणय का ऐतबार करते इस मौसम में नजर आ जाते हैं। पूरी तरह से बाजार की कीमती उपहारों पर आधारित यह पखवाड़ा जेब में नोटों के दम पर हलाल होता है। बाजार का आयात निर्यात पश्चिमी संस्कृति से पलायित विभिनन रिश्तों के दिवसों की वजह से साल भर यह बाजार इन त्योहारों की मुनादी करता है। सुनने में आया था इश्क प्यार और मोहब्बत जो खुद में अधूरे हैं वो जीवन को पूर्णता कैसे दे सकते हैं, हालाँकि प्रेम विषय वस्तु को कलमकारों ने अपने अपने तरीके से अभिव्यक्त किया है। किंतु उन सब प्रेम में जवां दिलों के बीच प्रेमी और प्रेमिका के बीच की अनुभूति को केंद्र बिंदु माना गया है। ढाई आखर पढ़ने की बात करने वाले कबीर संतृप्त पांडित्य की बात करते हैं, किंतु यहाँ पर तो प्रेम में बौराने की भी बात की गई है। आज के समय में दिखावे का प्रेम, पांडित्य के प्रेम पर हावी हो चुका है। आज कल की प्रेयसी भी कई प्रेमियों के साथ फ्लर्ट करने का चाल चलन स्थापित करने में माहिर होती हैं, किसी भी लड़के और लड़की के लिए मित्रता के नाम पर ब्वाय फ्रेंड और गर्लफ्रेंड की पदवी भी उपहारों से शुरू होकर, वासना और शारीरिक संबंधों पर जा कर इतिश्री हो जाती हैं। ड्रेस बदलने की तरह समाज और पार्टियों के बीच स्टेटस सिंबल बने ये पद कुछ समय में ही नई ड्रेस की तरह बदल दिये जाते हैं, इनकी परिणित लंबे समय तक चलने वाले रिश्तों की बजाय, मौसमी नालों में जल भराव की तरह होती हैं। स्वार्थ और जरूरत इस तरह के दिखावटी प्यार का मूल मंत्र होता है।
स्त्री पुरुष के बीच जिस प्रेम पिपासा और निस्वार्थ संबंधों की बात की गई है वह हमारे देश में मर्यादित और संस्कारिक होती है। पूरा समाजिक स्तर इस बात का गवाह है कि प्रेम के दिखावे के नाम पर मादकता को उड़ेल देना, फूहड़तापूर्ण प्रदर्शन करना, विरोध में संस्थाओं का नंगेपन के स्तर तक उतर जाना। आज के समय में आम बात हो चुकी है। इतिहास के पन्नों और साहित्य ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि देह के बिना प्रेम सिर्फ भक्ति ही हो सकती है, स्त्री पुरुष के बीच में प्रेम छिपाने का भाव रहा है। जो दिख जाए वो प्रेम की पराकाष्ठा नहीं हो सकता है। भारत का बाजार विदेश की संस्कृति और सभ्यता के दम पर अर्थव्यस्था को मजबूत कर सकता है। किंतु प्रेम और वासना के बीच में युवाओं के मन में महीन अंतर को मिटाने के लिए भी यह जिम्मेवार होता है। मन में प्यार शब्द आते ही जिस मनो वैज्ञानिक उत्तेजना की परिकल्पना युवा मन करता है उसके पीछे हमारे टीवी चैनलों में दिन रात चलने वाले प्रेम की मानवनिर्मित शहद में डूबे प्रायोजित कार्यक्रम, मीडिया में प्रचारित किया जाने वाला झूठा भ्रम जाल जिम्मेवार है। कुल मिलाकर यह कहना जरूरी है कि वर्तमान में समाज, मीडिया, सरकार, संस्कृति और संस्कार सब इस बात के लिए तैयार हैं कि हम पश्चिम की हवा में आंख बंद करके मृत प्राय होकर बहते चले जाएं। जैसा माहौल हो वैसा ढ़ल जाएं। क्योंकि यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम पिछड़े हो जाएगें, समूह में हमें पुराने जमाने का मान लिया जाएगा। हमें जमाने वाले अपने कुनबे से काट देंगें। हम जो कुछ भी युवा पीड़ी को परोस रहे हैं वो उनके मन में अपराध के रूप में परिवर्तित हो रहा है। यह अपराध किशोर जन्य अपराध, यौन अपराध, अवसाद जन्य अपराध के लिए सबसे बड़ा कारण बनता है। इस दिखावटी प्रेम में लड़का और लड़की अपनी इच्छा के अनुसार अगर साथी नहीं पाते, या साथी से मिलने से रोका जाता है, या फिर साथी के साथ उच्छखृल होने से रोकाजाता है तो आक्रामकता आ जाती है, इस भावनाओं के बहाव में माता पिता से ज्यादा महत्वपूर्ण उस समय के लिए तथाकथित लाइफ पार्टनर हो जाता है। जो सिर्फ आकर्षण के वशीभूत होकर मौन स्वीकृति के लिए तैयार हुआ है।
इतिहास में जिस प्रेम और प्रेमियों की स्थिति का वर्णन किया गया है। उनके वो जमाने रवाने हो गए। जिस तरह के प्रेम उपन्यासों की रचनाएँ की गई उनकी उपयोगिता युवाओं के मन के लिए कुछ नहीं रह गई। आज के लेखक भी प्रेम के नाम पर अश्लीलता, फूहड़ता, देह को उद्घाटित करना, और शारीरिक संबंधों की प्राथमिकता को फिल्मों और मीडिया के माध्यम से प्र्स्तुत करने के लिए आतुर हैं। क्योंकि बाजार उसी प्रकार की प्रस्तुति का है।ज्यादा आदर्शवादिता बताना और अपने पुरानी संस्कृति और सभ्यता को आगामी पीढी के बीच लाना मतलब खुद की बेइज्जती कराना ही है। कहा जाता है ठोकर लगने से जिंदगी संभल जाती है, युवाओं के साथ भी कुछ ऐसा इस मामले में होता है, उन्हें आकर्षण, दिखावा, फ्लर्ट और प्यार की सही स्थिति हादसों से गुजरने के बाद ही महसूस होता है। इस प्यार के बाजार में मादक इस माहौल में जब कोई युवा खुद को परवान चढ़ा देता है तो उसे समझ में आता है वो इस रास्ते में बहुत आगे आ चुका है। उसका कैरियर, उसके सामाजिक संबंध, और उसका समाजिक सम्मान सब जा चुका है। तब तक उसे लौटने में लुटे हुए मन के साथ बहुत कठिनाई होती है। बाजार में उपहारों के दम पर प्रेम, प्रेमी और प्रेमिकाएँ सस्ते दामों में उपलब्द नजर आ जाते हैं, किंतु हर युवा को अपने युवामन के आकर्षण के परे दिल की बजाय दिमाग से एक पल के लिए सोचने की आवश्यकता है। क्या युवा मन के वशीभूत होकर बाजार में बिकने लुटने और बदनाम होने के लिए उत्साहित हैं, तैयार हैं, या तैयार किए गए हैं। स्थितियाँ भटकन की ओर लिए जा रही हैं। यहां पर विरोध दिखावटी प्यार और इश्कबाजी का बाजारू प्रदर्शन करने को लेकर है। फूहड़ता, नग्नता, प्रेम के नाम पर उच्छखृलता, और अश्लीलता को परोसने का विरोध है। भारत में प्रेम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक भवन बनाने की बजाय विदेशी नकल के चलते मल्टीस्टोरी बिल्डिंग तैयार कर खुद की पीठ ठोकने के पागलपन के लिए विरोध है। बहुत सीधी सी बात है बाजार अगर आपको खुद को बेंचने के लिए और खुद के मयार को झुकाने के लिए मजबूर करे तो क्या आप खुशी खुशी खुद की अना को नीलाम करने के लिए तैयार हो जाएगें। इस यक्ष प्रश्न का जवाब हम सबको खोजना होगा। प्रेम में होना बुरा नहीं है, प्रेम को बाजार में तवायफ बनाकर उसके जिस्म से बाजार के लिए दलाली करना नैतिक, मानवीय, और मनोवैज्ञानिक रूप से सरासर गलत है।

अनिल अयान।
सतना
९४७९४११४०७

क्या करें जब अपने ही विभीषण हो जाएं

क्या करें जब अपने ही विभीषण हो जाएं
भारत की सरकारें बदलती हैं पर आतंकवाद और आतंक का पर्याय कभी नहीं बदलता है। धर्म के नाम पर आतंकवादी, दहशतगर्द अपने तथाकथित जेहाद को अंजाम देने के लिए सरेआम कत्लेआम करते हैं। यह कत्लेआम या तो सेना और सेना के जवानों के ऊपर बंब ब्लास्ट करके, या फिर वाहनों को अपहरण करके, या फिर जान माल को नुकसान पहुंचाकर, या फिर पूरे इलाके को अपने कब्जे में लेकर भारत को अपनी मांगों को मनवाने के लिए मजबूर करने की शाजिश रची जाती है, जम्मू और काश्मीर समस्या जितना ज्यादा पाकिस्तान से संबंध रखती हैं उतना ही चीन भी इस में आँख गड़ाए बैठा रहता है। जब से भारत ने अपनी आजादी पाई है तब से आज तक भारत और पाकिस्तान के युद्ध, और भारत के साथ चीन के हुए युद्ध इस बात के गवाह रहे हैं कि जम्मू काश्मीर भारत के लिए वो गले ही हड्डी बन गई है जिसको ना निगल पा रहे हैं हम और ना ही उगल पा रहे हैं हम, इस मध्यस्थ स्थिति में हमारी अर्थव्यवस्था के सहयोग से चलने वाले जम्मू और काश्मीर शासन हमारा ही विरोध करते हैं। वहाँ पर चाहे जिसकी भी सरकार हो वो भारत की नीतियों का विरोध हमेशा से करती रही हैं। कभी यह विरोध खुले आम किया जाता रहा है और कभी यह विरोध आवाम के द्वारा और जेहादियों की मदद से किया जाता रहा है। सरकारें वोट तंत्र की राजनीति के चलते कुछ ऐसा फैसला लाने में असफल रही हैं कि काश्मीर को भारत से अलग कर दिया जाए या पूरी तरह से भारत के साथ संविलियित कर लिया जाए।
कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की सरकार हर शासन काल में रक्षा मंत्रालय कहीं ना कहीं पर सरकारों के इसारों पर काम करने के लिए मजबूर रहा है। सरकार की तरफ से सेना की कमानों को इतनी आजादी नहीं दी गई कि आपातकालीन स्थिति पैदा होने पर वह खुद कोई सुरक्षा हेतु निर्णय ले सके। कहने को भारत में सुरक्षा एजेंसियाँ, और खूफिया एजेंसियाँ बहुत से बनी हुई हैं। वो अपने तरीके से खूफिया जानकारियाँ और सुरक्षा से संबंधित जानकारियाँ जुटाने के लिए काम भी कर रही हैं। किंतु इस तरह के एलर्ट को हमारे सरकारी नुमाइंदों ने उतना संजीद्दा नहीं लिया जितनी संजीदगी के साथ लेना चाहिए। इसी का परिणाम रहा है कि जम्मू काश्मीर में सरे आम विरोध के काले झंड़े दिखाए जाते हैं, आतंकवादियों के संगढ़नों के द्वारा युवाओं को आतंकवादी बनाया जाता है। उन्हें कैंप में ले जाकर पूरी तरह से सैनिकों की तरह ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें सेना के विरोध में तैयार किया जाता है। उन्हें जम्मू काश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने और इस मिशन में अपने को कुर्बान करने के लिए कुरान की आयतो की दुहाई दी जाती है। उन्हें भावनात्मकर रूप से मजबूर किया जाता है कि वो आतंकी संगठन के सैनिक बनकर भारत के विरोध में कत्ले आम करें। पूरी लड़ाई भारत और पाकिस्तान के बीच में लड़ाई की जड़ बने जम्मू और काश्मीर को अपने एकाधिकार में लेने की है। हालांकि इस मामले में पाकिस्तान का साथ देने के लिए विश्व के कई अमुक राष्ट्र भारत के विरोध में खड़े हैं, मध्यस्थता की मलाई खाने की जुगत मॆं लगे रहते हैं किंतु किसी भी तरह भारत इस स्थान को छॊड़ना नहीं चाहता, और पूरी तरह से इस स्थान पर आधिपत्य भी नहीं जमा पा रहा है।
जितने भी आतंकी हमले हुए हैं उन सब में हमारी सुरक्षा व्यवस्था में बट्टा लगा है। हमारे इंतजामात को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया गया है। इसके पीछे हमारे अपने आतंकपरस्तों, उनके संगठनों, और उनके सहयोगियों का हाथ होता है, हमारी ही जमीन में वो आतंकवादियों के संगठनों, उनके स्लीपिंग सेल्स के दहशत गर्दों को, पनाह देते हैं, उन्हें भोजन पानी से लेकर संबंधित स्थान की खूफिया जानकारियाँ मुहैया कराते हैं और ब्लास्ट, अपहरण करने में खूब मदद करते हैं, पत्थरबाजों, काला झंड़ा दिखाने वाले, सुविधा मुहैया कराने वाले, सहयोग करने वाले, उनके जेहाद को अंजाम तक पहुँचाने वाले, उनके संगठनों की ब्रांचेच को पूरे भारत में पहुंचाने वाले,उन्हें यहां की नागरिकता देने में सहयोग देने वाले हमारे ही देश के बेशर्म गद्दार हैं। कुछ धर्म के नाम पर, कुछ पैसे के नाम पर, कुछ सत्ता और सुमारी के नाम पर आतंकी संगठनों के लिए काम करना शुरू कर देते हैं। पुलवामा क्या अन्य जितने भी आतंकी हमले हुए हैं उन सब में हमलावर हमारे देश की सरजमीं की कई दिनों तक रहे, खाए और अंजाम देकर खत्म हो गए। इस सरकार के आने से सर्जिकल स्ट्राइक नाम का एक काम सेना के द्वारा किया गया। पहले की सरकारों में यह काम इस नाम से नहीं किया जाता था। जब देश की सर्वेसर्वा सरकार और जम्मूकाश्मीर की सरकार है तो फिर अलग झंडा, अलग संविधान, और अलग कानून की व्यवस्था को खत्म न कर पाने के मजबूरियों को खत्म करना जरूरी है। सर्वदलीय बैठको से लेकर अध्यादेश लाने तक, जम्मू काश्मीर को रखने या छॊड़ने की शर्तों पर हमारे अनुसार संविलयन करना चाहिए। ताकि वहां पर या तो भारत का संविधान कानून और व्यवस्था लागू हो, या फिर वो पूरी तरह से भारत से अलग हो जाए नहीं तो पाकिस्तान का हिंस्सा बन जाएं।
वर्तमान वैश्चिक स्थिति यह है कि इस गले में फंसी हड्डी को निगल ही दिया जाए या फिर उगल ही दिया जाए। जम्मू काश्मीर से भारतीय सेना हमेशा विरोध झेलती आई है। को एक बार भारत सरकार खुद विरोध क्यों नहीं जता देती हैं। सेना के लिए आर पार के युद्ध की बात या फिर ऐसी स्थितियों में सर्जिकल स्ट्राइक का रास्ता ही अख्तियार करने का अधिकार क्यों नहीं सरकार उपलब्ध करती है। बार बार पाकिस्तान के साथ मधुर संबंधों की कोशिश करना और इस्लामाबाद और लाहौर में जाकर दावतें उड़ाना, हमारे राष्ट्रीय त्योहारों में वहां के हुक्मरानों को आमंत्रित करना, बंद कर देना चाहिए। हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि पाकिस्तान को आतंकवादी संगठनों के प्रमुखों को बहुत ही सम्मान से देखा जाता है। उन्हें धर्म गुरु माना जाता है। या यह बात और है कि पाकिस्तान खुद भी आतंकवाद का शिकार होता रहा है। कुल मिलाकर भारत के राजनैतिक संगठनों को इस मसले में एक तरफ का निर्णय लेना चाहिए। जम्मूकाश्मीर को अपनी शर्तों में अपने साथ रखने या फिर पूरी तरह से छोड़ने पर एक मत होना होगा।
आतंकवाद के लिए वो कानून बनाना होगा जिसमें आतंकवाद,आतंकवादी संगठनों, उनके सहयोगियों और मददगारों को कानूनन कारावास हो। इस तरह के हमलों के बाद सरकार, सेना, और सुरक्षा एजेंसियों को अपनी कमजोरियों को खत्म करने पर काम करने की आवश्यकता है, जो नेता या राजनैतिक व्यक्ति, मंत्री, संत्री और प्रशासनिक अधिकारी इन आतंकवादियों के पक्ष की बात करे उसकी भारत की नागरिकता खत्म करके देश को छॊड़ने का विधान होना चाहिए। जनता, से लेकर जनार्दन तक इस आतंकवाद के विरोध में खड़े होकर एक जुट होकर संवैधानिक, कानूनन, और सामाजिक रूप से विरोध करेंगें तो हमारी सेना को इनसे लड़ने में इन्हें खत्म करने में आसानी होगी।हमारी सरकारों को चाहिए कि पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अन्य देशों से इस मामले में एक्शन रवैये से काम ले, सेना को ऐसी आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए सारे संवैधानिक अधिकारों से लैस करना होगा, आतंकवाद, आतंकवादी संगठनों को सह देने वाले, उद्योगपतियो, राजनैतिकों, समाजसेवियों, कलाकारों, युवा संगठनो, लेखकों को सश्रम कारावास, या फिर भारत को छॊड़कर जाने का आदेश देना होगा। जम्मू काश्मीर को अपनी शर्तों में भारत में संविलियित करने हेतु निर्णय लेना, अथवा पूरी तरह से स्वतंत्र छोड़ने का निर्णय लेना होगा। सेना के सैनिकों की सुरक्षा, उनके परिवार को हर तरह का सहयोग करने का ध्येय पूरा करना होगा। वोटतंत्र को छोड़कर सभी दलों को एक जुट होकर संवैधानिक रूप से जम्मूकाश्मीर राज्य को उनके निर्णय अनुसार संविलियित और स्वतंत्रत करने पर निर्णय लेना होगा।

अनिल अयान
९४७९४११४०७

सोमवार, 19 नवंबर 2018

जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ - अनिल अयान

जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ - अनिल अयान

कबिरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ।
जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ।
इस दोहे में कबीर ने उस समाज को अपने साथ चलने के लिए लुकाठी उठाई जो समाज हिंदुत्व और मुस्लिम संप्रदाय के झगड़े में लिप्त था। कबीर के समय समाज की जो दशा थी वह दशा वर्तमान समाज की होती जा रही है। समाजिक विद्वेष चिंता का कारन बना हुआ है। जिस समय कबीर कबीराना अंदाज को काशी की माटी महसूस कर रहा था उसी समय पूरा देश मुस्लिम आक्रमण का शिकार था। कबीर इतने चालाक रहे कि वो कोई भी बात दूसरे से शुरु नहीं की। खुद को केंद्र में रखकर समाज को आइना दिखा दिया। कबीर अगर समाज की पीड़ा को सहन नहीं कर सका तो उसने अपनी जुबान को तलवार से ज्यादा धारदार बना ली। बेशर्म समाज के ठेकेदारों को उसी तलवार की नोंक के दम पर लोहा मनवा लिया, एक यायावर, एक अख्खड़, संत जिसे लोग संत नहीं मानते थे एक रचनाकार के रूप लिये कबीर ने कब समाज को सुधार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे दिया यह वो खुद भी समझ नहीं पाया। कबीर के लेखन का अपना एक रस था वह था निंदा रस, इस रस में वह जब डूब कर लिखता था तो उसे इस बात का कोई भय नहीं होता था कि समाज उसके बारे में क्या सोचेगा और क्या प्रतिक्रिया देगा।
कबीर का अरबी अर्थ महान है और वह महान काम कर गया। कबीर के लेखन में जहां धार्मिक पाखंड का सीधा पोस्टमार्टम किया गया। वही दूसरी ओर उसके लेखन में हिंसा जाति पांति का खुलकर विरोध किया गया। उन्होने इतना ही नहीं सदाचार और  सत्य और अहंकार के त्याग, परोपकार और निर्गुण ब्रह्म को आराध्य मानने को प्रोत्साहन भी दिया। उसकी कबीराना लेखनी और उनका जुलाहेपन ने पाठक को घुटने के बल झुकने के लिए विवष कर दिया।कबीर ने स्वयं को जुलाहे के रुप में प्रस्तुत किया है कबीर ने लिख दिया कि उसके जुलाहे में कौन कौन से दृष्टिकोण समाहित हैं। कबीर की वाणी में वो सूत्र समाया है जिसका उपयोग करके देश का धार्मिक विद्वेष खत्म हो सकता है। कबीर की साखियों में अदैत ईश्वरवाद का वह सार है जिसकी परिभाषाएं अपरिभाषित है। यह तो सच है कि देश के लम्बरदारों ने देश को धर्म के नाम पर, वोट के नाम पर, जाति के नाम पर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की रोटियों को पकाने के लिए बांट दिया है। यह बंटवारा कबीर के समय पर भी था और जब पूरे जीवन भर कबीर ने काशी का पानी पिया और मरने के लिए उसे उसे मगहर जाना पड़ा। कबीर की कबीराई को उनकी साखियों ने अमर कर दिया। कबीर की आत्मा को उनकी पंक्तियों ने शातिं प्रदान करती रही। कबीर का कर्म उसके धर्म से बड़ा हो गया।  कबीर कबीर अपनी संधा-भाषा की उलटबाँसियों और समाज सुधार के दोहों के लिए प्रसिद्ध रहे।
कबीर ने आत्म-परिचय की शैली में जो कुछ कहा है, उसकी एक झलक-भर वहाँ देना सुसंगत होगा।
कबीर—‘‘मैंने अपनी जाति और कुल दोनों को बिसार दिया है एवं उलट दिया है। अर्थात् शूद्रता छूट गई, मैं वरेण्य-ब्राह्मण की कोटि में आ गया,
मैं धरती पर जीनेवाला जुलाहा नहीं हूँ, मैं सुन्न महल में सहज-समाधि की स्थिति में परमात्म-तत्त्व को बुनता हूँ।मैंने पंडित और मुल्ला दोनों को छोड़ दिया है। किसी भी मज़हब या संप्रदाय के बंधन से मुक्त हूँ। इसलिए कोई सैद्धान्तिक द्वन्द्व मेरे मार्ग में नहीं है।‘‘मैं तत्त्व के ताने-बाने से अपने लिए दिव्य परिधान तौयार कर उसे धारण करता हूँ।आगे चल कर मैं वहाँ पहुँचा, जहाँ मेरा ‘मैं’ भी न रहा।" इन बातों को सुनने के बाद यह कहा जा सकता है कि सनातन मूल्यों के पहरेदार थे कबीर दास, इस धरती को छोड़ के एक क्षण के लिए भी कहीं जाना पसन्द नहीं करते, सेवा ही उनका जीवन होता है। कबीर का मनुष्य पाखंड से दूर है, कबीर का प्राणी अपने कर्म से पहचाना जाता है, कबीर का साहित्य जनजागरण के लिए था। कबीर मौखिक व्यंग्य कार थे। कबीर हिंदी साहित्य के सुकरात के रूप में साखियों की अमृत वर्षा पाठकों में करते रहे।
कबीर के नाम पर आज कबीर पंथियों ने अपना एक गुट बना लिया। कबीर को अपने घर की जागीर बनाकर उसके नाम को उपयोग करने वाले क्या ये समाज के ठेकेदार कबीर के आचरण को अपना पाएगें। कदापि नहीं शायद, क्योंकि आज भी पोंगापंथी की बीमारी को पोषित करने वाले लोग कबीर महोत्सव के नाम पर उनके नाम के कसीदे पढ़े जाने का रिवाज है। कबीर के नाम पर शहरों की इमारतों को पहचान, चौक चौराहों की पहचान, विद्यालयों और महाविद्यालयों के नाम पर हमारे नेता मौन हैं। कबीर की कही हुई बातें समाज को गालियों की तरह महसूस होती हैं। कबीर की वाणी को गुनने की बजाय हम अपना अपना साधने में लिप्त हैं। एक बात और जो कबीर के बारे में करना जरूरी है वो है कि समाज में दलित साहित्य के रचने वाले कबीर को अपना पुरोधा मानते हैं किंतु कबीर ने यह सिद्ध कर दिया कि दलित व्यक्ति की पीड़ा को दलित के साथ साथ कोई भी भला मानुष गा सकता है। जो लोग कबीर की जाति खोज कर उन्हें दलित सिद्ध करने का असफल प्रयास करते रहे अंततः वो हार मान लिए। साहित्यकारो ने कबीर की जाति खोजने की कोशिश की। हजारी प्रसाद द्विवेदी, डा धर्मवीर भारती, पुरुषोत्तर अग्रवाल,आदि आदि वो साहित्यकार थे जो कबीर के लेखन के साथ साथ उसके परिवार जाति धर्म और हिंदू मुसल्मान, दलित और गैर दलित की परिभाषाओं में बांधने के लिए ग्रंथों की रचनाएं कर डाली, राजकमल प्रकाशन ने इस लेखन को जमकर कैश किया। कबीर की लुकाठी के साथ चलने की आवश्यकता हमारे देशवासियों को है। कबीर के अनुसार हमें अपने घर के अंदर के उस कालिख को खत्म करने के लिए और दाह करने के लिए तैयार रहना होगा जो पाखंड की कालिमा फैलाता है। कबीर के दोहे ,साखियों को गुनगुनाना ही उनकी उपस्थिति की साक्षी है। वार रे जुलाहे तुमने तो अपनी उदासी की चादर बुनकर समाज की उदासी को दूर करने के लिए अमरत्व प्राप्त कर लिया अंत में उन्हीं की ये पंक्तियां आपके सामने है जो बताते हैं कि कबीर भौतिक रूप से कैसे थे।
"जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी।'

अनिल अयान,सतना
९४७९४११४०७

"पालकी लिए हुए कहार देखते रहे"

"पालकी लिए हुए कहार देखते रहे"
समय की धरातल में अपनी पदचाप छोड़ने वाले गीतकवि नीरज अंततः चिरयात्रा के पथिक बनकर वहाँ चले गये जहाँ से सिर्फ यादें लौटकर आती हैं। गीत परंपरा के मूर्धन्य गीतकारों में सोम ठाकुर, गोपाल दास सक्सेना नीरज, मुकुट बिहारी सरोज, चंद्रसेन विराट की पंक्ति रिक्त हो गई। गीतों के स्वर्ण युग की दस्तक जैसे अचानक विलुप्त सी हो गई।दिनकर के द्वारा साहित्य की बाँसुरी की उपाधि से नीरज विभूषित ही सिर्फ नहीं थे बल्कि उनके गीतों की तानें बाँसुरी के समान सुमधुर और सुवासित मार्ग का विचरण करते हुए हम सबके मन में आहिस्ता आहिस्ता घर करती जाती थी। समाज के द्वारा मिली गरीबी ने उनहें टॊड़ने की नाकाम कोशिश की, वो गरीबी के लबादे को ओढ़कर और अमीर होते चले गये। उनकी कलम साहित्य रस को उड़ेलने के लिए अभिमुख होती चली गयी। नीरज के ९ दशक से ज्यादा अवसर मात्र और मात्र काव्य यात्रा में गतिशील रहे। उन्होने बताया की व्यक्ति शराब के नशे में भी गीतों को साध सकता है। शब्द ब्रह्म है और ब्रह्म की उपासना करना भी तपस्या है। इस तपस्या में जो सफल हो गया वो इस गीत गंगा में भिगो कर अमर हो जायेगा। यह सच है कि जिंदगी मौत से पराजित हो गयी किंतु नीरज की काव्य पंक्तियाँ बार बार अपनी प्रतिध्वनि कानों तक पहुँचा रही हैं।
एक शिक्षक के रूप में वो जितना धैर्यवान थे वैसे ही वो कवि के रूप में भी धैर्यवान रहे। व्यावसायिकता ने उन्हें जब मुम्बई की दहलीज तक ले गई तो उन्होने गीतों की भाषा और अदब को बनाए रखने की कोशिश की। इस अदब में जब वो खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे तो बालीवुड़ की दुनिया को अलविदा कहकर हमेशा के लिए काव्य मंचों की खातिर खुद को समर्पित कर दिया। उन्होने लगभग बीस कृतियों की रचना की तो इस तरह की हर कृति में अलग अलग रचनाएँ रही। लिखना उनके लिए जीवन जीने के लिए सांस लेने की तरह था। शराब की लत की बावजूद उन्होने अपने लेखन में गंभीरता और कल्पनाशीलता की मोहिनी सूरत बनाने में जीवन खपा दिया। सतना की धरती ने नीरज को अपना स्नेह दिया, साहित्य मर्मज्ञों ने नीरज जी को रात्रि से लेकर सुबह तक कई बार सुना, एक रचना को कई कई बार तक श्रोताओं की पंक्ति में बैठे साहित्यकारों की फरमाईस में उन्होने सुनाया। आज वह सब याद आ रहे हैं, यूसीएक का कवि सम्मेलन हो, या टाउन हाल के साहित्य समारोह सभी में नीरज की आवाज दीवारो के पोर पोर में घर कर गई। व्यावसायिकता के दौर में भी कवि सम्मेलनों की मर्यादायें कभी अमर्यादित होने का दुश्साहस नहीं कर सकी। वर्तमान कविसम्मेलनों की तुलना में उस समय के कवि सम्मेलन समाजिक और सुरुचिपूर्ण होते थे जो विरासत थे।उनका सतना आना और सतना के लिए अपने व्यवसायिक और व्यावहारिक जीवन के बीच समान्जस्य बनाना खुद में निपुणता ही है।
उनकी रचनाओं में गीतिका, गजलों,गीतों और दोहों ने भावों का इंद्रधनुष श्रोताओं के सामने खड़ा किया। उनकी कविताओं की हर पंक्ति में अजेय कवि जिंदा रहा। उनके गीतों के हर बंध में मनोबल को सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाने की बात की गई। सपनों के बिखरने के बाद भी नए सपने की तलाश में जाने वाले पथिक के रूप में उन्होने पाठकों और श्रोताओं को हमेशा ही ललचाया है। अश्लीलता को शब्दों की चार दीवारी से कोशों दूर फेंकने वाले नीरज ने आम जन की व्यथा कथा को जीवंत कर दिया। समाज की विशंगतियों पर उन्होने अपने दोहों के माध्यम से और संकेतात्कम रूप से वो सब लिखा जिसे आम मंचीय कवि सुनाने और पढ़ने से परहेज करते हैं। उन्होने अपने दोहों में मानव जीवन का दर्शन, व्यक्तित्व का दर्शन, मानव व्यवहार, और उस आत्क दर्शन की बात की जिसे पढ़ने के बाद अपनाने की चेष्टा हर कोई करता है। तालियों की लालसा के परे उनका काव्य पाठ श्रोताओं की कुछ पंक्तियों तक अनवरत चलता रहा। फिल्मों में उन्होने चुनिंदा गीत लिखे लेकिन जितने भी लिखे वो सदाबहार गीतों की श्रेणी में आज भी मौजूद हैं। गीतों में हर रस को उन्होने स्थान दिया। करुणा से लेकर श्रंगार, आवेश से लेकर कैब्रे, स्लो मोशन से लेकर तन बदन में आग लगा देने वाले गीत भी उनके खाते में आज भी ब्याज कमा रहे हैं।
आज नीरज चले गये। कहार पालकी लिए खडे उनके निकलने का इंतजार करते हुए  किंतु वो तो अपनी चिर यात्रा में तैयार होकर निकल गये। सब कारवां देखते रह गये। कहारों के हाथों में सिर्फ रह गया तो वह था गुबार। गीतों का एक स्वर्ण युग समाप्त हो गया। गीतकारों की वो उतर प्रदेशी नवाबी ठाठ समाप्त हो गई। वो बंडी और लुंगी लगाये मुस्कुराता हुआ कभी ना बूढा होने वाला हमेशा जवान रहने वाले गीतों की वो विरासत हम सबको सौंप करके चला गया जो अतुलनीय धरोहर है। समय ने साहित्य और फिल्म जगत दोनों को एक साथ चकमा देकर एक कोहिनूर छीन कर ले गया। अब शायद उस तरह के कवि सम्मेलन भी न मिले उनके पद धूलि में चलने वाले डा विष्णु सक्सेना की काव्य पंक्तियाँ कहीं न कहीं उनकी धरोहर को ढोती रहेगी। हम नीरज को याद रखेंगें यह वायदे से ज्यादा साहित्य में लिखे जा रहे गीतों की माँग है। जब भी हमें सदाबहार स्वर्णयुगीन गीतों को सुनना होगा। हम सोम ठाकुर से होते हुए नीरज और चंद्रसेन विराट तक आ ही पहुँचेगें। समय की जाजम में सबके अपने सलीब हैं उसके जिस सलीब को हमने अपनाया और मनोयोग से सुना था वो है नीरज जी। वैसे तो साहित्य की उर्वरा धरा युगों में गीतकारों को पैदा करती रहेगी किंतु नीरज का जाना शायद वाचिक परंपरा में गीतों की खान और गीतों की जुबान का मौन हो जाना है।
अनिल अयान,सतना

९४७९४११४०७

ना दैन्यं ना पलायनम का संदेश देते कविवर "अटल" बिहारी

ना दैन्यं ना पलायनम का संदेश देते कविवर "अटल" बिहारी

आग्नेय परीक्षा की इस घडी में / आइये अर्जुन की तरह उद्घोष करें/ ना दैन्यं ना पलायनम
आग्नेय परीक्षा की इस घडी में/ आइये अर्जुन की तरह उद्घोष करें/ ना दैन्यं ना पलायनम- अटल बिहारी बाजपेयी
ना दीन बनूँगा और ना ही पलायन करूँगा,अंत तक लडता रहूँगा.एक सफल जीवन जीने का यही संदेश है,
विगत दिनों नागपुर की यात्रा के दौरान पता चला कि अटल बिहारी बाजपेयी नहीं रहे। मन में एक विचार कौंधता रहा कि अगर मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। अटल भी भारत के लिए अटल सत्य रहे। जब अपने पुराने समय में लौटता हूँ तो मै उस समय पाँचवीं मे पढ़ रहा था जब अटल जी तेरह दिन के लिए प्रधानमंत्री बने थे। फिर तेरह महीने के लिए प्रधानमंत्री और फिर हम सब जानते हैं। कालेज के समय में जब मैने एनसीसी लिया तो उस समय पर हमने समूह गान गया उसके बोल थे- कदम मिलाकर चलना होगा। बाधाएं आती है आएं। छाए काल की घोर घटाएँ। कदम मिलाकर चलना होगा। अटल जी के व्यक्तित्व की व्याख्या करती ये पंक्तियाँ उनके राष्ट्रधर्म का प्रतीक रहीं। उसके बाद जब पाठक मंच से मै जुड़ा तो उनकी एक पुस्तक आई ना दैन्यं ना पलायनम। इस पुस्तक में उनकी बहुत सी कविताएं साक्षात्कार और उनका कविधर्म की व्याख्या थी। अटल जी का अटल भारत और और अटल राष्ट्रप्रेम उन्हें अपने कर्मपथ पर अटल बना दिया। वो जब तक रहे अटल रहे। उस पुस्तक में जो मैने उनके बारे में जाना उनके बारे में इंटरनेट के खोज से वो कहीं ज्यादा था। उन्होने स्वाधीनता विनोवा भावे,कवियों राष्ट्रभाषा आदि पर बहुत सी कुंडलियाँ लिखी है. चिंतन के स्वर में अंतर्मन की वेदना, सत्यनिष्ठा ,स्वराज, की कवितायें चतुष्पदी और कुंडलियों में बंधी हुई है. आपातकाल के स्वर में आपातकाल के भयावह दॄश्यों को पँक्तियों की भाव भंगिमाओं में संजोया गया है. जिसमें अनुशासन पर्व ,अंधेरा कब जायेगा, भूल भारी की भाई, मीसामंत्र महान. विविध स्वर में समाजिक विसंगतियों, पर्वों,पर्यावरण, वृद्धों तथा अन्य विषयों पर कवि ने कलम चलायी है.राष्ट्र स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और १९३९ सन से कविता के प्रति झुकाव को भी पाठकों के सामने लाया है. अटल जी ने संपादक के रूप में राष्ट्र धर्म,पांचजन्य,दैनिक स्वदेश, चेतना, वीर अर्जुन, आदि पत्रों को सम्हाला है, मृत्यु या हत्या, अमरबलिदान , कैदी कविराय की कुंडलियाँ, अमर राग है, मेरी इक्यावन कवितायें, राजनीति की रपटीली राहें, सेक्युलरवाद, शक्ति से क्रांति,न दैन्यं न पलायनम, नई चुनौतियाँ नया अवसर है।
अटल जी को साहित्य विरासत के रूप में श्याम लाल वाजपेयी वटेश्वर पिता जी और अवधेश वाजपेयी बडे भाई से मिला था. प्रसाद,निराला,नवीन, दिनकर,माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कवियों, जैनेंद्र, अज्ञेय,वॄंदावन लाल वर्मा, तसलीमा नसरीन, जैसे लेखकों भरत,जगन्नाथ मिलिंद रामकुमार वर्मा जैसे नाटककारों के मुरीद है. समाजिक समरसता के लिये उनकी विचारधारा उच्चकोटि की है. उनकी एक कविता युगबोध में भी राष्ट्र कवि, निराला, दिनकर के, क्रमशः साकेत ,राम की शक्ति पूजा, और उर्वशी को विशिष्ट प्रकार से उद्धत किया। एक कवि होने के नाते मुझे लगता है कि अटल जी की कवितायें एक व्याकरणिक छंद बद्धता के मर्म को स्पष्ट करती है. परन्तु आज के समय पर प्रताडित आम जन सर्वहारा वर्ग, शोषित लोगों की पीडा का बखान करने में प्रतिनिधित्व करती नजर आती है. अटल जी भी उमर भर चिंतन की अल्प अवधि की समस्या से घिरे रहे। अटल जी जीवन कवित्व और राजनीतिज्ञ के रूप में हम सबके सामने रहा। संपादक के रूप में उनके संपादन से जितनी भी पत्रिकाएँ निकली वह हमारे पत्रकारिता के इतिहास में अमर हो गईं। उनकी कविताएँ अनुशासन पर्व की मुनादी बन गई।
अटल जी का राजनीति में प्रवेश तब हुआ जब स्व. जयप्रकाश नारायण ने जन संघ का सोपान प्रारंभ किया। अटल बिहारी का प्रारंभिक समाजवादी जीवन उस समय घुटने टेक लिया जब उन पर संघ के प्रचारक और पूर्णकालिक स्वयंसेवक होने का राष्ट्रप्रेम अपने अभीष्ट रूप में था। सत्ता के मोह को त्याग कर चरित्र के लिए सत्ता को किनारे कर देने वाले अटल जी ने विपक्षी और विरोधी के महीन अंतर को समझा भी जाना भी और माना भी। उन्होने कांग्रेस के स्व. राजीव गांधी के उस सहयोग को कभी नहीं भूला जिसमें राजीव जी ने अपने प्रधानमंत्री काल में अटल जी के किडनी के इलाज के लिए पुरजोर सहयोग किया था। अटल जी कवि होने के साथ साथ प्रखर राजनीतिज्ञ, विदेश मंत्री के रूप में मोरार जी देसाई के पंचवर्षीय योजना में अपना स्तंभ गाड़ने वाले विशेष जन प्रतिनिधि रहे। उदीयमान भाजपा को वर्तमान भाजपा के रूप में लाने के लिए उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है। अटल जी की विदेशी नीति के कुछ उदाहरण तो मैने अपनी आंखों से देखे। जिसमें पोखरण में परमाणु परीक्षण, संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषा का प्रयोग करके इतिहास कायम करना, विदेशों में भी वही बंगाली अंदाज से धोती कुर्ता और कोटी का पहनना, पाकिस्तान के साथ बस यात्रा और फिर कारगिल युद्ध में विदेशी सहयोग को नकारते हुए अपने विरोधी पाकिस्तान से खुद ही निपटने के लिए तैयार होना विशेष उदाहरण है। काश्मीर की माँग में अटल का पाकिस्तान माँगना भी इतिहास में दर्ज रहा। सन एकसठ में पाकिस्तान के अस्तित्व को खत्म करने की बात, सन तिरसठ में चीन से कब्जे की जमीन को वापिस भारत में मिलाने की बात, सन उनसठ में तिब्बत पर सरकार की साफगोई भी उनकी विदेशी निपुणता का प्रतीक रहा।
अटल जी का राजनीति में पूर्वाग्रह भी काफी कारगर सिद्ध हुए। इसका एक उदाहरण तत्कालीन मंत्री यशवंत सिन्हा और जशवंत सिंह के मंत्रालयों में फेर बदल का अनुमान तेरह महीने के बाद वाली सरकार में देखने को मिला। बिल क्लिंटन की भारत यात्रा और आगरा भारत पाक मैत्री सम्मेलन, बाघा बार्डर के बहाने एक दिन के लिए लाहौर तक चले जाना, फिर भारत नई दिल्ली से इस्लामाबाद तक बस सुविधा कुछ पडो़सी मुल्कों के साथ मैत्री संबंधों में प्रगाढ़ता को हम सबके सामने रखते हैं। हालाँकि उसके बाद कारगिल युद्ध की विभीशिका से भी अटल जी का राजनैतिक सोच ने ही सेना की मदद की किंतु यह तय था कि अटल जी यदि राजनीति में न होते हो कवि जरूर होते। इस बात से भी कोई गुरेज नहीं है कि भाजपा ने अटल आडवानी और जोशी की तिकडी को यूपीए की सरकार के बाद भाजपा से नेपथ्य में खड़ा कर दिया। कोई पूँछताँछ नहीं ली गई और अटल जी का अंतिम जीवन काल एकाकी और एकांतवास की तरह गुजरा।अटल के सिद्धांतों वाली राजनीति अब इस देश में देखने को न मिली और ना मिलेगी।कविवर अग्रज अटल जी का साथ छूट गया भौतिक रूप से साहित्याकाश से। इमरजेंसी की उनकी कविताएं मर्म तक को झगझोर देती हैं। राजनीति ने उनकी लेखनी को अल्प विराम दिया। भाजपा चाहती तो अटल जी के अवदान को स्वर्णाक्षर से इतिहास मे दर्ज करने मे योगदान उनके जीते जी कर सकती थी।पर अब बहुत देर हो गई है अनुमानतः। अटल जी का तन मन और जीवन वचन सब कवितामय रहा। बहुत कुछ कहना चाहता हूं पर अभी अटल जी के अटल लेखन को उनकी इस और मेरी पसंदीदा कविता मे एक कविता रखकर एक रचनाकार अपने अग्रज रचनाकार को याद रखने के लिए कृतसंकल्पित है। अटल जी की एक कविता जो शुरू से मन को छूती रही वो थी- यक्ष प्रश्न।।
जो कल थे,/वे आज नहीं हैं।/जो आज हैं,वे कल नहीं होंगे।/होने, न होने का क्रम,/इसी तरह चलता रहेगा,/हम हैं, हम रहेंगे,/यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।/सत्य क्या है?/होना या न होना?/या दोनों ही सत्य हैं?/जो है, उसका होना सत्य है,/जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।/मुझे लगता है कि/होना-न-होना एक ही सत्य के/दो आयाम हैं,/शेष सब समझ का फेर, /बुद्धि के व्यायाम हैं।/किन्तु न होने के बाद क्या होता है,/यह प्रश्न अनुत्तरित है।/प्रत्येक नया नचिकेता,/इस प्रश्न की खोज में लगा है।/सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है।/शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा।/यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें/तो इसमें बुराई क्या है?/हाँ, खोज का सिलसिला न रुके,/धर्म की अनुभूति,/विज्ञान का अनुसंधान,/एक दिन, अवश्य ही/रुद्ध द्वार खोलेगा।/प्रश्न पूछने के बजाय/यक्ष स्वयं उत्तर बोलेगा।- अटल बिहारी वाजपेयी। इसी के साथ एक अग्रज कवि को एक अनुज कवि की शब्दपूरित श्र्द्धांजलि

अनिल अयान

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शिक्षक दिवस मे शिक्षक की उपादेयता

शिक्षक दिवस मे शिक्षक की उपादेयता

समम के साथ शिक्षा का रूप, स्वरूप, प्रारूप बदला है। स्वाभाविक तौर पर जब शिक्षा का रूप बदला तो शिक्षक का रूप भी बदला है। डा राधाकृष्णन के जन्मदिन को मनाने के पीछे शिक्षको के जिस उत्थान, उन्नयन और उपमान की कल्पना की गई थी उसके रूप को बदलाव की हवा लग चुकी है। अब तो गुरूता लिए हुए गुरूओं और वर्तमान शिक्षकों के बीच जमीन आसमान का अंतर हो गया है। पहले की शिक्षा मे शिक्षक केंद्र मे था तो उसका सम्मान था।वह विषय के अतिरिक्त छात्र के जीवन में उपस्थित होकर जीवन मूल्यों का अध्यापन करता था। बच्चे कक्षाओं के बाद भी गुरुओं को याद करते थे।

आज के समय मे करके सीखने और बालकेंद्रित शिक्षा का जमाना है। बच्चा केंद्र की धुरी मे है। तीन भुजा मे शिक्षक शिक्षा और स्कूल है। डा राधाकृषणन ने जिस समाजोपयोगी संस्थिन के रूप मे स्कूल को अपने सिद्धांतों मे स्थापित किया था वह तो पूरी तरह से शिक्षा उद्योगों मे बदल चुके हैं। जहां शिक्षक सेल्समैन, मार्केटिंग का कामगार और कारीगर के रूप मे है। बच्चा एक उत्पाद, पालिसी या बांड है। शिक्षकों को अधिक नंबर लाने वाले प्रोडक्ट के निर्माणकर्ता के रूप मे प्रशिक्षित किया जाता है। थोक का थोक इन प्रशिक्षणशालाओं मे गैर गुजरे युवाओं को बाई चांस मे मिले इस अवसर को पैसे और सोहरत मे बदलना सिखाया जाता है। बाई च्वाइस आजकल कम ही शिक्षक मिलते है। आज तो शिक्षक जैसे लोग पांच सौ से कम वेतन मे भी काम करने के लिए तैयार हैं। यह भी शिक्षा जगत का दुर्भाग्य भी है। सारे अनर्गल काम करने के लिए शासन को शिक्षक ही खाली मिलता है।

 कभी कभी मन मे सवाल उठता है कि शिक्षक दिवस किन शिक्षकों के उत्थान के लिए है।स्कूल के शिक्षक, ट्यूशन के शिक्षक, कोचिंग के शिक्षक, सरकारी शिक्षक, या प्राइवेट सककूल के शिक्षक, मेहनती लगनशील और पारिवारिक सामाजिक उपेक्षा के शिक्षक या फिर  अच्छी पहचान और पहुंच रखने वाले बच्चों को अधिक नंबद दिलाने का लालच देने वाले व्यवसायी शिक्षक, और सोंचे तो एक दिन के लिए स्कूल मे जाकर शिक्षकों मे अपना रूतबा दिखाने वाले सरकारी अधिकारी रूपी शिक्षक के लिए। 

आज के समय पर शिक्षक निहत्था है। उसकी स्थिति कुछ इस तरह है - पीछे बंधे हैं हाथ और शर्त है सफर किससे कहूं कि पांव के कांटे निकाल दो।।। शिक्षक पाठ्यक्रम के बाहर नहीं जा सकता, शिक्षक बच्चे को डांट नहीं सकता अनुशासन तो बहुत दूर की बात है, शिक्षक बच्चे को कक्षा मे खड़ा नहीं कर सकता, प्राचार्य की अवहेलना नहीं कर सकता, नवोन्वेषी रास्ता अपना नहीं सकता, विषय पर अपना अनुभव नहीं बता सकता, अपने मापदंडों के अनुरुप मूल्यांकन नहीं कर सकता,  वह तो एक खांचे मे सेट किया हुआ मानव रोबोट सा बन कर रह गया है। तब भी यह मूर्ख समाज उसे भविष्य का निर्माता कहता है। वह धरासायी हो चुके पाठ्यक्रम को बैलगाडी मे जुते हीए बैल की तरह ढो रहा है साहब। बडे अधिकारियो और शासन के ब्यूरोक्रेट्सस तय कर रहे हैं साहब कि शिक्षक क्या कब कैसे पढाएगा। और तो और इस व्यवसाय मे शिक्षक हमेशा थैंकलेस रहा है भले ही वह कितना गहरा थिंक टैंक रहा हो।

डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को मनाना हम सबके लिए गर्व की बात है। किंतु अब वर्तमान परिस्थितियों मे शिक्षक के हाल को देखते हुए लगता है कि कहां शिक्षक और कहां राधाकृष्णन जी। दोनो एक दूसरे के पसंघे हो गये है। राधाकृष्णन के सिद्धांतों के अनुरूप विश्व भी एक विद्यालय है।शिक्षक को पाठ्यक्रम के अतिरिक्त बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने की कला सिखाना चाहिए। परन्तु पढे लिखे गुलाम की तरह शिक्षक जीवन यापन कर रहा है और बाजार मे अपने को स्थिर बनाए रखने मे जग्दोजहद कर रहा है उस बीच वो सम्मानित कब होता है। सितंबरी शिक्षक सम्मान का बाकी अपमान का शिक्षक बना रहता है। फिर किस बात का शिक्षक दिवस। विद्यालयों मे शिक्षक एक कर्मचारी ही है हुजूर।वह सबकी सुनता है सबकी सुनकर हां मे हां मिलाने की कोशिश करता है। क्योंकि वो जानता है कि अगर कुछ भी इधर उधर हुआ तो विद्यालय प्रबंधन कारण बताव नोटिस देकर उसे बाहर का रास्ता दिखा देगा।

वर्तमान और भविष्य मे शिक्षक एक टूल बनकर यह जाएगा। वो औजार जिसका कोई पूरक नही बना शिक्षा जगत में। बाकी राष्ट्रनिर्माण, भविष्य उत्थान करने वाला पुरोधा जैसी उपाधियां सिर्फ अतीत के पन्नों मे लिखी सूक्तियां बनकर रह गया है। शिक्षक का वेतन सेवा शुल्क अन्यकामगार से बहुत कम है।उसके लिए मथोचित सुविधाएं नहीं है। सरकार शिक्षकों को श्रमिक तो मानती है किंतु श्रमिक के रूप मे सुविधाएं देने के लिए हाथ खडा कर लेती है। यह दोगला चरित्र ही शिक्षकों के समाजिक और राष्ट्रीय सम्मान के  पतन का कारण है। जब तक यह सौतेला रवैया , संविदा और ठेकेदारी का रवैया, श्रय साध्य मानकर भी स्वीकार न करने का रवैया, शिक्षक को एक बुद्धिजीवी गुलाम मानने का रवैया, नहीं बदला जाएगा । जब तक शिक्षक को सामाजिक सुदृढता, आर्थिक आत्मनिर्भरता , मौलिक अधिकार नहीं मिलेगा तो चाहे जितने शिक्षक दिवस के पर्वों मे शिक्षके के जीते जागते पुतले बिठा लिए जाए वो सिर्फ कठपुतली के नाच की तरह मनोरंजन का साधन ही बने रहेंगें।

अनिल अयान


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नेपथ्य में बिलखती हिंदी

नेपथ्य में बिलखती हिंदी
एक सितम्बर से १४ सितम्बर तक की गतिविधियाँ हिंदी के लिये समर्पित रहती हैं. राजकाज की भाषा के विकास और उत्थान के कसीदे सीमा से परे हो कर पढे गये.हिंदी के सेवक हिंदी की सेवा करते दिखे.अन्य लहजे में कहें तो गाहे बगाहे हिंदी से अपनी सेवा करवाने वाले इस पखवाडे में हीं सिर्फ हिंदी की दिखावटी सेवा कर मेवा पाने का प्रयास हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी करके कल ही फुरसत हुये.यदि हम परिणाम की बात करेंगें तो यह भी बेमानी होगा.राजभाषा के पखवाडे में जितने लोग और विद्वान दिखने वाले लोग माइक के सामने हिंदी को ऊपर उठाने की बात करते है वो ही सही मायनों में हिंदी को राष्ट्रभाषा न बनाये जाने के पैरोकार है.  क्योंकी यदि हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो गई तो उनकी अच्छी खासी आमदनी वाली दुकान में ताला लगा समझिये. कहने को आज के समय में हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु कई संस्थायें है जिनको शासन और सरकार ने हिंदी के विकास के लिये बहुत सी जिम्मेवारी सौपी है. परन्तु यहाँ भी रेवडियाँ ही बाँटी जा रही है. अपने अपने दफ्तरों में बैठ कर इनके अधिकारी सरकारी दामाद बने बैठे है अधिक्तर योजनायें और खर्च करने के लिये सरकार के द्वारा दिये जाने वाला फंड लैप्स हो जाता है और गाहे बगाहे सितम्बर माह मे हिंदी के कसीदे पढने के लिये समाज और देश भर में निकलते है.
संविधान सभा में जब हिंदी की स्थिति को लेकर जब दो दिवसीय चर्चा का आयोजन १२ सितम्बर १९४९ से १४ सितम्बर १९४९ तक हुआ तब भी तत्कालिक राष्ट्रपति स्व. डा राजेन्द्र प्रसाद, ने अंग्रेजी में ही अपना उद्बोधन दिया. प्रधान मंत्री स्व.जवाहर लाल नेहरू ने अंग्रेजी की पैरवी ज्यादा की थी. तब से लेकर आज तक भाषा संबंधी अनुच्छेदों राजभाषा अनुच्छेद ३ ग और १४ क में तीन सौ से अधिक बार संशोधन किया गया जो आज के समय में भाग १७ के रूप में संविधान में उपस्थित है. संवैधानिक स्थिति के अनुसार तब से आज तक भारत की राजभाषा हिंदी है और अंग्रेजी सह भाषा है. तब से लेकर आज तक संविधान सभा की अनुशंसा में इस १४ दिन राजभाषा पखवाडे के रूप में मनाये जाने लगे.उस वक्त डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देवनागरी लिपि को भारत की राष्ट्रीय लिपि बनाने की भी अनुशंसा की थी परन्तु उस बात को आज भी दबा कर खत्म कर दिया गया.
एक वह दिन था और एक आज का दिन, राज भाषा पखवाडा का चलन जगत में चलने लगा .हर छोटी बडी संस्था राजभाषा के प्रचार प्रसार के साथ राष्ट्रभाषा के रूप में स्थान दिलाने के लिये हर वर्ष एक नाटक का मंचन करते है. परन्तु परिणाम सिफर होता है.प्रायोगिक रूप से देखे कि हिंदी हमारी रोजमर्रा की भाषा रही है. परन्तु आज के समय में भागदौड और बाजारवाद के अवसरो के दरमियान यह भी हिंदी और इंगलिश का मिश्रित रूप हो गई है.जिसे आज के समय हिंगलिश के रूप में जाना जाने लगा है.जो आज भी चलन में है.विशुद्ध हिंदी या यह कहें की तत्सम और तद्भव शब्दों से बनी हिंदी से कार्य और ज्यादा दुरूह् हो रहे है. अधिक्तर हिंदी माध्यम विद्यालय अंग्रेजी माध्यम मे बदल गये है. यहाँ तक आगामी पीढी को अंग्रेज बनाने की कवायद हम नर्शरी से शुरू कर देते है. आज के समय में अंग्रेजी ना बाँच पाने और बोल पाने वाला व्यक्ति अनपढ और गंवार समझा जाने लगा है.
सिविल सर्विसेस परीक्षा का बखेडा अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है. ऐसी स्थित में राष्ट्र भाषा तक पहुँचने की कवायद बेमानी सी नजर आती है. आज के समय में अधिक्तर राजकीय काम अंग्रेजी से होता है. ऐसा लगता है कि हिंदी पहले कभी भाषा की माकान मालिक थी आज तो वह अंग्रेजी के फ्लैट में किराये से रहने को मजबूर हो चुकी है. हम जिस बहुभाषावाद के सिकंजे में फंसते जा रहे हैं उससे यही परिणाम निकलेगा कि मूल हिंदी के शब्द बिलखते नजर आयेगें और अन्य भाषाओं जैसे फारसी, उर्दू ,अरबी, के मिश्रण से हिंदी अपने में ही गुम हो जायेगी। आज के परिवेष में भले ही हम  इस बात के लिये दंभ भरते हों कि हिंदी सिर्फ भाषा नहीं वरन बाजारवाद का पर्याय बन चुकी है तो उन्हे मै इस बात से अवगत कराना चाहता हूँ कि हिंदी आज के समय में अपनी राजभाषा की अस्मिता बचाने में असफल हैं। आज के समय में अधिक्तर राजकाज हिंदी की बजाय हिंदी और अंग्रेजी में हो रहा है। राजस्व और न्यायालय की भाषा आम जन से कोसों दूर नजर आती है। और उच्च शिक्षा,बाजार,तकनीकि तक में हिंदी और अंग्रेजी का मिश्रण हिंगलिश पर्याप्त सुख भोग रही है।
  क्या इसी तरह से हिंदी का विकास होगा. आज जरूरत है कि यह प्रयास हो कि इस तरह की संस्थाओ के अस्तित्व को समाप्त कर संयुक्त आयोग गठित करने की. जमीनी स्तर पर प्रयास किया जाये. जागरुकता अभियान चलाये जाये. शिक्षा विभाग उच्च शिक्षा विभाग का सहयोग बच्चों और युवाओं में हिंदी के प्रति रूझान बढाने में मदद करे. अन्य राज्यों में भी हिंदी भाषियों को स्थान और सम्मान मिलने के साथ साथ रोजगार मिले. वरना हिंदी का अस्तित्व खतरे में आन पडा है कुछ राज्यों को छोड कर हिंदी के बोलने वाले वख्ता कम होते जा रहे है. अन्य भाषी राज्य हिंदी को अपने राज्य के लिये कलंक समझते है. हमें अपने मन के भ्रम को टॊड कर वास्तविकता की जमीन मे कदम बढाना होगा और हिंदी को पहले धरातल मे घर घर की बोली बनानी होगी.
हिंदी को यदि वास्तविक स्थान दिलाना है तो सिंहासन में बैठ हिंदी की तंदूर में अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकना बंद करना होगा। सर्वप्रथम हिंदी को भारत में सम्मानजनक स्थान और राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिये राजनैतिक और संवैधानिक पहल करनी होगी। इस हेतु अन्य राज्यों का भी समर्थन जरूरी होगा।। जब हिंदी को अन्य भाषी राज्यों में भी उतना ही स्नेह मिलेगा जितना कि गिनती के हिंदी भाषी राज्यों में मिल रहा है तभी कुछ बेहतर हो सकता है। अन्यताः यह पखवाडा पितृ पक्ष के पंद्रह दिनों की तरह हर वर्ष मनाया जाता रहेगा और संबंधित संस्थान, विभाग, विश्वविद्यालय और हिंदी के चाटुकार सेवक लाभान्वित होते रहेंगें। अंग्रेजी हिंदी का अपहरण कर अपना लबादा उसे पहनाती रहेगी और हम बाजार में खडे होकर अपनी सहूलियत के लिये हिंगलिश को ससम्मान से अपनाते रहेंगें।हिंदी का बिलखना कब विलाप और उसके अंतिम सांसों की डोर बन जायेगा हम पहचान नहीं पायेंगें।
हम सबके अंदर हिंदी रक्त में प्रवाहित हो रही है और यही प्रवाह हमें हिंदी के रक्षक के रूप में स्थापित करने की उर्जा देता है। यह बात अलग है कि व्यवसायिकता के युग में हिंदी को लेकर सत्ता पक्ष और उनके नुमाइंदे इतने सक्रिय और योजनायुक्त नहीं नजर आते जितना कि हिंदी के प्रति आस्था रखने वाले पाठक श्रोता और परिवारजन, हिंदी की कथा तो अनंत है हिंदी को दिगंत तक पहुँचाने के लिए हम दृढ़संकल्पित हैं, यह कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हमारे आसपास कितने लोग साथ देने के लिए आगे आते हैं भाषा के लिए यदि हमारे इरादे में घोल मोल नहीं है तो फिर दस कदम साथ चलने वाले चंद्र सेवी तो मिल ही जाते हैं। हिंदी के लिए हिंदी का पाठक वर्ग ही उसका पालनहार हो सकता है। नकारात्मकता की उर्जा के साथ हमें नयी सुबह का इंतजार हृदय की भाषा के लिए करना चाहिए।राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिये अन्य भाषा भाषी राज्यों को अपने पक्ष में करना होगा. अभी फिल हाल यह प्रयास होना चाहिये कि हर दिवस हिंदी दिवस हो. हमें हिंदी को जनसुलभ,सर्वसुलभ,और अपनी आगामी पीढ़ी को हिंदी और इसकी बोलियों के बारे में कम से कम साक्षर करने की कोशिश होनी चाहिए। अपने घर में अजनबी की तरह हिंदी न हो इस चिंता को चिंतन में परिवर्तित करना होगा।

अनिल अयान,सतना
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